Update 04

काला बदबूदार मुसल ८ इंच का सुलेमान का तगड़ा नन्गा मादरजाद लंड काव्या के ठीक नजदीक था. एकदम तना हुआ साप जैसा डुलता हुआ लंड को इतने करीब से देखके काव्या के गाल लाल-लाल हो गए. वो अपने होशो आवाज में नहीं रही. सुलेमान को तो ये सब पता ही था. वो जान बूझकर सब कर रहा था. दूसरी और सलमा को वो उसी समय सरे आम रगड़े भी जा रहा था. जहा सुलेमान अपने मादरजाद लंड को सरे आम खुला करके बैठा था उस समय भले उसका चेहरा सलमा की और था पर ध्यान था काव्या की और. उसका मुसल लंड एक दम तन गया था. घने काले झाटो के ऊपर तना हुआ हथियार बहुत आकर्षक दिख रहा था. जिसने सुन्दर काव्या की आखे चमका दी.

उसने सलमा को अपनी और जोर से खीच और उसके कमीज़ के ऊपर से उसके दूध मसल दिए. जैसे ही उसने उसने सलमा के दूध मसले तुरंत उसके लंड ने एक अंगड़ाई ली. वो सप बोलके तन गया जैसे वो किसीको सलामी दे रहा हो. काव्या की आंखे मानो ऊपर जम से गयी थी. वो बिना किसी सोच से एक दम से लंड को गौर से देख रही थी. लंड जब जब सलामी देता उसके छाती में ‘धस’ हो जाता. शहर की डोक्टोरिन साहिबा की धड़कन धक् धक् गर्ल की तरह भाग रही थी. डर और वासना काव्या के मन पे हावी हो रहें थे. बस ये देखना था के जीत किसकी होती हैं.

सत्तू जो ऑटो बहुत धीरे चलाकर सामने वाले शीशे में पूरा ध्यान लगाके सब मजे देख रहा था, उसने भी काव्या की नज़रे ताड़ ली. जो गए २-३ मिनट से एक जैसे सुलेमान के लंड को निहार रही थी. उसने सुलेमान से कहा,

“अरे सुलेमान भाई ..तनिक बस भी करियो. क्या पूरा प्यार यहाँ पर ही कर लोगे भाभी से?..हा हा हा”

सुलेमान सलमा को अपनी बाहों पे पकडे हुए बोला,

“अरे सत्तू मादरचोद, क्या बताए हम कितना खुश हु आज ..लगता है बेगम को उठा के नाच दू. बहुत प्यार करू.”

“मिया, पर जरा संभलके. वरना गए टाइम की तरह हमको ऑटो कही रुकवा कर बाहर निकलना होगा. तुम शुरू होने के बाद नहीं रुकते. तुम तो मजे करोगे भाभी जान के साथ हमरी तो जाने दो पर बीबीजी क्या करेगे फिर...?”

तभी सुलेमान ने अपना गन्दा चेहरा काव्या की तरफ किया. जैसे ही उसने काव्या की और देखा काव्या ने अपनी निगाहें दूसरी और कर दी. उसको लगा कही सुलेमान को ऐसा प्रतीत न हो के वो उसके लिंग को देह रही थी. भले उसके लिए ये सब अनजाने में हो रहा था किन्तु सुलेमान के लिए तो ये सब सोची समझी करतूत की तरह था.

“अबे हाँ..मैं भूल ही गया था बीबीजी..काव्या हमरी बाजू में हैं”, काव्या की तेज़ धडकनों को सुलेमान समझ गया था.

सत्तू ने सुलेमान से कहा, ”अरे सुलेमान भाई, भाभी के लिए तनिक काव्याजी को भी धन्यवाद् करियो”

“अरे हां...सत्तू, मादरचोद पहले बार अकल की बात की तूने. भाई, सच में काव्या ही तो है वो, जिसके कारण आज इतनी ख़ुशी हो रही हैं हमको”

ऐसा बोलते समय उसने अपना बाया हाथ सीधे काव्या की दाए (थाइस) जांघ पे रख दिया. काव्या जो पहले ही उसके मुसल खुले लंड से सदमे में थी अब तो उसके योनी में भी सिरहन आ गयी. सुलेमान ने बिना किसी खौफ से उसके जांघो पे अपना सख्त हाथ रख दिया. उसने उसको और ऊपर की और सहलाते हुए धीरे से काव्या की कानो में कहा,

