Update 05

मंजू मनीष के साथ जिम जाने के लिए निकली। मंजू ने जीन्स टॉप और मनीष ने जिम के कपड़े पहन लिए। दोनों के निकलते ही मैं और शिल्पी ही घर में थे। जैसे ही घर से वे निकले, मैंने घर का दरवाजा बंद किया।

अंदर आते ही मैंने शिल्पी को अपने गले से लगा लिया। फिर हम दोनों ने एक दूसरे के होंठो को चूमना शुरू किया। हम दोनों एक दूसरे पर टूट पड़े जैसे मानो दो प्रेमी वर्षों बाद मिले हो। हम एक दूसरे को चूमे जा रहें थे और शायद 15-20 मिनट्स हो गए होंगे, मेरे मोबाइल पर घंटी बजी। मैंने देखा मंजू की कॉल है।

मंजू ने यह बताने को कॉल किया था कि मनीष को जिम में एडमिशन मिल गया है और जिम वाले ने कुछ पैसे नहीं नहीं मांगे। मैं मन ही मन सालों कितने कंजूस हो।

फिर मंजू सीधे घर को आती, मैंने उससे कुछ स्नैक्स और डिनर के लिए कुछ अच्छा लाने को कहा। अब मंजू के घर आने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। मैंने तुरंत शिल्पी की शॉर्ट्स उतारी और अपनी शॉर्ट्स भी। शिल्पी भी लंड लेने को तैयार बैठी थी और मैं भी।

हम दोनों ने चुदाई का एक क्विक राउंड पूरा किया और फिर दोनों ने अपने अपने शॉर्ट्स पहन लिए। इतने देर में डोरवेल बजा और देखा कि मंजू आ गई। दोनों मां बेटी एक दूसरे के सामने सच नहीं आने देना चाह रही थी।

मैंने शॉर्ट्स बिना अंडरवियर के पहना था और लंड पूरा टाइट खड़ा था। मैंने शॉर्ट्स के ऊपर सोफे पर रखा एक पिल्लो रख लिया और शिल्पी गेट खोलने बाहर को गई। शिल्पी और मंजू अंदर आए। मंजू ने जो सामान लाया ओ शिल्पी को दिया किचन में रखने के लिए और सोफे पर मेरे बगल में बैठ कर पिल्लो को हटा दिया और बोला -

मंजू - क्या छिपा रहे हो?

मैंने तुरंत अपना शॉर्ट्स नीचे किया और बोला - छिपा नहीं दिखा रहा हूँ, लो खेलो।

मंजू ने तुरंत लंड पर हाथ मारते हूँ कहा अंदर करो, अभी शिल्पी भी है देख लेगी। मैं मुस्कुराया लेकिन अपने लंड को अपने शॉर्ट्स के बाहर ही निकाले रखा, अपनी उंगलियों को उसपर फेरते हुए बोला जिसे देखना है देख ले, मुझे कोई परेशानी नहीं है।

मंजू बेचैन हो रही थी और उसी बेचैनी में मैंने उसकी समीज के ऊपर से चिकोट काटी। फिर मैंने मंजू को अपनी ओर खींचा।

मंजू कोई देख ना ले इस डर से कपकपा रही थी तभी मैंने उसके गालों को चूम लिया। मंजू घबराहट में कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करना है तभी शिल्पी अपने कमरे से निकली।

मेरा लंड शॉर्ट्स के ऊपर ही था तभी मंजू ने जल्दी से टॉवल मेरे लंड के ऊपर फेका और खड़ी हो गई। टॉवल ने सही समय पर मेरे लंड को ढक लिया। मंजू शिल्पी से कुछ पूछी और किचन की ओर बढ़ी। मैंने शिल्पी को कहा कि जा मंजू की किचन में मदद कर और मैं उन दोनों के पीछे पीछे किचन में आ गया।

किचन में मंजू तेजी से डिनर रेडी कर रही थी और शिल्पी उसे मदद कर रही थी। उनदोनो के पीछे जा कर मै बीच में खड़ा हो गया। ममेरा एक हाथ मंजू के कंधे के ऊपर और दूसरा शिल्पी के कंधे के ऊपर था।

मैं दोनों के कभी कंधे दबा देता और दोनों के साथ एक दूसरे के सामने नज़दीक और उन दोनों को फ्रैंक करने की कोशिश करने लगा। तभी डोरबेल बजा।

जिम से मनीष भी आ गया। आते ही उसने मुझे देखा और थैंक यूँ बोला। मैंने मुस्कुरा कर कहा, मजा आया ना?

