Update 01

यह कहानी है मेरठ शहर की। जैसा की आप सभी जानते हैं की किसी भी शहर में बैचलर लड़के के लिए अच्छा मकान मिलना कितना मुश्किल होता हैं ठीक ऐसा ही मेरे साथ हुआ।

अच्छे मकान की तलाश में मोहल्ले के एक दुकानदार से मेरी बात होने लगी। वों जनरल स्टोर का दुकान चलाता था और अपने रोज की जरूरत और खाने पीने का सामान उसके दुकान से लेने लगा। दुकानदार का नाम रमेश था जो निहायती ही आलसी और लालची किस्म का इंसान था। एक दिन शाम में ऑफिस से लौटते वक्त दुकान पर मैंने दो लड़कियों को देखा जो मानो दो बहने हो और मकान मालिक की रिश्तेदार। मैंने उसदिन उन दोनों को ताड़ने के लिए दुकान से ज्यादा सामान लिया। दोनों ने एकदम कमर से कसी हुई जीन्स और टॉप पहना हुआ था। दोनों के बड़े बड़े बूब्स ऐसे दिख रहें थे की मन कर रहा था दबोच लू लेकिन खुद को किसी तरह काबू में किया। अपने कमरे पर आकर उन दोनों के नाम से बाथरूम में जमकर मेहनत की।

अगले दिन फिर शाम में लौटते वक्त देखा वों लालची दुकानदार खाली बैठा है। मौके का फायदा उठाते हुए मैं वहाँ बैठ गया और उससे इधर उधर की बाते करने लगा। बातें करते करते उस चूतिये से मैंने यह पता कर लिया की वों दोनों दुकानदार की बीबी और बेटी है। यह देखकर मैं चौंक गया। साथ में यह भी जान गया की दुकानदार का एक बेटा और भी है जो छोटा है। साथ ही वों अपने घर की पहली मंजिल पर उसने किरायेदार रखा हुआ है जिससे उसकी बीबी की नहीं बनती हैं। अब मेरे दिमाग में यह क्लियर हो चुका था कि इस दुकानदार के घर का ही किरायेदार बनना है और कैसे बनूं किरायेदार मैं इसका प्लान बनाने लगा।

अब मैं रोज शाम में ऑफिस से लौटते वक्त उसके दुकान में बैठ जाता, उससे इधर उधर की बातें करता और फिर सामान ले जाता। मैंने उसके दुकान से सामान ले जाना बढ़ा दिया जिससे वों भी मुझे डेली ढूंढता। इसी तरह बात करते करते मैंने उससे कह दिया की मैं एक ढंग का मकान ढूंढ रहा हूँ। बैचलर होने की वजह से ढंग का मकान नहीं मिल रहा नहीं तो मैं थोड़ा ज्यादा किराया दें दूँ। उस लालची दुकानदार के मन में लड्डू फूटने लगे और मैं समझ गया की निशाना सही जगह लगा है। दो दिन बाद वों लालची दुकानदार मुझसे कहता है कि तुम कहो तो मैं अपने किरायेदार को ऊपर का फ्लैट खाली करने को कह देता हूँ और तुम रह लो। मैंने भी कहाँ तुम देख लो, मैं तैयार हूँ। किराए जो उसको मिल रहा था उससे मैंने दो हजार बढ़ा के देने को राजी हो गया। जैसा मैंने बताया उसको मुझमे पैसे का लालच था और मुझे उसके बीबी और बेटी का।

अब मैं उनके घर पुराने किरायदार के खाली करते ही शिफ्ट हो गया। ऊपर पहली मंज़िल पर 2bhk फ्लैट जैसा बना रखा था और नीचे दुकान और उसके पीछे 3bhk मकान था जिसमे दुकानदार अपने परिवार के साथ रहता था।

शुरुआत में मैं खुद को शांत और अच्छे इंसान के रूप में प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया ताकि सबको समझ सकूँ।

दुकानदार के परिवार में उसकी बीबी थी जिसका नाम मंजू (काल्पनिक नाम) था जो की काफी सुन्दर और सेक्सी थी। उसकी उम्र 38 थी लेकिन पूरा बदन कसा हुआ था और कपड़े इतनी टाइट पहनती की मानो सब कुछ बाहर निकलने को बेताब हो।

दुकानदार रमेश की बेटी का नाम शिल्पी था जो की बला की खूबसूरत थी। पतला बदन और छोटे छोटे कपड़े हर वक्त मेरे होश उड़ाते थे। उसकी उम्र भी लगभग 19 साल थी। मंजू की शादी 18 वर्ष होते ही उसके माँ बाप ने कर दी थी परन्तु उसने अपने शरीर का अच्छे से ख्याल रखा था इसलिए जब वों अपनी बेटी के साथ चलती तो ऐसा लगता दो बहन हो।

उस परिवार का सबसे छोटा सदस्य था रमेश का बेटा मनीष जो की लगभग 12 साल का था और सातवीं में पढ़ता था।

अब मेरा मिशन प्रारम्भ हो चुका था। मैं प्रतिदिन का सामान रमेश से लेता ही था, अब उसने मेरा खाता शुरू कर दिया ताकि पूरे महीने का सामान का पैसा एक बार दूँ। सुबह दूध वों पहुंचाने लगा और हर रोज कुछ ना कुछ चाहता की ओ मुझे एक्स्ट्रा बेच दें। नौकरी मेरी अच्छी थी तो मुझे इससे बहुत फर्क नहीं पर रहा था और मेरा निशाना कुछ और था।

