Update 03

वहा सलमा अपनी निगाहे काव्या के साफ गोरी चूत से हटा ही नही पा रही थी. क्यों जाने उसको उस समय काव्या पे बहुत ज़्यादा जलन आने लगी थी. उसकी चूत जो के जवानी के चरम पे थी काव्या के सामने मानो फीकी गिर गयी थी. अब वो काव्या से दूरी नही बल्कि नज़दीकिया बढ़ाना चाहती थी शायद उसको भी स्त्री के सौंदर्य की पहचान हो रही थी.

उसने वैसे ही काव्य के योनी पे नज़ारे गड़ाकर कहा, "जी ज़रूर बीबीजी. मैं आपकी हर बात मानूँगी वो ‘वाकस’ करना आप मेरा भी."

वॅक्स को वाकस बोलने वाली सलमा को काव्य हर बारी की तरह थोडा हंस के हा मे जवाब दे दिया. उसके पेशाब से निकली हर बूँद मानो एक खुश्बू लेके निकल रही थी जिससे पूरा समां मादक बन गया था. तभी अचानक झाड़ियो से एक हल्का हवा का झोंका भागा चला आया. दोनों के पैरो के नीचे वो बह के निकल गया.

“आह....स्सीई....”

एक बहुत हलकी सी सिसकारी काव्या ने छोड़ दी. पहली बार खुले में पेशाब करने वाली काव्या को ये अनुभव एक ऐसी भेट दे दिया के उसके योनी में सिरहन की लाट आ गयी. वो आवारा हवा का झोंका उसके नाजुक कमसिन योनी के फाको को छु कर जो गुजरा था. जो उसको भरी गर्मी में भी ठंडी की राहत दे बैठा.

कुछ देर बाद दोनो का मूतना बंद हो गया. काव्या ने अपने पास से एक टिश्यू पेपर निकाला और अपनी चूत को साफ़ करने लगी. उसपे कुछ एंटीबायोटिक भी था जिससे कोई इन्फेक्शन न हो. ये सब सलमा को कहा पता. उसको देख के काव्य ने तीन-चार पेपर निकाले और सलमा को देते हुए कहा, "ये लो, तुम भी. पेशाब के बाद वहा इससे साफ करती जाओ"

सलमा जो ये सब बाते पहली बार देख रही थी उसने हैरत से पेपर लिया और ठीक काव्या को देख वैसे ही खुदकी चूत को साफ करना आरंभ किया. उसके बाद जैसे ही दोनो खड़ी हुई उनको देख दोनो कलूटे धीरे से वहा से निकल गये और वापस ऑटो की तरफ भागने लगे. वहा सलमा अपनी सलवार फिर से चढ़ा रही थी और काव्या भी अपनी प्यांटी वापस अपने कोमल अंगो पे खिसका रही थी. महंगी साड़ी ठीक करके उसने साड़ी को निचे कर दिया. जाने कितनो का दिल जैसे उसने तोड़ दिया हो. अचानक से उसकी जवानी फिर से ढक जो गयी थी. देर तक हवा में रहने से उसका पिछवाड़े को ठंडक महसूस हो रही थी. न जाने क्यों उसको अब ये सब अच्छा लगने लग रहा था.

शहर की डोक्टोरिन साहिबा को देहाती जीवन में रूचि आने लगी थी शायद ये दिलचस्पी उसको आगे और कही नए रोमांच का किरदार बनाने वाली थी. दोनों ने पेपर बाजू में फेक दिये और वापस ऑटो की तरफ चल पड़ी.

यहा सुलेमान और सत्तू जो अभी अभी काव्या के अप्सरा जैसे बदनको उसके सुनहरी नंगे पिछवाड़े के साथ देखके आ रहे थे वो दोनों जल्दी से ऑटो मे जाके बैठ गये. दोनो के दिमाग़ मे से वो तस्वीर जाने का नाम नहीं ले रह थी.

सत्तू अपने पजामे के ऊपर हाथ मलते हुए सुलेमान से बोलता हैं," सुलेमान मिया...क्या माँदरज़ाद गांड हैं इस डोक्टोरनी की...बड़ा मज़ा आ गया.. बेहनचोद पहली बार अखी ज़िन्दगी में ऐसी माल औरत देखि हैं. साला लवडा है के तम्बू के माफिक खड़ा हो गया"

जब उसने सुलेमान की तरफ देखा तो उसने उसको खोया खोया पाया. सुलेमान जो अपने शैतानी दिमाग़ के सोच मे जो डूबा था.

