Update 02
अगले दिन मैं थोड़ा लेट उठा और नहा-धो कर तैयार हो गया और चाय पीने पहुँचा| रसोई में सिर्फ अम्मा और शीला भाभी ही थी| बाकी सब कुछ न कुछ काम से चले गए थे| नीतू ने मुझे चाय ला कर दी और कॉलेज जाने की बात याद दिलाते हुए इशारा किया| इधर मैं इस फिराक में था की कैसे नेहा को कॉलेज ले जाने की बात शुरू करूँ| चाय की पहली चुस्की लेते ही मुझे एक उपाय सूझ गया;
“अम्मा... वो कॉलेज के मास्टर साहब को न्योता पहुँच गया क्या?" मैंने बात शुरू की| "नहीं बेटा...तेरा और तेरा पिताजी का इंतजार कर-कर के इतनी देर हो गई की आज से सब जगह न्योता जाना शुरू हुआ है| तेरे बप्पा और भैया सुबह जल्दी निकले हैं न्योता देने|" मैं थोड़ा सोचने का नाटक करने लगे और फिर चाय की अगली चुस्की भरते हुए बोलै; "अम्मा.. तो मैं दे आऊँ उन्हें न्योता?" अम्मा बोली; "ठीक है... तू दे आ|" अब मेरी बारी थी नीतू को साथ ले जाने की बात करने की| "अम्मा नीतू को साथ ले जाऊँ?" मैंने सवाल तो छोड़ दिया था और जानता था की जवाब में भी एक और सवाल पूछा जायेगा| "ये वहाँ क्या करेगी? शादी-व्याह का घर है और ऐसे में लड़की जात का यूँ बाहर घूमना ठीक नहीं|" अम्मा के सवाल का जवाब मैं देना जानता था; "अम्मा मास्टर साहब मुझे जानते नहीं हैं और ऐसे में अगर नीतू साथ हुई तो आसानी होगी| और फिर हम दोनों को आने जाने में पोना घंटा ही लगेगा| जल्दी आ जायेंगे|" अम्मा के हाव-भाव देख कर लग रहा था की उन्होंने ना ही करनी है की तभी शीला भाभी बोल पड़ी; "जाने दो ना अम्मा| अपने चाचा के साथ ही तो जा रही है और फिर कॉलेज कौनसा दूर है? ये तो रहा ... घर से दिख जाता है|" ये सुन कर आखिर कर अम्मा ने जाने की अनुमति दे दी| (हमारे घर से कॉलेज साफ़ नजर आता था|)
नीतू जाने की बात सुन कर बहुत खुश हुई और हम दोनों घर से कॉलेज की ओर चल पड़े| कॉलेज का रास्ता खेतों में से हो कर जाता था और आधे रास्ते में वहाँ एक छोटा सा बाग़ भी था जहाँ आम के २-४ पेड़ लगे थे| गर्मी से राहत पाने के लिए लोग कई बार यहाँ रूक के साँस लेते थे| उस बाग़ को देख नीतू बोली; "चाचू... याद है उस पेड़ पर आप चढ़ कर आम तोडा करते थे?" ये सुन मुझे वो दिन याद आने लगे और हम दोनों उसी पेड़ के नीचे खड़े हो कर बातें याद करने लगे| 5 मिनट बाद हम वहाँ से चल दिए और कॉलेज पहुँचे, वहाँ जो मैंने देखा उसे देख मैं हैरान रह गया| कक्षा के बाहर लड़के खड़े हो कर सिगरेट फूँक रहे थे| एक कक्षा के अंदर कोई भी नहीं था बस कोने में एक युगल जोड़ा जो की लगभग नीतू की उम्र के होंगे एक दूसरे से चिपटे हुए चुम्मा-चाटी कर रहे थे| ये सब देख मैंने नीतू की तरफ देखा तो वो मेरी तरफ ही देख रही थी पर मैं समझ नहीं पा रहा था की उसके मन में क्या चल रहा है? मैं थोड़ा जल्दी चलने लगा क्योंकि ये सब देख मेरे लंड में कुछ होने लगा था और मैं नहीं चाहता की वो अकड़ जाए और नीतू के सामने मुझे शर्म आये| हम जल्दी से मास्टर साहब के कमरे में पहुँचे और उन्हें न्योता दिया और तुरंत ही वहाँ से निकल पड़े| कॉलेज से थोड़ा दूर आने पर मैंने नीतू से पूछा; "ये सब होता है तुम्हारे कॉलेज में?" मेरा सवाल सुन नीतू का सर झुक गया| "कहीं तुम भी तो?" मैंने पूरी बात नहीं बोली पर नजाने नीतू को क्या ठेस लगी वो एक दम से बोली; "कभी नहीं चाचू.... मैं तो आपको...." बस इतना बोल कर वो चुप हो गई, पर मेरे लिए अब ये बात जानना आवश्यक हो गया था| "आपको...मतलब?" नीतू सर झुका कर कुछ सोचने लगी और फिर बोली; "चाचू ...आपको इतना मानती हूँ की मैं इन चक्करों में कभी नहीं पड़ी| आपने इतनी मुश्किल से मेरा कॉलेज में दाखिला कराया और मैं इन चक्करों में पढ़ कर आपके सपनों को ख़राब नहीं करना चाहती थी|" ये सुन मुझे विश्वास हो गया की मेरी भतीजी बहुत समझदार है| हम बाग़ के पास पहुँच ही थे की नीतू बोली; "चाचू मुझे....जाना है|" ये सुन पहले तो मैं सोचने लगा की उसे कहाँ जाना है, फिर याद आया की उसे पेशाब लगी है| "ठीक है ... उधर झाड़ी के पास... मैं वहाँ पेड़ के पास बैठा हूँ|" ये बोल मैं थोड़ा दूर आम के पेड़ के पास दूसरी तरफ मुंह कर खड़ा हो गया और मोबाइल में गेम खेलने लगा| अगले ही पल मुझे एक जोरदार सीटी की आवाज सुनाई दी....
ये सीटी थी नीतू के मूतने की| मुझे लगा वो दूर जा कर मूत रही होगी पर वो मेरे से करीब दस कदम दूर ही झाडी में बैठी मूत रही थी| आवाज सुन में समझ तो गया ही था की ये किसकी आवाज है पर मैं पलट नहीं सकता था| 2 मिनट बाद जब नीतू लौटी तो मैंने उसे थोड़ा गुस्से में बोला; "मैंने आपको उधर दूर झाडी के पास बोला था ना? फिर मेरे इतने नजदीक काने में शर्म नहीं आई?" मेरा गुस्सा देख नीतू ठिठक गई और सर झुका कर बोली; "चाचू... वो .... वहाँ किसी ने हग (टट्टी) रखा था... इसलिए...." ये सुन मैं थोड़ा शांत हुआ और कहा; "तो बेटा कहीं और दूर चले जाते|" अब नीतू सामान्य हो बोली; "पर चाचू आप से कैसी शर्म? आपने तो बचपन में मुझे देखा है ना?" "बदमाश... तब आप छोटे थे| अब आप बड़े हो गए हो.. शादी हो रही है आपकी| चलो छोडो ... और दुबारा ऐसी गलती मत करना|" इतना कह हम दोनों घर लौट आये|
घर पहुँच के मुझे शीला भाभी कुऍं से पानी भरती नजर आई| मेरी ओर देख उन्होंने कटीली मुस्कान दी पर मेरे मन में रात गुस्सा अभी भी था तो मैंने उनको ज्यादा तवज्जो नहीं दी| मैं और नीतू ने सीधे अम्मा के पास जा कर हाज़री लगाईं; "अरे, तुम दोनों इतनी जल्दी लौट आये?" अम्मा ने उत्सुकता वश पूछा| "हाँ अम्मा..." मैं आगे कुछ कहने ही वाला था की अम्मा बोल पड़ी; "अच्छा मुनना सुन, अपनी भाभी को दवाखाने ले जा|" ये सुन कर मैं अचंभित हो गया क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैंने देखा था| "पर उन्हें क्या हुआ? अच्छी-भली तो हैं|" मैंने थोड़ा गुस्से में कहा क्योंकि मुझे लगा ये भाभी का कोई नया ड्रामा होगा| "वो तुझे नहीं बता सकते| तू इसे बस बाजार ले जा ये अपने आप बात कर लेगी|" अम्मा तो थोड़ा झेंपते हुए बोला| पर भाभी ने बोल पड़ी; "अम्मा कोई बात नहीं आज नहीं तो कल मुनना को भी ये सब पता ही चल जायेगा| आखिर उसकी भी तो शादी होगी!" ये बात भाभी ने एक अलग अंदाज में कही, जैसे की वो मुझे चिढ़ा रही हो| "हम्म्म... ये तो सही है कहा तूने| बेटा तेरी भाभी को सफ़ेद पानी की शिकायत है|" ये सब बड़की अम्मा के मुख से सुन बुरी तरह झेंप गया और मुझे अब भाभी का चिढ़ाने का अंदाज समझा आया| पर ये सब सुन कर मैं भी चिंतित हो गया, क्योंकि भले ही उनसे नाराज रहता था पर उनकी सेहत की परवाह भी सब से ज्यादा करता था| मैंने गंभीर आवाज में भाभी से कहा; "चलो भाभी... आप तैयार हो जाओ| मैं जाके साइकल निकालता हूँ|" साडी बदल भाभी आ गेन और मैं उन्हें सायकल पर पीछे बिठा कर चल दिया| मेरे चेहरे पर अब भी गंभीरता थी और अंदर ही अंदर मैं उनके लिए परेशान भी था| गाँव से थोड़ा दूर पहुँच कर भाभी बोली; "क्या बात है मुनना सुबह तो इतना गुस्सा थे और अब देखो मेरी चिंता में आधे हुए जा रहे हो? अब भी कहोगे की मुझसे प्यार नहीं करते?"
