Update 10

अब काव्या सीधे हवेली के अन्दर जाती है. दादी को मैं आ गयी बोल कर सीधा अपने कमरे में जाती है और कमरा अन्दर से बन्द कर देती है काव्या का दिल काफी तेजी से धधक रहा था. उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करे वो. बहुत सारे सवालों के जवाब को खोजने का प्रयास कर रही थी. आज रिक्शा का सारा सफर उसको बहुत भारी सा लग रहा था. पर उसको सुमन से मिलने की खुशी भी हो रही थी. इन्हीं सभी सोच के बीच काव्या को काफी दुःख भी होता है कि कैसे वो सुलेमान को देख कर बहक गयी थी. सुलेमान की गंदी हरकतों से उसको भी मजा आ रहा था. वो कबसे ऐसी होने लगी. उसकी चुत आज इतनी गरम कैसे हो गयी. अब काव्या को थोड़ी थकान भी महसूस हो रही थी. काव्या अपने कपड़े बदल कर एक टी शर्ट और केपरी पहन कर जैसे ही बेड पर जाती है थोड़ी देर आराम करने वेसे ही उसके रूम के दरवाजे पर कोई खट खट करता है. काव्या तुरन्त खड़ी होकर गेट खोलती है. उसके सामने नजमा और रफीक दोनों खड़े थे. नजमा के चेहरे पर हल्का गुस्सा दिख रहा था और रफीक तो काव्या को बस एक टूक देख रहा था.

नजमा - मैडम मैं अन्दर आ सकती है क्या...?

नजमा की बोली थोड़ी कठोर लग रही थी.

काव्या - हाँ नजमा ताई आओ अन्दर.

नजमा और रफीक दोनों अन्दर आते है. रफीक की तो आंखे ही फटी की फटी रह जाती है काव्या को देख कर. रफीक ने अपनी पूरी जिन्दगी में कभी किसी लड़की या औरत को टी शर्ट में और इतने छोटे कपड़ों में नहीं देखा था. और इधर नजमा का भी यही हाल था उसने भी कभी किसी औरत या लड़की को इतने छोटे कपड़ों में नहीं देखा था. टी शर्ट के अन्दर काव्या के निप्पल के बीच का क्लीवेज साफ़ दिख रहा था.

नजमा - मैडम आप तो कमाल ही करती हो मैंने बोला था मैं दस मिनट में आ रही हूँ फिर भी आप कहीं चली गयी.

काव्या - क्या बोल रही हो नजमा मैं वहीं तो थी तुमने शायद ध्यान से नहीं देखा होगा.

नजमा - कहा थी आप मैं आयी थी वापस पर आप नहीं दिखी.

काव्या - मैं वहीं तो थी सुमन के घर पर.

सुमन का नाम सुनते ही जैसे नजमा को थोड़ा गुस्सा सा आ जाता है अब नजमा को लगता है ये सुमन साली शहर की कुतिया ने मेरे बारे कहीं सब तो नहीं बता दिया. ये सुमन मुझको लगता है कहीं का नहीं छोड़ेगी. अब नजमा ज्यादा काव्या को बोल भी नहीं सकती थी क्योंकि वो है तो एक नौकरानी ही. और नजमा काव्या से शाम के खाने के बारे में पूछती है और दूसरी फालतू बातें करती है जिसमें काव्या कोई इंटरेस्ट भी नहीं आ रहा था पर इधर काव्या नजमा से बात करते करते रफीक को देखती है. रफीक की निगाहें अभी तक काव्या के क्लीवेज को देखने में ही लगी हुई थी. रफीक को क्या बात चल रही है इसका कुछ ध्यान नहीं था पर अब रफीक के यू देखते हुए काव्या कभी काफी मजा आ रहा था. अब काव्या थोड़ा टी शर्ट को हल्का सा नीचे करते हुए अपना निप्पल के क्लीवेज को और थोड़ा अच्छे से दिखाती है रफीक को. यह शायद सुलेमान के द्वारा करी हुई इन्हीं हरकतों का नतीज़ा था कि काव्या इतनी बोल्ड और गरम हो रही थी. रफीक तो अभी तक अपनी आँखों से काव्या को कहीं बार नंगा कर चुका था पर वो ऐसा कुछ असलियत मैं नहीं कर सकता था. अब काव्या अपने दोनों हाथो को अपने निप्पल पर रख देती है जिससे रफीक को अब होश आता है. रफीक फिर काव्या को देखता है और काव्या भी रफीक की आँखों में आंखे डाल कर एक स्टाइल में आँख मार देती है और उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है. इधर तो रफीक को यकीन ही नहीं हो रहा था कि अभी उसने क्या देख लिया. काव्या ने उसको भाव दिया. अब तो मानो रफीक अपने सपनों में काव्या को अपनी बेगम बना चुका था. फिर काव्या काव्या नजमा को बोलती है ठीक है नजमा ताई तुम जाओ. हम बाकी बात शाम को करते है. मुझको अभी आराम करना है. और नजमा रफीक को लेकर जाने लगती है पर रफीक को तो काव्या के कमरे से जाना ही नहीं था. पर उसको जाना पड़ा.