इधर मैंने सबसे पहले मनीष से नज़दीकी बढ़ाना प्रारम्भ किया। ओ सातवीं में था और उसका ट्यूशन का मन था। उसका कंजूस बाप उसे ट्यूशन नहीं भेजता था। मैंने बातों बातों में उसके सवालों को उसको समझाया और फिर कहाँ की वों चाहे तो मुझसे ट्यूशन ले सकता हैं और वों भी फ्री में। बाप बेटे खुश और मैंने कह दिया की सुबह 7 बजे आ जाया करें। अगले दिन सुबह 7 बजे मैं सोया ही था, मुझे ऐसे लेट से ही उठने की आदत थी की मनीष ने दरवाजे को नॉक किया। मैं उठा तो उसको दरवाजे पर देखकर पूछा क्या हुआ तो वों बोला भैया आपने सुबह ट्यूशन के लिए बोला था। तब मुझे याद आया तब मैं बोला हाँ याद आया और सॉरी मैं भूल गया था। फिर उसको बैठने को बोलके मैं फ्रेश हो के आया और उसको पहले दिन ट्यूशन दी। अब ये रूटीन स्टार्ट हो गया। मैं अब अपने फ्लैट का गेट लॉक करना छोड़ दिया ताकि मनीष अंदर आ जाता और मुझे जगा देता। उसके घर वाले ट्यूशन से खुश थे और मैं सोच रहा था कि प्लान कैसे आगे बढ़ाऊ।

इसी बीच एक दिन उसकी बहन शिल्पी भी उसके साथ ट्यूशन के लिए आ गई। मैं सोते वक्त बिना अंडरवियर के बारमुडे में सोता था। वों दोनों भाई बहन मेरे कमरे में आ के बैठ गए और मनीष मुझे उठाया। जैसे ही उठा, मेरा लंड जो तना खड़ा था वों मेरे साथ शिल्पी को देख चौंक पड़ा। मैंने किसी तरह लंड को आज एडजस्ट किया और उनदोनो को ट्यूशन दी। शिल्पी 11th में पढ़ रही थी और उसे भी मुझसे ट्यूशन चाहिए थी। यह सुनकर मैं समझ गया की अब मेरा मिशन सही दिशा में जा रहा है। शिल्पी से ट्यूशन के दौरान मैंने एक दिन मनीष को कुछ सामान दुकान से लाने के बहाने नीचे भेजा और शिल्पी के साथ एक डबल मीनिंग जोक बोला जिसपर शिल्पी शर्मा कर हंस पड़ी। मैंने सोच लिया था शिल्पी का शिकार धीरे धीरे करना है। अब मैं चाहता की मनीष ट्यूशन में ना आए और आता भी तो मैं किसी ना किसी बहाने से उसको बाहर भेजकर शिल्पी से करीब आने की कोशिश करता। शिल्पी भी मुझे फुल रिस्पांस दें रही थी। अब मैं कभी उसकी चूचिया दबा देता कभी गांड। वों ऐसी ही घर पर छोटे छोटे कपड़े पहनती थी अब वों और ज्यादा कपड़े खुले पहन कर आने लगी। अब मेरा मन पढ़ाने में कम और शिल्पी के अंगों को दबाने में ज्यादा होता था। कभी टॉप के ऊपर से तो कभी टॉप के अंदर हाथ डाल कर मैं उसकी चूचियों को खूब दबाता। वों छोटा सा शॉर्ट्स पहन कर आती और उसके नीचे होती पैंटी तो मैंने उससे कह दिया की नीचे पैंटी ना पहनकर आया करें। अगले दिन वों बिना पैंटी की छोटी सी शॉर्ट्स पहन कर आई और मैं भी मौके के इंतज़ार में बैठा था। मैंने मनीष को आज कुछ ज्यादा सामान लाने के लिए नीचे भेजा और उसके जाते ही अपने बरमुडे को नीचे कर दिया। मेरा 8" लम्बा लंड फड़ फड़ता हुआ बाहर निकला और शिल्पी को सलाम ठोंक रहा था। शिल्पी भी देखकर चौंक गई और मैंने तुरंत अपना लंड उसके हाथों में पकड़ा दिया। शिल्पी ने आँखे बंद कर लिया और मुझसे चिपक कर बैठ गई और मेरे लंड को सहलाने लगी। इधर मेरा हाथ शिल्पी के शॉर्ट्स के अंदर उसकी चुत को सहला रहा था। इतने में मनीष के आने की आहट हुई और हम दोनों के जल्दी जल्दी अपने हथियार को छुपाया।

अब यह सिलसिला रोज का हो गया जब मैं और शिल्पी एक दूसरे के करीब आते और एक दिन मैंने उसको अपना लंड मुँह में लेने को कहाँ। वों इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी तो मैंने उसको समझाते हुए अपनी जीभ से मेरे लंड को चाटना सिखाया। वों अपने जीभ से मेरे पूरे लंड को चाटती और मुझे खूब मजा आता।

मैं शिल्पी के साथ कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। मैं धीरे धीरे उसको गर्म कर रहा था ताकि वों खुद एक दिन मेरे पास आकर कहे की आओ करो मेरे साथ। अब शिल्पी प्रतिदिन ट्यूशन के वक्त बिना पैंटी पहने शॉर्ट्स में आती और मैं मौका निकालकर अपना लंड कभी उसके मुँह में और कभी गांड की दरारों पर रगड़ता। वों भी इसका मजा ले रही थी। इधर मेरी रमेश की परिवार से नजदीकी बढ़ रही थी लेकिन मंजू से बात नहीं हो पा रही थी। मैं यह बात अच्छे से जानता था की रमेश बहुत ही लालची इंसान है, मैंने एक दिन बातों ही बातों में रमेश से कह दिया की मैं बैचलर रहता हूँ तो चाहो तो तुम्हारे यहां से टिफिन ले सकता हूँ और इसका पैसा पे कर दूँगा। रमेश ने यह बात मंजू से की और दोनों में क्या बात हुई मुझे मालूम नहीं लेकिन दो दिन बाद रविवार को उन्होंने मुझे डिनर पर इनवाइट किया। मैं भी अच्छे से तैयार होकर उनके घर डिनर पर पहुँच गया।