"चिंता करने का मतलब ये तो नहीं की आपसे प्यार करता हूँ... हाँ परवाह करता हूँ आपकी| गुस्सा होता हूँ पर सबसे ज्यादा चिंता भी आप की ही करता हूँ|" मैंने जवाब दिया|
"देखो इतनी चिंता करने वाले को भी मैं खुश नहीं कर पाती| धिक्कार है मुझ पर!" भाभी ने अपने को कोसते हुए कहा| "जो हुआ उसमें आपकी गलती नहीं थी.... अब बुढ़ापा होता ही ऐसा है!" मैंने ये बात कह कर थोड़ी चुटकी ली| "अच्छा ? मैं बूढी हो गई हूँ?" भाभी ने थोड़ा चिढ कर कहा| "कल रात आप ही ने तो कहा था!" मैंने उन्हें चिढ़ाने के लिए थोड़ी और आग लगा दी| "अच्छा? आज बताती हूँ की कितनी बूढी हो गई हूँ! आज तुम्हारा तेल ना निकाल दिया तो कहना!" भाभी ने बिदक के कहा| "अरे भाभी मैं तो मजाक कर रहा था, आप खामखा गुस्सा हो गए| अभी आपकी तबियत ठीक नहीं है, पहले ठीक हो जाओ फिर चाहे मुझे जिन्दा खा जाना| पर जब तक पूरी तरह ठीक नहीं होते तब तक शांत रहो|" ये सुनकर भाभी थोड़ी शांत हुई और हम हंसी-मजाक करते हुए शहर पहुँचे| दवाखाने के सामने पहुँच भाभी ने मुझे वहीँ रुकने को कहा और खुद अंदर चली गई| दवाखाने के बाहर औरतों के इलाज की अलग लाइन थी और मर्दों की दूसरी तरफ थी| मैंने देखा भाभी लाइन में नहीं लगीं बल्कि सीधा अंदर चली गईं| मुझे लगा भाभी बड़ी दबंग हैं! 5 मिनट में ही वो बहार आ गईं और उनके हाथ में कुछ भी नहीं दिख रहा था, न दवाई न कोई परचा! मैं सोच में पद गया की ये यहाँ करने क्या आई थीं? तभी वो मेरे पास आईं और बोलीं, "मुनना एक बोतल पानी ला दो|" मैंने सायकल स्टैंड पर कड़ी की और जा के पानी की बोतल खरीद लाया| तभी भाभी ने अपने ब्लाउज के अंदर हाथ डाला और मैंने अपनी आँखें फेर लीं| ये देख भाभी हँस दी और बोली; "आँखें क्यों फेर ली?" "तो क्या घुस जाऊँ उधर?" मैंने झूठा गुस्सा दिखते हुए कहा| ये सुन भाभी खिलखिलाकर हँस पड़ी और आने जाने वालों की नजर हम पर टिक गई|
खेर भाभी ने अपने ब्लाउज में से अपना बटुआ निकाला और उसमें एक दवाई का पत्ता था जिसकी एक गोली उन्होंने मेरे सामने पानी से खा ली| मुझे लगा की डॉक्टर ने दवाई दी होगी| दवाई खा कर भाभी ने मुझे घर जाने के लिए कच्चा रास्ता लेने को कहा, जब मैंने वजह जननी चाही तो वो बोलीं की उन्हें किसी से मिल कर शादी का न्योता देना है| मैंने भाभी की बात मान ली और हम कच्चे रस्ते के लिए मुख्य सड़क से उतर आये| दोपहर के दो बजे होंगे और धुप में मैं और भाभी हँसते-मुस्कुराते हुए बात किये जा रहे थे की तभी अचानक भाभी बोली; "मुनना... सायकल रोक!" भाभी की आवाज में कुछ अजीब था और मेरा ध्यान उनकी आवाज समझने में लग गया की तभी भाभी फिर बोली; "रोक....रोक ना|" मैंने सायकल रोक दी और उतर के पीछे मुड़ा; "क्या हुआ भाभी? सब ठीक तो है?" भाभी के चेहरे पर अजब सी मुस्कराहट फ़ैल गई और वो बोली; "मेरे साथ चल|" और मेरा हाथ खींच के रास्ते के किनारे एक बाग़ की तरफ जाने लगी| "अरे पर ले कर कहाँ जा रही हो ?" मैंने फिर से पूछा पर वो कुछ नहीं बोली| ये देख मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे थे| मैं समझ गया था की ये जर्रूर कल रात का अधूरा काम ख़तम करने मुझे ले जा रही हूँ और मन ही मन मैं ठान चूका था की इनकी बीमारी के चलते मैं इन्हें छूने वाला भी नहीं हूँ| बाग़ के अंदर एक तरफ एक आधा कटा हुआ पेड़ था और झाड़ियाँ भी थी, वहाँ पहुँच कर शीला भाभी रूक गई और अपनी बढ़ी हुई साँसों को थामते हुए बोली; "कल रात मैंने अपने सजना को बहुत आहात किया था|" मैंने भाभी की बात वहीँ काट दी; "ठीक है... पर इस सब की कोई जर्रूरत नहीं है| अभी आप बीमार हो, पहले ठीक हो जाओ फिर ...|" मैंने बात पूरी नहीं की पर ये सुन कर भाभी हंसने लगी| उनकी हंसी देख मुझे समझते देर नहीं लगी की ये बिमारी-वीमारी कुछ नहीं बल्कि ढोंग था उनका| मैंने अपने माथे पर हाथ मरते हुए बोला; "तो ये सब आपने ड्रामा खेला था?" मेरी बात सुन उनका सर झुक गया था और मेरा पारा चढ़ने लगा था| "यहाँ मैं खुद को मन ही मन गालियाँ दे रहा था की मैंने आपके साथ कल रात इतना बुरा व्यवहार किया और आप यहाँ ...." मैंने बात अधूरी छोड़ दी और भाभी की तरफ देखना बंद कर दिया था और उनसे नजरें फेरे खड़ा था| तभी भाभी बोली; "मैंने ये सब तुम्हारे लिए किया| कल रात मैंने तुम्हें अतृप्त छोड़ दिया था और तब से मैं खुद को माफ़ नहीं कर पा रही थी| सुबह जब तुमने मेरी तरफ देखना भी ठीक नहीं समझा तो मैंने सोच लिया की मुझे क्या करना है| मैंने दवाखाने से दवाई ली और ....." दवाई का नाम सुन मेरे कान खड़े हगो गए थे| "कैसी दवाई?" मैंने पूछा तो जवाब में वो बोली; "जोश बढ़ने वाली| आज मैंनेतुम्हेँ छका न दिया तो कहना?" मैं मन ही मन सोच में पढ़ गया की ऐसी दवाइयाँ तो मर्दों के लिए होती हैं, भला औरतों को इसकी क्या जर्रूरत? इधर भाभी के तपते जिस्म ने उनकी हरकतों को मजबूर कर दिया था| भाभी ने अपना हाथ मेरे लंड पर रखा और पैंट के ऊपर से दबाने लगी| "ये क्या कर रही हो? पागल हो क्या? यहाँ खुले में? कोई देख लेगा तो?" मैंने उनके हाथों की पकड़ से अपने लंड को आजाद करते हुए कहा| एक बात मैंने गौर की वो ये की भाभी की सांसें भारी हो चली थीं और ये साफ़ था की भाभी के ऊपर दवाई का असर दिखने लगा था| भाभी ने गुस्से से मेरी कमीज के कालर पकड़ते हुए बोली; "डर गए.. की कहीं आज तुम्हारी सिटी-पित्ती गुल्ल हो गई तो? कहीं आज तुम्हारा ये औजार कमजोर पड़ गया तो?"