अब काव्या बिना कुछ सोचे सो जाती है और एक अच्छी नीन्द लेकर सीधा शाम को उठती है. उठते ही काव्या को आराम करने से पहले उसने क्या गलती करी इसका एहसास होता है उसने रफीक के साथ ये क्या किया. सुलेमान जी यह आपने क्या करवा दिया. अगर रफीक ने कही कुछ बोल दिया तो....? कहीं उसने कुछ गलत समझ लिया तो....? क्या सोचेगा मेरे बारे में. मैं एक शादी शुदा औरत हु. एक अच्छे घर की बहू हु. नहीं नहीं रफीक के साथ बात करके यह मज़ाक को क्लीन करना पड़ेगा.

अब काव्या एक बाथ लेती है और फ्रेश होकर बाहर आती है वह अपने दिमाग को शान्त रखती है. और अब नीचे दादी के साथ डिनर के लिये बैठती है. काव्या को हर बार की तरह इस बार भी नजमा के हाथ का खाना बिलकुल अच्छा नहीं लगा. पर उसने बिना कुछ बोले खाने लगी और सोचने लगी कहा सुबह का सुमन के हाथ का बना खाना था और कहा ये नजमा के हाथ बेस्वाद और बकवास खाना. फिर काव्या दादी को नजमा के सामने सुमन के बारे में सब बताती है.

दादी - अच्छा तुम्हारी दोस्ती सुमन से हुई है वो पंडित जी की बहू.

काव्या - हाँ दादी वहीं.

दादी - हाँ बेटा वो बहुत अच्छी लड़की है. उसका गाँव में काफी नाम है गाँव की महिलाओं के बीच. सुमन भी तुम्हारी तरह ही शहर की ही है.

एक कोने में नजमा खड़ी हो कर यह सब सुन रही थी उसको सुमन की तारीफ बिलकुल अच्छी नहीं लग रही थी. अब काव्या नजमा को सुनाने के लिये दादी से बोलती है

काव्या - हाँ दादी आपको पता है सुमन खाना काफी टेस्टी बनती है उसके हाथ का खाना किसी भी फाइव स्टार होटल के खाने से कम नहीं है.

दादी - हाँ बेटी सही कहा, मैंने तो टेस्टी और स्वादिष्ट खाना खाये सालो हो गये है.

दादी यह सब नजमा की और देखते हुए बोलती है नजमा समझ जाती है ये सारा तंज उसी पर कसा जा रहा है. पर नजमा कुछ बोल नहीं पाती. ऐसी ही कुछ बातों के साथ काव्या का डिनर खत्म हो जाता है और वो दादी को इंग्लिश में शुभ रात्री बोल कर अपने कमरे में चली जाती है. काव्या का यू जल्दी से कमरे में जाना नजमा को थोड़ा अजीब लगता है पर वो अब रसोई की साफ़ सफाई में लग जाती है.

