Update 07
“कौन आ गया इस समय..मा चोद दूंगा.”
बड़े ही गुस्से से खुदसे बडबडाते हुए रफीक दरवाजे की और दौड़ा. दरवाजे की बेल अभीभी बज रही थी. शायद बाहर की और भी कोई बहुत हलचल में था.
“आया ... आया ..रुको”
जोर से और गुस्से से रफीक अन्दर से बुलावा देता हैं. एकदम ख़ट से वो दरवाजे की कुण्डी खोलता हैं और गुस्से से सामने गाली निकालते हुए देखता हैं. तो अचानक से अपने मूह को कस कर लगाम भी लगा देता हैं. क्योकि सामने उसकी सौतेली मा नजमा जो खड़ी थी.
“तू...?”
अपने गुस्से का अचानक से रूपांतर चौक के उसने नजमा से बोला.
“हाँ मैं..तू इतना क्यों चौंक गया रे?” नजमा ने उसको उलटा सवाल किया. होश में आते रफीक ने फिर बात पलटाना शुरू कर दिया.
वो बोला ,“नहीं नही...अम्मी मतलब..इस समय तुम यहाँ कैसे?”
“अरे बावला हो गया क्या? शाम के ५ बजने को हैं..मालकिन के खाना बनाने का समय हुआ हैं. मैं तो हमेशा ही आती हूँ तूझे नहीं पता क्या?”
इसपे रफीक को एहसास हुआ के अभी भी उसका सर भीतर के महोल में ही अटका हैं. बस इस गलती पे अपनि बगले झाकने लगा.
“चल हट, मुझे अन्दर आने दे, काम हैं बहुत. अपने आवारा दोस्तों के साथ रहकर तू भी आवारा बन गया हैं रफीक”
रफीक को हटाकर सलमा अन्दर की और आ गयी. उसने अपना थैला सोफे पे रख दिया जो वो रोज करती थी और अपने काम पे लग जाती थी. पर आज उसने कुछ अलग किया. वही रफीक दरवाजे के बाहर देखता हैं सच में बारिश शुरू थी. और रात होने जैसे लग रह थी. रफीक खुदको मन ही मन समझाता हैं, “बाल-बाल बच गया आज, वरना अम्मी को तो गाली देने ही वाला था..या अलाह शुक्रिया”. ऐसा कहके दरवाजा फिर से लगा कर पिच्छे की और मुड जाता हैं. जैसे ही वो पिच्छे मुड़ता हैं वो और फिर से एक बार चौक जाता हैं.
सामने का नजारा देख वो हक्काबक्का हो जाता हैं. नजमा ने अपने सारी का पल्लू पूरा का पूरा निचे गिरा दिया था. शायद बारिश के कारण उसने वैसा किया. वो बरिश के कारन पूरी भीग जो गयी थी. उसकी साडी भीगने से उसके गठीले मादक बदन से चिपके हुयी थी. उसका ब्लाउज पूरा का पूरा उसकी चुचियों को दर्शा रहा था. उसकी गांड उभरी हुयी थी तो भीगने के कारन और मादक हो गयी थी. रफीक उसका ये अवतार देख सन्न रह गया. ४२ साल की नजमा बिलकुल ३५ साल से ज्यादा नहीं लग रही थी. भीगा बदन कहर ढा रहा था. वो ज्यादा सावली भी नहीं थी इसलिए उसका बदन दमक रहा था. ब्लाउज में दूध का क्लेवेज साफ साफ़ दिख रहा था.
यु तो ये सब बाते रफीक के लिए नयी नहीं थी. नजमा उसको बच्चे की तरह मानती थी. उसके साथ वो कही बार नदी पे नहाई भी थी. और रफीक तो बिना किसी हिचक से उम्र के साथ उसके साथ और घुल मिल जाया करता था. पर आज का समा कुछ और था. आज रफीक को मर्द होने का पूरा एहसास जो मिल गया था. उसकी मर्दानगी को ये सभी बाते ललकार रही थी. उसकी आँखे नजमा के भीगे जिस्म पे टिकी रही और उसके टाईट लंड में फिर से अकड आने लगी.
नजमा वही बेशर्मी से अपने सर के बाल साफ़ कर रही थी. उसको इन बातो का कोई परिणाम था नहीं. वो हमेशा की तरह अपने काम में व्यस्त थी. पर रफीक का ध्यान आज कहा अपने काममे था.
वो वैसे ही नजमा की करीब जाके पिछे से एक झटके में ही उससे बदन से चिपक जाता हैं.
यु तो उसके लिए नजमाँ को चिपकना नया नहीं था. रात में वो आज भी कई कबार नजमा के चुचियों से खेलता, कही बार तो उनका दूध पिता. पर उसने कभी घर के बाहर ऐसी जरुरत नहीं की थी.
“अमीई......रफीक....”
अचानक से हुए इस हमले से नजमा भी चौक गयी. रफीक उससे जम कर के पीछे से चिपक के खड़ा हुआ जो था.
नजमा ने होश सँभालते कहा,
“र..रफीक...बेटे,,क्या हुआ? छोडो ऐसे नहीं करते..”
रफीक अपना भार पीछे से और बढाते हुए नजमा के गले पे अपनी गरम सासे छोड़ते हुए भले ही मादक आवाज में बोल पड़ा,
“ उम...नही...अम्मी..आज मुझे चाहिए...”
नजमा यहाँ वहा देखते हुए उसको अपने आप से छुड़ाने की कोशीश कर रही थी. “बेटा... कक..क्या होना? छोडो अभी,,,”
रफीक ने अपने हाथ सामने से सीधे नजमा के चुचियों पे रख दिए. और उनको जम कर दबाते हुए बोला, “ये चाहिए...मुझे आज..”
जब रफीक के नजमा का दूध दबाया. नजमा तो होश के बाहर हो गयी. उसकी पकड़ बहुत मजबूत लग रही थी आज. उसकी आह निकलते निकलते उसने रोक दी कही कोई आ ना जाए.
और अपने होठो को चबाते हुए वो बोल बड़ी हुए धीरे कस्म्कसाते हुए बोल पड़ी,
“बे,,,,बेटा .. तू...तू घर पे पि लेना .यहाँ नहीं रहता ऐसे, समझो...”
लेकिन आज रफीक कहा सुनने वाला था. उसने अपना जोर और बढ़ाया और इसीके साथ पहली बार नजमा को रफीक की और से अपने बड़ी गद्देदार गांड पे कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ. उसको ये समझने बिल्कुल वक़्त नहीं लगा के ये रफीक का लंड था. उसको इसके कारन एक झटका लगा और अब उसको रफीक से थोडा डर भी लगने लगा.
“नहीं..मुझे अभी चाहिए...पिलाओ...”
नजमा को बुरी तरह अपने से चिपकाते हुए उसकी चुचियों को लगातार मसलना उसने जारी रखा. रहीम चाचा से मसलने से नजमा की चुचिया आज भी ढीली ढाली नहीं थी. बहुत सुडोल थी वो. ३६ साइज़ की चुचिया रफीक पुरे जोश के साथ मसल रहा था. पर बात चुचियों की नहीं थी बात थी उसकी पकड़ की जिसमे मर्दाना एहसास ज्यादा था, ना के बच्चे का. साथ ही बात उसके लंड की थी जो उसके गांड की साडी के ऊपर से मा चोद रहा था.
“नहीं....रफीक....ज़बरदस्ती नहीं करते,...छोडो...अच्छे बचे की तरह..”
नज्मा अभी भी उसको बच्चे की तरह दाट रही थी. शायद उसको अभीभि सब साधारण ही लग रहा था. पर तभी वो हुआ जो सलमा के लिए किसी बड़ी सुनामी की तरह था.