“काव्या..शुक्रिया..जी तनिक इधर तो देखिये ”

काव्या के पुरे बदन में सनसनी आ गयी. उसके माथे पे पसीना आ गया. खुला मुसल लंड, जांघो पे सख्त हाथ और कानो में आती हुयी गर्म सासे इन सबसे उसका बदन अकड़ने लगा. सुलेमान का लंड उसके जैसा ही निकम्मा था. जैसे वो कोई भैंसा हो और तमाम चूत उसके लिए भैंसिया. शायद जिस तरह सुलेमान को काव्या चाहिए थी, ठीक वैसेही उसके लंडको घुसने के लिए उसकी राजसी चूत चाहिए थी जो के नयी दुल्हन की तरह अभी भी छुपी हुयी थी. वो और तन-तन के सलामिया देने लगा. काव्या ने अपनी आँखे मूँद ली. अपनी हथेलियों को कसके अपने हैण्ड बैग पे रोंद दिया. उसकी साँसे रुक सी गयी.

“काव्या...देखोगी नहीं..बताओ न..”, अपने हाथ काव्या के गद्देदार जान्घो पे उसकी महंगी शिफोन सारी के ऊपर से चलाते हुए सुलेमान ने बड़े ही कामुक अंदाज़ में कहा.

“जी..जी....वो....” हडबड़ाती काव्या कापते स्वर में बोल पड़ी.

“हाँ बोलो न...क्या हुआ?”

“जी मैं कैसे कहूँ..?”मैं नहीं देख सकती आपकी और...”

“क्यों बीबीजी..क्या हम गरीब हैं इसिलिये? हम समझ गए...” अपना चेहरा दुखी करके सुलेमान अपने हाथो को काव्या के पेट पे लेके जाते हुए बोल पड़ा.

“बात वो नहीं हैं....” कस्म्कसते हुए काव्या ने अपना हाथ सुलेमान के हाथ पर रख दिया. शायद वो उसको आगे जाने से रोक रही थी.

“फिर का हैं? बोलो न..” बड़े ही कामुक अंदाज़ में सुलेमान काव्या की हाथो की पर्व न करता अपने हाथ की बिचवाली ऊँगली काव्या किए गोरी सुन्हेरी नाभि में डालते हुए बोल पड़ा.

काव्या इन सभी हरकतों से पिघल रही थी. उसने सुलेमान के हाथ को पकड़ते हुए थोड़े जोर से कहा, “आप प्लीज निचे देखिये” पर उसने उसका हाथ हटाया नहीं.

“कहा नीचे...कुछ भी तो नहीं हैं “ अपनी उसके नाभि के निचे सरकाते उसने कहा. शायद वो खुदके निचे नहीं काव्या के निचे देख रहा था.

अब काव्या ने उसके हाथ को और निचे जाने से रोक कर खुद उसकी और हिम्मत कर के देखा और जरा डांटते स्वर में कहा,

“अरे.. अब कैसे बताऊ ,, आप का वो प्लीज् आप नीचे देखो न ज़रा”

सुलेमान ने मौके को समझ कर अपना हाथ वह से हटा दिया. उसको अपने इतने देर से चलते हुए खेल पे पानी नहीं चलाना था. उसने अपने निचे की और देखा और नार्मल समझते हुए ऐसा रिएक्शन दिया जो उसके लिए कोई आम बात हो.

“अबे इसकी मा का..तो ये मा का लोडा हैं, अरे काव्या, गलती से बाहर आ गया ससुरा. रुको इसको हम अभी अन्दर डलवा देते हैं. तुम फिकर ना करो. इस ससुरे को चैन ही नहीं हैं जब भी हम भावुक हो जाते न इ ससुरा ऐसे बिच में आ जाता हैं..चल हट मादरचोद अन्दर ”

काव्या को उसकी बाते सुनके हंसी बी आ रही थी और शर्म भी आ रही थी. उसको समझ नही आ रहा था करू तो क्या करू.