सत्तू ने उसको जोर का धक्का मारा और बोला, "अरे ..भाई किधर खो गये तुम? हमरी बात तनिक सुने हो के नाहीं?"

उसपे सुलेमान बोला, "अबे चुतिए..इतना जोर का धक्का क्यों मारा? सोया नही मैं सोच रहा था.."

“क्या गुरु? मुझे भी बताओ आखिर क्या सोच रहे हो?”

सत्तू ने बड़े गौर से और सुलेमान की चापलूसी करते कहा. सत्तू को पता था सुलेमान का दिमाग इन बातो में कैसे तेज तर्रार चलता हैं. सत्तू को उसने अपने तौरतरीके जो सिखाये थे. मानो वो उसका चेला हो और ये गुरु. और वो सच भी था. सुलेमान ने सत्तु को अपने झोली से बहुत कुछ दिया था. जैसे शहर की रंडियों से मिलवाना, जुवा सिखाना, और खुबसूरत औरतो के अंतरिम अंगों के नजारों के दर्शन करवाना.

सुलेमान और सत्तू थे तो मजदूर उच्चके पर अपने शोक को वो शान से पालते. खासकर चिंधी चोर सुलेमान को शहर में घूमना, औरतो को टटोलना, किसी साहब की तरह रहना बड़ा पसंद था. जब पहली बार सत्तू सुलेमान के साथ बड़े शहर गया था, तब कोठे पे जाने के बाद वो एक बड़े से शौपिंग मॉल के अन्दर गए थे. वहा के नज़ारे देख के दोनों को ऐसा प्रतीत हुवा मानो वो किसी स्वर्ग में आ गये हो. चारो तरफ सुन्दर और जवानी से भरपूर मॉडर्न औरते और लडकिया. सत्तू वो बात कभी भूलनेवाला नहीं था, के कैसे सुलेमान ने वहा पे एक हाई प्रोफाइल औरत के पिछवाड़े को भीड़ में कस-कस के मसला था. सत्तू की हिम्मत तो नहीं हो पायी पर, इसके बाद सुलेमान उसके लिए किसी गुरु के माफिक बन गया था.

जब आशावादी होकर सत्तू ने सुलेमान से पुछा तब सुलेमान अपने खड़े नंगे लंड पे जो लुंगी के आधा बाहर था उसपे हाथ मलते हुए बोला, "अबे भूतनी के, यही के इस डॉक्टोरिनिया को नंगी कैसे किया जाये, चोदा कैसे जाए....साली क्या माल हैं..अंगार हैं..आज तक मैने ऐसी गांड नहीं देखा ...साली को अपना लंड खिलवाना ही पड़ेगा.आह...हरामी लंड"

सुलेमान को शायद काव्या की सुनहरी मखमली भरा हुआ पिछवाडा देख याद आया के कैसे एक बार उसने ज़बरदस्ती रजनी नाम के धन्देवाली की गांड मरवा दी थी. उसको उसमे बड़ा मज़ा आया था. रजनी जिसकी गांड उसने धोके से मार दि थी, उसको सुलेमान के मुसल लंड से बहुत दर्द हुआ था उसके बाद उसने सुलेमान को अपने आस-पास भी आने नही दिया. सस्ती रंडिया 200 से 500 रुपयो तक पैसा मांगती थी. उसके लिए तो वही सस्ती रंडिया चोदने के लिए नसीब में रहती.

सलमा उन रंडियों से कही ज़्यादा सुंदर और कमसिन थी उसी कारण उस मादरजादने उसको ढंग से पेल दिया था. इंसान जब चोदने पे उतर जाता हैं तब रिश्तो की अहमियत भी मिट्टी मे मिल जाती हैं. वासना सभी बातो पे हावी हो जाती हैं फिर कौन क्या हैं ये भूल कर बस मनुष्य भूक मिटने को देखता है. सुलेमान इसका प्रत्यक्ष उदहारण हैं. अपनी चाचा की लड़की सलमा की कमसिन सील उसने अपने पहले ही चुदाई मे तोड़ दी थी. दो दिन तक चलन मुनासिफ नहीं हुआ बेचारी को. पर उसकी गांड माँरने का मौका उसे कभी नही मिला था. आज काव्या जो के उसके लिए मानो किसी सपनो की अप्सरा जैसी थी अब वो ये मौका भले हाथ से कैसे जाने दे.