मनीष ने जी में जवाब दिया और फिर बोला कि मैं फ्रेश होकर आता हूँ। मनीष को भी कंट्रोल में रखना था और साथ ही मंजू और शिल्पी के बारे में यह सोचना था कि इन दोनों के साथ अलग अलग रिलेशनशिप मैनेज करूंगा या दोनों के साथ एक साथ गैंग बैंग करू?

खैर मैंने सब कुछ वक्त पर छोड़ दिया। अभी दोनों के साथ जितना मजा ले सकता था लेना था। हमलोगो ने साथ मस्ती करते हुए डिनर किया। फिर हसीं मजाक की बातें हुई फिर सब लोग सोने जाने लगे। मैं छत पर सोने की ओर बढ़ा और लगभग 5-10 मिनट में जैसे ही शिल्पी और मनीष सोने के लिए गए, मैं नीचे आया और बेडरूम में चला गया।

अब मैं और मंजू एक कपल की तरह डेली रात में सोने लगे। ओ मेरी रखैल बन रही थी और मुझे उसके साथ खुलकर मस्ती करनी थी। पूरी रात मेरे और मंजू के बीच चुदाई का राउंड चला। सुबह 6 बजे मैंने अलार्म लगाया।

6 बजे मोबाइल के वाइब्रेट होते ही मेरी नींद खुली। मैं और मंजू एक दूसरे से चिपक कर सोए हुए थे और दोनों पूरी तरह नंगे थे। मैंने मंजू को बाय बोला और उसी तरह नंगा ही छत पर चला गया।

छत पर मैंने अपने फ्लैट के बेडरूम में जाकर नंगा लेट गया। नींद तो खुल गई थी इसलिए बेड पर लेटा था तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी। यह शिल्पी होगी इसलिए मैं उसी तरह नंगा ही लेटा रहा और सोने की एक्टिंग करने लगा। शिल्पी ही थी और शिल्पी आते ही मेरे लंड को पकड़ कर जोर से हिलाया और फिर मेरे बाजू में आकर लेट गई। शिल्पी मेरे कहे अनुसार सिर्फ एक पतली सी शॉर्ट्स और शार्ट टॉप पहन रखी थी। मैंने उसके कपड़े उतारे और फिर चुदाई का दो राउंड उसके साथ पूरा किया।

इस तरह पूरे हफ्ते मेरा यह रूटीन चलता रहा। रात में मैं मंजू के साथ सोता, सुबह 6 बजे छत पर फ्लैट में आता जहाँ 6 से 8 शिल्पी के साथ वक्त बिताता और उसके बाद पूरे दिन ऑफिस। ऑफिस से आने के बाद मंजू और शिल्पी के साथ मौज मस्ती और डिनर।

रमेश का सहारनपुर गए एक हफ्ते हो गए। आज शनिवार दोपहर में रमेश मेरठ पहुँचता और फिर रविवार शाम में उसे सहारनपुर लौटना था।

शनिवार शाम में रमेश मुझसे मिला। मेरे सामने आते ही ओ मेरे पैर छूने लगा तो मैंने उसे रोकते हुए पूछा -

मैं - कैसे हो रमेश

रमेश - जी सब ठीक है। अमन जी आपकी बहुत तारीफ करते है और मेरा ख्याल रखते है।

मैं (हसते हुए )- हाँ सही से काम करो तो अच्छी ग्रोथ हो जाएगी।

फिर मैंने रमेश से कहा कि चलो अभी फैमिली को टाइम दो, मैं कल बात करता हूँ। इसके बाद मैं छत पर आ गया। आज मैं लगातार की भाग दौर के बीच खुद को आराम दिया।