अब जैसे जैसे समय जा रहा था वेसे वेसे काव्या की भी सांसे तेज हो रही थी वो उसको पता नहीं चल रहा था कि अब आगे क्या करना चाहिये. उसको सलमा के इलाज के लिये इस समय जाना चाहिये या नहीं. काव्या का मन तो बिलकुल नहीं हो रहा था जाने का सुलेमान की बातों से... पर वो एक डॉक्टर भी थी उसको किसी भी हालत में किसी भी मरीज का खयाल रखना था अगर वो बीमार है तो.

इन्हीं सब विचारो के साथ काव्या निर्णय लेती है कि वह जायेगी और आधे घण्टे में वापस किसी भी हालत में आ जायेगी. पर अब समस्या यह थी कि वो कपड़े क्या पहने साड़ी पहन ले या सलवार सूट. पर काव्या के अन्दर कहीं ना कहीं कुछ आग तो थी. उसको भी आज सुलेमान की हरकतों से मजा आ रहा था. इसलिये काव्या भी एक सेक्सी सी काले और सफेद रंग की साड़ी पहन लेती है और साथ में बिना आस्तीन का ब्लाउज जिसमें काव्या के गोरे हाथ और सेक्सी आकृति वालीं कमर काफी अच्छे से दिख रही थी. पर काव्या ने खुद को तैयार करने के बाद एक जैकेट पहन लिया काले कलर का. जिसमें उसने अन्दर क्या पहन रखा किसी को नहीं दिखे. काव्या अब तैयार हो चुकी थी एक साहस और अन्दर एक डर के साथ.

अब घड़ी में 9 बज चुके थे यह गाँव का वह समय था जब पूरा गाँव सो गया था हवेली में भी सब सो गये थे. गाँव में लोग जल्दी सो जाते है. काव्या अब दबे पाँव हवेली के पीछे वाले गेट से बाहर निकलती है और जैसा कि उसने सोचा था वैसा ही हुआ उसके सामने हवेली से थोड़ा दूर सत्तू अपना रिक्शा ले कर खड़ा था. वो काव्या का इन्तेज़ार ही कर रहा था. काव्या को आता देख तो जैसे सत्तू के मुह से पानी ही आ गया. पर वो कुछ कर नहीं सकता था.

अब काव्या आकर सीधा रिक्शा में बैठ जाती है और सत्तू रिक्शा शुरू कर सुलेमान की झोपड़ी की तरफ ले लेता है. जैसे ही रिक्शा चलता है वेसे ही काव्या सत्तू से पूछती है

काव्या - सत्तू जी ये सुलेमान जी नहीं आये क्या उन्होंने तो बोला था कि वो आयेंगे क्या हुआ.....?

सत्तू - मैडम जी वो सुलेमान मिया और सलमा के बीच काफी बड़ा झगड़ा हो रहा है इसलिये सुलेमान भाई आ नहीं पाये.

काव्या को ये सुनते काफी अजीब लगता है कि सलमा और सुलेमान के बीच झगड़ा हो रहा है. पर मुझको जहां तक लगता है कि सलमा की इतनी औकात नहीं है और ना ही इतनी हिम्मत है कि को वो सुलेमान जैसे आदमी से लड़ या झगड़ा कर पाये........? वो कुछ बोल तो पाती है नहीं सुलेमान के सामने......? क्या पता अब वहा जाकर ही पता चलेगा......?

अब रिक्शा आगे बढ़ रहा था. सत्तू को काव्या से बात करने की काफी इच्छा हो रही थी पर वो सुलेमान के डर से कुछ बोल नहीं पा रहा था. दरसल सत्तू को भी काव्या को चोदना था पर अब वो समय जा चुका था. सत्तू को कहीं ना कहीं सुलेमान से जलन और ईर्ष्या हो रही थी. अब रिक्शा एक पुरानी सी झोपड़ी के पास आकर रुकता है. झोपड़ी के आसपास भी टूटी फूटी झोपड़ियां ही थी. काव्या को वो जगह देख कर पता चल गया था कि यह कोई गरीबों की बस्ती है. फिर काव्या रिक्शा से उतरती है और खड़ी हो जाती है.....

सत्तू - क्या हुआ मैडम आप अन्दर क्यों नहीं जा रही है.