रफीक ने अपना पूरा बोझ उसके पीछ डाल दिया था. और होशो आवाज से बाहर होकर उस नवयुवक से अपनी मा को इस कदर दबाया के खड़े खड़े ही वो सामने सोफे पर झुक गयी. उसके हाथ सोफे पे थे. और पीछे गांड उभर के रफीक से लपकी थी. कुत्ता कुतिया पे जैसा चढ़ता हैं वैसे स्थिथि में दोनों की हालत थी. ताज्जुब ये था के बारिश भी गिर रही थी. जिससे सच में वो दृश्य बहुत ही कामुक हो गया था. नजमा के सासे ही अटक गयी. उसने पूरी कोशीश की रफीक को समझाने की. अटक अटक सांस लेते हुए उसने कहा,
“रफीक,,,छोडो...मार पड़ेगी अब तुमको...सुनते हो के नहीं?”
पर यहाँ तो बच्चा पूरा जवान हो गया था वो क़हा अब डरने वाला था. उसका ध्यान तो बस नजमा का बदन सेकने में डूबा था. अपनी आखे बंद रखते हुए ही उसने अपना शरीर का दबाव और बढ़ाया. जिस कारण उसका लंड सलमा के गांड के बीचो बीच आके अपना बल दिखाने में सफल हो गया.
अब वो भी खुद झूक गया और उसका मूह सलमा की पीठ पर चिपक गया. और उसके चेहरे को हाथो से मलते हुए लाड में आकर चुम्मी लेते हुए बोला,
“आह...नहीं...अमी..मुझे अभी चाहिए...जाओ”
रफीक तो मानने में नहीं दिख रहा था. तभी नजमा को निचे की कमरे की लाइट जली हुयी दिख पड़ी. शायद काव्या की नानी जाग गयी थी. नजमा को विंडो से दिख रहा था. वो कभी भी आ सकती थी. नजमा करे तो क्या करे? अगर इस हालात में कोई गलती से देख ले तो उसको तो मूह दिखाने जगह नहीं रहेगी. उसको कैसे भी करते रफीक को हटाना था. नज्मा की आँखे ये सोच के डर के मार खुली की खुली रह जाती हैं उसे कैसी भी करके रफीक को अब हटाना ज़रूरी बन गया था.
उसकी इन हरकतों को अभी भी वो बचपना समझ रही थी. उसके बचपने से वो एक सौदा करने का ठान लिया. जैसे बचचो के साथ चॉकलेट पे किया जाता हैं. पर शायद उसको ये सौदा रफीक के जवान लंड की करतूतों से मेहंगा न गिर जाये.
“रुक जा बेटे...कोई आ जायेगा..अब तू बच्चा नहीं रहा के मैं कही भी दूध पिला सकू..समझ”
रफीक के दबाव के निचे सोफे पे खुद दबते हुए नजमा वहा रफीक को समझा रही थी. पर वो तो कही अलग ही दुनिया में था जो उसके चुचियों को जम के रगड़े जा रहा था.
“अम्मी,..मुझ होना,,,”
नजमा के कान काटते हुए उसका तना लंड इस कदर साडी के ऊपर से नजमा के गद्देदार गांड को चुभ गया के उसकी एक चीख निकल गयी.
“आ:;;;;ह्ह्ह.......”
डर और जल्दबाजी में उसके मूह से ये चीख निकल तो गयी थी. पर उसकी आवाज सुन के काव्या के नानी ने अपने कमरे से ही कहा,
“कौन? कौन हैं ? काव्या बेटी जाग गयी क्या?”
अचनक से निकली अपनी चीख से नजमा किसी बुत के माफिक थम गयी. उसने तुरंत पीछे मूड के वैसे ही हालात में रफीक से लगभग भीग मांगते हुए कहा,
“बेटा ,, छोड़ दे अपनी मा को समझ...तू बड़ा हो गया हैं अब.. ये यहाँ नहीं हो सकता..तू देख छोटी मेमसाब भी हैं घर में..काव्या बीबी..वो जाग जायेगी “
काव्या का नाम सुनते ही रफीक होश में आ गया. उसका नाम किसी दवा की तरह काम कर गया. रफिक एकदम से नजमा के ऊपर से हट गया. और बाजु में खड़ा हो गया. नजमा ने रहत की सांस छोड़ी. जैसे ही वो खड़ी हो गयी, अन्दर से काव्या की नानी आती हुयी उसको दिख गयी. बाल-बाल बच गयी थी वो अगर थोड़ी भी देरी हो जाती तो आज न जाने दोनों मा बेटो का नाम का क्या हो जाता. नजमाँ वही समझा रही थी जो रफीक नहीं समझ रहा था. काव्या का नाम उसको किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लगा उस वक़्त.
उसने अपना साडी का पल्लू कैसे तो कंधे पे वापस ले लिया. कुछ समय में ही उसके ब्लाउस को रफीक के मर्दाना हातो ने तितर बितर कर दिया था. उसके ऊपर का बटन खिचातानी में टूट गया था. खैर नजमा ने एक बार गुस्से से रफीक और देखा और अपनि साडी ठीक करने लगी.
“क्यों रे? तू हैं? मुझे लगा काव्या बेटी हैं. इतना क्यों जोर से चीखी तू”, काव्या के नानी के आये ताबड़तोड़ सवाल ने नजमा को उलझन में दाल दिया.
अपने साडी का पल्लू का एक छोर कमर पे घुसाते हुए उसने हिचकिचाते कहा, “जी....वो...बड़ी ठकुराइनी...अम्मा जी..छिपकली दिख गयी थी सोफे के निचे साफ़ करते ..तनिक घबरा गयी मैं बावली”
नजमा अपनी नज़ारे यहाँ वह घुमा रही थी. काव्या की नानी की नज़र उसके ब्लाउज पे गया. उसकी हालत देख के उसको कुछ अजीब लगा पर बाजु में रफीक को देख उसने कुछ गलत नहीं समझा. पर उसको क्या पता वही सच था.
“अच्छा ठीक है..अपने कपडे ठीक कर और काम पर लग जा..काव्या बेटी आई हैं अछा खाना बना आज. दूध की खीर बनानि है उसके पसंद की तुझे और उसको पुछ लेना कल से क्या क्या बनाना हैं. और हा, एक बात”
“जी अम्मा जी क्या?”
“खुदको ज़रा ढंग में रखा कर. कैसे कपडे हो गए हैं तेरे. गिले और तितर बितर. तेरा बीटा भी बड़ा हो रहा हैं न, अकल नहीं क्या तुझे?”
“जी अम्मा जी ...आइन्दा से ख्याल रखूंगी”
अपने नज़रे निचे ज़मीन की और टिकाकर वो चुप चाप कड़ी हो गयी. बिच बिच में रफीक की और वो बड़ी आँखे कर के देखती वो भी वह कोने में चुप चाप गाय के माफिक खड़ा था.
काव्या की नानी थी उम्र से ज्यादा पर थी वो बिलकुल कड़क. उसका स्वाभाव बिलकुल सख्त था खासकर नौकर चाकर के साथ. और नजमा के प्रति वो जरा इर्षा भी रखती थी. कही बार किशोरी लाल को उसने नजमा के साथ करीब होते हुए देखा था, गाँव में चर्चे भी थे के बूढ़े ने इस को इसलिए सिर्फ मस्ती के लिए रखा था. पर नजमा सब सह लेती क्योंकि किशोरी लाल के बहुत उपकार उसके घर पे थे.
गरीब और अमिर ये भले भगवन ने नहीं बनाये हो परन्तु इंसान आज इनि बातो से घिरा हुआ हैं. बात थी काव्या के नानी की जिसको नजमा के कपड़ो पे ऐतराज था, परन्तु खुदकी पोती पे उसको नाज था. शायद इसलिए क्योंकि नजमा गरीब हैं. काव्या आमिर हैं, उसकी पोती हैं, इसलीये वो जो करे वो उसके लिए ठीक था. काश वो एखाद बार काव्या के रूम में चली जाके देख लेती तो उसको पता चलता कपड़ो की मर्यादा की सिख किसको ज्यादा जरुरी हैं. पर क्या पता? वो उसको भी प्रशंशा की नजर से देखती, के जमाना मॉडर्न हैं.