ये शब्द सुन कर तो नामर्द के लंड में भी अकड़न आ जाए मैं तो फिर भी मर्द था! म आईने भाभी की कमर में हाथ डाला और उन्हें अपने नजदीक खींच लिया और उनके थिरकते होटों पर अपने होंठ रख दिए| उनके नीचे वाले होंठ को मैंने अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| इधर भाभी ने भी अपने दोनों हाथों से मेरे सिर के पीछे बालों में चलना शुरू कर दिया था| उनकी नाखून मेरे सिर में एक अजीब सा एहसास करा रहे थे| मैंने नीचले होंठ को छोड़ के उनके ऊपरी होंठ को अपने मुँह में दबोच लिया और चूसने लगा|भाभी की उत्तेजना अब उफान मारने लगी थी, शायद ये दवाई का असर था|उनके हाथों ने मेरे लंड पर पकड़ बनानी शुरू कर दी थी, उँगलियाँ मेरी पैंट की ज़िप पर घूमने लगी और उन्होंने जल्द ही मेरी पैंट की कैद से मेरे लंड को आजाद कर दिया| जी भर के भाभी के होंठों का रसपान करने के बाद जब मैंने उन्हें आजाद किया तो देखा की भाभी की सांसें धोकनी की तरह चल रही थीं| मुझे समझते देर न लगी की भाभी की कामाग्नि उन्हें जला रही है| मैंने आस-पास देखने लगा की लेटने का कुछ जुगाड़ हो सके| तभी भाभी ने उस आधे कटे हुए पेड़ की तरफ इशारा किया| मैंने अपनी पैंट उतारी और मैं उस कटे हुए पेड़ के तने के ऊपर लेट गया| मेरी सिर्फ कमर और थोड़ी सी पीठ ही उस तने पर थी बाकी का शरीर हवा में था जो मेरी टांगों के सहारे था| भाभी ने अपनी साडी और पेटीकोट ऊपर किया और मेरी कमर के ऊपर आ गईं और लंड को अपनी पनियाई हुई बुर के ऊपर सेट किया और धीरे-धीरे लंड पर बैठने लगीं| उनकी बुर अंदर से बुरी तरह गीली थी| लंड पूरा अंदर जा चूका था और भाभी के चेहरे पर संतुष्टि के भाव झलकने लगे थे| भाभी ने ऊपर-नीचे होना शुरू किया और मैंने महसूस किया की जब भाभी ऊपर उठती तो उनकी बुर अंदर से मेरे लंड को जकड़ने लगती, जैसे की मेरे लंड को निचोड़ना चाहती हो| भाभी की गति बहुत बढ़ चुकी थी और उनके मुख से आनंदमई सुर आने लगे थे; "सससस....उम्मम्मम.... आआह......आनमममम" इधर मुझे भी बहुत आननद आ रहा था| मेरी नजरें भाभी के ब्लाउज में कैद चुचों को आनंद लेने में व्यस्त थीं जो भाभी की रफ़्तार से लय बांधने लगे थे और ऊपर-नीचे हिलने लगे थे| पर जब भाभी लंड पर नीचे आती तो मेरी कमर में पेड़ की लकड़ी चुभने लगती| मैंने भाभी को रोकना चाहा पर तभी भाभी जोर से झड़ने लगीं और उनके बुर का सारा रस मेरे लंड के साथ बहता बहता बाहर आने लगा पर भाभी थी की रुकने का नाम नहीं ले रही थी| जबतक उनके अंदर रस की सारी धार बाहर नहीं बाह गई वो ऊपर-नीचे कूदती रही| आखिर कार थक कर वो रुकीं और मेरे ऊपर से हट गईं| भाभी की सांसें बहुत तेजी से चल रही थी और उनकी प्यास आँखों से बयान हो रखी थी| मैंने उनको एक पेड़ के पास खड़ा किया उनकी दायीं टांग को उठाया और पीछे से अपना लंड अंदर पेल दिया| लंड फिसलता हुआ अंदर घुस गया| अब मेरे अंदर के ट्रक ने पूरी हार्सपावर से काम करना शुरू कर दिया था| मैंने बहुत तेज-तेज झटके मारना शुरू कर दिया था और गति कुछ इस कदर बढ़ चुकी थी कली भाभी को खुद को गिरणसे से सँभालने के लिए पेड़ का सहारा लेना पड़ा| उनके मुख से लगातार चींखें निकलने लगी थी; आआह.....न्नन्न....ममममम.....ससससस.....हाय...ह्ह्हम्मम्मम्म ....मममममम ...." ये तो शुक्र था की बाग़ के आस पास कोई गाँव-घर नहीं था वर्ण आज वहां जमावड़ा लग जाता| मेरी रगों में जोश बढ़ने लगा था और मेरी चुदाई की रफ़्तार पूरे चरम पर थी| ३-४ धक्के और भाभी फिर से झड़ गईं और हाफने लगीं| भाभी की बुर का रास उनकी बुर से निकल कर थाई से होता हुआ नीचे बहने लगा| पर मैं अब भी संतुष्ट नहीं था, इतने समय बात छूट मिली थी की क्या बताऊँ!
भाभी मेरी तरफ पलटीं और मेरे मन में ख्याल आया की ये जर्रूर अब बोलेंगी की मैं थक गई हूँ| पर हुआ उससे उलट! "सससस....मु...नननन...अअअ.... खड़े-खड़े मैं थक गईं हूँ अब मुझे लेटने दे| मैं थोड़ा हैरान हुआ पर चुदाई का भूत सर पर सवार था तो ज्यादा ध्यान नहीं गया| अब भाभी उस कटे हुए पेड़ के तने पर पीठ के बल लेट गईं और मैंने उनकी दोनों टांगें खोलीं और बीच में आ गया| एक झटके में लैंड अंदर पेल दिया और थोड़ी बेरहमी दिखते हुए उन्हें चोदने लगा| जैसे ही मैं लंड अंदर पेलता भाभी के चुचे ऊपर को उछाल जाते और जब बाहर निकालता तो वो नीचे को वापस आ जाते| मुझसे उनके ये छलते हुए चुचों को ब्लाउज में कैद देखना मुश्किल हो रहा था सो मैंने भाभी के ब्लाउज का हुक खोल दिया और पाया की भाभी ने ब्रा नहीं पहनी थी| यानी आज भाभी पूरी तैयारी कर के आई थी चुदाई की| मैंने अपने दोनों हाथों से भाभी के चुचों को थामा और दबाना शुरू किया| मैंने उन पर इस कदर पकड़ बना ली थी की वो अब मेरे धक्कों के प्रभाव से उछाल नहीं पा रहे थे| इधर भाभी के मुंह से सिर्फ सिसकारियां ही फुट रही थीं| १५ मिनट की म्हणत और की, कि तभी भाभी को मेरे चेहरे पर संतुष्ट होने के भाव नजर आने लगे| मतलब की मैं झड़ने वाला था और भाभी जानती थी की मैं हमेशा अपना वीर्य बाहर निकालता था| पर इससे पहले की मैं लंड बाहर निकालता भाभी ने अपनी दोनों टांगों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द कास लिया और बोलीं; "अंदर छोड़ दो... मैंने गर्भ निरोधक गोली खरीदी है|" ये सुन कर मैंने अपना लंड बाहर नहीं खींचा और ४-५ धक्के मारता हुआ उनके भीतर ही झड़ गया| मेरे रस के साथ-साथ भाभी ने फिर से अपना रस छोड़ दिया और वो भी संतुष्ट हो कर मुझसे लिपट गईं|
जब दिलों में उमड़ रहा तूफ़ान थमा तो हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए| दिलों की गति सामान्य हो छुकि थी और सांसें मद्धम| मैं भाभी के ऊपर से उठा और मेरा लंड फिसलता हुआ उनकी बुर से बाहर आ गया| साथ ही उनकी बुर से मेरे वीर्य की एक धार भी बाह निकली जिसे उनकी बुर पी न पाई थी| मैं खड़ा हो के अपनी पैंट उठाने लगा तो भाभी ने मुझे रोक लिया और मेरा हाथ पकड़ के अपने पास बुलाया| फिर मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ा और उसकी ऊपरी चमड़ी को पीछे खिसका कर सुपाडे को मुंह में भर कर जीभ से साफ़ करने लगी|पूरा लंड अच्छे से साफ़ करने के बाद उन्होंने मेरे लंड को आजाद कर दिया| मैंने अपनी पेंट पहनी और कमीज ठीक करने लगा| इधर भाभी ने भी अपनी साडी ठीक की, ब्लाउज के हुक लगते समय मुझे दिखते हुए बोली; "तुम सच्ची बहुत बेरहम हो! देखो कितना दर्द कर रहे हैं ये!" मैं मुस्कुरा दिया और जैसे ही बाग़ से बहार आने के लिए मुदा की भाभी ने मुझे रोक लिया और आकर मेरे सीने से लग गईं और बोलीं; "मुझे माफ़ कर दो|" "भाभी जो आपने अभी मेरे लिए किया उसके बाद माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं है| आपने मेरी महीनों की प्यास बुझा दी अब इसके बाद माफ़ी-वाफी की कोई जर्रूरत नहीं|" इसके बाद हम दोनों अलग हुए और साथ ही बाग़ से बाहर आये और मैं पहले साईकल पर बैठ गया और फिर भाभी बैठ गईं| भाभी बोली; "मुनना तुम्हारी पूरी कमीज भीग गई है!" "अब क्या करूँ... इतनी मेहनत जो करवाती हो तुम|" मैंने हँसते हुए जवाब दिया| अच्छा भाभी एक बात बताओ, इस गोली ने तो सच में आप के भीतर इतना जोश भर दिया था जैसा मैंने कभी नहीं देखा| इतना जोश तो आपके अंदर पहले भी नहीं था! अगर पुरूषों