मैंने मंजू को देखा तो देखते ही रह गया। उसने स्लिवलेस ब्लाउज के साथ क्या मस्त तरीके से साड़ी पहन रखी थी। उसके बूब्स जो की पूरे 36 साइज के थे उसकी ब्रा के कैद में थे और ब्लाउज आगे से डीप कट था जो क्लीवेज दिख रहा था वों लंड को जगाने के लिए काफी था। पहुंचते ही मैंने नमस्ते भाभी बोला और बात चीत करने लगा। रमेश हमें मिलवाकर कुछ बोलता उससे पहले ही दुकानदार में ग्राहक आ गए और वों बाहर चला गया। फिर मंजू से मेरी हंसी मजाक के साथ बातें होने लगी। मैं बातें कम और उसके बूब्स को ज्यादा देख रहा था। तभी शिल्पी और मनीष भी आ गए। शिल्पी भी आज कम क़ातिल नहीं लग रही थी। शिल्पी ने वन पीस पहना था जो बमुश्किल उसके कमर और गांड को ढक रहा था। तभी किचन से सीटी की आवाज आई और मंजू उठ के किचन की और गई। उसको पीछे से देख मैं चौंक पड़ा। पीछे से उसके ब्लाउज बिल्कुल बैकलेस थे जो सिर्फ एक पतली सी डोर पर टीके थे। शिल्पी और मनीष मेरे पास बैठे थे इसलिए मैंने जल्दी से मंजू से नजर हटाई और शिल्पी से बात करने लगा। मैं सोफे के एक साइड बैठा था, बगल में मनीष और सामने शिल्पी। मैं बातें करते करते शिल्पी के पैरो से अपने पैरो को रगड़ रहा था जिससे मेरा लंड एकदम तन कर खड़ा था। ऐसे ही बात कर ही रहा था की मंजू अचानक से आ गई और कहाँ की डिनर रेडी है लेकिन 10बजे के बाद डिनर करेंगे जब रमेश दुकान बंद कर के अंदर आ जाएगा। अभी आठ बजे थे और घर के अंदर चार लोग थे मैं, मंजू, शिल्पी और मनीष। शिल्पी ने फिर कहाँ की क्यूँ ना हम लोग तब तक डांस और अंताक्षरी खेलते है। पहले शुरुआत हुई डांस से। शिल्पी ने डीवीडी स्टार्ट किया और एक पर एक लेटेस्ट और हॉट सेक्सी गाना बजायी जिसमे सबको डांस करना था। पहला ही गाना था "जरा जरा टच मी" और हम सब डांस किए जा रहे थे। मैंने डांस करते करते मंजू को पकड़ा और उसके साथ कपल डांस करने लगा। मंजू का पूरा पीठ नंगा था और मुझे छूने में बहुत मजा आ रहा था। मेरा एक हाथ उसके हाथ में और दूसरा हाथ उसके कमर में था। वों भी मुझसे चिपक कर मेरे कंधे पर हाथ रखकर डांस कर रही थी। मैं अपने हाथ से उसके कमर के पास नंगे बदन पर ऊँगली फेरता और तभी अचानक से उसने मेरे कानो के पास मस्ती से काटा और मेरी चीँख निकल गई। मंजू मुझसे ज्यादा मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी और यह देखकर मैं पूरा रोमांचित हो रहा था साथ ही मेरा पूरा ध्यान शिल्पी पर था क्योंकि शिल्पी मेरे करीब आ चुकी थी और जल्दी ही मैं उसकी सील तोड़ने वाला था। इस बीच मैं कभी कभी शिल्पी के साथ भी डांस करने लगता ताकि वो कुछ समझें नहीं। इस तरह लगभग एक घंटे तक डांस शो चलता रहा। फिर अंताक्षरी खेलना स्टार्ट किया जिसमे दो टीम बनी। एक टीम में मैं और मंजू और दूसरे टीम में शिल्पी और मनीष। मैं और मंजू एक साथ एक दूसरे के करीब बैठे थे और दूसरी साइड शिल्पी और मनीष इस तरह हमने अंतराक्षी खेली जिसमे बहुत मजा आया। इसके बाद डिनर की बारी आई।

डिनर जो की काफी अच्छा बना था उसका मैंने जमकर लुफ्त उठाया। आज मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था इसलिए मैं जल्दी से उसके बाद ऊपर अपने फ्लैट में चला गया। डांस और डिनर के बाद मैं काफी थक गया था इसलिए मैं ऊपर आ कर कपड़े उतारे और तौलिया लपेट कर ही सो गया। सअगले दिन सुबह सिर्फ शिल्पी ट्यूशन के लिए आई और मैं सिर्फ तौलिया लपेटे सोया था। सोने की वजह से तौलिया भी काफी ऊपर आ गया था और मेरा लंड सुबह तन कर खड़ा था। शिल्पी ने आकर मेरे गालों पर किश किया। मैं भी नींद से जागा और शिल्पी को अपनी ओर खींच लिया।

शिल्पी एक पतली सी शॉर्ट्स वों भी बिना पैंटी के मेरे ऊपर थी। मेरा तौलिया कब का मेरा साथ छोड़ चुका था और मेरा लंड उसकी गांड की गहाराइयो को नाप रहा था। इसी पोजीशन में मैं अपने दोनों हाथों से उसकी चूचिया दबा रहा था और उसकी सिसकियाँ निकल रही थी। मैंने उसकी चूचियों को जम कर मसला फिर उसको अपनी और पलट कर उसके होठो से अपने होठो का मिलन करा दिया। मैं उसको इतना बेचैन कर देना चाहता था की वों अपनी शॉर्ट्स खुद से उतार कर मुझे बोले की राज चोदो मुझे।

काफी देर तक हम दोनों एक दूसरे के होठो को चूमते रहे फिर मैंने उसकी टॉप उतार दी। उसने एकदम पतली लेकिन बहुत ही सेक्सी ब्लैक कलर का ब्रा पहना हुआ था। मैंने उसको अपने गोद में बिठाया और उसके गर्दन के पास किस किया। वहाँ किस करते ही उसकी आह निकल गई। उसकी पूरी पीठ मेरे सामने नंगी थी सिर्फ एक ब्रा की डोर के अलावा। मैंने उसके पूरे पीठ को चूमते चूमते उसकी ब्रा की डोर खोल दी। उसकी ब्रा की डोर खोलते ही शिल्पी ने अपनी ब्रा को आगे से पकड़ लिया मानो की अपनी चूचियों को ढकने का आखिरी प्रयास। मैं इससे समझ गया और मैं अपने तरफ से कुछ जल्दी भी नहीं करना चाहता था।