खैर बात कपड़ो की नहीं हैं, बात हैं अमिर और गरीब की. दुनिया भले ही अपने आप को कपड़ो से, रीती रिवाजो से, रहन सहन से मॉडर्न बुला दे. पर सच तो ये हैं, के आज भी इस मॉडर्न दुनिया में कोई मार खाता हैं तो वो हैं गरीब. अगर कोई गरिब इस दुनिया के तरीके सिख भी ले फिर भी उसको ही झुकना पड़ेगा. समाज तभि आगे बढ़ पायेगा जब गरीब और अमिर ये अंतर ख़त्म हो जाए. इतिहास गवा हैं काला धन रहे या काला मन रहे ये काला कम करने वाले अमिर तो खुदको सफ़ेद करके निकल जाते हैं बाद में इसका काला कलंक सिर्फ गरीबो को झेलना पड़ता हैं.
काव्या के नानी ने रफीक की और नज़र घुमाई. वो कोने में चुप चाप निचे गर्दन झुकाके खड़ा था. उसको देख के थोड़े कठोर शब्दों में नानी बोली,
“सुन. तू गया था क्या काव्या के खोली में साफ़ करने?”
रफीक के मानो कबूतर उड गए. उसके माथे पे पसीना आ गया. उसकी धड़कन एक दम से तेज़ दौड़ने लगी. वो कुछ बोल ही नहीं पाया.
“हां या नहीं बोल. साप सूंघ गया क्या तुझे?”
अलग ही रंजिश में फसा रफीक ने अपना सर एकबार ना में हिलाया एक बार हां में. काव्या के नानी को ये देख कर और माथा खनक गया वो नजमा की और देख के फिर से गुस्से से बोली,
“क्या बचपना हैं नज्मा. तेरे बेटे को ख़ाक बात समझती नहीं. क्या काम करेगा वो यहाँ? दोनों मा बेटे कुछ काम के नहीं हो”, नजमा चुपचाप सब सुनके खामोश खड़ी थी.
“बावले लोग हैं. खैर इसको बोल काव्या का रूम साफ़ करने. और अभी मत जा..वो सोयी होगी. और दरवाजा बजाके जाते जाओ दोनों अब से. हर बात बोलनी पड़ती”
“जी अम्मा जी”, नजमा ने हां में सर हिलाया और गुस्से से रफीक की और देखा.
काव्या की नानी को बाहर बगीचे में जाते हुए देख के नजमा ने राहत ली. उसने तुरंत रफीक की और देखा और गुस्से से बोला, ” तुझे हो क्या गया? देख तेरे वजह से मुझ सुनना पड़ा. वो कितना सुनाती तुझे पता न.”
रफीक उसकी बाते सुन कर बोल पड़ा,”मेरी क्या गलती अम्मी. मुझे बस दुधू चाहिए था..”
नजमा ने अपने सर पे हाथ लगाया. रफीक के नादान जवाब ने उसका गुस्सा दूर भगा दिया. उसके करीब जाके वो धीरे से बोला “ बेटा, घर में तुम कुछ भी करो, यहाँ नहीं“
अचानक रफीक के चेहरे पे ख़ुशी लौट आई.
“सच अम्मी?”
उसकी ख़ुशी को देख नजमा भी थोड़े खुश होक बोली” हां सच” रफीक का डर सब एक पल भर में भाग गया. वो खुश होक हँसने लगा.
नजमा ने उसकी ख़ुशी देखते कहा,” बड़ा खुश हो रहा है आज. पहले तो नहीं देखा. चल सीधे घर जा कही भटक मत. मैं खाना बनाके आ जाती हु घर. यही से कुछ खाना ले कर आती हु ठीक हैं”
“जी अम्मी..आप बहुत प्यारी हो” और हस्ते हुए रफीक दरवाजे के बाहर निकालने लगा. नजमा से उसे पिच्छे से जोर से पुकारके कहा,” सुन....सीधे घर जाके पढ़ाई करना”
“ अच्छा अम्मी..”और अपने साइकिल पे बैठके अपने घर की और वो रवाना हो गया. नजमा भी अपने काम में लग गयी. रात का खाना जो आज बनाना था. वो किचन में गयी और अपने काम में लग गयी. खीर बनाने के लिए पहले उसने फ्रिज से दूध निकाल लिया. सच में आज तो दूध की बहुत जरुरत थी उसको अभी खाने में और बाद में घर में रफीक के लिये.
“उम्mmmmmmm.....आ....ओह हनी....”
यहाँ शाम का समा उतरने ही वाला था के गहरी नींद से आखिरकार काव्या ने आखे खोले दी.एक जोर की अंगडाई देते हुये उसने अपने गोरी बाहे ऊपर कर दी. ऐसा लग रहा था कोई योवन सुंदरी अभी नहाकर आई हो. अपने बालो को सवारते हुए उसको पिन से बांध के वो बहुत मादक लग रही थी. अपनी सुस्ति से वो बाहर आने की कोशिश कर रही थी. उसका बदन उसको फ्रेश महसूस हो रहा था.
तभी अचानक उसको निचे कुछ गिला महसूस हुआ. वो अचानक चौक गयी. जब अपन हाथ लगाके देखा तो उसने पा के उसकी प्यांति पूरी आगे से भीग गयी थी और तो और उसके पेट पे और जांघो पे गिला पण महससू हो रहा था. उसने चौक कर के झटके में गौर से अपने प्यांति को देखा.
“ओह गॉड .ये क्या हुआ?”
सब गिला गिला महसूस करने से उसको झनझनी महसूस हो रहि थी. ठण्ड हवाओ से उस जगह और ठण्ड और गिला लग रहा था. उसने उसी चद्दर से उसको साफ़ किया.
“ये क्या हैं? मेरे पिरिओड्स तो नहीं हैं अभी...देन?”
मासिक हफ्ता उसका गुज़र गया था इसलिए वो उलझन में थि. ये गिला गिला हैं क्या.
“ ओह शिट ..ये कही वो तो नहीं? “
शायद उसके दीमाक की बत्ती अब बुझने चालू हो गयी थी. उसको लगा उसका पानी नींद में छुट गया. पर फिर भी पेट और बिस्तर को देख वो असमंजश में थी. पेशे से डॉक्टर होने से उसको सब समझने के लिए ज्यादा समय नहीं लगा. उसको ऐसा एहसास हुआ के भावनाओं में बहकर नींद में उससे शायद ऐसा हुआ होगा. पर इतना सारा चिपचिपा पानी देख के उसको थोडा शक हो रहा था. पर शायद मन का बरम समझके वो उलझन भरे मोड़ में थी.
“ओह....शिट...आई हैव तो क्लीन...हम्म”
खैर वो वैसे ही उठ खड़ी हुई. आह..क्या क़यामत माल थी काव्या, ब्रा और गीली प्यांति जिसपे उसके चूत से निकला पानी और रफीक के लंड से निकला वीर्य कहर धा रहे थे. उसने यहाँ वह देखा. उसको अपना तोवेलिया वार्डरॉब के पास बिछा देखा. वो वैसे ही अपना तोवेलिया ले कर सीधा बाथरूम में चली गयी. उसने ज्यादा कुछ सोचने से पहले खुदको साफ़ करना मुनासिफ समझा. अन्दर जाते ही अपनी प्यांति उतार के बाजू में फेक दी और शावर चालू करके उसके निचे खुद को रुका दिया. देखते ही देखते पानी की धारे उसकी मखमाली जिस्म से लेकर कोरी कोरी चूत को स्पर्श करके निचे एडियो तक टपकने लगी.