अपना मुसल ताना हुआ लं लुंगी अन्दर डालके सुलेमा ने काव्या पे एक और चुटकी ले ली,

“लो डाल दिया इसको अन्दर काव्या. अब नाही आएगा बाहर. बस तुम पे भावुक हो गए थे हम ज़रासा”

काव्या ने अपने सुन्ग्लासेस आँखों पे दाल दिए. और ओने मूह हें हाथ रख दिया. वो अपनी हंसी दबा रही थी. पर वो थोड़े ही ऐसे छुपने वाली थी.

१ घंटे से चल रहा ये ऑटो का सफ़र का ठिकाना आखिरकर आ गया. १८ साल के बाद काव्या ने अपने गाँव को देखा. बरवाड़ी की ताज़ी ताज़ी हवाओने ने उसका पुरे जोश के साथ स्वागत किया.

सत्तू ने जोर से सुलेमान को कहा “लो सुलेमान भाई गाओ आ गया अब ज्यादा भावुक मत होना. वरना ऑटो वापस मोड़ना पड़ेगा” और दोनों कलूटे जोर से हसने लगे.

गाओ में काव्या का आगमन हो गया था. सुलेमान का शातिर दिमाग बस वो दिन का इंतज़ार कर रहा था के कब वो काव्य को अपने निचे सुलाएगा. मानो न मनो कही पे जुदाई का गम उसको सता रहा था. ऑटो का सफ़र आज उसके लिए बहुत छोटा लग रहा था. पर गाँव का सफ़र अभि भी उसके लिए आगे की परिकल्पना के लिय सशक्त किये जा रह था.

शहर की डोक्टोरिन साहिबा काव्या के नाना जी के बंगले की तरफ औटो ने रुख मोड़ लिया. बस १०-१५ मीनट में ही काच्ची सडको पे से हिलते डुलते देहाती ऑटो काव्या के घर पे रुकने वाला था. जहा पे कोई और उसका स्वागत करने के लिए इंतेज़ार में खड़ा था. बस समझ लो काव्या अब अपनी छुटिया में इतना सारा अनुभव प्राप्त करने वाली थी जो उसके जीवन को नयी नयी बातो से अवगत करने वाली थी.

“वो देखो बीबी जी आपका बंगला आ गया” सत्तू ने एक दम खुश होके पुरे दम से काव्या को बोला.

काव्य ने ख़ुशी से नज़र दौड़ाई तो उसको वही १८ साल पुराना किशोरीलाल अग्रवाल भवन दिख गया. वही जिसमे वो बचपन में लुका छुपी खेलती थी, दौड़ती थी, अपनी गुडिया संग खेलती थी, नाना के साथ सैर पे जाती थी, नानी से कहानिया सुनती थी. उसका ख़ुशी का कोई किनारा न रहा. वो ख़ुशी से फुले नहीं समां रही थी. उसके घर के गेट से ही अंदर की पौधों फुलोकी बगिया दिख रही थी. बचपन में वो उन पौधों को पानी डालती थी. आज वही बगिया अब बहुत खुबसूरत हो गयी बिलकुल काव्या की तरह. पर्यावरण का देखभाल करो तो वो भी तुम्हारा देखभाल करेगा ये विचार यहाँ पे हमें मिलता हैं. उस बगिया से आने वाली फूलो की महक बाहर तक आ रही थी. पूरा वातावरण जैसे महक गया था और साथ ही वो भव्य बंगला उसमे जैसे किसी राज महल जैसे प्रतीत हो रहा था. मानो वो अपनी राजकुमारी के स्वागत में सज धज के खड़ा हो.

जैसे तैसे देहाती ऑटो बंगले के गेट के पास रुक गया. काव्या ने अपने पैर ऑटो के बाहर रख दिए. अपने घर को इतने सालो के बाद देख वो बहुत ज्यादा खुश नज़र आ रही थी. फूलों की महक उसको और सकारात्मक हवा प्रदान कर रही थी. उसने वही बड़े ही आराम से खड़े-खड़े एक लम्बी आह भरी और भारी अंगडाई ली. जिससे उसके दोनों हाथ ऊपर हो गए और आखे बंद हो गयी. होठो पे सतुष्टि से भरी मुस्कान आ गयी.