नंगी पीठ को किस करते करते मैं उसके कमर तक आ गया और तभी मैं नीचे उसके चूतरों को नंगा करने के बजाए उसको फिर अपनी ओर किया। मैंने देखा की शिल्पी अपने दोनों आँखों को बंद कर मेरी ओर चिपकी है और अपने होंठो को मेरे कंधे पर गड़ा रखे है। मैंने प्यार से उसके एक हाथ को पकड़ा और उसके हाथ पर किस किया। उसके बाद मैंने दूसरे हाथ जिससे उसने ब्रा को पकड़ रखा था, उसको अपने हाथों में लिया और प्यार से किस करता रहा। इसी दौरान उसके ब्रा ने उसकी चूचियों का साथ छोड़ दिया और उसकी दोनों चूचियाँ मेरे सामने आजाद दें। संतरे जैसे उसकी दोनों चूचियों को देखकर मैं अपना खुद से नियंत्रण खो रहा था लेकिन मैंने खुद को किसी तरह संभाला। अब मेरा लक्ष्य उसके चूचियों का मसाज करना और उसको बड़े बड़े बूब्स बनाने थे। मैं उसकी चूचियों को मसलता रहा जिसमे मुझे और शिल्पी को भी बहुत मजा आ रहा था।

अब शिल्पी का भी खुद से नियंत्रण खत्म हो चुका है। अपने बंद आँखों के साथ ही उसने मेरे लंड को पकड़ा और जोर जोर से दबाने लगी। उसकी बेचैनी को समझते हुए मैं लेट गया और उसको खुद से नीचे करते हुए अपने लंड को उसके गालो के पास ले गया। उसके दोनों गालो को लंड से मिलन कराते ही उसने मुँह खोला और फिर मेरा लंड उसके मुँह के अंदर।

वों बहुत ही अच्छे तरीके से मेरे लंड को चूस रही थी और मैं भी उसका पूरा साथ दें रहा था। काफी देर तक लंड चूसने के बाद मैंने फिर उसको अपने पास लाया और उसके शॉर्ट्स को नीचे कर दिया। उसकी चिकनी चिकनी चुत मेरे सामने थी। जैसे ही मैंने उसके शॉर्ट्स को नीचे किया उसने खुद ही शशॉर्ट्स को नीचे खिसका कर अपने बदन से आजाद कर दिया। अब हम दोनों पूरी तरह नंगे थे।

मैं शिल्पी के कमर के पास जाकर उसके चुत के ऊपर के हिस्सों को किस करने और चाटने लगा। इसको चाटने से शिल्पी की सिसकारिया कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैंने चाटने की गति बढ़ा दी तभी अचानक से शिल्पी बोल उठी - "ओह राज, प्लीज फक मी'।

मुझे इसी मौके का इंतज़ार था। मैंने अपने लंड के सुपारे को उसकी चुत से सटाया और बोला फिर से कहो क्या कहाँ।

शिल्पी जो खुद को कंट्रोल नहीं कर पा रही थी तुरंत बोल पड़ी, राज प्लीज प्लीज जल्दी करो ना। शायद उसके चुत में कोई लंड पहली बार जा रहा था, उसकी चुत एकदम टाइट थे। मैं धीरे धीरे लंड को अंदर ले जा रहा था और वों आह उह की आवाजे भी काफी तेजी से निकाल रही थी। मैंने उसको होठों से अपने होठो को जोड़ा और एक जोर का झटका नीचे मेरे लंड ने शिल्पी के चुत में मारा। अब मेरा लंड पूरी तरह शिल्पी के चुत के अंदर था और मैं लगातार अपने लंड को तेज गति से धक्के मारे जा रहा था। शायद उसकी झिल्ली टूटी हो, मुझे अपने लंड पर हल्के हल्के खून का भी एहसास हो रहा था।

एक लम्बी और यादगार चुदाई के बाद हम दोनों निढाल होकर बेड पर गिर गए और मैंने अपने बाजूओ में शिल्पी को समेट लिया। शिल्पी मेरे छाती पर अपना सर रखकर खुद को खुश महसूस कर रही थी। तभी मैंने देखा की 9 बज रहे है और अमूनन शिल्पी और मनीष का ट्यूशन 8:30-8:45 तक खत्म हो जाता था। मेरा मन हो रहा था की शिल्पी के साथ एक राउंड और मारा जाए लेकिन मुझे लगा की शिल्पी के ज्यादा देर ऊपर रुकने से कहीं किसी को शक ना हो जाए। मैंने शिल्पी को टिश्यू पेपर दिया, उसने खुद से अपनी चुत को साफ किया वहाँ पर ब्लड के निशान भी थे। उसने कपड़े पहने और स्माइल देते हुए नीचे चली गई।

अब शिल्पी नीचे जा चुकी थी और मेरे दिमाग में ये चल रहा था की कैसे शिल्पी और मंजू को अपने जाल में रखते हुए दोनों से खूब मजे लू और रमेश और मनीष को अपने काबू में ताकि वे मेरे लिए कोई समस्या ना खड़ी कर दें। ये सोचते सोचते मेरे दिमाग में एक आईडिया आया और मैंने रमेश को फोन कर ऊपर बुलाया। मैंने तुरंत एक शॉर्ट्स टीशर्ट पहना और लेट गया। अन्यथा अब तक तो मैं नंगा ही लेटा था।

रमेश के साथ मैं पूरे रौब से बाते करने लगा था ताकि उससे कोई परेशानी ना हो। उसने ऊपर आते ही गेट पर नॉक किया और मैंने कहाँ आओ रमेश।

रमेश - क्या हुआ, अचानक बुलाया

मैं - हाँ रमेश, कल रात तुमने जो डिनर के लिए बुलाया था उसके लिए थैंक्स। काफी अच्छा डिनर बनाया था मंजू ने।

रमेश - जी धन्यवाद। आपको खाना अच्छा लगा। अब आप चाहो तो डेली के खाने के लिए मैं मंजू को बोलू।

मैं - खाना अच्छा था कोई शक नहीं। लेकिन डेली खाने के लिए मैं तैयार हूँ लेकिन तुम मंजू से पूछ लो उसको कोई समस्या तो नहीं और हाँ पैसे मुझसे जरूर लेना होगा।

रमेश निहायती लालची और आलसी इंसान था वों यह सुनकर काफी खुश हुआ। मेरी तरफ चालाकी से हसते हुए वों बोला - पैसे आप जो मर्जी दें देना और मंजू तैयार है।