कई दिनों बाद मैंने ओ रात अकेली गुज़ारी। अगले दिन सुबह मैं नीचे उतरा तो देखा मंजू के घर दो लेडी आयी हुई है।

मैं नीचे उतरा तो मुझे देख रमेश बाहर आया और मुझे नमस्ते किया और पूरे सम्मान के साथ अपने फ्लैट के अंदर लाया। अंदर दो लेडीज आई हुई थी। मंजू ने भी मुझे देख कर फॉर्मेलिटी में नमस्ते किया।

रमेश और मंजू मुझे पूरा भाव दे रहें थे इस वजह से वे दो लेडीज भी मुझे ही देख रही थी

मंजू ने हमारा परिचय कराया। मंजू ये है मेरी दीदी नीतू और ये दीदी की बेटी प्रीति। मैंने नीतू को नमस्ते बोला तो उन्होंने भी अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। मंजू ने प्रीति को इशारा किया तो उसने मेरे पैर छुए।

नीतू जो मंजू की बड़ी बहन है ओ बहुत ही ज्यादा गोरी बदन की महिला है। नीतू की हाइट लगभग 5'7" होगी। उसकी उम्र लगभग 44-45 साल थी लेकिन ओ एक नेचुरल ब्यूटी वाली महिला थी। उसके बूब्स काफी बड़े बड़े थे और पूर्णतः गांव के तरीके से उसने साड़ी पहनी हुई थी।

साथ में प्रीति थी नीतू की बेटी। नीतू भी ऐसा लग रहा था गाँव में रही हो। उसके नैन नक्श काफी तीखे थे और उसमे उसकी गोराई चार चाँद लगा रहा था। प्रीति ने एक सलवार समीज पहना हुआ था जिसमे समीज उसके घुटनो तक आ रहा था। उसके बूब्स बहुत ही छोटे छोटे थे।

उन दोनों के सामने रमेश और मंजू ने मुझे बहुत वैल्यू दी। अब रमेश की नौकरी लगवाई भी मैंने ही थी और जब तक मैं चाहूं ओ जॉब उतने ही वक्त की थी। रमेश और मंजू नीतू और प्रीति के सामने मेरी तारीफ कर रहें थे जो धीमे धीमे उनके मन में मेरे लिए वैल्यू बढ़ा रहा था। थोड़ी देर नीचे रुकने के बाद मैं छत पर अपने फ्लैट में आ गया। लगभग 4 बजे शाम में रमेश सहारनपुर के लिए निकला।

शाम के 7 बज गए होंगे, मैं नीचे आया। शिल्पी, मनीष, मंजू, नीतू और प्रीति नीचे बैठे हुए थे और आपस में बातें कर रहें थे। मुझे देखते ही सब अपनी जगह से खड़े हो गए।

मैं - बैठो बैठो

मंजू - हाँ आप भी बैठो हमारे बीच

मैं 3 सीट वाली सोफा जिसके दोनों किनारे पर मंजू और नीतू बैठे थे उनके बीच में बैठ गया। मंजू ये देख कर खुश हो गई लेकिन नीतू थोड़ी सहम गई। मैं ये देख रहा था। नीतू ने अभी भी साड़ी पहनी हुई थी ढीली ढीली सी और अपने बड़े बड़े स्तनों को ब्लाउज और उसके ऊपर साड़ी के पल्लू से धका हुआ था फिर भी उसके बूब्स इतने बड़े थे कि मानो बाहर आने को बेताब।