काव्या - तुम भी चलो साथ मे..... मैं जल्दी से सलमा को देख लेती हूं और इलाज कर देती हूं फिर तुम मुझको जल्दी से वापस हवेली छोड़ देना. कहीं दादी जी मेरे कमरे में ना आ जाये.

सत्तू - हाँ मैडम जी आप सही कह रही है पर अभी मुझको मेरे रिक्शा में तेल डलवाने जाना है. क्या करे मैडम जी हम ठहरे गरीब रिक्शा वाला. हमारे पास एक ही बारी में बहुत तेल डलवाने का रुपया होता नहीं है इसलिये हम थोड़ा थोड़ा तेल भरमाते है. पर आप कोई नहीं अन्दर जाइए हम अभी आधे घण्टे में आता हूं.

अब काव्या काफी डर भी लग रहा था कि ये सत्तू कहा जा रहा है मुझको वापस हवेली जाना है किसी ने मेरे कमरे में आकर देख लिया कि मैं नहीं हु और रणधीर अंकल को पता चल गया तो वो काफी नाराज होंगे.

पर अब काव्या कर भी क्या सकती थी उसने कहा ठीक है तुम तेल भरवा कर वापस जल्दी से आ जाओ. और अब सत्तू वहां से जा चुका था. काव्या को थोड़ा अजीब लग रहा था कि सुलेमान जी ना ही लेने आए और अब अपने घर से बाहर आ रहे हें मुझको अन्दर बुलाने. लगता है मुझको ही जाना पड़ेगा अन्दर कोई बात नहीं. शायद हो सकता है सत्तू जो कह रहा था वो सही हो सुलेमान और सलमा के बीच बहस हो रही हो पर यहा बाहर तो कोई आवाज नहीं आ रही चलो अन्दर जाकर ही देख लेते हैं. काव्या अब झोपड़ी के गेट के पास खड़ी थी है और गेट को टक्क यानी हल्का सा बजाती है. पर कोई नहीं आता फिर काव्या देखती है कि कि यह टूटा दरवाजा पहले से ही खुला हुआ है फिर वो अन्दर जाती है. अन्दर जाते ही वो देखती है कि सामने फटी लूँगी यानी धोती में सुलेमान बैठा हुआ था अपने सर पर हाथ रख कर. जैसे उसको अभी बहुत बड़ा सदमा लगा हो.

वेसे आपको बता दे कि सुलेमान को कोई सदमा नहीं लगा था यह तो सब उसकी चाल थी.

अब सुलेमान जैसे ही काव्या को देखता है वह अपने रोने जैसे मुह बनाता है.

काव्या - सुलेमान जी आप रो क्यों रहे है और सलमा कहा है......?

सुलेमान - काव्या क्या बताऊँ तेरे को वो मुझसे लड झगड़ कर कहीं चली गयी शायद अपने मायके ही गयी होगी इसलिये मैं रो रहा हू.

काव्या को यह सुन कर काफी अजीब और बेकार महसूस हो रहा होता है कि सुलेमान जैसा आदमी अब उसको उसके नाम से बुला रहा है. अभी तक तो सुलेमान मैडम जी और डॉक्टर साहिबा करके ही बुला रहा था. हो सकता है सलमा के जाने के कारण गुस्से और सदमे में होंगे इसलिये बोल रहे होंगे. पर अब काव्या भी थोड़ी गुस्से में आती है और सुलेमान से बोलती है......

काव्या - सुलेमान जी जब आपको पता था कि सलमा जा चुकी है तो आपने सत्तू जी को क्यों भेजा रिक्शा ले कर. अब मेरा इतना रिस्क लेकर आने का क्या फायदा.......?

इधर सुलेमान तो अपना नाटक जारी रखते हुए काव्या को ऊपर से लेकर नीचे तक निहार रहा था. बस उसका मजा किरकिरा वो कला जैकेट कर रहा था जो काव्या ने पहन रखा था कैसे भी करके सुलेमान को वो जैकेट निकलवाना था..