मैं- ठीक है। मैं अपनी सन्तुस्टि के लिए एक बार मंजू से पूछ लूंगा फिर तुम्हे बता दूँगा। और बताओ क्या चल रहा है।

रमेश - जी सब ठीक है।

फिर एक दो मिनट सामान्य बातें हुई और रमेश नीचे चला गया।

रमेश को मुझमे मेरे पैसे का लालच दिख रहा था और मुझे उसकी बीबी और बेटी में। दोनों अपनी चाल चल कर खुश थे।

अब मैं तैयार हो के ऑफिस जाने के लिए नीचे उतर रहा था तभी मेरा मन हुआ की मंजू से मिलता चलू। शिल्पी कॉलेज जा चुकी थी और मनीष कॉलेज। रमेश बाहर दुकान में था और मैं मंजू से मिलने को उसके घर के अंदर।

घर में नॉक किया और मंजू ने दरवाजा खोला। मंजू मुझे देखते ही स्माइल देते हुए बोली राज जी आप।

मैं - हाँ कोई शक

मंजू - नहीं नहीं, बोलिये कैसे आना हुआ

मैं - कल के स्वादिस्ट डिनर के लिए थैंक यू बोलने आया हूँ

मंजू - सिर्फ थैंक यू

मैं - और बताओ क्या चाहिए

मंजू - आप सोचो, हर चीज मांगी नहीं जाती

मैं - अच्छा ठीक है, मैं सोचता हूँ।

मंजू - बैठो अभी चाय बना के लाती हूँ।

मंजू ने सेक्सी नाईटी पहन रखा था और ऐसा लग रहा था जैसे तुरंत नहा के आई हो। चाय बनाने के लिए वों अपनी गांड मटकाती हुई किचन की ओर गई और मैं उसकी गांड को ऐकटक निहार रहा था।

मंजू चाय बना के वापिस आई और हम दोनों ने हसते हुए चाय पीया और फिर पूछा मुझे डेली खाना खिलाने वाली हो तुम। उसने हाँ में सिर हिलाया और मैं समझ गया की रमेश ने इसे सब समझा दिया है। मैं मन ही मन खुश हुआ और ऑफिस के लिए निकल पड़ा।

पूरे दिन ऑफिस की भाग दौर के साथ दिमाग में ये चल रहा था की अब आगे आगे क्या करना है।

शाम को मैं घर आया और सोच रहा था की आज डिनर के लिए क्या होता है तभी शिल्पी मुस्कुराते हुए मेरे फ्लैट में आई। आते ही शिल्पी को मैंने गले लगा के किस किया। शिल्पी ने बोला की मम्मी ने आपको फ्रेश हो के नीचे बुलाया है। मैंने पूछा क्यूँ तो शिल्पी बोली मुझे मालूम नहीं है। मैंने शिल्पी को रुकने के लिए बोला लेकिन वों रुकी नहीं और नीचे चली गई। मैं थोड़ी देर बाद फ्रेश होकर नीचे गया तो देखा ड्राइंग रूम में मंजू मेरा इंतज़ार कर रही है। मंजू ने अभी भी नाईटी पहनी हुई थी जिसमे उसके ऊपर से नीचे तक सभी अंग कहर बरपा रहे थे।

मंजू मुझे देखकर स्माइल करती हुई बैठने को बोली और मैं भी सोफे पर बैठ गया। फिर थोड़ी देर इधर उधर की बातें हुई फिर मंजू मेरे लिए डिनर ले आई। मैंने कहाँ डिनर क्यू तो वों तुरंत बोली की क्यू मत करो अब तो डेली खिलाऊंगी।

मैंने इस बार स्माइल करते हुए, इधर उधर की बातें करते हुए डिनर को फिनिश किया और छत पर फ्लैट की ओर चला गया।

सब कुछ मेरे प्लान के मुताबिक चल रहा था। मैं खुद पर खुश होता हुआ ऊपर फ्लैट में आके सो गया।

अगले दिन सुबह शिल्पी और मनीष ट्यूशन के लिए आए। आज शिल्पी के चेहरे को देखकर यह लग रहा था मानो वों मनीष के आने से खुश नहीं थी और वों मुझसे कुछ और उम्मीद ले कर आई थी। मैं यह समझ गया और मैंने उसको इशारे से शांत रहने को कहाँ। आज वों मेरे करीब बैठी थी। मैंने दोनों का ट्यूशन खत्म किया और दोनों को नीचे भेजना। दोनों उसके बाद कॉलेज /कॉलेज निकल जाते।

अभी मैं ऑफिस के लिए तैयार हो कर निकलने की सोच रहा था कि मंजू की कॉल आ गई। मंजू ने कहाँ की नाशता रेडी है नीचे आ जाओ। मैंने कहाँ की ऊपर ही आओ ना तुम साथ नाश्ता करते है। मंजू ऊपर नाश्ता लेकर आ गई। मैंने उसको कुर्सी पर बैठने को कहाँ और बोला आँखे बंद कर लो। उसने बोला क्यूँ तो मैंने कहाँ कि जैसा कहाँ है वैसा करो। ठीक है बोल के मंजू ने आँखे बंद कर ली और मैंने अपने बैग से एक लेडी वॉच निकली जो मैंने मंजू के लिए कल ख़रीदा था। मैंने मंजू के माथे पर किस किया और मंजू के हाथों में वों घड़ी बाँध दी। मंजू ने गिफ्ट देखकर मुझे थैंक यूँ कहाँ। मैंने कहाँ कि सिर्फ थैंक यूँ?