सत्तू ने सुलेमान की इस बात पे अपना सवाल रखा, "सुलेमान भाई..बात तो सही हैं..माल तो बढ़िया हैं..वू शोपिंग मौल में देखे थे वैसे ही. आज तक नाही भूले हम गुरु. पर तनिक ये बताओ. इसको कैसे पटाओगे..साली शहर की डॉक्टोरीं हैं. ऐसे सीधे सीधे हाथ तो नही आने वाली.."

इसपे सुलेमान बोला, "इसकी सारी अकड़ निकाल दूँगा मैं. बहनचोद तू सिर्फ़ देखते जा. इसके गांड मे मेरा लंड जाता हैं के नही .अल्लाह कसम साली की गांड को तो मैं फाड़ के रहूँगा मेरे हथियार से.." और दोनो कलूटे हसने लगे.

तभी सामने से काव्या और सलमा को आते हुए देख सत्तू झट से सीधा हो गया और सुलेमान भी अपने जगह जाके बैठा. उसके शैतानी दिमाग़ मे जाने क्या सूझा के उसने अपनि लुंगी में से लंड जरा बाहर दिखे ऐसे अपनी लुंगी सेट की. बस थोडा सा अगर वो लुंगी को सरकाता तो उसका मुसल लिंग पूरा का पूरा सप बोलके बाहर निकल जाता. और वैसे ही अपने जालीदार बनियान और गंदे दस्ताने को गले में डाल के पीछे जाके बैठ गया.

"ओह हो...आ गयी बेगम..कुछ तकल्लूफ तो नही हुई ना करने मे?"

सलमा जो अभी अभी काव्या को बेज़िज़क बोल रही थी उसने अपना मूह फिर से गुस्से जैसा बना दिया. कोई जवाब ना देते हुए वो ऑटो मे आके बैठ गयी. काव्या सलमा के बाजू आके बैठ गयी. तभी सुलेमान झट से उठा और सलमा को खींच के फिर से वही पहले के कॉर्नर मे सरका दिया और खुद उनके बीच मे जाके बैठ गया.

"आहा...बेगम..हम भी बच्चे हैं.. अपनी जगह नही जाने देते.."

बचकानी बातो से अपने खेल खेलने वाला सुलेमान ने और एक बार अपनी गंदी मुस्कान ली. ये देखके के दोनो कलूटे जोर जोर से हसने लगे. सत्तू ने ऑटो स्टार्ट किया और फिर से सफ़र चालू हो गया.

थोड़ी देर बाद सत्तू आगे के शीशे में देख के बोला, "अरे सुलेमान मिया..आप भी क्या बच्चो जैसे करते हैं..भाभी को हमेशा तंग करते हो, अब बीबीजी के सामने तो तंग मत करियो"

सुलेमान बोला "अरे सत्तू मिया, आप शादी कर लो फिर समझेगा..इसमे कितना मज़ा होता. हैं ना बेगम?"

और उसने अपने गंदे होठ सलमा की गाल पे रख के एक चुम्मी ले ली.

सलमा ने गुस्से से मूह फेर लिया तो सुलेमान हस के बोला "अरे बेगम रानी, लगता हैं अभी भी नाराज़ हो मेरे पे. पता हैं? मैं तुम्हारे हर बात का ध्यान रखता हूँ और तुम नाराज़ हो हम से"

इसपे सत्तू बोला" क्या कह रहे हो मिया..भाभी फिर नाराज़ क्यों हैं"

सुलेमान ने काव्या की तरफ़ मूह किया और बोला, "बीबीजी..अब तुमसे क्या छुपाए..डॉक्टोरीं हो तो बोलिए ना. किसी बेगम को अपने मिया से ऐसा रूठना ठीक हैं क्या? और वो भी इतनी छोटी बात पे?"

काव्या के मन मे वो अपनी बाते इस तरह बिठा रहा था के काव्या की उन बातों में दिलचस्पी और बढ़े. काव्या ठीक दिलचस्पी से बोली, "ह्ममम्म..वैसे देखे तो नो..नहीं...वाइफ को मीन्स आपके बेगम को ऐसे रूठना तो नही चाहिए पर डोंट माइंड आप वो वजह बोल सकेते हो तो शायद मैं समझ लू के वो क्यों रूठी हैं?"