“हम्म....आई लव माय होम..आव....”

जैसे ही उसको ऐसे खड़े मुद्रा में सबने देखा, सुलेमान झट से ऑटो से उतर गया. उसने बिना कोई देरी किये काव्या के नजदीक जाकर अपनी नाक उसके गोरी चिकनी खुली बघलों में घुसा दी. और एक लम्बी सांस भरी.

“स......आह.....”

अपनी बघलो में अचानक कुछ गुदगुदी महसूस हुए काव्या ने अपनी आखे खोली और एकदम से दोनों हाथ निचे करके थोडा पिच्छे हट गयी. सुलेमान अपने इतने करीब खड़ा देख के वो चौक गयी.

“ये क्या कर रह थे तुम?” उसने बड़े आश्चर्यता से और जोर से सुलेमान से कहा.

“जी...मैं बीबीजी..काव्या मैं तो बस फूलो की खुशबू ले रहा था....” ऐसा बोलके और उसने यहाँ वहा देखा जैसे वो उसको दिखा रहा हो, फूल उसको कितने पसंद हैं.

काव्या ने थोडा मूह टेढा किया. पर उसका ध्यान फिलहाल सुलेमान से हटकर अपनी पुराणी यादो पे था. सो उसने खुद ही उसकी बात को इग्नोर किया.

“अछ्छा,...ओके..”

“हा काव्या..मुझे तो फूलो को सूंघना पसंद हैं. मैं तो उसको चाटता भी हूँ कभी कभी..” अपने भद्दे होठो पे अपनी जुबान फिरते उसने काव्या की बघलो की तरफ देखके बड़े ही कामुक अंदाज़ में ये बोल दिया.

काव्या उसके हर बात को इगनोर करके बस अपने घर की और देख रही थी. तभी उसने कहा ,”अच्छा ये लो पैसे”

उसने अपनी पर्स से २००० की नोट निकाल के उसको दे दी. उसको देख के सत्तू बोला “अरे बीबीजी..हमारे पास इतना पैसा कहा होगा..इसका छूटटा नहीं हैं हमरे पास.”

“ऊप्स..मेरे पास तो यही सब नोट हैं. बाकि १०-२० के हैं थोड़े ”

बस सुलेमान को यही चांस मिल गया उसने झट से कहा,

“अरे काव्या तुम क्यों सोच रही हो इतना..पैसे रहने दो हम ले लेगे तुमसे बाद में. सलमा की इलाज के लिए आना ही हैं न तुमको तब दे देना..जो देना हैं वो”

“अरे हाँ...थैंक्स ..मैं भूल ही गयी थी”, काव्या ने एक मुस्कान के साथ जवाब दिया.

एक बार फिर से काव्या के बदन पर नज़र फिराते हुए सुलेमान के बड़े कामुक स्वर में धीरे से कहा,

“ऐसे भूल मत जाना बीबीजी..हमरे पैसे हैं आप के पास..सूद के साथ वापस लेंगे फिर तो..और हिसाब के पक्के हैं हम आप से तो ले कर रहेंगे“

और इस बात पे सब हसने लगे. काव्या भी उन सब के साथ ताल में ताल मिला कर हस गयी.

“ओके बाबा..ओके..मैं दूंगी तुमको पैसे”, हस्ते हुए अपनी बैग ले कर वो गेट के अंदर आ गयी.

“बाय..सी यू,....” सबको बाय बोलते हुए वो जब मूडी तब वो नज़ारा सच में देखने लायक था. जैसे कोई रानी अपने महल में जा रही हो. मटक मटक के उसका पिचवाडा घुमे जा रहा था. दोनों कलूटे आखरी मंजील तक उसके पिछवाड़े को निहारते रहे.

फिर एक बार काव्या ने घर के मैं दरवाजे के पास जाके वापस मुडके अपनी हाथो से सबको बाय बोला. यहाँ दोनों कलूटे भी जोर से बोल पड़े ”मिलना बिबीजी..हम आयेंगे वापस..” और काव्या ने दरवाजे की बेल बजायी और अपने घर के अन्दर प्रवेश किया.