इस पर मंजू खिलखिलाते हुए हंस पड़ी और मेरे गले लग गई और अपने होंठो को मेरे होंठो से मिला दिया। हम दोनों लंबे समय तक एक दूसरे के साथ लिप लॉक करते रहे। फिर अलग होते हुए मंजू ने कहाँ कि नाश्ता कर लो। मैंने बोला चलो साथ नास्ता करते है और मंजू ने अपने हाथों से मुझे खिलाया।

नाश्ता खत्म करने के बाद मंजू नीचे चली आई और मैं ऑफिस। मैं अब ये सोच रहा था कि मंजू के तरफ से ग्रीन सिग्नल है लेकिन सुरक्षित टाइम कैसे निकालू।

इसी कश्मकश में दो तीन दिन बीते की। डेली रूटीन जैसा मैं ट्यूशन में शिल्पी और ब्रेकफास्ट /डिनर के समय मंजू के साथ कुछ टाइम बिता पा रहा था।

अब मेरे लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था। तभी शाम में मुझे शिल्पी का कॉल आया की वों और मनीष कुछ दिनो के लिए ननिहाल जा रहे है। मंजू मुझे खाने देने के कारण नहीं जा पा रही है और रमेश उन दोनों को ननिहाल छोड़ने सुबह जाएगा।

मैं समझ गया की मंजू क्यूँ नहीं जा रही है और मैंने खुश हो गया। अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर तैयार हो गया और चुपचाप छत से देखने लगा की ये लोग कब जाते है। मैंने देखा की सुबह लगभग 7:30 बजे मनीष और शिल्पी को लेकर रमेश रिक्शा से बस स्टैंड की ओर निकल पड़ा। अब mai मंजू का इंतज़ार कर रहा था। लगभग 10 मिनट हो गए मंजू की कोई कॉल नहीं आई। मुझे इंतजार बहुत लम्बा लग रहा था तभी फोन की घंटी बजी ओर देखा की मंजू की कॉल है। मैंने ऐसा शो किया जैसे मुझे कुछ मालुम ही ना हो और मैंने हेलो बोल कर पूछा की शिल्पी और मनीष आज ट्यूशन के लिए नहीं आए। मंजू ने जवाब दिया की आज वे दोनों नहीं जा पाए और मुझे नाश्ते के लिए नीचे बुलाया।

मै समझ रहा था और इसलिए अच्छे से तैयार हो कर नीचे गया। नीचे गया तो मुझे घर में कोई नहीं था और दुकान भी बंद था। मैंने अनजान बन कर पूछा तो मंजू ने बोला की रमेश बच्चों को ननिहाल छोड़ने गया है मुरादाबाद और शाम तक वापिस आ जाएगा। मै समझ गया की मेरे पास शाम तक का टाइम है। तभी रमेश ने मंजू को फोन किया की बस मिल गई और मै अब निश्चिंत हो गया।

इसके बाद मै मंजू के पास गया और बिना कुछ बोले उसको गले लगा लिया। मंजू ने भी मेरा पूरा साथ दिया और कस कर मेरे गले लग गई। मंजू को कस कर मुझे गले लगाने से उसके बड़े बड़े बूब्स मेरी छाती से टच हो रहे थे। मैंने उसको अलग किया और सोफे पर बैठ कर मंजू को गोद में बिठा लिया। मंजू ने ब्लू कलर की पतली साडी पहन रखी थी और मेरा दिल उस साड़ी को उतारने को बेताब था। मंजू को गोद में बिठा कर मैंने उसके चेहरे से बालो को हटाते हुए उसके माथे पर किस किया। वों मेरे लिए पूरी समर्पित नजर आ रही थी और मै भी उसको अपनी रखैल बनाना चाहता था

मंजू को मै अपनी गोद में बिठा कर उसके साथ बातें कर रहा था साथ ही धीरे धीरे उसके शरीर के सभी अंगों पर ऊँगली भी फेर रहा था। आज मेरे पास पूरा वक्त था मंजू को अपना बना लेने का और मजा तो तब आता है जब लड़की या औरत अपनी इच्छा की चरमसीमा पर पहुँच कर आपको अपनी ओर खींचे। मंजू भी एक समझदार खिलाड़ी की तरह इसका पूरा मजा ले रही थी। बाते करते करते मैंने उसके साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया। मंजू के ब्लाउज जो काफी डीप गले का था उसमे मुझे उसके क्लीवेज साफ साफ नजर आ रहे थे। फिर मैंने उसके ब्लाउज के पहले दो बटन खोले और उसको अपने गोद में रख कर वहाँ पर हल्का हल्का दबाया। फिर मैंने उसके ब्लाउज को उससे आजाद कर दिया। अब वों ऊपर सिर्फ ब्रा में थी। उसके बूब्स फुल साइज के थे जो ब्रा में साफ साफ बाहर की ओर दिख रहा था। मैंने उसके पेट पर ऊँगली फेरी जिससे उसकी आँह निकल गई। पेट पर कभी ऊँगली फेरता कभी जीभ से चाट लेता इस तरह करते करते मैंने उसकी साड़ी की गाँठ खोल दीऔर अगले ही क्षण मंजू की साड़ी जमीन पर थी।

अब मेरे सामने मंजू ब्रा और पेटीकोट में थी और मै उसके पेट से नाभि के आस पास अपने जीभ से चाट रहा था। उसके नाभि के छेद में ऊँगली डाल कर मै गोल गोल घुमा रहा था और साथ ही मैंने पेटीकोट के नारे की डोर को खींच दिया और पेटीकोट ने मंजू का साथ छोड़ दिया। पेटीकोट जमीन पर और मंजू मेरे सामने बिकनी में। मंजू ने काफी स्टाइलिश पैंटी पहन रखा था जो आम तौर पर घरेलू औरते नहीं पहनती। उसमे उसकी पीछे से गांड बिल्कुल नंगी थी। मैंने उसके चूतड पर जोर जोर से दो -तीन थप्पड़ मारे और मंजू को बेड पर गिरा दिया। फिर मैंने मंजू की पैंटी के किनारे किनारे लकीर खींचता हुआ उसकी चुत को जोर से खींचा। उसकी आँह की गूंज पूरे घर को सुनाई दें सकती थी लेकिन घर पर कोई नहीं था। फिर मैंने मंजू के बालो को पीछे से पकड़ कर खुद से दूर किया और अपना लंड उसके गालों पर घूमने लगा। मंजू मेरी इच्छा को समझ गई और मेरे लंड को अपने मुँह के अंदर ले लिया। मंजू अपने मुँह में लंड को अच्छे से चूस रही थी जिससे मुझे जबरदस्त मजा आ रहा था। उसके मस्त तरीके से चूसने से मेरा लंड पानी छोड़ने वाला था और मंजू मेरे लंड को अपने मुँह से बाहर निकालना चाह रही थी लेकिन मैंने उसकी एक ना चलने दी। वों मजबूरन मेरे लंड का वीर्य अपने मुँह में लेती रही जिससे वों काफी सड़क भी गई। फिर वों ब्रा पैंटी में बाथरूम में मुँह धोने चली गई।