के लिए ऐसी गोली होती तो....." भाभी ये सुनकर एक दम से बोल पड़ी: "न बाबा ना... तुम गलती से भी मत खाना ये गोली| बिना गोली खाये तो तुमने मेरा तेल निकाल दिया अगर गोली खा ली तो मेरी बुर के साथ-साथ पड़ोसन भी फाड़ के रख दोगे|" ये सुन मैं ठहाके लगा के हंस पड़ा और हम हँसते बात करते हुए हम घर लौट आये| घर पर नीतू खाना बना चुकी थी और सब लोग खा भी चुके थे केवल हम ही बचे थे| खाना खा कर मैं भाभी और नीतू मेरे घर पर आ गए और वहां अलग-अलग चारपाइयों पर लेट गए और बातें शुरू हो गईं| नीतू बोली; "माँ आप चाचू से बहुत प्यार करती हो ना?" नीतू के सवाल ने तो मेरे होश उड़ा दिया पर भाभी ने इसका जवाब यूँ दिया; "हाँ बहुत प्यार करती हूँ मैं तेरे चाचू से! और क्यों न करूँ... तेरे पैदा होने के बाद तेरे चाचू ने मेरा इतना ख़याल रखा| सिर्फ एक ये थे जो मेरे बीमार होने पर मेरी इतनी तीमारदारी करते थे| तू जब बीमार होती थी तो अपनी पढ़ाई तक छोड़ के आ जाते थे|" ये सुन कर मैं कुछ नहीं बोलै बस आँखें बंद किये चुप-चाप लेटा रहा और ऐसे जाहिर किया जैसे मैं सो रहा हूँ| पर तभी नीतू ने मुझ पर सवाल दागा; "चाचू आप भी माँ को प्यार करते हो?" ये सुन कर मैंने थोड़ा गुस्सा दिखते हुए कहा; "नीतू... आप बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हो!" अब भाभी चुटकी लेते हुए बोली; "अरे तो गलत क्या है? बड़ी हो गई है नीतू और शादी होने जा रही है इसकी!" "पर इसका मतलब ये नहीं की ये भूल जाए की ये किस्से बात कर रही है? आप इसकी माँ हो और मैं चाचा! इसे पता होना चाहिए की अपनों से बड़ों से इस प्रकार बात नहीं करते|" मैंने ये बात थोड़ा डांटते हुए कही| पर भाभी आज बहुत चुटकी लेने के मूड में थी सो नीतू का बचाव करते हुए बोलीं; "रहने दे नीतू... तेरे चाचू थके हुए हैं.....बहुत मेहनत की है इन्होने|" ये बोलने के बाद वो 1 सेकंड के लिए चुप हो गई और फिर बोलीं; "मुझे साईकिल पर बिठा के ले गए थे और फिर वापस लाये हैं| थकना तो लाजमी है!" मैं समझ गया था की उनका मतलब क्या है पर फिर भी शांत रहा| करीब आधा घंटा आँख लगी होगी की मुझे चारपाई की चरमराहट सुनाई दी| उठ कर देखा तो नीतू मेरी तरफ देख रही थी और मुस्कुरा रही थी| उसकी ये मुस्कराहट मुझे अजीब लगी पर मैंने कुछ कहा नहीं और उठ कर बाहर चला गया| बाहर आ कर देखा तो रमाकांत भैया मेरी ही तरफ आ रहे थे| वो मुझे बड़े बप्पा के पास ले गए हम सब बैठ कर शादी की तैयारियों की बातें कर रहे थे| मुझे अगले दिन कुछ लोगों को न्योता और कैटरिंग वालों से मिलने जाना था| तो मैंने अगले दिन की साड़ी प्लानिंग कर ली की कितने बजे निकलना है, कहाँ पहले जाना है आदि| शाम को सबने बैठ कर चाय पी और बातें चलने लगी| बड़े बप्पा पिताजी को बहुत याद कर रहे थे, तो मैंने उनकी बात पिताजी से करा दी| रात को खाना खा कर मैं अपने घर लौट आया और दरवाजा बंद कर मैं लेट गया| मैं जानता था की आज भाभी नहीं आने वाली हैं पर भाभी की बुर की प्यास इतनी जल्दी कहाँ बुझने वाली थी|
डेढ़ बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मेरी आँख खुल गई| मैं समझ चूका था की हो न हो ये भाभी ही होगी| मैंने दरवाजा खोला तो भाभी ही थी और मुझे धक्का दे कर अंदर घुस गई| मैंने दरवाज़ा बंद किया और भाभी के पास आ कर बोला; "आपको चैन नहीं? आज जी भरके बुझा ो दी थी आपकी प्यास!" "हाय...इतनी जल्दी कहाँ बुझती है प्यास? साल-साल भर तुम अपनी शकल नहीं दिखाते और जब आये हो तो मुझे जी भर के प्यार करने नहीं देते!"
"भाभी बात को समझा करो! किसी ने अगर देख लिया तो आपकी बहुत बदनामी होगी|" "वो सब मुझे नहीं पता.... बस मेरी तन की आग बुझा दो!" "आप ने फिर से गोली तो नहीं खा ली?" मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा| "नहीं ... ले कर आई हूँ, सोचा यहीं खा लुंगी|" "आप पागल हो क्या? एक दिन में दो बार गोलियाँ खा लीं!" "हाय! इससे कोई बिमारी हो जाती है?" भाभी ने उत्सुकता दिखते हुआ पूछा| तभी मेरे मन में ख्याल आया की क्यों ना मैं भी थोड़ी चुटकी ले लूँ| "और क्या! ओवरडोज़ से बीमारियां होती हैं जैसे बुर में से पानी बहना, बुर में जलन, धड़कन की तेज गति और तो और स्वप्न बुर झाड़न|" अंतिम वाला नाम मैंने अपने आप ही बना लिया था| ये सब सुन कर भाभी निराश हो गई और सोच में पड़ गई| भाभी को इस तरह उदास देख मैंने सोचा की अब और ज्यादा इन्हें तंग नहीं करूँगा| सो मैंने उनसे कहा; "भाभी परेशान मत हो| आपको मेरा प्यार चाहिए ना? तो उसके लिए आपको हमेशा गोली खाने की जर्रूरत नहीं|" "पर मैं तुम्हारा साथ कैसे दे पाउंगी .... मैं तुम्हें आधे रास्ते में तड़पता नहीं छोड़ सकती!" "आप उसकी चिंता मत करो ... मेरे पास एक उपाय है|" "वो क्या" भाभी ने उत्सुकतावश पूछा| "वो सब आपको बताना मुश्किल है आप बस वो करो जो मैं कहता हूँ और हम दोनों संतुष्ट हो जायेंगे|" ये सुन कर भाभी के मुख पर आशा की किरण जाग उठी| फिर मैंने भाभी को उनके तमाम कपडे उतारने को कहा और खुद भी सारे कपडे उतार कर उनके समुख खड़ा हो गया| मेरा लंड तन्नाया हुआ था और जिस पर भाभी की नजरें तिकी हुई थीं| मेरे कुछ करने से पहले ही भाभी ने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और अपनी बुर के पास ले जाने लगीं| इससे पता चलता है की उनके अंदर मेरे प्रति कितनी भूख थी! मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका और उनके होठों को चूमा| मुझे इस बात का ख़ास ध्यान रखना था की मैं भाभी को ज्यादा उत्तेजित न करूँ वरना वो जल्दी ही झड़ जाएँगी| मैंने उनके हाथ से अपना लंड छुड़ाया और उन्हें चारपाई की ओर चलने को कहा| वहां पहुँच कर मैं चारपाई पर लेट गया और उन्हें अपने ऊपर आने का मूक इशारा किया| भाभी अंदर से इतनी उत्सुक थीं की वो सीधे मेरे लंड के ऊपर अपनी बुर को ले आईं और उस पर बैठने ही वाली थीं की मैंने उन्हें कंधे से दबा कर नीचे जाने को कहा और मेरे लंड को अपने मुंह में ले कर चूसने का आदेश दिया| भाभी अब समझ गई थीं की खेल क्या है सो उन्होंने सबसे पहले मेरे लंड को चूमा और उसकी खुशबु को अपने नथुनों में भरने लगी| मेरे लंड के सुपाडे को वो अपने नथुनबों में ठूसने लगी और मैं इधर देख रहा थी की उनके अंदर की प्यास बढ़ने लगी है| मैंने उनके गालों पर हाथ फेरा और उन्हें मूक इशारे से चूसने को कहा| भाभी ने अपने निचले होंठ को मेरे सुपडे पर ऊपर से नीचे रगड़ना शुरू कर दिया| अगला हमला उनकी जीभ का था जिसने मेरे सुपाडे के छेड़ को कुरेदा| भाभी ने अपनी जीभ बाहर निकाली और मेरे लंड को ऊपर से नीचे की तरफ और नीचे से ऊपर की तरफ चाटने लगीं| भाभी की खुरदरी जीभ और उनकी लार मेरे लंड को गीला कर रही थी और मेरे अंदर की वासना को हवा दे रही थी| दो मिनट की इस चटाई ने मेरी वासना को पूरी तरह से जागृत कर दिया था और मेरा हाथ स्वथा ही उनके सर पर पहुँच गया था| मैंने उनके सर पर दबाव डाला की वो मेरे लंड को अपने रसीले होठों की गिरफ्त में ले लें और उन्होंने ऐसा ही किया| मेरे लंड को अपने मुंह में भर कर भाभी स्थिर हो गईं| दस सेकंड तक भाभी ने मेरे लंड को अपने मुंह में कैद रखा| ना तो वो उसे अपनी जीभ से छेड़ रही थीं न ही कुछ और कर रही थीं| शायद वो मुझे तंग कर रहीं थीं.....