जैसे ही वो अन्दर गयी यहाँ सुलेमान सत्तू से बोल पड़ा,

” मादरचोद..इस डोक्टोरनी ने आग लगा दी हैं मेरे लवडे में”

सत्तू बोला” बात तो ठीक हैं गुरु, मेरा भी हाल वैसा ही हैं जैसा तुम्हारा..”

“कुछ भी बोल माल हाथ से नहीं जाने देना हैं सत्तू...”

“वो बात तो सही हैं गुरु पर अपनी तो हालत अभी भी ख़राब हो गयी हैं,.इसको ठंडा करना होगा..”

“तो फिर सोच क्या रहा हैं गांडू..भगा ऑटो अपने झोपडी की तरफ”

और दोनों कलूटे हस कर ऑटो में बैठ गए. ऑटो चालू करके सत्तू ने उसको खेतो की और मोड़ा सलमा को समझ में देरी नहीं लगी के ने उसको वक़्त ने फिर से एक घंटा पिच्छे की और मोड़ दीया था.

जैसे ही काव्या ने डोर बेल बजाई नानी ने दरवाजा खोला. वो पहले अपनी नानी से मिली. उनके पैर छुए. और उनको गले लगा लिया. अपनी पोती को देख नानी बड़ी खुश हुयी. काव्या जब १० साल की थी तब वह आई थी. तब उसने खेल खेल के पूरा घर सर पे रख दिया था. नानी को वो दिन याद आये. लेकिन अब उसको क्या पता के २८ साल की काव्या अब जो खेल यहाँ खेलने वाली हैं शायद उससे पूरा समा, सर चढ़ना हैं. काव्या ने नानी को एक जोर से ज़प्पी दी.

“जुग जुग जियो बेटी. बड़ी लेट आई हो गाडी सब खैरियत से मिली न?”

“ओह नानी वो सब ठीक मिला. पता हैं यहाँ के लोग भी काफी अच्छे हैं, एक औटोवाला था उसने यहाँ तक लाके छोड़ा मुझे”

“हाँ बेटी वो तो हैं, इसीलिए मुझे गाँव से शहर आने का कभि मन नहीं करता. तेऋ मा हर बार बोलती हैं पर मैं नहीं सुनती उसकी कभी...हा हा ” और नानी हसने लगी.

“सच नानी. कितनी ताज़ी हवा हैं यहाँ. कितने अच्छे लोग हैं यहाँ. अब तो मैं फुल आराम करुँगी देखो”

“अरे क्यों नहीं बेटी जब तक रहो तब तक सिर्फ आराम करो कोई बात लगे तो बता देना. तेरे नाना की आत्मा को शान्ति मिलेगी आज कितने दिन के बाद पोती घर आई हैं”

दोनों हॉल में लगी हुयी किशोरीलाल के बड़े तस्वीर के सामने आ गए.

“सच नानी, नाना जी की बहुत याद आती हैं मुझे भी.”

“हा बेटी. पर सब उसके हाथ में हैं. हम क्या कर सकते हैं.”

और सब तरफ एक दम शांति छा गयी. तभी खिड़की से ठंडी हवा का झोका आया और नानाजी के तस्वीर से एक फूल निचे गिर गया.

“अरे बीटा लो. नाना भी खुश हुए देखो प्रकृति का सन्देश”

सच में भारत देश की महिमा भी काफी अलग हैं. यहाँ लोग एकदूसरे के साथ प्रकृति, जानवर और चीजो को भी जोड़ लेते हैं. कितना एक हैं हम सब फिर भी लड़ते रहते हैं. प्रकृति तो अच्छी हैं पर मानव बदल गया हैं.

वो फूल ओने हाथो से उठाकर के अपनी पोती की तरफ देख कर नानी ने कहा, “जाओ काव्या, तुम आराम करो. थक गयी होगी. फिर शाम नजमा आएगी तब खाना खा लेते हैं”

“ओह सच नानी .. नजमा फूफा अभी भी हैं यहाँ “

“हां बेटी वो बेचारी कहा जायगी और अब ऐसे लोग मिलते भी नहीं “काव्या ने नानी को एक जोर की झप्पी दे दी और सीधे अपने रूम की तरफ निकल पड़ी.