काव्या - बोलिए सुलेमान जी क्या फायदा हुआ. अब आप जल्दी से सत्तू जी को कॉल लगाइए और उनको जल्दी से आने का बोले. जल्दी कीजिये..

इधर सुलेमान को इस बात की बिलकुल आशा नहीं थी कि काव्या ऐसे रिएक्ट करेगी. सुलेमान को तो लग रहा था कि काव्या उसको सम्मान देगी सलमा को वापस लाने की बात करेगी पर इधर तो कुछ और ही हो गया काव्या को तो बस वापस ही जाना है कुछ करना पड़ेगा.

सुलेमान - काव्या जी आप यह क्या बोल रही है मेरी बेगम चली गयी है उसका कुछ नहीं आप उल्टा मुझको ही डांट रही हो. और सत्तू मुझको बिना पूछे आपको लेने आ गया था और जब तक आप आयी तब तक सलमा जा चुकी थी इसमे मैं क्या करता.

अब काव्या को भी लगता है कि उसने थोड़ा ज्यादा ही तेज बोल दिया. पर काव्या की भी यहा मजबूरी थी उसको जल्द से जल्द हवेली जाना था.

काव्या - ठीक है सुलेमान जी मैं आपकी बात समझ गयी पर आप भी मेरी मजबूरी समझिये मुझको वापस हवेली जाना है. जल्दी से आप कॉल लगाइए.

सुलेमान - काव्या जी आप पहली बार मेरे इस छोटी झोपड़ी में आयी है थोड़ी देर तो बैठिए अगर आपकी शान को इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता हो तो. मैं कुछ खाने को लेकर आता हूं आपके लिये.

काव्या - सुलेमान जी आप मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे मुझको जाना होगा कल रणधीर अंकल भी आ रहे है.

इधर अब सुलेमान को काव्या की बात से कोई ज्यादा फर्क़ नहीं पढ़ रहा था वो तो बस अपने खेल में लगा हुआ था उसको केसे भी करके काव्या को आज रोकना था. वो अपने हाथ में आयी इस हुस्न की परी को छोड़ नहीं सकता था किसी भी कीमत पर. भले ही रणधीर जैसा खतरनाक आदमी भी बीच में क्यों ना आ जाये.

अब इधर सुलेमान काव्या की कोई बात नही सुन रहा था उसने ठान लिया था आज तो वो काव्या की चुदाई करके ही रहेगा. पर यहा समस्या यह थी कि वो काव्या को चोदने के साथ साथ काव्या से निकाह भी करना चाहता था. उसका मकसद तो काव्या को अपनी बेगम बना कर रोज चोदना था और एक तरफ रणधीर का खौफ भी था इसलिये वो जबरदस्ती ज्यादा नहीं कर सकता था. पर काव्या को यहा से जाने भी नहीं देना चाहता था.

सुलेमान - ठीक है काव्या जी मैं सत्तू को फोन लगाता हु और अभी बोलता हु की जल्दी से जल्दी आ जा.

काव्या - बिलकुल सही आप कॉल करिये सत्तू जी को.

यह सुनते ही सुलेमान अपने पैर को जोर जोर से कूट कर फोन पर हैलो बोल कर झोपड़ी से बाहर चला जाता है और फिर कुछ 5 मिनट बाद अन्दर आता है.

सुलेमान - काव्या जी बहुत बड़ी गडबड हो गयी है.

काव्या - क्या गडबड हुई है बोलो सुलेमान जी.......?

सुलेमान - अरे वो सत्तू चुतिये का बेकार रिक्शा खराब हो गया है और अभी इस समय तो कोई कारीगर भी नहीं मिलेगा. इसलिये वो नहीं आ पायेगा.

काव्या - क्या बोल रहे है सुलेमान जी आप..... ऐसा नहीं हो सकता मुझको अभी ने अभी हवेली जाना है. आप कुछ भी कीजिये.

सुलेमान - मैं कुछ नहीं कर सकता काव्या जी आपकी हवेली यहां से काफी दूर है और रास्ते में ज्यादा रोशनी भी नहीं है. एक दम अंधेरा होगा और हो भी सकता है जंगली जानवर भी मिल जाये.