मै भी उसके पीछे पीछे बाथरूम में चला गया और उसको पीछे से दबोच लिया। मै पूरा नंगा था और उसकी पैंटी जिसके पिछले हिस्से में नाम मात्र का ही कपड़ा था। इस वजह से मेरे लंड को उसकी गांड की दरारे साफ साफ महसूस हो रही थी। मैंने अपने लंड को उसके गांड से रगड़ना शुरू कर दिया। गांड रगड़ते रगड़ते मै उसके बूब्स को दोनों हाथों से मसले जा रहा था। तभी मै मंजू को शॉवर के नीचे ले गया और शॉवर चला दिया। उसके गोरे गोरे बूब्स पर पानी की बुँदे चमक रही थी और बूब्स काफी ज्यादा कहर बरपा रहे थे। मैंने ब्रा को भी खोल दिया और उसके बूब्स के निप्पल्स को पहले अपनी ऊँगली और फिर जीभ से चाटने लगा। जीभ से चाटने की वजह से निप्पल्स पूरे खड़े हो गए। अब मंजू के शरीर पर पैंटी का क्या काम था, मैंने पैंटी भी नीचे सरका दी और अब हम दोनों बाथरूम में पूरे नंगे थे। बाथरूम में दोनों गले मिल रहे थे और ऊपर से शॉवर से पानी की बुँदे माहौल को रोमांचित कर रही थी।

इसीबीच मैंने मंजू को गोद में उठा लिया और गोद में उठा कर बेडरूम में ले आया। बेड पर मंजू को गिराकर मैंने अपने लंड का सुपारा मंजू के चुत पर लगाया और पूरे जोर के साथ अपना लंड मंजू की चुत में घुसा दिया। मै पूरे जोर से अपने लंड का धक्का लगाएं जा रहा था और मंजू की चीखे मुझे और उकसा रही थी जोर से धक्के मारु। लगभग 10 मिनट के धक्के के बाद मेरे लंड ने मंजू की चुत में पानी छोड़ दिया। इसके बाद हम दोनों बेड पर गिर गए। सुबह से हम दोनों ने कुछ नहीं खाया था तो मैंने पिज़्जा का आर्डर किया और मंजू मेरे हाथ पर अपना सर रखकर अपने एक हाथ से मेरे लंड को सहला रही थी। इसी बीच मुझे कुछ बदमाशी सूझी और मैंने मंजू को ऐसे ही पिज़्जा रिसीव करने को कहाँ तो मंजू के होश उड़ गए। मंजू पूरी नंगी थी और ऐसे में वों कैसे रिसीव करती। मै उसकी मजबूरी को समझ रहा था इसलिए उससे काफी मिन्नतें कराने के बाद मैंने उसको तौलिया लपेटे हुए पिज़्जा रिसीव करने को कहाँ लेकिन बूब्स आधे से अधिक दिखने चाहिए थे। तभी पिज़्जा डिलीवरी बॉय ने डोर बेल बजाया और मैंने मंजू को तौलिया लपेट कर पिज़्जा लेने का इशारा किया। मंजू ने तौलिया लपेटा और दरवाजे की ओर बढ़ी। मै जल्दी से खिड़की के पास जा कर पर्दे के पीछे छुप गया।

मंजू ने तौलिए से अपने बूब्स और चुत अच्छी तरह से ढकने की कोशिश की लेकिन वो उसमे कामयाब नहीं हो पा रही थी। उसके बड़े बड़े बूब्स बाहर की ओर उभर कर सामने आ रहे थे और नीचे बस किसी तरह कमर को ढक रहे थे। मंजू ने जैसे ही दरवाजा खोला, मंजू को इस हालात में देखकर डिलीवरी बॉय चौंक गया और हकलाते हुए कहाँ - मैम आपका पार्सल। मेरे कहे अनुसार मंजू ने डिलीवरी बॉय को पिज़्जा टेबल पर रखने को कहा। मै चुपचाप पर्दे के पीछे खड़े होकर डिलीवरी बॉय को पसीने से तर बतर देख रहा था। वो पिज़्जा टेबल पर रख कर मंजू की ओर देखकर थैंक यू बोला और भागता हुआ चला गया।

उसके जाते ही मैंने मंजू के तौलिए को खोल दिया और हम दोनों फिर से पूरी तरह नंगे थे। मैंने पिज़्जा के साथ आए सॉस को अपने लंड पर लगाया और मंजू को चाटने को कहाँ। मंजू ने अपने जीभ से सॉस का स्वाद लेते हुए पूरे लंड को साफ किया। फिर हम दोनों बाथरूम में साथ नहाए और नंगे ही पिज़्जा खाया। थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिर उठने लगा और मंजू मेरे साइड ही लेटी थी। मैंने अपना लंड मंजू के मुँह में डाल दिया और मंजू स्वाद ले कर मेरे लंड को चाट रही थी। मंजू द्वारा मेरे लंड को उत्तेजक तरीके से चाटने के कारण मेरा लंड काफी बड़ा हो रहा था और मैं अपने पूरे लंड को उसके मुँह में घुसाए जा रहा था।

इसके बाद मैंने मंजू के बूब्स को रगड़ना शुरू किया। मंजू के बूब्स काफी बड़े थे और उन्हें मसलने में काफी मजा रहा था। काफी देर तक मसलने से बूब्स काफी बड़े लग रहे थे तब मैंने मंजू को अपने दोनों बूब्स हाथों से पकड़ने को कहाँ और उसके दोनों बूब्स के बीच अपने लंड को घुसेड़ने लगा। बूब्स फुल साइज के होने की वजह से पूरा लंड मानो अंदर बाहर हो रहा था और इस तरह अंदर बाहर करते करते मेरे लंड ने पानी छोरा जो की पूरा का पूरा मंजू के चेहरे पर फैल गया। फिर मंजू ने उसको साफ किया और मेरा लंड अब अपने अगले लक्ष्य यानी मंजू की चुत की ओर जाने को बेताब था। तभी मंजू को मैंने ऊपर की ओर खींचा और उसके बूब्स को अपने जीभ से चाटने लगा। फिर मैंने अपने जीभ से उसके बूब्स के निप्पल्स को रगड़ा और निप्पल बिल्कुल मटर के दाने के जैसा खड़ा हो गया। उसके बाद उसके पूरे पेट को चूमता हुआ मैंने उसके चुत के ऊपरी हिस्से पर जीभ फेरा और वो सिसक उठी। मै वहाँ जीभ से चाटता रहा और इससे मंजू का पानी छूट गया।