“कमरा याद हैं न बेटी”

“हा दादी मैं कैसे भूलूंगी कितना खेलती थी मैं वहां बचपन में. आप आराम करो मैं खुद जाती हु”

“ओके बेटी. कुछ लगे तो आवाज दे न. घर में नौकर हैं मैं भी हैं वो नजमा का बेटा हैं आने वाला था शायद उसने साफ़ करके राखी होगी तुम्हारी खोली”

काव्या सीडिया चढ़ते हुए बोली “ओके नानी.. आप फ़िक्र मत करो मैं देखती हूँ”

उसका घर सबसे पुराना और बड़ा था उस गाँव में. उसके नाना जी को सब पहचानते थे. बड़ा रुतबा था उनका. पर उनके गुज़र जाने के बाद मकान सुना हो गया. अब वह सिर्फ नानी और नौकरानी नजमाँ और उसका बेटा रहते थे. नजमाँ एक पुराणी नौकरानी थी वो काव्या को बचपन से जानती थी.

जब काव्या २ साल की थी तबसे वो वह काम करती थी. वैसे तो नजमा पे काव्या के नाना का बहुत सारे उपकार थे. उसका पति शराब में गिरा हुआ था और वो किसी औरत के साथ भाग गया.. तबसे वो वापस नहीं आया था. उसके पति को एक बेटा था रफ़ीक. फिर उसीने उसको पला पोसा अपने बेटे की तरह रखा. उसके बाद यही सब वो काम कर लेती थी. कहा जाता हैं के वो जवानी में बहुत भरी हरी भरी थी. और रफ़ीक के बाप के भाग जाने के बाद काव्या के नाना ने भी उसको चोदा था. शायद उसी काम के लिए उन्होंने उसको काम पे रख लिया.

काव्या को वो अपने हाथो से खाना खिलाती थी, नेहलाती थी और सुलाया करती थी. अब वो ४२ साल की हो चुकी थी. पर आज भी वो गरम थी. उसका बदन भरा हुवा था. आज भी वो उसके पडोसी रहीम चाचा से चुदवाया करती हैं. रहीम चाचा जो ६० साल का अधेड़ बुजुर्ग आदमी हैं. वो उसके पड़ोस में ही एक जुग्गी में रहता था. रफ़ीक के साथ उसकी बहुत जमती थी. बुढा बड़ा ठरकी था. उसने नजमा को बेटी बेटी बोल के एक रात उसपे हाथ मार ही दिया. दिखने में तो वो ६० साल का था पर चुदाई करते टाइम उसने ४२ साल की विधवा नजमा की नस नस तोड़ दी थी.

उस रात के बाद नजमा उससे हफ्ते में एक बार तो चुदवा ही लेती थी. जब भी रफ़ीक दोस्तों के साथ रात-रात बाहर रहता यहाँ उसकी सौतेली माँ अपना बदन रहीम चाचा से सेक लेती थी. रहीम चाचा की भी बीवी नहीं थी. दोनों का हाल एक जैसा ही था. वो शहर में ब्रा-पेंटी बेचने का धंदा करता था. उसका मालिक उसको इस काम के बदले छोटी मोठी रकम देता था. उससे उसका गुज़ारा चल जाता था. देसी शराब और मुर्गी खाके सोना और अपने दमदार लंड से नजमा की कस कर चुदाई करना जैसा उसके जीवन का एक अंग हो गया था.

दादी से मुलाकात करके काव्या अपने रूम में चली गयी. वो बहुत सालो बाद वह आई थी. रूम साफ़ तो नहीं थी. शायद रफ़ीक ने वो साफ़ नहीं की थी. उसने काव्या को बचपन में देखा था. वो काव्या से ८ साल छोटा था. काव्या उसको ज़र्ता पहचानती थी पर वो भी अब भूल गयी थी. खैर अपनी बैग बीएड पे डालके उसने रूम की विंडो खोली. एक बड़ी विंडो थी. जिसको खोलते ही सूरज की रौशनी अन्दर आ गयी और गाँव की ताज़ी हवा के साथ. और काव्या ने चैन की एक लम्बी आह भरी.