मैं मनीष से - क्यों मनीष आज जिम नहीं जाना

मनीष - नहीं भैया आज संडे को बंद रखता है ओ जिम

मैं (मन ही मन )- मादरचोद बहनचोद इसके सामने ही सबकी चुदाई करनी होगी।

फिर सब से बात हुई जिसमे मैं समझा कि प्रीति पूरे 18 साल की कच्ची कली है जिसने पिछले वर्ष 12वी पास किया। उसके गाँव में कॉलेज नहीं इसलिए पिछले वर्ष ओ कहीं एडमिशन नहीं ले सकी। मेरठ में ओ लोग किसी कॉलेज में उसका एडमिशन कराना चाहते है लेकिन उसके 12 में नंबर काफी कम है और फिर एक साल का गैप भी। कल से ओ लोग कॉलेज में एडमिशन की भाग दौर करेंगे।

इन सब के बीच डिनर का टाइम हो गया। सबने डिनर किया। मैं सोच रहा था आज mai कहा किसके साथ सोऊंगा?

तभी मंजू ने शिल्पी से कहा कि, नीतू दीदी और प्रीति तुम्हारे कमरे में जो डबल बेड है उस पर सो जाएंगी।

लेकिन अब शिल्पी कहा सोएगी, मेरे मन में यह बात दौरी? क्या शिल्पी मंजू के साथ सोएगी? यदि ऐसा हुआ तो मै उन दोनों के बीच या तन्हा छत पर अपने फ्लैट में?

ये सब विचार मेरे मन में चल ही रहें थे तभी शिल्पी बोल पड़ी कि मै जो दूसरा बेड मनीष के रूम में रखा है उस पर सो जाउंगी। मै खुश हुआ। फिर मै और मंजू एक साथ सोए।

मंजू अब मेरी रखैल बन कर रह रही थी। हम दोनों एक साथ सोते और फिर रूटीन में चुदाई का कार्यक्रम चल रहा था। रात में दो बजे मेरी नींद खुली तो मैं शिल्पी के कमरे के सामने से गुज़रा तो मैंने देखा नीतू और प्रीति सो रही है। नाईट बल्ब की आती हल्की हल्की रोशनी में यह साफ दिख रहा था कि प्रीति अपने सलवार कमीज में सोई है और नीतू साड़ी में। ये क्या, नीतू जो साड़ी ढीले तरीके से पहनती थी ओ कहीं कहीं पेटीकोट से अलग हो रखे है जिस वजह से पेटीकोट उसका नजर आ रहा था। साड़ी के हल्के खुल जाने और ढीले होने की वजह से साड़ी ऊपर आ रखा था लगभग घुटनो तक। नीतू काफी ज्यादा गोरी थी लेकिन घुटने से नीचे का जो हिस्सा अभी दिख रहा था ओ कुछ ज्यादा ही नाईट बल्ब की रोशनी में चमक रहा था। पल्लू ब्लाउज का साथ छोड़ बेड पर गिरा हुआ था जिससे उसकी डबलसाइज बूब्स को कैद रखने में ब्लाउज को संघर्ष करना पर रहा था। ब्लाउज पर देखते देखते मेरी नजर पड़ी दोनों बूब्स के बीच जहाँ ब्लाउज के बीच के एक -दो बटन खुले हुए थे। इसे देखकर मन तो हो रहा था कि जैसे अंदर जाऊ और ब्लाउज खोल कर उसके बूब्स को मसल दूँ और सारे दूध पी जाऊ।

इन हसीन दृश्यों को देखते देखते मेरा लंड फिर से टाइट हो गया। मै इन दृश्यों में खो सा गया था। नीतू की हर सांस के साथ उसके बूब्स हिलते जो मेरे होश को उड़ा रहें थे। मै बेखबर नीतू को देखे जा रहा था तभी मुझे अचानक एहसास हुआ कि किसी ने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ा।

नीतू को देखने में मै खोया हुआ था। मेरा लंड उसको देखते देखते टाइट हो कर बड़ा हो गया था तभी मुझे यह एहसास हुआ कि किसी नरम हाथों ने मेरे लंड को पकड़ा। अचानक से नीतू से मेरा ध्यान हटा और मैंने देखा कि मेरे बाजू में मंजू खड़ी है।