यहाँ रफीक आराम से खुशी से मारे साईकल पे से घर की और बढ़ रहा था. उसको तभी उसके दोस्त बीजू की याद आ गयी. वो रुका और खुद से बुदबुदाया,
“क्यों न बीजू से मिल लिया जाये उसको भी तो जाने रफीक डरपोक नहीं हैं”
ख़ुशी से मारे उसने अपने कच्छे के सिली हुई जेब में अपना मोबाइल लेने हाथ डाला. पर उसको वो वह मिला नहीं. फिर उसने अपना कुर्ता टटोला कही पे भी मोबाइल मिलने का नाम नही ले रहा था.
“या अल्लाह,,मोबाईल कहा गया? अम्मी को पता चला तो गया मैं”
बैचनी और डर में अचानक उसको याद आया. जल्बाजी में उसने वो मोबाइल दुसरे जेब में रखा था जो के कितने दिन से फटा पड़ा था. उसके तो पसीने निकल गए.
“ओ तेरी, मोबाइल तो कमरे में बेड के निचे गिर गया होगा? अब क्या करू?”
उसके माथे पे पसीने आ गए,
“अगर वह मोबाइल मिला तो काव्या जी की नानी तो मेरी जान निकाल देगी.”
उसने एक झटके में साइकिल मोडी और काव्या के बंगले की तरफ बहुत तेज़ी से पैडल घुमाने लगा. राजधानी एक्सप्रेस की तरह उसने पुरे ताकद से बंगले की तरफ अपनी कुछ थी. जैसे किसी सेना के साथ चढ़ाई करने जा रहा हो. भय और भावनाओ में आज रफीक ने जीवन का ऐसा दिन गुजारा था जो उसको शायद चैन की सांस लेने नहीं दे रहा था.
यहाँ काव्या शावर के निचे अर्ध नग्न खड़ी थी. पानी ने उसको थोड़ी राहत दी. खुदको और आज़ाद करने के लिए उसने अपनी ब्रा के हुक पीछे से खोले और अपने नाजुक गोरी बाहों में से उसको उतार दिया. उसने जैसे ही अपनि ब्रा निकाल के बाजू में फेक दी. उसके ३२ के भरेभरे दूध उछल से आजाद हो गए. वा,,,नंगी पुंगी योवन सुंदरी इस कदर शावर के नीछे खड़ी थी के मानो वह हुस्न से आग लगाने वाली हो सब तरफ. पानी बदन से बह रहा था वो सुकून महसूस कर रही थी. पर उसके मन में अभी भी वो शक आ रहा था के वो धब्बे हैं किस चीज के? प्व्शे से डॉक्टर होने से उसको वो बाते समझ तो रही थी पर उसका दिल मान नहीं रहा था.
वो पानी को बदन पे लेते सोच रही थी:
“कही..मैं नींद में डिस्चार्ज तो नहीं...? या फिर कोई और आया तो नहीं था सोने के बाद?”
सोचते सोचते उसका हात उसके नाजुक गले पे जैसे ही लिप्त उसको तुरंत शोक लग गया.
“ओह...रमण...मेरा मगल्सुत्र? कहा गिरा?”
उसके मन में जैसे लहर दौड़ गयी. सब सवाल एक ही बात पे अटक गए मंगलसूत्र. वो बैचैन हो गयी. अपने भीगे बदन की परवाह ना करते उसने यहाँ वह देखा. बाजू में फेकी हुई ब्रा उठा केदेखा तो उसमे भी कही मंगलसूत्र अटके जैसा नहीं दिखा. उसने बाथरूम में यहाँ वह देखना चालू कर दिया.
“ओह्ह...शिट...मेरा मगल्सुत्र...”
पूरा ध्यान उसको पाने में उसका लगा हुआ था. शोवर अभी भी ऑन था. पानी की बौछार उसके ऊपर चालू थी.
“ओह...ये पानी...” गुस्से से उसने उठकर शोवर पहले बंद किया. और पानी ने उसको भीगना रोक दिया. जल्दी जल्दी में अपना तोवेल लेकर वो बालो को साफ़ करने लगी. और वैसे ही तोवेल १ मिनट में अपने बदन से लपेटकर वो कैसे तैसे बाहर आ कर मंगलसूत्र ढूँढना चाहती थी.
उसने वैसे ही तोवेल अपने भीगे बदन पे लपेटा और बाथरूम के बाहर आ गयी. अध् गिले बदन की परवाह ना करते वो यहाँ वह रूम में ढूंढ रही थी. अपनी बीएड पे जाके उसने चद्दर और तकिये झांके पर कुछ मिला नहीं. उसकी बैचनी बढ़ रही थी पर उसके साथ ही बैचैन था उसका तोवेल जो जरा छोटा था और बड़े मुस्किल से उसके बदन को सवारे हुए था.
यहाँ रफीक भी १० मिनट में ही वापस काव्या के बंगले के गेट पर आ गया. वही उसने साइकिल लगा दी और दरवाजे की तरफ भागा. तभी उसके पीछे से आवाज आई,
“अरे छोकरे, कहा जा रहा हैं?”
काव्य की नानी जो बागीचे में टहल रही थी उसने रफीक को पीछे से आवाज दी थी.
रफीक की तो पहले ही बत्ती गुल थी वो कैसे तो हडबडाते सास लेते हुए बोला,
“जी...जी...अम्मा जी..वो अम्मि से चाबी लेनी थी...”और आगे कुछ सुनने के पहले बिना कुछ बोले वो सर्र कर के भागा अन्दर की और.
अन्दर काव्या अपने भीगे बदन से मंगलसूत्र ढून्ढ ही रही थी के उसको अचानक बेड के निचे कुछ आवाज आती हैं. वो वही चीज थी जो रफीक वह भूल गया था. उसका मोबाइल. उसके मोबाइल की रिंगटोन जोर से बज रही होती हैं. वो पलट के उस तरफ देखती हैं और उस रिंगटोन को सुनती हैं.
“लगावेलु जब लिपस्टिक, हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट
ज़िला टॉप लालेलु
कमरिया करे लापा लप, लोलीपोप लागेलु”
काव्या हैरानी से बेड के निचे झुकती हैं जिससे उसका तोवेल और ऊपर चढ़ जाता हैं उसका पिछवाडा लगभग खुल जाता हैं.
गुस्से से काव्या ने वो मोबाइल उठाया उसपे देखा कोई बीजू नामे से कॉल आ रहा होता हैं. उसको देख उसके मन में गुस्से के साथ कही सवाल आने लगे.
“ओह...इसका मतलब कोई आया था,,कही उसने ही तो ..?”
उसका माथा आगबबुला हो गया. गुस्से से वो चिड गयी. उसको चोरी का शक आने लगा. वो बस उठ के अपने आप को वार्डरोब के शीशे में देखती हैं. बड़े गुस्से में आगबबुला हो वो वह खुदको देखती हैं. और जैसे ही जोर से अपनी नानी को आवाज देनी वाली थी. के वो अचानक से रुक गयी.
सामने सास फूलता हुआ रफीक दरवाजे पे दस्तक ले आया था. उसको देख काव्या और गुस्सा हो गयी और रफीक तो मानो डर के काप रहा था. पर दोनों के वजह अलग थे. रफीक को काव्या के गुस्से वाले चेहरे के साथ उसका एक हाथ में पकड़ा मोबाइल तो दिख ही गया पर साथ ही दुसरे हाथ में पकड़ा हुआ तोवेल जो के उन दोनों से भी ज्यादा बैचैन हो रहा था. शायद ये समय रफीक के लिए किसी ऐसा था जैसे धुप और बारिश , गुस्सा और हुस्न एक ही समय आ गयी हो. उसके मूह में पानी भी आ रहा था और गले से उतर भी नही रहा था. पुरे खोली में डर और गुस्से से सन्नाटा छा जाता हैं. पर फिर से रफीक का मोबाइल बज पड़ता हैं और खोली में रिंगटोन की आवाज घुमने लगती हैं.