झूठ मूठ का दुखी चेहरा बनके बड़ी गंभीरता से उसने काव्या की आखो में देख के कहा,

"ठीक हैं बीबीजी..अगर आप कहे तो बता ही देते हैं हमारी बेगम की बीमारी"

"वॉट? बीमारी?" काव्या शॉक होके पूछने लगी.

इसपे असलम झुठ मूठ का दुखी चेहरा करके अपने सर पे हाथ रखके बोला," हा बीबीजी..सलमा रानी को एक बीमारी हैं शादी से ही हमको समझ आ गया था.."

काव्या एक डॉक्टर थी. वो अपने प्रोफेशन से बहुत प्यार करती थी. वो तुरंत बोली, "अरे....प्लीज़ बोलो आई विल हेल्प यु..मैं मदत करूँगी..कौनसी बीमारी हैं सलमा को?"

इसपे सत्तू जो बडे ध्यान से बाते सुन रहा था उसने भी थोड़ी आग सेक ली और बोला, "बता भी दो सुलेमान मिया..मेडम जी मदत करने को तयार हैं..बोल भी दो..मुझे बोला वैसा इनको भी बोल दो"

काव्या बड़ी डेस्पेरेट हो गयी थी, भोली सी काव्या का हाथ ढोंग करने वाले सुलेमान के कंधो पे न चाहते हुए चला गया और पुरे भरे स्वर में उसने पूछा, ”प्लीज् सुलेमान, आप बताइए क्या हुआ सलमा को?”

बस सुलेमान को यही तो पाना था. मछली जाल मे फँस गयी सोचके सुलेमान बड़ा खुश हुआ. वो अपना हर पेंतरा फूँक फूँक के डाल रहा था. और अपनि मनचली बातो से काव्या को अपनी तरफ खींचे जा रहा था. काव्य का मदद भरा हाथ अब वो अपने हाथो से कहा जाने देने वाला था

काव्या का हाथ अपने बाहों पे पाके सुलेमान तो जैसे परलोक सिद्ध हो गया. बस उसको यकीन हो रहा था बहुत जल्दी वो हाथ उसके मुसल लिंग पे होगा सिर्फ उसको वो पल आने तक का इंतज़ार करना था.

सुलेमान झुठमूठ के दुखी स्वर मे थोडा नौटंकी करते हुए बोला "बीबीजी..वो ..उसको.."

बिच बिच में बात काटके वो खुदको ऐसा प्रतीत करवा रहा था जैसे उसको बहुत दर्द हो रहा हो बताने के लिए. सच में नौटंकी का कोई पदक उसको देना उचित रहता. और दूसरी तरफ पधिलिखी काव्या तो, मानो उसके जवाबो में ऐसी धसती जा रही थी के वो उसके लिए कोई जिम्मेदारी बन गयी हो. उसकी बैचैनी देख काव्या भी अब बैचैन हो रही थी. उसके चेहरे पे तनाव के भाव स्पष्ट झलक रहे थे .

काव्याने भी बड़ी बैचिने से सुलेमान पुछा, “प्लीज बोलो...क्या हुआ सलमा को...हाँ बोलो सुलेमान..प्लीज्”

सुलेमान इस गहरी बात पे और ज्यादा नौटंकी करते बडी बैचेनी दिखाते हुए बोला “बीबीजी..वो..उसको..”

काव्या को अब बिलकुल संभला नहीं जा रह था. उसको कैसे भी करके सुलेमान से इसका जवाब निकलवाना था. उसने थोडा अपने हाथो का भार उसके कंधे पे और बढाया और धीरे मधुर स्वर में पुछा, “हाँ..बोलो न प्लीज्”..

बस और क्या सुलेमान के लिए तो ये कोइ सिग्नल से कम नहीं था. काव्या के बदन की आग के साथ अब उसके मधुर आवाज ने सुलेमान को जैसे और उकसा दिया. शैतानी दिमाग सुलेमान ने, कोई वक्त जाया ना करते उसका हाथ अपने हाथो में ऐसे भींच लिया जैसे डाली से कोई फूल को तोड़ लिया जाये. उसने वैसे ही बहुत मजबूती से काव्या की नाजुक हतेली अपने सख्त काले हाथो में पकड़ के बड़े ही नौटंकी अंदाज़ में रोती सूरत बनाकर कहा, “बीबीजी...हमरी सलमा को भूलने की बीमारी हैं"..