हम दोनों बेडरूम में नंगे ही सोए थे और अभी नीतू को हम दोनों नंगे ही सोते हुए देख रहें थे। मैंने मंजू को वही नीचे बैठाया और अपना तना लंड उसके मुँह में डाल दिया। मंजू नीचे बैठ कर पूरे जोश के साथ मेरे लंड को अंदर बाहर करने लगी। मै भी नीतू के बूब्स को देखता हुआ अपने लंड के धक्के की रफ्तार बढ़ाते जा रहा था। ऐसा करते करते मैंने पूरा वीर्य मंजू के मुँह में छोड़ दिया।

अब मेरे ऊपर नीतू का खुमार था और मुझे किसी तरह इस डबल साइज बूब्स का मजा लेना था।

उसी जोश में मैंने मंजू की फिर जोरदार चुदाई की और फिर दोनों निढाल हो कर नंगे ही सो गए। अगले दिन नीतू और प्रीति के साथ कुछ कॉलेजो में एडमिशन के लिए गई लेकिन कम नम्बर और 1साल की गैप की वजह से सभी ने मना कर दिया।

शाम में मै घर आया तो मंजू और शिल्पी ने मुझे यह बात बताई। डिनर के बाद मै मंजू के साथ और बाकी सभी जैसे पिछली रात को सोए थे सो गए।

बेडरूम में मैंने नीतू का टॉपिक स्टार्ट किया।

मै - क्या हुआ नीतू आज उदास थी?

मंजू - हाँ, सब कॉलेज वाले मना कर रहें है एडमिशन के लिए

मै - क्यों

मंजू - नम्बर काफी कम है 12th में

मै - कितने है

मंजू - 40

मै - ओह्ह, जब इतनी कमजोर है फिर एडमिशन क्यों दिलाना चाहते है

मंजू - दीदी का मन है कि उसकी बेटी ग्रेजुएशन कर ले तभी शादी करू

मै - उससे क्या होगा

मंजू - दीदी ने खुद पढ़ाई नहीं की इसलिए ओ अपनी लड़की को पढ़ाना चाहती है

मै - अच्छा और प्रीति का क्या मन है?

मंजू - गाँव में पढ़ नहीं पाती थी, उसका भी मन है पढ़ने का

मै - फिर तो कम नम्बर के साथ मुश्किल है उसका एडमिशन

मंजू - आप देखो ना कुछ उपाय हो जाए

माहौल थोड़ा टेंशन जैसा बन रहा था तो मै उसको नार्मल करते हुए बोला नीतू चाहे तो मै सोच सकता हूँ।

मंजू - दीदी तो चाहती है।

मै - एडमिशन नहीं, नीतू ये चाहे कि मै एडमिशन हो जाए किसी तरह ये सोचू तो मै उपाय ढूंढ सकता हूँ।

मंजू - और ओ कैसे होगा

मै - ओ नीतू समझें।

मंजू - प्लीज

मै - मंजू प्लीज तुम्हे नहीं नीतू को करना है। तुम बस नीतू से यह कह देना कि मुझे किसी भी तरह मना ले तो म एडमिशन करवा दूँगा।

इसके बाद हमारा नाईट का प्रोग्राम चला और सुबह मै छत पर अपने कमरे में चला गया।

अब मुझे इंतजार था कि क्या जो मैंने कहना चाहा, ओ मंजू नीतू से कह पायेगी और क्या नीतू तैयार होगी? यदि नीतू तैयार नहीं हुई और निराश होकर नीतू और प्रीति वापिस चले गए तो?