“लगावेलु जब लिपस्टिक, हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट
ज़िला टॉप लालेलु
कमरिया करे लापा लप, लोलीपोप लागेलु”
बड़े ही गुस्से से खुदसे बडबडाते हुए रफीक दरवाजे की और दौड़ा. दरवाजे की बेल अभीभी बज रही थी. शायद बाहर की और भी कोई बहुत हलचल में था.
“आया ... आया ..रुको”
जोर से और गुस्से से रफीक अन्दर से बुलावा देता हैं. एकदम ख़ट से वो दरवाजे की कुण्डी खोलता हैं और गुस्से से सामने गाली निकालते हुए देखता हैं. तो अचानक से अपने मूह को कस कर लगाम भी लगा देता हैं. क्योकि सामने उसकी सौतेली मा नजमा जो खड़ी थी.
“तू...?”
अपने गुस्से का अचानक से रूपांतर चौक के उसने नजमा से बोला.
“हाँ मैं..तू इतना क्यों चौंक गया रे?” नजमा ने उसको उलटा सवाल किया. होश में आते रफीक ने फिर बात पलटाना शुरू कर दिया.
वो बोला ,“नहीं नही...अम्मी मतलब..इस समय तुम यहाँ कैसे?”
“अरे बावला हो गया क्या? शाम के ५ बजने को हैं..मालकिन के खाना बनाने का समय हुआ हैं. मैं तो हमेशा ही आती हूँ तूझे नहीं पता क्या?”
इसपे रफीक को एहसास हुआ के अभी भी उसका सर भीतर के महोल में ही अटका हैं. बस इस गलती पे अपनि बगले झाकने लगा.
“चल हट, मुझे अन्दर आने दे, काम हैं बहुत. अपने आवारा दोस्तों के साथ रहकर तू भी आवारा बन गया हैं रफीक”
रफीक को हटाकर सलमा अन्दर की और आ गयी. उसने अपना थैला सोफे पे रख दिया जो वो रोज करती थी और अपने काम पे लग जाती थी. पर आज उसने कुछ अलग किया. वही रफीक दरवाजे के बाहर देखता हैं सच में बारिश शुरू थी. और रात होने जैसे लग रह थी. रफीक खुदको मन ही मन समझाता हैं, “बाल-बाल बच गया आज, वरना अम्मी को तो गाली देने ही वाला था..या अलाह शुक्रिया”. ऐसा कहके दरवाजा फिर से लगा कर पिच्छे की और मुड जाता हैं. जैसे ही वो पिच्छे मुड़ता हैं वो और फिर से एक बार चौक जाता हैं.
सामने का नजारा देख वो हक्काबक्का हो जाता हैं. नजमा ने अपने सारी का पल्लू पूरा का पूरा निचे गिरा दिया था. शायद बारिश के कारण उसने वैसा किया. वो बरिश के कारन पूरी भीग जो गयी थी. उसकी साडी भीगने से उसके गठीले मादक बदन से चिपके हुयी थी. उसका ब्लाउज पूरा का पूरा उसकी चुचियों को दर्शा रहा था. उसकी गांड उभरी हुयी थी तो भीगने के कारन और मादक हो गयी थी. रफीक उसका ये अवतार देख सन्न रह गया. ४२ साल की नजमा बिलकुल ३५ साल से ज्यादा नहीं लग रही थी. भीगा बदन कहर ढा रहा था. वो ज्यादा सावली भी नहीं थी इसलिए उसका बदन दमक रहा था. ब्लाउज में दूध का क्लेवेज साफ साफ़ दिख रहा था.
यु तो ये सब बाते रफीक के लिए नयी नहीं थी. नजमा उसको बच्चे की तरह मानती थी. उसके साथ वो कही बार नदी पे नहाई भी थी. और रफीक तो बिना किसी हिचक से उम्र के साथ उसके साथ और घुल मिल जाया करता था. पर आज का समा कुछ और था. आज रफीक को मर्द होने का पूरा एहसास जो मिल गया था. उसकी मर्दानगी को ये सभी बाते ललकार रही थी. उसकी आँखे नजमा के भीगे जिस्म पे टिकी रही और उसके टाईट लंड में फिर से अकड आने लगी.
नजमा वही बेशर्मी से अपने सर के बाल साफ़ कर रही थी. उसको इन बातो का कोई परिणाम था नहीं. वो हमेशा की तरह अपने काम में व्यस्त थी. पर रफीक का ध्यान आज कहा अपने काममे था.
वो वैसे ही नजमा की करीब जाके पिछे से एक झटके में ही उससे बदन से चिपक जाता हैं.
यु तो उसके लिए नजमाँ को चिपकना नया नहीं था. रात में वो आज भी कई कबार नजमा के चुचियों से खेलता, कही बार तो उनका दूध पिता. पर उसने कभी घर के बाहर ऐसी जरुरत नहीं की थी.
“अमीई......रफीक....”
अचानक से हुए इस हमले से नजमा भी चौक गयी. रफीक उससे जम कर के पीछे से चिपक के खड़ा हुआ जो था.
नजमा ने होश सँभालते कहा,
“र..रफीक...बेटे,,क्या हुआ? छोडो ऐसे नहीं करते..”
रफीक अपना भार पीछे से और बढाते हुए नजमा के गले पे अपनी गरम सासे छोड़ते हुए भले ही मादक आवाज में बोल पड़ा,
“ उम...नही...अम्मी..आज मुझे चाहिए...”
नजमा यहाँ वहा देखते हुए उसको अपने आप से छुड़ाने की कोशीश कर रही थी. “बेटा... कक..क्या होना? छोडो अभी,,,”
रफीक ने अपने हाथ सामने से सीधे नजमा के चुचियों पे रख दिए. और उनको जम कर दबाते हुए बोला, “ये चाहिए...मुझे आज..”
जब रफीक के नजमा का दूध दबाया. नजमा तो होश के बाहर हो गयी. उसकी पकड़ बहुत मजबूत लग रही थी आज. उसकी आह निकलते निकलते उसने रोक दी कही कोई आ ना जाए.
और अपने होठो को चबाते हुए वो बोल बड़ी हुए धीरे कस्म्कसाते हुए बोल पड़ी,
“बे,,,,बेटा .. तू...तू घर पे पि लेना .यहाँ नहीं रहता ऐसे, समझो...”
लेकिन आज रफीक कहा सुनने वाला था. उसने अपना जोर और बढ़ाया और इसीके साथ पहली बार नजमा को रफीक की और से अपने बड़ी गद्देदार गांड पे कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ. उसको ये समझने बिल्कुल वक़्त नहीं लगा के ये रफीक का लंड था. उसको इसके कारन एक झटका लगा और अब उसको रफीक से थोडा डर भी लगने लगा.
“नहीं..मुझे अभी चाहिए...पिलाओ...”
नजमा को बुरी तरह अपने से चिपकाते हुए उसकी चुचियों को लगातार मसलना उसने जारी रखा. रहीम चाचा से मसलने से नजमा की चुचिया आज भी ढीली ढाली नहीं थी. बहुत सुडोल थी वो. ३६ साइज़ की चुचिया रफीक पुरे जोश के साथ मसल रहा था. पर बात चुचियों की नहीं थी बात थी उसकी पकड़ की जिसमे मर्दाना एहसास ज्यादा था, ना के बच्चे का. साथ ही बात उसके लंड की थी जो उसके गांड की साडी के ऊपर से मा चोद रहा था.
“नहीं....रफीक....ज़बरदस्ती नहीं करते,...छोडो...अच्छे बचे की तरह..”
नज्मा अभी भी उसको बच्चे की तरह दाट रही थी. शायद उसको अभीभि सब साधारण ही लग रहा था. पर तभी वो हुआ जो सलमा के लिए किसी बड़ी सुनामी की तरह था.