फिर मैंने अपने लंड को उसके चुत में घुसा दिया और उसी पोजीशन में मंजू को गोद में उठा कर पूरे घर में घूमने लगा। तब तक शाम के 4 बज गए और रमेश का फोन आ गया की वो मुरादाबाद से लौटने के लिए बस में बैठ गया है और एक घंटे में पहुंचने वाला है। फिर हम दोनों ने कपड़े पहने और मै घर से बाहर की ओर निकल गया। इधर मंजू ने घर को साफ किया ताकि कोई सबूत ना रहे।

मै आज काफी खुश था। अब मुझे दोनों माँ बेटी मंजू और शिल्पी का चुत मिल चुका था और ये सोच रहा की इन दोनों को कैसे आगे मुट्ठी में रखना है। ये सोचते सोचते मै शाम को लगभग 6 बजे घर लौट आया। जैसे ही मैंने घर का दरवाजा खोला मैंने देखा मंजू बाहर ही ड्राइंग रूम में बैठी है और उसने मुझे देख कर स्माइल किया। रमेश अपने दुकान में था।

ऊपर आकर मै फ्रेश हुआ और मंजू को मैसेज किया की आज डिनर ऊपर ही करेंगे। लगभग आठ बजे मंजू मेरे लिए डिनर लेकर छत पर फ्लैट में आई। हम दोनों सोफे पर बैठ थे और मै बरमुडे में था। मैंने उसको नीचे बैठने को कहाँ और अपने बरमुडे से लंड निकालकर उसको चूसने के लिए दें दिया। उसने चुपचाप मेरे लंड को अपने मुँह में लिया और चूसने लगी। थोड़ी देर लंड चूसने के बाद उसने अपने मुँह से लंड निकला और बाथरूम से हाथ धो के आई। मैंने उससे खाना खिलाने को कहाँ और वो अपने हाथों से मुझे खाना खिलाने लगी। मै खाना खाते वक्त बीच बीच में उसका बूब्स दबाता रहा। इस तरह खाना खत्म हुआ फिर मैंने अपने होंठो को उसके होंठो से सटा दिया और एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे। उसके बाद मंजू नीचे चली गई।

मंजू नीचे चली गई और मेरा दिमाग अब आने वाले दिनों की तैयारी कर रहा था। शिल्पी मनीष के साथ कुछ दिन ननिहाल में रहने वाली थी लेकिन यहां रमेश मेरे सामने था जिससे बचते हुए मुझे मंजू की चुदाई करनी होती थी। रमेश मेरे जाल में फस रहा था लेकिन मै उसको पूरी तरह अपनी मुट्ठी में लाना चाहता था। दिमाग में कई सारे प्लान चल रहे थे और कब मै सोया पता ही नहीं चला।

मुझे बिल्कुल नंगा या बिल्कुल कम कपड़े में सोने की आदत थी और कल रात भी मंजू के जाते वक्त नंगा था और बस नंगा तौलिया लपेट कर सो गया। सुबह लगभग 8 बज रहे होंगे अचानक मैंने अपने गालों पर किसी को किस करता हुआ महसूस किया। भींगे भींगे बाल मेरे चेहरे को छू रहे थे जिससे मेरी नींद खुल गई। मैंने देखा मंजू मेरे कमरे में आ कर मुझे मॉर्निंग किस कर रही है। वाह दिन की शुरुआत हो तो ऐसी। मैंने भी मंजू को किस किया और पीठ लगा कर बेड पर बैठा और मंजू को अपने गोद में बिठा लिया। मै अभी अभी उठा था और मंजू मेरे लिए ब्रेकफास्ट लायी थी। मै फटाफट रेडी होने गया तब तक मंजू मेरे फ्लैट में मेरा इंतज़ार करती रही।

मै रेडी हो कर आया और मंजू ने मुझे अपने हाथों से नास्ता कराया। जाते जाते हम दोनों ने एक दूसरे को किस किया। मंजू नीचे चली आई और मै ऑफिस के लिए निकल आया। लेकिन सिर्फ किस से मै संतुष्ट कैसे होता, मुझे तो चुत चाहिए थी। आज शुक्रवार था और अगले दो दिन छुट्टी के थे इसलिए मै अगले दो दिन घर में रुकने का प्लान बना रहा था। ऑफिस से शाम में निकलते वक्त मैंने शराब की 3-4 बोतले खरीद ली और घर लौटते वक्त दुकान पर रुक गया। दुकान में रमेश ने बैग देखकर पूछा की क्या है तो मैंने चुपचाप उसे ये दिखाया। शराब की बोतले देखकर रमेश पागल हो गया और पिलाने की जिद करने लगा। मै मन ही मन बहुत खुश हुआ और समझ गया लालची इंसान की लालच को। मैंने उसको छत पर मेरे फ्लैट पर थोड़ी देर में आने को बोला और साथ में चखना दुकान से ले लिया। मैं फिर नीचे के फ्लैट में जा कर मंजू को अपना प्लान बताया और कुछ नमकीन बनाने को कहा। कोई भी भारतीय औरत अपने पति को शराब पीने नहीं देती मैंने बहुत मुश्किल से मंजू को समझाया और जैसा कहा वैसे करने को कहा। मंजू इसके लिए मान गई।

थोड़ी देर बाद रमेश दाँत खिसोरता हुआ ऊपर मेरे फ्लैट में आया। मै भी तब तक पूरी तैयारी कर चुका था, ऐसी तैयारी जो रमेश के होश उडाने वाले थे।​
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