काव्या - मुझको यह सब नहीं पता आप चलो मेरे साथ अभी मुझको घर छोड़ने.

अब सुलेमान थोड़ा गुस्से में आकर बोलता है काव्या यह कोई तेरा शहर नहीं है यह गाँव है गाँव. यहा कोई रिक्शा नहीं मिलने वाला और ना ही पैदल जा सकते हैं.

इधर तो जैसे काव्या को यह सब सुन कर एक बड़ा झटका सा लग गया हो. एक तो यह कि वो यहा से निकलेगी कैसे....? और दूसरा की अब सुलेमान के हाव भाव बदल रहे थे अब सुलेमान सीधे नाम से बुला रहा था. और काफी गुस्सा भी दिखा रहा था.

सुलेमान - देखो काव्या जी आप मेरी बात मानो तो आज की रात यही निकाल दो. सुबह होते ही सत्तू आ जायेगा और आपको हवेली छोड़ देगा. यह आपके लिये बहुत अच्छा होगा.

अब काव्या को काफी गुस्सा भी आता है यह सुन कर की उसको क्या अब रात यहा झोपड़ी मे गुजारनी पड़ेगी वो भी इस सुलेमान के साथ......?

काव्या मन में .... मैं कहा फस गयी. यहां से कैसे निकला जाये. और यहा गर्मी कितनी है यहां कोई कैसे रह सकता है.

अब काव्या थोड़ी देर ऐसे ही पास वाले खटिया पर बैठ कर सोचती है. सुलेमान काव्या को गुरे जा रहा था. अब काव्या भी गर्मी से काफी परेशान हो कर अपना काले कलर का जैकेट निकालती है और जैकेट को एक कोने में रख देती है. और खड़ी हो कर सुलेमान से बोलती है

काव्या - सुलेमान जी अगर मुझको यहा रुकना पड़ा तो आप कहा जायेंगे.

सुलेमान तो मैं तो जैसे कोई जानवर ही जाग गया हो वो काव्या को ऐसे देख रहा था कि अभी उसको खा जाये. सुलेमान का लंड तो उसकी फटी लुंगी में ही तेजी से खड़ा हो रहा था काव्या को देखते हुये. काव्या क्या कमाल लग रही थी जैकेट निकालने के बाद. काव्या के बिना आस्तीन का ब्लाउज में उसका पूरा गौरा बदन चमक रहा था.

अब सुलेमान काव्या के पास जाता है और काव्या के पीछे जाकर काव्या के ब्लाउज पर अपने दोनों काले हाथ रखता है और अपने हाथो को घुमाता है और बोलता है

सुलेमान - बस इतनी सी समस्या है तेरे को काव्या कोई नहीं तु ऊपर खटिया पर सो जाना में नीचे सो जाऊँगा.

सुलेमान की इन हरकतों से जैसे काव्या के शरीर के सभी रोंगटे खडे हो जाते हैं उसको भरी गर्मी की रात में अपने शरीर एक ठंड सी महसूस होती है पर इसके साथ काव्या को अपनी चुत में गर्मी और हल्का सा पानी आता मेहसूस होता है. अब काव्या को थोड़ा थोड़ा मजा भी आ रहा था सुलेमान की इन हरकतों से. पर वो एक शादी शुदा औरत है इसका भी ध्यान था.

अब काव्या सुलेमान को खुद से अलग करती है और पलट कर बोलती है

काव्या - सुलेमान जी आप यह क्या कर रहे.....? मुझको यह सब पसन्द नहीं. और मुझको यहां चार दीवार में आपके साथ कोई रात नहीं गुजारनी है कोई देख लेगा तो गलत समझेगा. वेसे भी मैं शादी शुदा हू आप प्लीज कोई और तरीका निकालिये.

सुलेमान - ( हस्ते हुए ) बस इतनी सी बात काव्या. कोई नहीं तुझको कोई मुसीबत है तो मैं बाहर जा कर अपनी रात गर्मी में काट लेता हूं. मुझको लगा तू रि बड़ी शहर की है तुझको इन सब से कोई फर्क़ नहीं पढ़ता होगा. चलो कोई नहीं मै बाहर चला जाता हूँ.