सुबह 6 बजे मेरे रूटीन में शामिल हो गया नीचे के बेडरूम से ऊपर के बेडरूम में नंगे आना और आ के लेट जाना। फिर 7 बजे शिल्पी आती, उसके साथ आठ बजे तक मजे लेता फिर ओ कॉलेज और मै 10 बजे तक ऑफिस।

आज मै ऑफिस नहीं जाने का सोचा। शिल्पी के जाने के बाद मै उसी तरह नंगे हालत में सोफे पर आकर बैठ गया और टीवी देखने लगा। मंजू और शिल्पी के साथ मेरा रूटीन कुछ ऐसा हो गया था कि डिनर के बाद जो नंगा होता ओ सुबह ऑफिस जाते वक्त ही कपड़े पहनता उससे भी अधिक मजा आता आपके साथ आपका पार्टनर भी नंगी रहती हो और ओ भी अलग अलग पार्टनर।

इस तरह आज का दिन भी था। बस अंतर यह था कि आज मै ऑफिस नहीं जा रहा था सो मैंने कपड़े पहनने की जरूरत नहीं समझी। सोफे पर बैठकर सामने टेबल पर टांग पर टांग रखकर मै मजे के साथ टीवी देख रहा था। लगभग 9 बजे ब्रेकफास्ट के लिए मंजू की कॉल आयी। नीचे नीतू और प्रीति भी थे तो मैंने मंजू से कहा कि ऊपर ही भेज देना और मै आज ऑफिस नहीं जा रहा। नीतू की ख़ूबसूरती और जिस्म पर तो मै फ़िदा था लेकिन नीचे जाने का मेरा मन नहीं हुआ। प्रीति भी थी और दो दो नए माल। मेरा लंड भी मन ही मन सोचने लगा था कि कैसे मौका मिले इनके चुत में प्रवेश का। मैंने एक बात नोटिस कि थी कि नीतू की ब्लाउज थोड़ी छोटी होती थी और बड़े बड़े बूब्स की वजह से ब्लाउज के नीचे से बूब्स का निचला हिस्सा दिख रहा होता जिसे साड़ी का पल्लू छुपा रहा होता।

मेरा ध्यान टीवी देखने में था तभी मुझे किसी के आने की आहट हुई। मुझे लगा ब्रेकफास्ट लेकर मंजू आ रही होगी और मै बेफिक्र होकर नंगे ही टीवी देखता रहा। मेरा ध्यान टीवी की ओर था और गेट की ओर मेरा पीठ था। कोई पीछे से देखे तो यही लगेगा सामान्य रूप से कोई बंदा शॉर्ट्स पहन कर ऊपर नंगा टीवी देख रहा होगा। टीवी देखते हुए मुझे यह एहसास हो गया कि शायद मंजू ब्रेकफास्ट लेकर ऊपर आयी है और वों टेबल पर रखकर मेरे पास आकर मेरे लंड के ऊपर बैठ जाएगी। लेकिन मुझे आवाज आयी सर नमस्ते तो मै चौंक गया। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो पीछे नीतू खड़ी थी। नीतू ने ब्रेकफास्ट टेबल पर रख दिया था और शायद मुझे बताना चाह रही थी ये बात। उसे मेरा शर्टलेस होना शायद अजीब लग रहा था लेकिन मै तो यहाँ बिल्कुल नंगा था। नीतू को देखकर मै भी चौंक गया लेकिन अगले ही पल मैंने खुद को संभाला। मेरे मन में आया जिस हसीना के बूब्स मै दो दिन से आधा अधूरा कुछ खुला कुछ बंद चोरी चोरी देख रहा था आज मौका है उसे अपना लम्बा लंड दिखाने का और यह समझने का ककि वों कितनी देर जा सकती है।

मैंने नीतू के "नमस्ते सर" के जवाब में नमस्ते बोला और कहा-

मै - तुम कैसे, सब ठीक है ना

नीतू - जी

मै - आइये बैठीए।

फिर मै जानबुझ कर नीतू को अपना हल्का तना हुआ लंड दिखाते हुए तेजी से सामने बेड पर रखे टॉवल को उठाया और खुद से लपेट लिया। फिर मै बोला - सॉरी वों मै अकेला ही रहता हूँ इसलिए कई बार नहाने के बाद नंगा ही बाहर आ जाता हूँ फिर ऑफिस के लिए रेडी होता हूँ। आज ऑफिस नहीं जाना था सो ऐसे ही बैठा रहा गया।