रफीक ने अपना पूरा बोझ उसके पीछ डाल दिया था. और होशो आवाज से बाहर होकर उस नवयुवक से अपनी मा को इस कदर दबाया के खड़े खड़े ही वो सामने सोफे पर झुक गयी. उसके हाथ सोफे पे थे. और पीछे गांड उभर के रफीक से लपकी थी. कुत्ता कुतिया पे जैसा चढ़ता हैं वैसे स्थिथि में दोनों की हालत थी. ताज्जुब ये था के बारिश भी गिर रही थी. जिससे सच में वो दृश्य बहुत ही कामुक हो गया था. नजमा के सासे ही अटक गयी. उसने पूरी कोशीश की रफीक को समझाने की. अटक अटक सांस लेते हुए उसने कहा,
“रफीक,,,छोडो...मार पड़ेगी अब तुमको...सुनते हो के नहीं?”
पर यहाँ तो बच्चा पूरा जवान हो गया था वो क़हा अब डरने वाला था. उसका ध्यान तो बस नजमा का बदन सेकने में डूबा था. अपनी आखे बंद रखते हुए ही उसने अपना शरीर का दबाव और बढ़ाया. जिस कारण उसका लंड सलमा के गांड के बीचो बीच आके अपना बल दिखाने में सफल हो गया.
अब वो भी खुद झूक गया और उसका मूह सलमा की पीठ पर चिपक गया. और उसके चेहरे को हाथो से मलते हुए लाड में आकर चुम्मी लेते हुए बोला,
“आह...नहीं...अमी..मुझे अभी चाहिए...जाओ”
रफीक तो मानने में नहीं दिख रहा था. तभी नजमा को निचे की कमरे की लाइट जली हुयी दिख पड़ी. शायद काव्या की नानी जाग गयी थी. नजमा को विंडो से दिख रहा था. वो कभी भी आ सकती थी. नजमा करे तो क्या करे? अगर इस हालात में कोई गलती से देख ले तो उसको तो मूह दिखाने जगह नहीं रहेगी. उसको कैसे भी करते रफीक को हटाना था. नज्मा की आँखे ये सोच के डर के मार खुली की खुली रह जाती हैं उसे कैसी भी करके रफीक को अब हटाना ज़रूरी बन गया था.
उसकी इन हरकतों को अभी भी वो बचपना समझ रही थी. उसके बचपने से वो एक सौदा करने का ठान लिया. जैसे बचचो के साथ चॉकलेट पे किया जाता हैं. पर शायद उसको ये सौदा रफीक के जवान लंड की करतूतों से मेहंगा न गिर जाये.
“रुक जा बेटे...कोई आ जायेगा..अब तू बच्चा नहीं रहा के मैं कही भी दूध पिला सकू..समझ”
रफीक के दबाव के निचे सोफे पे खुद दबते हुए नजमा वहा रफीक को समझा रही थी. पर वो तो कही अलग ही दुनिया में था जो उसके चुचियों को जम के रगड़े जा रहा था.
“अम्मी,..मुझ होना,,,”
नजमा के कान काटते हुए उसका तना लंड इस कदर साडी के ऊपर से नजमा के गद्देदार गांड को चुभ गया के उसकी एक चीख निकल गयी.
“आ:;;;;ह्ह्ह.......”
डर और जल्दबाजी में उसके मूह से ये चीख निकल तो गयी थी. पर उसकी आवाज सुन के काव्या के नानी ने अपने कमरे से ही कहा,
“कौन? कौन हैं ? काव्या बेटी जाग गयी क्या?”
अचनक से निकली अपनी चीख से नजमा किसी बुत के माफिक थम गयी. उसने तुरंत पीछे मूड के वैसे ही हालात में रफीक से लगभग भीग मांगते हुए कहा,
“बेटा ,, छोड़ दे अपनी मा को समझ...तू बड़ा हो गया हैं अब.. ये यहाँ नहीं हो सकता..तू देख छोटी मेमसाब भी हैं घर में..काव्या बीबी..वो जाग जायेगी “
काव्या का नाम सुनते ही रफीक होश में आ गया. उसका नाम किसी दवा की तरह काम कर गया. रफिक एकदम से नजमा के ऊपर से हट गया. और बाजु में खड़ा हो गया. नजमा ने रहत की सांस छोड़ी. जैसे ही वो खड़ी हो गयी, अन्दर से काव्या की नानी आती हुयी उसको दिख गयी. बाल-बाल बच गयी थी वो अगर थोड़ी भी देरी हो जाती तो आज न जाने दोनों मा बेटो का नाम का क्या हो जाता. नजमाँ वही समझा रही थी जो रफीक नहीं समझ रहा था. काव्या का नाम उसको किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लगा उस वक़्त.
उसने अपना साडी का पल्लू कैसे तो कंधे पे वापस ले लिया. कुछ समय में ही उसके ब्लाउस को रफीक के मर्दाना हातो ने तितर बितर कर दिया था. उसके ऊपर का बटन खिचातानी में टूट गया था. खैर नजमा ने एक बार गुस्से से रफीक और देखा और अपनि साडी ठीक करने लगी.
“क्यों रे? तू हैं? मुझे लगा काव्या बेटी हैं. इतना क्यों जोर से चीखी तू”, काव्या के नानी के आये ताबड़तोड़ सवाल ने नजमा को उलझन में दाल दिया.
अपने साडी का पल्लू का एक छोर कमर पे घुसाते हुए उसने हिचकिचाते कहा, “जी....वो...बड़ी ठकुराइनी...अम्मा जी..छिपकली दिख गयी थी सोफे के निचे साफ़ करते ..तनिक घबरा गयी मैं बावली”
नजमा अपनी नज़ारे यहाँ वह घुमा रही थी. काव्या की नानी की नज़र उसके ब्लाउज पे गया. उसकी हालत देख के उसको कुछ अजीब लगा पर बाजु में रफीक को देख उसने कुछ गलत नहीं समझा. पर उसको क्या पता वही सच था.
“अच्छा ठीक है..अपने कपडे ठीक कर और काम पर लग जा..काव्या बेटी आई हैं अछा खाना बना आज. दूध की खीर बनानि है उसके पसंद की तुझे और उसको पुछ लेना कल से क्या क्या बनाना हैं. और हा, एक बात”
“जी अम्मा जी क्या?”
“खुदको ज़रा ढंग में रखा कर. कैसे कपडे हो गए हैं तेरे. गिले और तितर बितर. तेरा बीटा भी बड़ा हो रहा हैं न, अकल नहीं क्या तुझे?”
“जी अम्मा जी ...आइन्दा से ख्याल रखूंगी”
अपने नज़रे निचे ज़मीन की और टिकाकर वो चुप चाप कड़ी हो गयी. बिच बिच में रफीक की और वो बड़ी आँखे कर के देखती वो भी वह कोने में चुप चाप गाय के माफिक खड़ा था.
काव्या की नानी थी उम्र से ज्यादा पर थी वो बिलकुल कड़क. उसका स्वाभाव बिलकुल सख्त था खासकर नौकर चाकर के साथ. और नजमा के प्रति वो जरा इर्षा भी रखती थी. कही बार किशोरी लाल को उसने नजमा के साथ करीब होते हुए देखा था, गाँव में चर्चे भी थे के बूढ़े ने इस को इसलिए सिर्फ मस्ती के लिए रखा था. पर नजमा सब सह लेती क्योंकि किशोरी लाल के बहुत उपकार उसके घर पे थे.
गरीब और अमिर ये भले भगवन ने नहीं बनाये हो परन्तु इंसान आज इनि बातो से घिरा हुआ हैं. बात थी काव्या के नानी की जिसको नजमा के कपड़ो पे ऐतराज था, परन्तु खुदकी पोती पे उसको नाज था. शायद इसलिए क्योंकि नजमा गरीब हैं. काव्या आमिर हैं, उसकी पोती हैं, इसलीये वो जो करे वो उसके लिए ठीक था. काश वो एखाद बार काव्या के रूम में चली जाके देख लेती तो उसको पता चलता कपड़ो की मर्यादा की सिख किसको ज्यादा जरुरी हैं. पर क्या पता? वो उसको भी प्रशंशा की नजर से देखती, के जमाना मॉडर्न हैं.