“क्या? भूलने की बीमारी,.ओह गोड..कब से?” काव्या एकदम से शॉक होकर बोली.

इसपे अपने मन ही मन में खुश होकर साथ ही साथ चेहरे पे अफ़सोस के भाव जताते हुए सुलेमान ने काव्या का हाथ वैसे ही भिन्च्के बोला, “हा बीबीजी...वो शादी से ही वैसी हैं...बाते भूल जाती हैं”

काव्या उसके जवाबो से नया सवाल बनाती. ठीक उसने वैसा ही किया. सुलेमान के इस जवाब पे उसने उसको पुछा, ”बाते भूल जाती हैं?...लाइक कैसी? किस प्रकार की बाते?”

सुलेमान ने उसको हर बार की तरह घुमा घुमा के जवाब दिया, “हां न बीबीजी..हर दिन कुछ कुछ ना कुछ भूल जाती हैं. एक दिन गहने, कभी पैसे, कभी कपड़े और कभी कभी तो ये भी भूल जाती हैं के मैं उसका शोहर हूँ"

काव्या इसमे इंटरेस्ट लेने लगी थी. उसको अन्दर की डोक्टोरिन को नया केस जो मिल गया था. उसके अन्दर का डॉक्टर अब इस देहाती गाँव में जाग गया था. वो खुलके इस बात पर बोल रही थी.

"ओह,,,आई सी...ये तो मुश्किल हैं. पर तुम मायूस मत हो इसका इलाज भी हैं. ओके"

सुलेमान दुखी चेहरा बनाते हुए उसके स्लीवलेस ब्लाउज के दीखते हुए दूध के नजारो की तरफ अपनि नज़रे गिडाते हुए बोला, "नही बीबीजी..हमरे पास इतने पैसे नही. शहर के डॉक्टर तो बस पैसे लेते हैं. हमरा बिसवास नही उनपे..हम ऐसे ही ज़िंदगी काट लेंगे, गरीबो का कोनो नाही दुनिया में.."

सुलेमान का भोला चेहरा देख काव्या को उसपे बहुत दया आई और खास कर के उसके गरीब शब्द पर. जैसा का काव्य के बारे में कहा था वो भोली थी. कही जानो को वो फीस भी नहीं लेती थी. बस फिर क्या अन्दर से करुना से पिघल्के वो उसको बड़ी सादगी से बोल पड़ी,

"ओह हो.... सुलेमान.. ऐसा नही हैं तुम मुझपे ट्रस्ट करो ओके. चलो मैं पैसे नही लूँगी जब तक सलमा ठीक ना हो जाए"

"सच काव्या???? हमरी बेगम ठीक हो जाएगी????"

एकदम से चेहरे के भाव बदलकर, एक ख़ुशी की मुस्कान ले के सुलेमान ने बीबीजी से काव्या पे ऐसी करवट ली के काव्या के साथ ही सलमा और सत्तू भी सन्न रह गए. सत्तू को उस टाइम सुलेमान को पकड़ के गले लगाने का मन किया. जिस तरह से उसकी स्पीड थी लग रहा था काव्या को जल्द ही वो अपने गोदी में खिलायेगा. काव्या भी उसके इस बात पे शॉक तो बहुत हुयी लेकिन पर वो उसकी ख़ुशी को देखके कुछ नहीं बोली. उसने उल्टा उसको और दिलासा देने की कोशिश की.

"हा हाँ ज़रूर..मैं करूँगी तुमको मदत अब तो विश्वास हैं?"

काव्य की तरफ से कोई विरोध ना देख सुलेमान ने अपनी बाते जारे रखी. उसका हात और कास के पकड़ कर उसने कहा, "अरे काव्या...आप पे तो बहुत भरोसा हैं हमरा. अब हम खुश हुए...आप तो महान हैं..बड़ी प्यारी है "

तभी सत्तू जो के ये सब बाते देखे जा रहा था. न जाने उसको कौनसी अचानक से जलन हुयी उसने बात काटते हुए बिच में ही कुछ बोल दिया,

"अरे सुलेमान भाई, भाभी के इलाज मे गुम तुम मेडम जी को नाम से पुकारे हो..पागल हो गये क्या? "

सुलेमान ज़रा ढोंग करते हुए बोला, "अरे हन..काव्या ग..ब्ब..बीबीजी..हमसे ग़लती हो गयी माफ़ कीजिए गा..