जब मेरी बेचैनी बढ़ने लगी तो मैंने भाभी के गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाईं| भाभी समझ गई और उन्होंने अपनी जीभ को मेरे लंड के सुपडे पर चलाना शुरू कर दिया| उनकी पूरी तरह से गीली जीभ ने मेरे लंड को उनके मुँह के रसों से सरोबोर कर दिया| अब भाभी ने मेरे लंड को अपने मुँह के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| मेरे पूरा लंड उनके थूक से गीला हो चूका था और चुदाई के लिए तैयार था पर न भाभी रूक रही थी और न ही मैं उन्हें रोक रहा था| डा मिनट की ताबड़तोड़ चुसाई के बाद अब मैं अपने चरम पर पहुँचने वाला था तो मैंने भाभी को रुकने का इशारा किया पर भाभी थी की मेरा लंड छोड़ ही नहीं रही थी| मुझे उनके मुँह से अपना लंड बाहर निकालना पड़ा और मैंने उनसे कहा; "इतना क्या मोहित हो इस (मेरे लड़) पर की छोड़ती ही नहीं?" जवाब में भाभी बोली; "मेरा बस चले तो इसे अपनी बुर में जिंदगी भर डाले रहूँ!" ये सुन कर उनकी प्यास कितनी बढ़ चुकी है ये मैं समझ गया था| मैंने भाभी को अपने नीचे लिटाया और उनकी दोनों टांगों को खोल उनके बीच में आगया और उनके थूक से चुपड़े लंड को भाभी की छूट में ठेल दिया और पूरा का पूरा लंड अंदर जड़ तक पेल कर मैं उनपर सारा वजन डालकर पड़ गया|" अब भाभी को तड़पाने की बारी मेरी थी....
भाभी की बुर में अपना लंड डाले मैं उनपर पड़ा रहा| दो सेकंड नहीं हुए होंगे और भाभी का शरीर कसमसाने लगा| उनका शरीर कामवासना से भरने लगा था और भाभी के मुँह से एक घुटी से आवाज आई; "उम्म्म...ससस... करो ... ना..." मैंने भाभी के मुंख पर देखा और उन्हें याद दिलाया की उन्होंने मुझे कितनी यातना दी थी! खेर मैं भी उनपर जुल्म करने के मूड में नहीं था तो मैंने उनकी धक्कापेल चुदाई शुरू कर दी| मेरे हर धक्के में भाभी के चुके ऊपर-नीचे होने लगे थे और मुझसे उनकी ये थिरकन बर्दाश्त नहीं हो रही थी सो मैंने उनके दाहिने चुके पर अपने दाँत गड़ा दिए! इस हमले से भाभी की कराह निकल गई पर उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा बस मेरे बालों में हाथ फिराने लगी| 10 मिनट की चुदाई में ही भाभी और मैं अपने चार्म पर पहुँचने लगे| एक और ठस्सा और मेरे अंदर का जवाला मुखी फुट पड़ा और सारा लावा भाभी की बुर में भरने लगा| लावे की गर्माहट से भाभी भी अपने चार्म पर पहुँच गई और अपना रस बहा कर निढाल हो कर रह गईं| मैं भी उनके ऊपर पड़ा रहा की तभी दरवाजे पर दस्तक हुई जिसे सुन हम दोनों के प्राण निकल गए!
दस्तक सुन मैं और भाभी दोनों हड़बड़ा गए! हम दोनों की धड़कनें तेज थी और दिमाग के तोते उड़े हुए थे| बहार न जाने कौन होगा? अम्मा, बप्पा या भैया? जर्रूर भाभी को बिस्ता पर ना पाकर वो सब भाभी को ढूढ़ने निकले होंगे! इन्हीं ख्यालों ने मेरा दिमाग सनन कर रखा था की दुबारा दस्तक हुई और मैंने जल्दी से अपनी बनियान पहनी और तहमद लपेटा| भाभी को मैंने कहा की वो अंदर वाले कमरे में जा कर छुपे| मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा और अपनी साँसों को नियंत्रण में किया और सोचा की ऐसे जताऊँगा जैसे नींद से उठा हूँ| दरवाजे तक पहुँचने तक एक बार और दस्तक हुई; "आ रहा हूँ!" मैंने ऐसे कहा जैसे मेरी नींद अब खुली हो| दरवाजा खोला तो बाहर नीतू खड़ी थी; "क्या हुआ इतनी रात गए?" मैंने अंगड़ाई लेते हुए कहा| "चाचू वो...." इतना कह कर वो चुप हो गई और फिर कुछ सूंघने लगी| मैं सोच में पड़ गया की ये क्या सूंघ रही है? दारु या सिगेरट तो मैंने पी नहीं| मैं अभी अपनी सोच में डूबा था की वो बोली; "चाचू आप मुझसे नाराज तो नहीं? मैंने दोपहर मैं आपसे....." इतना कह कर वो रुक गई और उसकी नजर मेरे तहमद पर गई जिसमें गीले निशान पड़ गए थे| जब नीतू की नजरों का पीछा करते हुए मेरी नजर मेरे तहमद पर गई तो मुझे समझ आया की नीतू क्या देख रही थी| ये निशान दरअसल मेरे और भाभी की कामरस से भीगे लंड से आये थे| "नीतू आप पगला गए हो क्या? इतनी रात गए ये पूछने आये हो?" मैंने अपने तहमद से अपने लंड को ढकते हुए गुस्से में कहा| नीतू समझ गई थी की मैंने उसकी चोर निगाहों को पकड़ लिया है तो उसने अपनी आँखें नीचे कर लीं| उसका उदास चेहरा देख मैं भी थोड़ा पिघल गया और उससे समझते हुआ कहा; "मैं आपसे नाराज नहीं हूँ बस अपनी हद्द में रह कर बात किया करो| मेरे लिए आप अभी भी बच्चे हो और मैं आपका चाचा, हमेशा इस रिश्ते का लिहाज किया करो| अब जाओ और सो जाओ रात बहुत हो गई है, किसी ने देख लिया तो खामखा बवाल हो जायेगा| आईन्दा जो भी बात करनी हो दिन में किया करो|" इतना सुन नीतू ने हाँ में सर हिलाया और चली गई| मुझे उसके चेहरे पर ख़ुशी नहीं दिखी और मन ही मन मैं भी थोड़ा दुखी था क्योंकि वो तो बच्ची है और गलत काम तो मैं और भाभी कर रहे थे| मैंने दरवाजा बंद किया और वापस भाभी के पास पहुँचा| इससे पहले की भाभी पूछती मैंने स्वयं ही उन्हें बता दिया; "नीतू थी|" ये सुन कर उन्होंने थोड़ा चैन की साँस ली| "लेकिन कल से रात में आप यहाँ मत आना किसी ने देख लिया तो आफत हो जाएगी|" ये सुन कर भाभी का दिल टूट गया पर मैं उस समय कर भी क्या सकता था? भाभी बाहर जाने लगी तो उनका दिल रखने के लिए मैंने उन्हें पीछे से थामा| मेरी बाहें उनकी कमर से लिपट गई थीं और मैं उनकी गर्दन पर अपने होठ गड़ाए खड़ा था| मेरे इस अंदाज से भाभी पिघलने लगीं और जल्द ही उनके मुँह से सिसकारियां फूटने लगीं| बात आगे बढ़ पाती इससे पहले ही मैंने खुद को रोक लिया और मैं उनके कान में खुसफुसाया; "शुभ रात्रि!!" ये सुनकर भाभी के चेहरे पर मुस्कान लौट आई और वो ख़ुशी-ख़ुशी चली गईं|