खैर बात कपड़ो की नहीं हैं, बात हैं अमिर और गरीब की. दुनिया भले ही अपने आप को कपड़ो से, रीती रिवाजो से, रहन सहन से मॉडर्न बुला दे. पर सच तो ये हैं, के आज भी इस मॉडर्न दुनिया में कोई मार खाता हैं तो वो हैं गरीब. अगर कोई गरिब इस दुनिया के तरीके सिख भी ले फिर भी उसको ही झुकना पड़ेगा. समाज तभि आगे बढ़ पायेगा जब गरीब और अमिर ये अंतर ख़त्म हो जाए. इतिहास गवा हैं काला धन रहे या काला मन रहे ये काला कम करने वाले अमिर तो खुदको सफ़ेद करके निकल जाते हैं बाद में इसका काला कलंक सिर्फ गरीबो को झेलना पड़ता हैं.
काव्या के नानी ने रफीक की और नज़र घुमाई. वो कोने में चुप चाप निचे गर्दन झुकाके खड़ा था. उसको देख के थोड़े कठोर शब्दों में नानी बोली,
“सुन. तू गया था क्या काव्या के खोली में साफ़ करने?”
रफीक के मानो कबूतर उड गए. उसके माथे पे पसीना आ गया. उसकी धड़कन एक दम से तेज़ दौड़ने लगी. वो कुछ बोल ही नहीं पाया.
“हां या नहीं बोल. साप सूंघ गया क्या तुझे?”
अलग ही रंजिश में फसा रफीक ने अपना सर एकबार ना में हिलाया एक बार हां में. काव्या के नानी को ये देख कर और माथा खनक गया वो नजमा की और देख के फिर से गुस्से से बोली,
“क्या बचपना हैं नज्मा. तेरे बेटे को ख़ाक बात समझती नहीं. क्या काम करेगा वो यहाँ? दोनों मा बेटे कुछ काम के नहीं हो”, नजमा चुपचाप सब सुनके खामोश खड़ी थी.
“बावले लोग हैं. खैर इसको बोल काव्या का रूम साफ़ करने. और अभी मत जा..वो सोयी होगी. और दरवाजा बजाके जाते जाओ दोनों अब से. हर बात बोलनी पड़ती”
“जी अम्मा जी”, नजमा ने हां में सर हिलाया और गुस्से से रफीक की और देखा.
काव्या की नानी को बाहर बगीचे में जाते हुए देख के नजमा ने राहत ली. उसने तुरंत रफीक की और देखा और गुस्से से बोला, ” तुझे हो क्या गया? देख तेरे वजह से मुझ सुनना पड़ा. वो कितना सुनाती तुझे पता न.”
रफीक उसकी बाते सुन कर बोल पड़ा,”मेरी क्या गलती अम्मी. मुझे बस दुधू चाहिए था..”
नजमा ने अपने सर पे हाथ लगाया. रफीक के नादान जवाब ने उसका गुस्सा दूर भगा दिया. उसके करीब जाके वो धीरे से बोला “ बेटा, घर में तुम कुछ भी करो, यहाँ नहीं“
अचानक रफीक के चेहरे पे ख़ुशी लौट आई.
“सच अम्मी?”
उसकी ख़ुशी को देख नजमा भी थोड़े खुश होक बोली” हां सच” रफीक का डर सब एक पल भर में भाग गया. वो खुश होक हँसने लगा.
नजमा ने उसकी ख़ुशी देखते कहा,” बड़ा खुश हो रहा है आज. पहले तो नहीं देखा. चल सीधे घर जा कही भटक मत. मैं खाना बनाके आ जाती हु घर. यही से कुछ खाना ले कर आती हु ठीक हैं”
“जी अम्मी..आप बहुत प्यारी हो” और हस्ते हुए रफीक दरवाजे के बाहर निकालने लगा. नजमा से उसे पिच्छे से जोर से पुकारके कहा,” सुन....सीधे घर जाके पढ़ाई करना”
“ अच्छा अम्मी..”और अपने साइकिल पे बैठके अपने घर की और वो रवाना हो गया. नजमा भी अपने काम में लग गयी. रात का खाना जो आज बनाना था. वो किचन में गयी और अपने काम में लग गयी. खीर बनाने के लिए पहले उसने फ्रिज से दूध निकाल लिया. सच में आज तो दूध की बहुत जरुरत थी उसको अभी खाने में और बाद में घर में रफीक के लिये.
“उम्mmmmmmm.....आ....ओह हनी....”
यहाँ शाम का समा उतरने ही वाला था के गहरी नींद से आखिरकार काव्या ने आखे खोले दी.एक जोर की अंगडाई देते हुये उसने अपने गोरी बाहे ऊपर कर दी. ऐसा लग रहा था कोई योवन सुंदरी अभी नहाकर आई हो. अपने बालो को सवारते हुए उसको पिन से बांध के वो बहुत मादक लग रही थी. अपनी सुस्ति से वो बाहर आने की कोशिश कर रही थी. उसका बदन उसको फ्रेश महसूस हो रहा था.
तभी अचानक उसको निचे कुछ गिला महसूस हुआ. वो अचानक चौक गयी. जब अपन हाथ लगाके देखा तो उसने पा के उसकी प्यांति पूरी आगे से भीग गयी थी और तो और उसके पेट पे और जांघो पे गिला पण महससू हो रहा था. उसने चौक कर के झटके में गौर से अपने प्यांति को देखा.
“ओह गॉड .ये क्या हुआ?”
सब गिला गिला महसूस करने से उसको झनझनी महसूस हो रहि थी. ठण्ड हवाओ से उस जगह और ठण्ड और गिला लग रहा था. उसने उसी चद्दर से उसको साफ़ किया.
“ये क्या हैं? मेरे पिरिओड्स तो नहीं हैं अभी...देन?”
मासिक हफ्ता उसका गुज़र गया था इसलिए वो उलझन में थि. ये गिला गिला हैं क्या.
“ ओह शिट ..ये कही वो तो नहीं? “
शायद उसके दीमाक की बत्ती अब बुझने चालू हो गयी थी. उसको लगा उसका पानी नींद में छुट गया. पर फिर भी पेट और बिस्तर को देख वो असमंजश में थी. पेशे से डॉक्टर होने से उसको सब समझने के लिए ज्यादा समय नहीं लगा. उसको ऐसा एहसास हुआ के भावनाओं में बहकर नींद में उससे शायद ऐसा हुआ होगा. पर इतना सारा चिपचिपा पानी देख के उसको थोडा शक हो रहा था. पर शायद मन का बरम समझके वो उलझन भरे मोड़ में थी.
“ओह....शिट...आई हैव तो क्लीन...हम्म”
खैर वो वैसे ही उठ खड़ी हुई. आह..क्या क़यामत माल थी काव्या, ब्रा और गीली प्यांति जिसपे उसके चूत से निकला पानी और रफीक के लंड से निकला वीर्य कहर धा रहे थे. उसने यहाँ वह देखा. उसको अपना तोवेलिया वार्डरॉब के पास बिछा देखा. वो वैसे ही अपना तोवेलिया ले कर सीधा बाथरूम में चली गयी. उसने ज्यादा कुछ सोचने से पहले खुदको साफ़ करना मुनासिफ समझा. अन्दर जाते ही अपनी प्यांति उतार के बाजू में फेक दी और शावर चालू करके उसके निचे खुद को रुका दिया. देखते ही देखते पानी की धारे उसकी मखमाली जिस्म से लेकर कोरी कोरी चूत को स्पर्श करके निचे एडियो तक टपकने लगी.