वो हुम गरीब हैं न इसलिए बहक गए"

उसने फिर से काव्या की कमजोर नस पे वार किया था. गरिबी की हालात को बार बार वो उसके सामने बता रहा था. और काव्य भी उसको ढील पे ढील डे जा रही थी. उसने तुरंत अपना मूह दुखी बना दिया.

बस काव्या को और चाहिये ही क्या था उसने फिर से सुलेमानको दिलासा देना चाहा. यही भूल वो बार बार किये जा रही थी.

उसने सत्तु की तरफ मूह करके बोला, “"अरे..उसमे क्या? मेरा नाम ही काव्या हैं. ईटस ओके. आई डोंट माइंड..तुम मुझे नाम से पुकार सकते हो, आई मीन आप सुलेमान. अब सलमा मेरी ज़िम्मेदारी है ओके. और वो ठीक नहीं होती तब तक मैं उसकी जांच करुँगी. बट प्लीज, खुदको गरीब बोलके उदास मत करना"

सुलेमान ने काव्य की इतनी ढील का नदाजा नहीं लगाया था. उसने इसका पूरा फायदा उठाया. और जोर से कहा, "सच काव्या...तुम कितनी अच्छी हो..जी कर रहा हैं तुमको उठाके झूम लू"

इस्पे भी काव्य ने कोई गुस्से वाला रिअक्शन नहीं दिया. वो सिर्फ शरमाके शरमाके हस दी.

बीबीजी से...काव्या जी..और अब काव्या जी से सीधे काव्या पे आने वाले सुलेमान के खेल को काव्या बिलकुल समझ ही नही पा रही थी. शायद उसको अपने मरीज़ के लिए सब ठीक ही लग रहा था और वो सुलेमान की जाल मे फसे जा रही थी. दूसरी तरफ़ सलमा ये सब बाते सुनके हैरान और चुपचाप बैठी थी.

कहते हैं अन्होनी और हादसे बता के नहीं आते. वही काव्या के साथ हो. जाने क्या सुझा वक़्त ने पूरी तरह से बाजी सुलेमान को जैसे दे दी. सुलेमान उसी पल मौका गरमा देख काव्या का हाथ छोड़ तो दिया. पर सामने रास्ते पे जैसा एक मोड़ आया वैसे ही अब एक और मोड़ काव्या के लिए उसने ला दिया. वहां ऑटो ने करवट ली और यहाँ सुलेमान ने पूरे हाथो से काव्या को अपने बाहों में भींच लिया. उसके सख्त बदन ने काव्या को को पलक झपकते ही दबोच लिया. अचानक से हुए इस बदलाव से काव्या को ज़रा असमंजसता हुयी. वो उसकी पकड़ में अकड गयी. लेकिन उससे ज्यादा बड़ा करंट उसको तब लगा जब उसका हाथ इस पूरी गड़बड़ में कही और जाके टिक गया.

“नहीं काव्या....तुम महान हो..,मै आजसे तुम्हारा मुरीद बन गया..आह..”

सुलेमान काव्या को अपनी बाहो में जकड़े हुय ये सब बात कर रहा था. सत्तू के तो आँखों पे पट्टी बंध गयी हो, उसका मूह खुला का खुला ही रह गया. ऑटो की स्पीड इतनी कम हो गयी, के मानो वो लगभग बंद ही गिरने वाला हो. क्योंकि असलम ने काव्या को अपनी बाहों में भींच लिया था उसके कारण काव्या का मूह सलमा की और था. सो सलमा भी काव्या को देख के आँखे चुरा रही थी.

“ओह...काव्या...तुम बहुत अच्छी हो..” अपने हाथ काव्या के गोरी और मुलायम पीठ पे चलाते हुए देहाती सुलेमान हर पल का मजा ले रहा था.

काव्या के गर्दन पे उसकी नाक थी और वो उसके बदन की हर आती मादक खुशबू सूंघे जा रहा था. मुलायम, गद्देदार, राजसी महिला को ऐसे बाहों में ले कर के, उसको अपने से चिपका कर उसमे वासना के शोले उमढ पड़े.