नीतू जो मुझे इस हालत में देख कर चौंक गई थी वों मेरे सामने आ कर बैठ गई। मैंने टॉवल को कुछ इस तरह लपेटा कि मै नंगा भी ना कहलाऊ और जिसे जो जब दिखाना चाहूं, दिखा भी सकू।

मै तौलिया लपेट कर सोफे पर बैठा और सामने वाले सोफे पर नीतू बैठ गई। नीतू ने साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के नीचे ब्लाउज में उसके दबे हुए बूब्स जो लगातार बाहर निकलने की कोशिश कर रहें होते और उन्हें देखकर मै नीतू पर मुग्ध हो जाता

नीतू - सर आपके लिए ब्रेकफास्ट लायी हुई।

मै - आज मंजू की जगह तुम लायी।

नीतू - वों अभी मंजू को काम था तो मै सोची मै ही ला देती हूँ।

मै - अच्छा, चलो अब लाए हो तो खाना पड़ेगा। यही खा लेता हूँ। मेरा यह मतलब नीतू समझ गई और ब्रेकफास्ट को सोफे वाली टेबल पर ले आयी।

मै और नीतू अब ब्रेकफास्ट करते हुए बात कर रहें थे।

मै - और बताओ कैसा लगा मेरठ कुछ घुमा फिरा या नहीं

नीतू - घुमा फिरा तो नहीं और जो काम था शायद वों नहीं हुआ तो 1-2 दिन में वापिस जाना होगा।

मै - क्या काम नहीं हुआ

नीतू - वों आपको तो शायद पता होगा गांव में कोई कॉलेज नहीं है और मेरा मन था कि प्रीति का एडमिशन ग्रेजुएशन में यही करा दूँ।

मै - हाँ तो बहुत कॉलेज है यहाँ, करा दो।

नीतू - जी 1 साल का गैप और कम नंबर की वजह से नहीं हो पा रहा।

मै - अच्छा और कोई उपाय है

नीतू - आप कुछ करवा देते, किसी तरह एडमिशन हो जाता तो बहुत कृपा होती आपकी।

मै - तुम चाहो तो मै कोशिश कर सकता हूँ लेकिन हो पाएगा या नहीं अभी बता नहीं सकता।इधर मैंने अपना ब्रेकफास्ट भी खत्म किया और हाथ धोने के लिए बेसिन की ओर बढ़ा।

उधर मैंने देखा नीतू ने प्लेट्स उठाएं और जाकर किचन में धोने लगी। शुरुआत में कुछ दिन मैंने प्लेट्स धोये थे अपने लेकिन अब मंजू ही करती थी सबकुछ और आज नीतू। मै मन ही मन खुश हुआ और सोचने लगा इसके साथ कैसे आगे बढ़ा जाए

मै भी वापिस आकर सोफे पर बैठ गया और अपने कमर पर तौलिए थोड़ी ढीली की। तौलिए को लपेटे मै टीवी देख रहा था और सोच रहा था कि नीतू अब क्या कहेगी तभी नीतू मेरे सोफे के पास आके नीचे बैठ गई और बोली की प्लीज मै यहाँ किसी को जानती नहीं, आपसे ही उम्मीद है। रमेश जी की भी नौकरी आपने ही लगवाई है और आप चाहेंगे तो मेरी प्रीति का भी एडमिशन हो जाएगा।

मैं नीतू की ओर मुड़ा और अपने दोनों हाथों से उसके दोनों कंधो को पकड़ा और उठाने की कोशिश की। उसने भी साथ दिया और वों उठी तो मैंने उसको सोफे पर अपने पास बिठाया और पूछा - इतनी क्या बेचैनी है कि एडमिशन हो ही जाए।

नीतू - जरूरी है इसका एडमिशन। शादी से पहले कुछ अच्छी पढ़ाई हो जाएगी। घर से लड़कर लायी हूँ मै इसे। वहाँ कोई राजी नहीं था, अब मै किस मुँह से वापिस जाउंगी और वहाँ जाते ही सब इसकी शादी करवा देंगे।