अगली सुबह चूँकि मुझे कुछ न्योते बाँटने जल्दी निकलना था सो चाय भाभी ले कर आईं और जब वो आईं तो उनके चेहरे के रंग उड़े हुए थे| "क्या हुआ? चेहरा फीका क्यों है?" मैंने गंभीरता से पूछा| "वो....रात को.... मुझे यहाँ से जाते हुए नीतू ने देख लिया|" भाभी ने काँपते हुए स्वर में कहा| ये सुन कर मैं भी हैरान रह गया और मैंने भाभी को एक समाधान बताया| समाधान क्या ये तो कुर्बानी थी! "मेरी बात ध्यान से सुनो| अगर किसी ने कुछ पूछा तो कह देना की मैंने आपको रात में बुलाया था| सारे आरोप मुझ पर अलग देना, कहना मैं जबरदस्ती कर रहा था!" ये सुन कर भाभी स्तब्ध रह गईं; "पर ... मैं.....नहीं ... मैं ऐसा कुछ नहीं कहूँगी| फिर जो होना है वो हो जाए|" "जरा दिमाग लगा कर सोचो, अगर खुद पर आरोप लोगी तो सब आपको कुलटा कहेंगे! और नीतू का क्या? उसका ब्याह है, ये बात फ़ैल गई तो उससे कोई शादी नहीं करेगा! मेरा क्या है मैं घर-बार छोड़ दूँगा, किसी दूसरी जगह... दूसरे शहर गुजरा कर लूंगा| आप मेरी चिंता मत करो और नीतू के भविष्य के बारे में सोचो|" ये कह कर मैंने कपडे पहने और तभी अम्मा आ गईं और मुझे एक थैला दे कर घर लौटते समय कुछ सामना लेन को भी कहा| थैला ले कर मैं बप्पा और भैया से मिला और घर से निकल पड़ा| सब कुछ शांत था क्योंकि नीतू अभी तक सो रही थी पर मेरा दिल ये कह रहा था की आज घर लौट कर मुझे तूफ़ान का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा|
सारा काम निपटा कर घर लौटते-लौटते मुझे शाम के सात बज गए थे| घर लौटते समय मैं बस मन ही मन खुद को आने वाले सवालों के लिए तैयार कर रहा था| मैंने सोच लिया था की आज रात ही मैं घर छोड़के चला जाऊँगा और फिर कभी वापस नहीं आऊँगा| बस एक ही बात का गम था की मैं अपनी प्यारी हतिजी जिसे मैं अपनी बेटी की तरह चाहता था उसकी नजरों में गिर जाऊँगा और फिर कभी उससे मिल नहीं पाउँगा| पर इसमें सब मेरी ही गलती थी... अगर मैं भाभी को बहने से पहले ही रोक लेता तो आज मेरा ये छोटा सा आशियाँ बाढ़ में बह ना जाता| भारी-भारी क़दमों से मैं अपने घर पहुँचा और सीधा अम्मा के पास पहुँचा और उन्हें थैला दिया| पर अम्मा ने मुझे प्यार से बिठाया और पानी और गुड़ दिया| बप्पा और भैया भी आ गए और सब बड़े आराम से बातें कर रहे थे| मैंने ये सब देख अचंभित था और मेरी नजरें भाभी को ढूंढने लगीं| कुछ देर बाद अंदर से भाभी निकलीं और वो भी बहुत शांत थी और मुस्कुरा रही थी| इसका मतलब नीतू ने किसी से कुछ भी नहीं कहा था| मैं उठा और नीतू को ढूंढने लगा ताकि उससे बात करके उसे झूठ बता सकूँ की ये सब उसकी माँ की नहीं बल्कि मेरी गलती है| पर वो मुझे कहीं नहीं मिली, मेरे पूछने पर भैया ने बताया की वो सो चुकी है| मैं घर के आँगन में पहुँचा तो देखा नीतू वहां लेटी हुई थी मैं उसके पास पहुँच कर मैंने नीतू को आवाज लगाईं पर वो कुछ नहीं बोली और चुप चाप लेटी रही| मेरा मन किया की मेंमैंने नीतू के सर पर हाथ फेरने को हाथ बढ़ाया पर फिर खुद को रोक लिया| मेरा मन अंदर से कचोट ने लगा और मैं आत्मग्लानि की आग में जलने लगा| मेरे अंतर मन ने मुझे नीतू को छूने भी नहीं दिया| मैं ने अपनी जेब में हाथ डाला और नीतू के लिए लाइ हुई चॉकलेट निकाल कर उसके पास छोड़ के वापस मुड़ा| पीछे देखा तो भाभी खड़ी सब कुछ देख रही थी| मैंने भाभी से कुछ नहीं कहा और अपने घर लौट आया और कपडे बदलने लगा| तभी अम्मा और भाब ही खाना खाने को बुलाने आये तो मैंने उन्हें ये कहकर मना कर दिया की मैंने बाहर खाना खा लिया था सो मैं अभी खाना न यहीं खाऊँगा| अम्मा तो मेरा झूठ मान गई पर भाभी जान चुकी थी की मैं झूठ बोल रहा हूँ| अम्मा के जाने के बाद भाभी बोली; "क्यों झूठ बोल रहे हो?.... तुम नहीं खाओगे तो मैं भी खाना नहीं खाउंगी!" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और सर झुकाये बैठ गया| मेरा सर झुका हुआ देख भाभी बोली; "मैंने अभी देखा .... तुम.....बहुत चाहते हो नीतू को और मेरे कारन वो.... तुमसे बात भी नहीं कर रही|" ये बोलते हुए भाभी की आँखें छलक आईं| "हम्म्म...पर आज नहीं तो कल....उसने अपने ससुराल चले जाना था| फिर तो क्या ही .... मैं उससे मिलता..." इतना कह कर मैं चुप होगया और खुद को सँभालने लगा की मैं रो न पडूँ| "नहीं.... ये सब मेरे कारण हुआ है|" भाभी ने रोते हुए कहा| "नहीं.... गलती मेरी थी! मुझे आपको शुरू में ही ये सब करने से पहले रोक देना चाहिए था| खेर छोडो जो होगया उसे तो मैं बदल नहीं सकता आप बस चुप रहना और नीतू से कुछ मत कहना| अगर उसने पूछा तो वही कहना जो मैंने कहा था| सारा इल्जाम मुझ पर लगा देना और कहना मैंने आपको बरगलाया था| आप उसकी माँ हो और मैं नहीं चाहता की उसकी नजरों में कभी आपकी इज्जत कम हो| रही मेरी बात तो मैं था ही कौन? उसका चाचा... मेरे ना होने से उसे इतना दुःख नहीं होगा जितना अपने माँ के नहोने से होगा!" मैंने भाभी के आँसूं पोछते हुए कहा| मैंने आगे उन्हें कुछ कहने नहीं दिया और उन्हें अपनी कसम से बाँध कर चुप करा कर घर भेज दिया|
भाभी के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और पलंग पर लेट गया पर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी| सारी रात मैंने जाग कर काटी और नीतू के बचपन की यादों को याद करता रहा| सुबह होते ही मैं नाहा-धो कर तैयार हुआ और बप्पा के पास आ कर बैठ गया| मुझे इतनी जल्दी उठा देख कर बप्पा खुश हुए और हम खेत की तरफ निकल गए| उस समय कोई नहीं उठा था सो मैं और बप्पा एक सैर पर चल दिए| जब हम वापस आये तो मुझे और बप्पा को साथ देख सब हैरान रह गए| सिर्फ नीतू अभी तक उठी नहीं थी, बाकी सब उठ चुके थे| सबने साथ बैठ कर चाय पी और फिर अम्मा और बप्पा दूसरे गाँव पूजा में चले गए और भैया भी किसी काम से चले गए| मुझे घर रह कर आराम करने का काम दिया गया था क्योंकि की कल मैंने बहुत सारा काम किया था! मैं अपने घर लौट आया और सीढ़ी पर बैठा किताब में हिसाब लिखने लगा| करीब एक घंटे बाद भाभी और नीतू आये| भाभी ने नीतू का हाथ जोर से पकड़ रखा था और दोनों बहुत तेजी से मेरी तरफ आ रहे थे| मेरे पास पहुँच कर भाभी ने नीतू को मेरी ओर धकेल दिया|