यहाँ काव्या का चेहरा आश्चर्यता से भरा हुआ था. पर वो सब नॉर्मल समझकर सुलेमान की ख़ुशी की खातिर चुप थी. लेकिन जैसे ही सुलेमान ने धीरे धीरे अपना हाथ उसके पीठ पे चलाना शुरू किया उसके कारण उसको अब थोडा अजीब लगने लगा. सुलेमान अपनी गरम सासे काव्या की गर्दन पे छोड़े जा रहा था और उसको हर पल जोर-जोर से अपने पास भींछे जा रहा था. अचानक से हुए इस बदलाव से काव्या को ज़रा असमंजसता हुयी. वो उसकी पकड़ में अकडसी गयी. लेकिन उससे ज्यादा बड़ा करंट उसको तब लगा जब उसका हाथ इस पूरी गड़बड़ में कही और जाके टिक गया. वो था सुलेमान का मुसल लिंग.

उसका मुसल काला लिंग फुल के कद्दू जैसा बन गया था. और उस पुरे हलबल में वो फुला हुआ कद्दू उसके लुंगी के उपरी कोने में से ठीक जैसे उसने सोचा था वैसे ही सपाक बोलके पूरा का पूरा बाहर किसी रोंकेट की तरह कूद पड़ा. काव्या का हाथ न जाने उसके ऊपर आ गया. गरम और एकदम तना हुआ काला मुसल लंड काव्या के नाजुक कोमल हथेली के निचे आ गया. काव्या की नज़रे सलमा की तरफ थी सो उसको इसकी भनक नहीं लगी के उसका हाथ सुलेमान की लिंग पे जकड़ा था.

काव्या का हाथ अपने लंड पे छूते ही सुलेमान को एक तगड़ा झटका लग गया. उसका एक सपना जो पूरा हो गया था. बस फिर क्या? उसके साथ ही उसने काव्या को और जोर से अपने बाहो में भीच लिया. जिसके कारण उसका ब्लाउज उसकी जालीदार बनियान की छाती से सट गया. उसको काव्या के उभारो का स्पर्ष प्रतीत हुआ. उसके सख्त छाती से वो दबे जा रहे थे. क्या एहसास था जिस सुन्दरता को वो कितने देर घुर रहा था अब वो उसके छाती से सट हो गए दबे जा रहे थे. उसका मन तो किया वही उन उभारो को मसल कर उनका अमृतपान किया जाए. पर उसने खुदपे लगाम लगा दी. इस मामले में संयमता कोई इस निकम्मे से सीखे. पर उसने बाकी के सभी मौको का भरपूर फायदा उठाया. भागते को लंगोटी सही, सुलेमान ने अपना नाक काव्या के घने खुशबूदार बालो में सटाके एक लम्बी आह भरी. जिससे उसके लिंग में और तनाव आया और उसने भी काव्या कि नाजुक हथेली में एक तगड़ा झटका मार ही दिया.

क्या तकदीर पायी थी आज उस कलुटे ने. वो दृश्य ही इतना कामुक था के देखने वाले के होश उड जाए. ३३ साल का अधेड़ देहाती कलूटे ने २८ साल की शहर की सुन्दर राजसी डोक्टोरिन साहिबा को अपने बाहों में कस के जकड़ा हुआ था. उसके गन्दी लुंगी के कोने में से उसका मुसल लिंग पुरे गर्व से बाहर झूम रहा था. जो के इस राजसी महिला के नाजुक हथेली में लपका गया. जिससे वो पूरी तरह अनजान थी.

सत्तू जो के कही समय से ये सब देखे जा रह था. उसकी आँखों में जैसे अँधेरा छा गया. वो पूरी तरह से पिछे की और गर्दन करके ये सब नज़ारा देखे जा रहा था. वही सलमा अपनी नज़रे निचे की और करके बूत बन गयी थी जैसे मानो सच में उसको कोई सौतन मिल गयी हो. ये रंगीन नज़ारा देखके पूरा ऑटो जैसे मादकता का मंच को दर्शा रहा था.

सुलेमान की स्पीड शायद इस नज़ारे को कही ज्यादा आगे ले जाती पर उसको रोकने का काम किया एक कच्ची सड़क ने. अचानक से रास्ते पे गड्डा आ गया और ऑटो थोडा धपाक से हिल के एकदम से रुक गया. इसके साथ ही दोनों की बाहों की जकड टूट गयी और काव्या सुलेमान की बाहों से आज़ाद हो गयी.