मै - शादी तो करवानी है ना

नीतू - अभी 18 की हुई है ये पिछले महीने। इतनी जल्दी शादी नहीं करवानी मुझे

मै - अच्छा तो एडमिशन हो गया तो शादी नहीं करवानी पड़ेगी।

नीतू - जब तक पड़ेगी, तब तक थोड़ी उम्र हो जाएगी शादी के लिए।

इन बातों के क्रम में नीतू की आँखों से आंसू आ गए जो वों मुझसे छुपा रही थी लेकिन मैंने देख लिया। इन्ही बातों के बीच मेरा एक हाथ उसके कंधे की ओर गया और मैंने उसे हल्का अपनी ओर खींचा। नीतू के लिए मै पराया मर्द था और मेरे इस तरह अपनी ओर खींचने से वों चौंक गई।

नीतू को मैंने अपनी ओर खींचा। इससे वों थोड़ी चौकी लेकिन मेरी कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। मैं जबरदस्ती नहीं नीतू को तैयार कर उसके साथ सेक्स करना चाहता था।

मेरे द्वारा अपनी ओर खींचने से अब मैं और नीतू लगभग साथ साथ सोफे पर बैठे थे। नीतू की सांस तेज तेज चल रही थी जिससे उसके बूब्स हिल रहें थे और वों हिलते बूब्स मेरे लंड को टॉनिक देने का काम कर रहें थे। मेरा लंड पूरा तन के खड़ा था टॉवल के नीचे तम्बू बनाएं।

शायद यही उधेड़बुन नीतू के दिमाग में चल रही थी। वों मेरे पास मजबूरी में आ रही थी या मेरे पास आना नहीं चाहती थी मैं यह सोच ही रहा था कि नीतू बोल पड़ी।

नीतू - प्लीज सर आप करा दोगे एडमिशन

मैं - तुम साथ रहो तो पूरी कोशिश करूंगा।

ऐसा कहते हुए मैंने नीतू के जाँघ पर हाथ रखा और धीमी गति से नीचे की ओर घुटने तक सरकाया। नीतू कुछ नहीं बोली। मैंने फिर नीतू के हाथ को उठाकर अपने दोनों हाथों के बीच रखा और उसकी ओर मुड़ के पूछा - बोलों साथ रहोगी ना?

नीतू - मैं एडमिशन करा के गांव चली जाउंगी।

मैं - ठीक है तुम सबसे कह देना कि एडमिशन की बात चल रही है और जब तक मैं ना कहूँ तुम किसी को कुछ मत बताना।

नीतू - जी लेकिन एडमिशन हो जाएगा ना।

मैं - हाँ हो जाएगा।

नीतू खुश हो गई और उसने अपनी आँखे बंद कर ली। मैंने उसके माथे पर किस किया। मैं उसके होंठो से अपने होंठो को किस करना चाहा लेकिन वों सही से नहीं कर पा रही थी।

मैंने उसे सोफा पर बैठे रहने दिया और उसके सामने जा के पल्लू को नीचे गिरा दिया। पल्लू के गिरते ही अद्धभुत मादक नज़ारा मेरे सामने था। मेरे द्वारा पल्लू नीचे गिराते ही उसकी बेचैनी बढ़ गई। जिसकी वजह से उसके साँसे तेज चल रही थी और उतनी ही तेज था बूब्स का ऊपर नीचे होना। मैंने नीतू के ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खोल दिए जिससे उसके आधे बूब्स बाहर को आ गए। फिर मैं उसी हालत में उसको गर्दन के पास किस और चूमने लगा। गर्दन से चूमते चूमते मैं जैसे ही उसकी बूब्स के ऊपरी हिस्से तक पहुंचने ही वाला था कि वों सोफे से उठ गई और मेरे सामने हाथ जोड़ कर बोली - प्लीज सर, मेरा पति है। मैं आपके साथ कुछ नहीं कर पाउंगी।

मैं इससे पहले ही उसको रोकता, कुछ समझाने की कोशिश करता नीतू तेजी से नीचे जाने लगी। मैं मन मसोस कर रह गया।​
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