“अम्मा... वो कॉलेज के मास्टर साहब को न्योता पहुँच गया क्या?" मैंने बात शुरू की| "नहीं बेटा...तेरा और तेरा पिताजी का इंतजार कर-कर के इतनी देर हो गई की आज से सब जगह न्योता जाना शुरू हुआ है| तेरे बप्पा और भैया सुबह जल्दी निकले हैं न्योता देने|" मैं थोड़ा सोचने का नाटक करने लगे और फिर चाय की अगली चुस्की भरते हुए बोलै; "अम्मा.. तो मैं दे आऊँ उन्हें न्योता?" अम्मा बोली; "ठीक है... तू दे आ|" अब मेरी बारी थी नीतू को साथ ले जाने की बात करने की| "अम्मा नीतू को साथ ले जाऊँ?" मैंने सवाल तो छोड़ दिया था और जानता था की जवाब में भी एक और सवाल पूछा जायेगा| "ये वहाँ क्या करेगी? शादी-व्याह का घर है और ऐसे में लड़की जात का यूँ बाहर घूमना ठीक नहीं|" अम्मा के सवाल का जवाब मैं देना जानता था; "अम्मा मास्टर साहब मुझे जानते नहीं हैं और ऐसे में अगर नीतू साथ हुई तो आसानी होगी| और फिर हम दोनों को आने जाने में पोना घंटा ही लगेगा| जल्दी आ जायेंगे|" अम्मा के हाव-भाव देख कर लग रहा था की उन्होंने ना ही करनी है की तभी शीला भाभी बोल पड़ी; "जाने दो ना अम्मा| अपने चाचा के साथ ही तो जा रही है और फिर कॉलेज कौनसा दूर है? ये तो रहा ... घर से दिख जाता है|" ये सुन कर आखिर कर अम्मा ने जाने की अनुमति दे दी| (हमारे घर से कॉलेज साफ़ नजर आता था|)
नीतू जाने की बात सुन कर बहुत खुश हुई और हम दोनों घर से कॉलेज की ओर चल पड़े| कॉलेज का रास्ता खेतों में से हो कर जाता था और आधे रास्ते में वहाँ एक छोटा सा बाग़ भी था जहाँ आम के २-४ पेड़ लगे थे| गर्मी से राहत पाने के लिए लोग कई बार यहाँ रूक के साँस लेते थे| उस बाग़ को देख नीतू बोली; "चाचू... याद है उस पेड़ पर आप चढ़ कर आम तोडा करते थे?" ये सुन मुझे वो दिन याद आने लगे और हम दोनों उसी पेड़ के नीचे खड़े हो कर बातें याद करने लगे| 5 मिनट बाद हम वहाँ से चल दिए और कॉलेज पहुँचे, वहाँ जो मैंने देखा उसे देख मैं हैरान रह गया| कक्षा के बाहर लड़के खड़े हो कर सिगरेट फूँक रहे थे| एक कक्षा के अंदर कोई भी नहीं था बस कोने में एक युगल जोड़ा जो की लगभग नीतू की उम्र के होंगे एक दूसरे से चिपटे हुए चुम्मा-चाटी कर रहे थे| ये सब देख मैंने नीतू की तरफ देखा तो वो मेरी तरफ ही देख रही थी पर मैं समझ नहीं पा रहा था की उसके मन में क्या चल रहा है? मैं थोड़ा जल्दी चलने लगा क्योंकि ये सब देख मेरे लंड में कुछ होने लगा था और मैं नहीं चाहता की वो अकड़ जाए और नीतू के सामने मुझे शर्म आये| हम जल्दी से मास्टर साहब के कमरे में पहुँचे और उन्हें न्योता दिया और तुरंत ही वहाँ से निकल पड़े| कॉलेज से थोड़ा दूर आने पर मैंने नीतू से पूछा; "ये सब होता है तुम्हारे कॉलेज में?" मेरा सवाल सुन नीतू का सर झुक गया| "कहीं तुम भी तो?" मैंने पूरी बात नहीं बोली पर नजाने नीतू को क्या ठेस लगी वो एक दम से बोली; "कभी नहीं चाचू.... मैं तो आपको...." बस इतना बोल कर वो चुप हो गई, पर मेरे लिए अब ये बात जानना आवश्यक हो गया था| "आपको...मतलब?" नीतू सर झुका कर कुछ सोचने लगी और फिर बोली; "चाचू ...आपको इतना मानती हूँ की मैं इन चक्करों में कभी नहीं पड़ी| आपने इतनी मुश्किल से मेरा कॉलेज में दाखिला कराया और मैं इन चक्करों में पढ़ कर आपके सपनों को ख़राब नहीं करना चाहती थी|" ये सुन मुझे विश्वास हो गया की मेरी भतीजी बहुत समझदार है| हम बाग़ के पास पहुँच ही थे की नीतू बोली; "चाचू मुझे....जाना है|" ये सुन पहले तो मैं सोचने लगा की उसे कहाँ जाना है, फिर याद आया की उसे पेशाब लगी है| "ठीक है ... उधर झाड़ी के पास... मैं वहाँ पेड़ के पास बैठा हूँ|" ये बोल मैं थोड़ा दूर आम के पेड़ के पास दूसरी तरफ मुंह कर खड़ा हो गया और मोबाइल में गेम खेलने लगा| अगले ही पल मुझे एक जोरदार सीटी की आवाज सुनाई दी....
ये सीटी थी नीतू के मूतने की| मुझे लगा वो दूर जा कर मूत रही होगी पर वो मेरे से करीब दस कदम दूर ही झाडी में बैठी मूत रही थी| आवाज सुन में समझ तो गया ही था की ये किसकी आवाज है पर मैं पलट नहीं सकता था| 2 मिनट बाद जब नीतू लौटी तो मैंने उसे थोड़ा गुस्से में बोला; "मैंने आपको उधर दूर झाडी के पास बोला था ना? फिर मेरे इतने नजदीक काने में शर्म नहीं आई?" मेरा गुस्सा देख नीतू ठिठक गई और सर झुका कर बोली; "चाचू... वो .... वहाँ किसी ने हग (टट्टी) रखा था... इसलिए...." ये सुन मैं थोड़ा शांत हुआ और कहा; "तो बेटा कहीं और दूर चले जाते|" अब नीतू सामान्य हो बोली; "पर चाचू आप से कैसी शर्म? आपने तो बचपन में मुझे देखा है ना?" "बदमाश... तब आप छोटे थे| अब आप बड़े हो गए हो.. शादी हो रही है आपकी| चलो छोडो ... और दुबारा ऐसी गलती मत करना|" इतना कह हम दोनों घर लौट आये|
घर पहुँच के मुझे शीला भाभी कुऍं से पानी भरती नजर आई| मेरी ओर देख उन्होंने कटीली मुस्कान दी पर मेरे मन में रात गुस्सा अभी भी था तो मैंने उनको ज्यादा तवज्जो नहीं दी| मैं और नीतू ने सीधे अम्मा के पास जा कर हाज़री लगाईं; "अरे, तुम दोनों इतनी जल्दी लौट आये?" अम्मा ने उत्सुकता वश पूछा| "हाँ अम्मा..." मैं आगे कुछ कहने ही वाला था की अम्मा बोल पड़ी; "अच्छा मुनना सुन, अपनी भाभी को दवाखाने ले जा|" ये सुन कर मैं अचंभित हो गया क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैंने देखा था| "पर उन्हें क्या हुआ? अच्छी-भली तो हैं|" मैंने थोड़ा गुस्से में कहा क्योंकि मुझे लगा ये भाभी का कोई नया ड्रामा होगा| "वो तुझे नहीं बता सकते| तू इसे बस बाजार ले जा ये अपने आप बात कर लेगी|" अम्मा तो थोड़ा झेंपते हुए बोला| पर भाभी ने बोल पड़ी; "अम्मा कोई बात नहीं आज नहीं तो कल मुनना को भी ये सब पता ही चल जायेगा| आखिर उसकी भी तो शादी होगी!" ये बात भाभी ने एक अलग अंदाज में कही, जैसे की वो मुझे चिढ़ा रही हो| "हम्म्म... ये तो सही है कहा तूने| बेटा तेरी भाभी को सफ़ेद पानी की शिकायत है|" ये सब बड़की अम्मा के मुख से सुन बुरी तरह झेंप गया और मुझे अब भाभी का चिढ़ाने का अंदाज समझा आया| पर ये सब सुन कर मैं भी चिंतित हो गया, क्योंकि भले ही उनसे नाराज रहता था पर उनकी सेहत की परवाह भी सब से ज्यादा करता था| मैंने गंभीर आवाज में भाभी से कहा; "चलो भाभी... आप तैयार हो जाओ| मैं जाके साइकल निकालता हूँ|" साडी बदल भाभी आ गेन और मैं उन्हें सायकल पर पीछे बिठा कर चल दिया| मेरे चेहरे पर अब भी गंभीरता थी और अंदर ही अंदर मैं उनके लिए परेशान भी था| गाँव से थोड़ा दूर पहुँच कर भाभी बोली; "क्या बात है मुनना सुबह तो इतना गुस्सा थे और अब देखो मेरी चिंता में आधे हुए जा रहे हो? अब भी कहोगे की मुझसे प्यार नहीं करते?"