अपना पूरा मजा कीरकिरा होने के कारण सुलेमान गुस्से से आग बबूला हो गया. वो सत्तू की तरफ मूह करके

जोर से चिल्लाया,“क्या हुआ बे मादरचोद.. सरफिरे लवडे..तेरी गांड क्यों फट गयी. क्या डंडा घुस गया तेरी गांड में..ऑटो क्यों रुक गया”

सत्तू को सुलेमान की गलियों की आदत थी. बस काव्या के सामने सुनके उसको खुदका अपमान लगा. पर वो करता भी क्या? उसको भी काव्या को अपने बाहों में भींचना था जो सिर्फ सुलेमान ही उसके लिए करवा सकता था. वो चुप चाप से बोल पड़ा, “सुलेमान भाई...वो रास्ता कच्चा था इसलिए हुआ..मेरी गलती नाही थी”

“अबे मादरचोद..फिर आगे देख के चलाना ऑटो पीछे क्या अपनी अम्मा को देखे जा रहा था तबसे?”

बार-बार गालिया सुनकर सत्तू ने भी इस बार एक चुटकी सुलेमान पे डाल दी, “भाई ..तुम बिबीजी को ऐसे प्यार कर रहे थे न तो हमरी भी नज़र वैसे ही अटक गयी. गलती तो तुम्हारी हुयी न ”

“अबे चूतिये..मैं तो बस काव्या का शुक्रिया कर रहा था. अब हमरी बेगम अच्छी हो जाएगी तुझे क्या मालुम भडवे? बीवी क्या होती हैं. तू रंडियों को चोदते बैठ सिर्फ ”

सुलेमान के मूह से इतनी सारि गालिया और चोदने चुदाने की बाते सुन काव्या के गाल लाल हो गए. अभी अभी उसके सख्त जिस्म से छुठ के वो खुदसे आझाद फील कर रही थी. पर साथी ही उसको गैर आदमी का ऐसा कसा हुआ बदन उसके मुलायम बदन को एक नयी उर्जा दे गया था.

सुलेमान ने काव्या के और बड़े प्यार से देखा और बोला, “ बोलो न काव्या...मैंने गलत किया? तुम्हारा शुक्रिया मानके..क्या तुमको हम गरीबो को गले लगाना पसंद नहीं ?”

काव्या के नाजुक भावनाओं पे तीर चलाते सुलेमान ने अपना चेहरा फिर से दुखी बना दिया. बस हमेशा की तरह काव्या पिघल गयी. और उसने कहा,

“ अरे..नहीं मैंने कुछ कहा क्या? आई डोंट माइंड..इट्स ओके” और अपने गले से पसीना पोंछ लिया.

“ देख भड़वे, कमीने इसे कहते डोक्टोरिन साहिबा. इनके पैर धो के पि ले तू ”, सुलेमान ने सत्तू को गुस्से से कहा और फिर से अपनी शैतानी मुस्कान काव्या की और बढाई.

“ क्यों काव्या पिलाओगी न ?”

बड़े ही मादक स्वर में उसने काव्या को पुछा. काव्या को बात समझी नहीं उसने बस थोड़ी स्माइल दे कर अपनी नज़रे बाजू कर दी.

“आई.हाई...काव्या शर्मा गयी..अब तो पिलाना ही पड़ेगा बीबीजी..”

और अपनी गन्दी मुस्कान के साथ सुलेमान ने इस बार सलमा को अपनों बाहों में जकड लिया.

स्त्री की अजीब विडम्बना होटी हैं. सलमा को काव्या सौतन लग रही थी अब ठीक काव्या को वैसा लगने लगा. सलमा को सुलेमान की बाहों में देख उसने ना चाहते हुए भी अपने चेहरे पे इर्षा वाले भाव बना दिए. पर तभी वो हुआ जो काव्या के जज्बातों को किसी सुनामी की तरह बहा ले गया.

जैसे ही काव्या ने सलमा की और इर्षा से देखा काव्या की मानो सासे रुक गयी उसके सामने अँधेरा जैसा छा गया. उसकी आँखे इस बार जम गयी. कारण था सुलेमान का मुसल लंड. जो कबसे पूरा लुंगी के बाहर झूम था, बस काव्या की नजर उसपे अभी चली गयी थी. काव्या तब सिहर गयी जब उसके पढ़ाकू दिमाग को दो पल में ही समझ गया के उसकी हथेली ने कुछ देर पहले किस चीज को अपने में समेटा हुआ था.​
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