यहाँ रफीक आराम से खुशी से मारे साईकल पे से घर की और बढ़ रहा था. उसको तभी उसके दोस्त बीजू की याद आ गयी. वो रुका और खुद से बुदबुदाया,
“क्यों न बीजू से मिल लिया जाये उसको भी तो जाने रफीक डरपोक नहीं हैं”
ख़ुशी से मारे उसने अपने कच्छे के सिली हुई जेब में अपना मोबाइल लेने हाथ डाला. पर उसको वो वह मिला नहीं. फिर उसने अपना कुर्ता टटोला कही पे भी मोबाइल मिलने का नाम नही ले रहा था.
“या अल्लाह,,मोबाईल कहा गया? अम्मी को पता चला तो गया मैं”
बैचनी और डर में अचानक उसको याद आया. जल्बाजी में उसने वो मोबाइल दुसरे जेब में रखा था जो के कितने दिन से फटा पड़ा था. उसके तो पसीने निकल गए.
“ओ तेरी, मोबाइल तो कमरे में बेड के निचे गिर गया होगा? अब क्या करू?”
उसके माथे पे पसीने आ गए,
“अगर वह मोबाइल मिला तो काव्या जी की नानी तो मेरी जान निकाल देगी.”
उसने एक झटके में साइकिल मोडी और काव्या के बंगले की तरफ बहुत तेज़ी से पैडल घुमाने लगा. राजधानी एक्सप्रेस की तरह उसने पुरे ताकद से बंगले की तरफ अपनी कुछ थी. जैसे किसी सेना के साथ चढ़ाई करने जा रहा हो. भय और भावनाओ में आज रफीक ने जीवन का ऐसा दिन गुजारा था जो उसको शायद चैन की सांस लेने नहीं दे रहा था.
यहाँ काव्या शावर के निचे अर्ध नग्न खड़ी थी. पानी ने उसको थोड़ी राहत दी. खुदको और आज़ाद करने के लिए उसने अपनी ब्रा के हुक पीछे से खोले और अपने नाजुक गोरी बाहों में से उसको उतार दिया. उसने जैसे ही अपनि ब्रा निकाल के बाजू में फेक दी. उसके ३२ के भरेभरे दूध उछल से आजाद हो गए. वा,,,नंगी पुंगी योवन सुंदरी इस कदर शावर के नीछे खड़ी थी के मानो वह हुस्न से आग लगाने वाली हो सब तरफ. पानी बदन से बह रहा था वो सुकून महसूस कर रही थी. पर उसके मन में अभी भी वो शक आ रहा था के वो धब्बे हैं किस चीज के? प्व्शे से डॉक्टर होने से उसको वो बाते समझ तो रही थी पर उसका दिल मान नहीं रहा था.
वो पानी को बदन पे लेते सोच रही थी:
“कही..मैं नींद में डिस्चार्ज तो नहीं...? या फिर कोई और आया तो नहीं था सोने के बाद?”
सोचते सोचते उसका हात उसके नाजुक गले पे जैसे ही लिप्त उसको तुरंत शोक लग गया.
“ओह...रमण...मेरा मगल्सुत्र? कहा गिरा?”
उसके मन में जैसे लहर दौड़ गयी. सब सवाल एक ही बात पे अटक गए मंगलसूत्र. वो बैचैन हो गयी. अपने भीगे बदन की परवाह ना करते उसने यहाँ वह देखा. बाजू में फेकी हुई ब्रा उठा केदेखा तो उसमे भी कही मंगलसूत्र अटके जैसा नहीं दिखा. उसने बाथरूम में यहाँ वह देखना चालू कर दिया.
“ओह्ह...शिट...मेरा मगल्सुत्र...”
पूरा ध्यान उसको पाने में उसका लगा हुआ था. शोवर अभी भी ऑन था. पानी की बौछार उसके ऊपर चालू थी.
“ओह...ये पानी...” गुस्से से उसने उठकर शोवर पहले बंद किया. और पानी ने उसको भीगना रोक दिया. जल्दी जल्दी में अपना तोवेल लेकर वो बालो को साफ़ करने लगी. और वैसे ही तोवेल १ मिनट में अपने बदन से लपेटकर वो कैसे तैसे बाहर आ कर मंगलसूत्र ढूँढना चाहती थी.
उसने वैसे ही तोवेल अपने भीगे बदन पे लपेटा और बाथरूम के बाहर आ गयी. अध् गिले बदन की परवाह ना करते वो यहाँ वह रूम में ढूंढ रही थी. अपनी बीएड पे जाके उसने चद्दर और तकिये झांके पर कुछ मिला नहीं. उसकी बैचनी बढ़ रही थी पर उसके साथ ही बैचैन था उसका तोवेल जो जरा छोटा था और बड़े मुस्किल से उसके बदन को सवारे हुए था.
यहाँ रफीक भी १० मिनट में ही वापस काव्या के बंगले के गेट पर आ गया. वही उसने साइकिल लगा दी और दरवाजे की तरफ भागा. तभी उसके पीछे से आवाज आई,
“अरे छोकरे, कहा जा रहा हैं?”
काव्य की नानी जो बागीचे में टहल रही थी उसने रफीक को पीछे से आवाज दी थी.
रफीक की तो पहले ही बत्ती गुल थी वो कैसे तो हडबडाते सास लेते हुए बोला,
“जी...जी...अम्मा जी..वो अम्मि से चाबी लेनी थी...”और आगे कुछ सुनने के पहले बिना कुछ बोले वो सर्र कर के भागा अन्दर की और.
अन्दर काव्या अपने भीगे बदन से मंगलसूत्र ढून्ढ ही रही थी के उसको अचानक बेड के निचे कुछ आवाज आती हैं. वो वही चीज थी जो रफीक वह भूल गया था. उसका मोबाइल. उसके मोबाइल की रिंगटोन जोर से बज रही होती हैं. वो पलट के उस तरफ देखती हैं और उस रिंगटोन को सुनती हैं.
“लगावेलु जब लिपस्टिक, हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट
ज़िला टॉप लालेलु
कमरिया करे लापा लप, लोलीपोप लागेलु”
काव्या हैरानी से बेड के निचे झुकती हैं जिससे उसका तोवेल और ऊपर चढ़ जाता हैं उसका पिछवाडा लगभग खुल जाता हैं.
गुस्से से काव्या ने वो मोबाइल उठाया उसपे देखा कोई बीजू नामे से कॉल आ रहा होता हैं. उसको देख उसके मन में गुस्से के साथ कही सवाल आने लगे.
“ओह...इसका मतलब कोई आया था,,कही उसने ही तो ..?”
उसका माथा आगबबुला हो गया. गुस्से से वो चिड गयी. उसको चोरी का शक आने लगा. वो बस उठ के अपने आप को वार्डरोब के शीशे में देखती हैं. बड़े गुस्से में आगबबुला हो वो वह खुदको देखती हैं. और जैसे ही जोर से अपनी नानी को आवाज देनी वाली थी. के वो अचानक से रुक गयी.
सामने सास फूलता हुआ रफीक दरवाजे पे दस्तक ले आया था. उसको देख काव्या और गुस्सा हो गयी और रफीक तो मानो डर के काप रहा था. पर दोनों के वजह अलग थे. रफीक को काव्या के गुस्से वाले चेहरे के साथ उसका एक हाथ में पकड़ा मोबाइल तो दिख ही गया पर साथ ही दुसरे हाथ में पकड़ा हुआ तोवेल जो के उन दोनों से भी ज्यादा बैचैन हो रहा था. शायद ये समय रफीक के लिए किसी ऐसा था जैसे धुप और बारिश , गुस्सा और हुस्न एक ही समय आ गयी हो. उसके मूह में पानी भी आ रहा था और गले से उतर भी नही रहा था. पुरे खोली में डर और गुस्से से सन्नाटा छा जाता हैं. पर फिर से रफीक का मोबाइल बज पड़ता हैं और खोली में रिंगटोन की आवाज घुमने लगती हैं.
“लगावेलु जब लिपस्टिक, हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट
ज़िला टॉप लालेलु
कमरिया करे लापा लप, लोलीपोप लागेलु”