वो बहुत सालो बाद वह आई थी. रूम साफ़ तो नहीं थी. शायद रफ़ीक ने वो साफ़ नहीं की थी. उसने काव्या को बचपन में देखा था. वो काव्या से ८ साल छोटा था. काव्या उसको जादा पहचानती थी पर वो भी अब भूल गयी थी. रफीक के बारे में बताया जाए तो, रफ़ीक एक २० साल का युवक था. उसको पता था के उसकी माँ किसी गैर मर्द से चुद्वाती हैं. उसने कही बार उसके कच्छी पे सफ़ेद दाग देखे थे. और जब वो छोटा था तबसे उसको भनक लगी थी के रात में उसकी माँ कहराति क्यों हैं. इन सभी बातो से उसके मन में बचपन से ही सेक्स से भरी बाते बैठ गयी थी. वो बहुत उसमे रूचि लेता था.

उसके मवाली दोस्त उसको गन्दी गन्दी चुदाई की किताबे देते थे. पर वो था बड़ा शर्मीला वो उनके सामने उसको देखता भी नहीं था. पर उसको खुद पता नहीं चला कब वो उनको पढके अपनि मूठ मारने लगा था. रफ़ीक का लंड भी बड़ा मजेदर था. ७ इंच का एकदम कोरा लंड था उसका. वो हर बार फिल्मी किताबे देखता था उसमे सुन्दर अभिनेत्रिओं के फोटो देखके अपनी मुठ मारता था. उसने कही बार ब्लू फिल्मे भी देखि थी. इन सब से वो एकदम मर्द बन गया था. ये उसे तब पता चला जब उसका लंड रात में अपनी माँ के गांड को देखे फूलने लगा था.भले ही नजमाँ की वो सौतेली संतान थी पर सलमा उसका ख्याल बहुत रखती थी.

बचपन से नजमा उसको अपने साथ ही रखके सब काम करती थी जैसे खाना पकाना, कपडे धोना, नहाना, सोना. बात तो इतनी ज्यादा थी के आज भी वो रफ़ीक को एक बच्चे की तरह समझती थी. आज भी रफ़ीक अपनी हरी भरी माँ को अगर मन चाहे तो उसके ३८ के बड़े बड़े मम्मो को चुसकर सोता था. और वो भी उसको बच्चे की तरह पिलाती थी. शायद उसको वो बच्चा ही लगता था पर फर्क था के रफ़ीक अब जरा बड़ा हो गया था और वो उसपे ज्यादा जोर लगाया करता था.

मर्द सम्भोग में मादी पे हावी हो ही जाता हैं. वो उसको भोगना चाहता हैं. भले ही आधुनिक युग में नारी को पूर्ण रूप से भोग विलास में किरदार निभाये दिखाते हैं फिर भी अंतिम सत्य यही हैं के सौंदर्य और नाजुकता नारी का प्रतिक हैं. और मर्द उसका भूका. ये नियम से रफीक भला कहा बचने वाला था. अब रात में सोते वक़्त रफ़ीक के अन्दर का मर्द उसको ललकार रहा था. दिन भर दिन उसके हरकते बढती जा रही थी. शायद उसको वो नहीं समझ रहा था पर नजमा भले भाति सब समझ रही थी. उसकी नज़रे नजमा के मम्मो से हटकर अब उसके साडी के अन्दर जाने लगी थी. और नजमा भी उस बात को अच्छी खासी जान चुकी थी. रात में रफ़ीक कभी उसको चिपक के सोता था तो अपना हाथ उसके साडी के अन्दर डालने की कोशिश करता था पर वो उसके हातो को भिन्च्के अपने सिने से लगा लेती थी. और उसको सुलाने के सब उपाय करती थी. बिना बाप के और गरीबी की वजह से उसके कदम कही बहक न जाये इसलिए उसको आज भी वो बच्चे की तरह संभालती थी. उसके शादी तक उसको कही गलत लत न लगे इसकी वो पूरी कोशिश करती थी. सौतेली संतान को इतना प्यार देने वाली नज्म को बचपन की तरह अब उसको सुलाना इतना आसान नहीं रह गया था.