अब सुलेमान यह बोल कर बाहर वाली खटिया पर चाला जाता है सोने. पर साथ ही खुद की किस्मत को कोसता है और सोचता है कोई नहीं अब मैं मेरा खेल आधी रात को शुरू करूँगा. देखता हूं कैसे बचती है मेरी काव्या रानी. मैं भी सुलेमान हू तेरी चीख तो निकाल के रहूँगा.

पर इस कलूटै को क्या पता कि वो असली गेम तो अभी काव्या के साथ खेल कर जा रहा है.......!

सुलेमान के जाने के बाद काव्या तुरंत झोपड़ी का टूटा गेट बन्द करती है और खुद को शान्त करने की कोशिश करती है काव्या भी कहीं ना कहीं अंदर से काफी गर्म हो चुकी थी सुलेमान का लंड से बना तंबु देख कर पर कुछ कर नहीं पा रही थी. उसको सुलेमान के सामने अपनी हवस जो छुपानी थी. जो सुलेमान ने उसके अन्दर जगाया था. और काव्या को अपनी इज़्ज़त भी बचानी थी.

पर अब काव्या सोचती है कि सुलेमान का डिक ( लौंडा ) कितना बड़ा होगा उसके पति रमण से.

काव्या अपने मन में ... नहीं नहीं काव्या यह सब क्या सोच रही है रमण सबसे बेस्ट आदमी है इस दुनिया मे मेरा पति जो है. पर अन्दर ही अन्दर पर यार देख ना उस सुलेमान का लौंडा कितना बड़ा है. और बार बार खडा हो जाता है मैं कल से देख रही हूँ. लगता है सुलेमान जी को मुझमे कुछ ज्यादा ही रुचि है.

अब यही सब सोचते हुए काव्या ने अपनी एक ऊँगली अपनी चूत में गुसा दी और धीरे धीरे उसे अन्दर बाहर करने लगी | धीरे धीरे उसके शरीर में मस्ती चढ़ने लगी उसके मुह से सिसकियाँ निकलने लगी | उसने मन में सुलेमान के लंड के बारे में सोच कर एक और ऊँगली अपनी चूत में घुसा ली | अब उसकी चूत भी हलकी हलकी पनिया गयी थी काव्या के मन में अब सुलेमान का लंड उसकी चूत में घुस चुका था और उसकी अन्दर बाहर होती उंगलियों की जगह अब सुलेमान का लंड उसकी चुदाई कर रहा था | काव्या किसी और ही दुनिया में खो चुकी थी और अपनी उंगलियों को और जोर से अपनी चूत में अंदर बाहर कर रही थी | धीरे धीरे काव्या के शरीर में तरंगे उठने लगी और थोड़ी ही देर में काव्या थोड़ी सी झड गयी | आज बहुत दिन बाद काव्या की चूत ने थोड़ा सा पानी छोड़ा था पर अब उसने ठान लिया था की वो अब उंगलियों की जगह सुलेमान का लंड अपनी चूत में लेगी. भले ही वो शादी शुदा है तो क्या हुआ....! पर रमण ने तो कभी मुझको कभी सन्तुष्ट नहीं किया. हमेशा काम काम में लगे रहते है मैं भी एक डॉक्टर हू मुझको भी बहुत काम होता है पर मैं रमण जैसे काम काम नहीं करती रहती. मुझको भी अपने निर्णय लेने का पूरा हक है. काव्या के मन में अब यहीं सब चल रहा था. और वेसे भी किसी को कहा कुछ पता चलने वाला है काव्या खुद से बात करते हुए. और इधर सुलेमान की रात खाट पे उलथते पलथते बित रही थी | वो सोच रहा था कि कब में अन्दर जाऊँगा वापस और डॉक्टरीया की चुदाई करेगा. सुलेमान का गर्मी और उमस से बुरा हाल हो चुका था | सुलेमान ने अपनी लूँगी उतार दी और लंगोट में ही बिस्तर पे पसर गया | थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गयी |​
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