यहाँ काव्या अपने रूम की खिड़की खोलती हैं. बाहर की ताज़ी ताज़ी हवा से उसके रेशम जैसे बाल उड़ने लगते हैं. उसको बहुत सुकून का एहसास होता हैं. उसके रूम में एयर कन्दिश्नर था पर उसको उसकी ज़रूरत ही नहीं लगी. उसने चारो और नज़र दौड़ाई उसको सब तरफ बस खेत और खली सडके ही नज़र आये. उसका घर उस इलाके में बहुत शांत और सुनसान जगह पे था और मुश्किल से १ या २ मकान थोड़ी दुरी पे होगे. उसने एक गहरी सांस ली उसकी नज़र ठीक एक जगह गयी. उसके घर के ठीक सामने कुछ दुरी पे कुछ जुगिया थी. शायद वो मजदूर लोगो के लिए बनायीं गयी थी . वह पे कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था. पर फ़िलहाल वह काम बंद था. सो उस इलाके में पूरा वीराना भरा पड़ा था.

खिड़की वैसे ही खुली छोडके वो वापस अपने बेड की तरफ चल दी. उसके बेड के सामने एक बड़ा शीशा था. और उसके बाजू में उसका वार्डोब. शीशे के ठीक सामने ही रूम का दरवाज़ा था. दरवाजे से कोई भी शीशे में से अन्दर का झांक सके ऐसी कुछ बनावट थी रूम की. खैर काव्या ने अपने आप को शीशे में निहारा वो इतनी सुन्दर थी के उस वक़्त भी उसका बदन गजब ढा रह था. जाने क्यूँ उसके मन में अचानक ऑटो का सीन आ गया और सुलेमान का लंड ... और अचानक से खिड़की से आती हुई ठंडी हवा के साथ काव्या के होठों पे एक हसी झलक गयी.

“हा..हा...पागल कही का “काव्य उस समय को याद करके खुदे बड बड़ाई. और शीशी में देख के शर्मा गयी.

वो उठी अपने बाल सवारे. दिन भर की थकान से वो थक गयी थी. उसने अपना बैग बेड पे ही डाल दिया और उसमे से एक तोवेल निकाला और ब्रा प्यांति निकाली. उसकी इम्पोर्टेड ब्रा और प्यान्ति उसके पति ने उसको गिफ्ट दी थी. उसने अपनी शिफोन की साडी निकाल के निचे फेकी और अपना ब्लाउज निकाल के बाजु कुर्सी पे दाल दिया. क्या नज़ारा था, ब्रा और पेटीकोट में एक राजसी महिला खड़ी थी. ठीक वैसे ही वो बेड पे बैठती हैं.

उसको मोबाइल देख रमण की याद आई. उसने मोबाइल उठाया और रमण का नंबर डायल किया.

काव्या: “हेलो..जाणू”

रमण: “ओह..ही..डिअर.कहा हो पहुच गयी?”

काव्या: “हा..जस्ट..नानी से मिली और तुम्हारी याद आई..”

अपने ब्रा की straps को सीधा करते हुए वो रमण से बात कर रही थी.

रमण: “ओह हनी आई मिस यू टू”

काव्या: “मुझे बहुत मनन कर रहा हैं तुमसे बात करने का..जानू”

रमण: “ओह डिअर..अभी नहीं मैं मीटिंग में हूँ. मैं शाम में फ़ोन लगाता हु”

काव्या: “जाओ तुमको मेरे लिए हमेशा वक़्त ही नहीं रहता..जाओ मैं नहीं बात करती”

रमण: “ओह डिअर वेट“

और गुस्से से काव्या फ़ोन कट कर देती हैं. रमण हमेशा अपने काम में बीजी रहने से उसको वक़्त नहीं दे पाता. सो उसकी कमी अब काव्या को बहुत खल रही थी. उसने गुस्से से मोबाइल लिया और कुछ चाट निकाला. उसमे कुछ फोटोस और चाट वो पढ़ते बैठी. अपनी ब्रांडेड ब्रा और पेतिकोट में बेड पे बैठी काव्या को, मोबाइल से पुराणी यादे पढ़ते पढ़ते और ठंडी ठंडी खिड़की से आती हुयी हवा से कब आँख लग गयी समझा ही नहीं. और वो वही नींद के मारे ढेर हो गयी.​
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