"चिंता करने का मतलब ये तो नहीं की आपसे प्यार करता हूँ... हाँ परवाह करता हूँ आपकी| गुस्सा होता हूँ पर सबसे ज्यादा चिंता भी आप की ही करता हूँ|" मैंने जवाब दिया|
"देखो इतनी चिंता करने वाले को भी मैं खुश नहीं कर पाती| धिक्कार है मुझ पर!" भाभी ने अपने को कोसते हुए कहा| "जो हुआ उसमें आपकी गलती नहीं थी.... अब बुढ़ापा होता ही ऐसा है!" मैंने ये बात कह कर थोड़ी चुटकी ली| "अच्छा ? मैं बूढी हो गई हूँ?" भाभी ने थोड़ा चिढ कर कहा| "कल रात आप ही ने तो कहा था!" मैंने उन्हें चिढ़ाने के लिए थोड़ी और आग लगा दी| "अच्छा? आज बताती हूँ की कितनी बूढी हो गई हूँ! आज तुम्हारा तेल ना निकाल दिया तो कहना!" भाभी ने बिदक के कहा| "अरे भाभी मैं तो मजाक कर रहा था, आप खामखा गुस्सा हो गए| अभी आपकी तबियत ठीक नहीं है, पहले ठीक हो जाओ फिर चाहे मुझे जिन्दा खा जाना| पर जब तक पूरी तरह ठीक नहीं होते तब तक शांत रहो|" ये सुनकर भाभी थोड़ी शांत हुई और हम हंसी-मजाक करते हुए शहर पहुँचे| दवाखाने के सामने पहुँच भाभी ने मुझे वहीँ रुकने को कहा और खुद अंदर चली गई| दवाखाने के बाहर औरतों के इलाज की अलग लाइन थी और मर्दों की दूसरी तरफ थी| मैंने देखा भाभी लाइन में नहीं लगीं बल्कि सीधा अंदर चली गईं| मुझे लगा भाभी बड़ी दबंग हैं! 5 मिनट में ही वो बहार आ गईं और उनके हाथ में कुछ भी नहीं दिख रहा था, न दवाई न कोई परचा! मैं सोच में पद गया की ये यहाँ करने क्या आई थीं? तभी वो मेरे पास आईं और बोलीं, "मुनना एक बोतल पानी ला दो|" मैंने सायकल स्टैंड पर कड़ी की और जा के पानी की बोतल खरीद लाया| तभी भाभी ने अपने ब्लाउज के अंदर हाथ डाला और मैंने अपनी आँखें फेर लीं| ये देख भाभी हँस दी और बोली; "आँखें क्यों फेर ली?" "तो क्या घुस जाऊँ उधर?" मैंने झूठा गुस्सा दिखते हुए कहा| ये सुन भाभी खिलखिलाकर हँस पड़ी और आने जाने वालों की नजर हम पर टिक गई|
खेर भाभी ने अपने ब्लाउज में से अपना बटुआ निकाला और उसमें एक दवाई का पत्ता था जिसकी एक गोली उन्होंने मेरे सामने पानी से खा ली| मुझे लगा की डॉक्टर ने दवाई दी होगी| दवाई खा कर भाभी ने मुझे घर जाने के लिए कच्चा रास्ता लेने को कहा, जब मैंने वजह जननी चाही तो वो बोलीं की उन्हें किसी से मिल कर शादी का न्योता देना है| मैंने भाभी की बात मान ली और हम कच्चे रस्ते के लिए मुख्य सड़क से उतर आये| दोपहर के दो बजे होंगे और धुप में मैं और भाभी हँसते-मुस्कुराते हुए बात किये जा रहे थे की तभी अचानक भाभी बोली; "मुनना... सायकल रोक!" भाभी की आवाज में कुछ अजीब था और मेरा ध्यान उनकी आवाज समझने में लग गया की तभी भाभी फिर बोली; "रोक....रोक ना|" मैंने सायकल रोक दी और उतर के पीछे मुड़ा; "क्या हुआ भाभी? सब ठीक तो है?" भाभी के चेहरे पर अजब सी मुस्कराहट फ़ैल गई और वो बोली; "मेरे साथ चल|" और मेरा हाथ खींच के रास्ते के किनारे एक बाग़ की तरफ जाने लगी| "अरे पर ले कर कहाँ जा रही हो ?" मैंने फिर से पूछा पर वो कुछ नहीं बोली| ये देख मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे थे| मैं समझ गया था की ये जर्रूर कल रात का अधूरा काम ख़तम करने मुझे ले जा रही हूँ और मन ही मन मैं ठान चूका था की इनकी बीमारी के चलते मैं इन्हें छूने वाला भी नहीं हूँ| बाग़ के अंदर एक तरफ एक आधा कटा हुआ पेड़ था और झाड़ियाँ भी थी, वहाँ पहुँच कर शीला भाभी रूक गई और अपनी बढ़ी हुई साँसों को थामते हुए बोली; "कल रात मैंने अपने सजना को बहुत आहात किया था|" मैंने भाभी की बात वहीँ काट दी; "ठीक है... पर इस सब की कोई जर्रूरत नहीं है| अभी आप बीमार हो, पहले ठीक हो जाओ फिर ...|" मैंने बात पूरी नहीं की पर ये सुन कर भाभी हंसने लगी| उनकी हंसी देख मुझे समझते देर नहीं लगी की ये बिमारी-वीमारी कुछ नहीं बल्कि ढोंग था उनका| मैंने अपने माथे पर हाथ मरते हुए बोला; "तो ये सब आपने ड्रामा खेला था?" मेरी बात सुन उनका सर झुक गया था और मेरा पारा चढ़ने लगा था| "यहाँ मैं खुद को मन ही मन गालियाँ दे रहा था की मैंने आपके साथ कल रात इतना बुरा व्यवहार किया और आप यहाँ ...." मैंने बात अधूरी छोड़ दी और भाभी की तरफ देखना बंद कर दिया था और उनसे नजरें फेरे खड़ा था| तभी भाभी बोली; "मैंने ये सब तुम्हारे लिए किया| कल रात मैंने तुम्हें अतृप्त छोड़ दिया था और तब से मैं खुद को माफ़ नहीं कर पा रही थी| सुबह जब तुमने मेरी तरफ देखना भी ठीक नहीं समझा तो मैंने सोच लिया की मुझे क्या करना है| मैंने दवाखाने से दवाई ली और ....." दवाई का नाम सुन मेरे कान खड़े हगो गए थे| "कैसी दवाई?" मैंने पूछा तो जवाब में वो बोली; "जोश बढ़ने वाली| आज मैंनेतुम्हेँ छका न दिया तो कहना?" मैं मन ही मन सोच में पढ़ गया की ऐसी दवाइयाँ तो मर्दों के लिए होती हैं, भला औरतों को इसकी क्या जर्रूरत? इधर भाभी के तपते जिस्म ने उनकी हरकतों को मजबूर कर दिया था| भाभी ने अपना हाथ मेरे लंड पर रखा और पैंट के ऊपर से दबाने लगी| "ये क्या कर रही हो? पागल हो क्या? यहाँ खुले में? कोई देख लेगा तो?" मैंने उनके हाथों की पकड़ से अपने लंड को आजाद करते हुए कहा| एक बात मैंने गौर की वो ये की भाभी की सांसें भारी हो चली थीं और ये साफ़ था की भाभी के ऊपर दवाई का असर दिखने लगा था| भाभी ने गुस्से से मेरी कमीज के कालर पकड़ते हुए बोली; "डर गए.. की कहीं आज तुम्हारी सिटी-पित्ती गुल्ल हो गई तो? कहीं आज तुम्हारा ये औजार कमजोर पड़ गया तो?"
ये शब्द सुन कर तो नामर्द के लंड में भी अकड़न आ जाए मैं तो फिर भी मर्द था! म आईने भाभी की कमर में हाथ डाला और उन्हें अपने नजदीक खींच लिया और उनके थिरकते होटों पर अपने होंठ रख दिए| उनके नीचे वाले होंठ को मैंने अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| इधर भाभी ने भी अपने दोनों हाथों से मेरे सिर के पीछे बालों में चलना शुरू कर दिया था| उनकी नाखून मेरे सिर में एक अजीब सा एहसास करा रहे थे| मैंने नीचले होंठ को छोड़ के उनके ऊपरी होंठ को अपने मुँह में दबोच लिया और चूसने लगा|भाभी की उत्तेजना अब उफान मारने लगी थी, शायद ये दवाई का असर था|उनके हाथों ने मेरे लंड पर पकड़ बनानी शुरू कर दी थी, उँगलियाँ मेरी पैंट की ज़िप पर घूमने लगी और उन्होंने जल्द ही मेरी पैंट की कैद से मेरे लंड को आजाद कर दिया| जी भर के भाभी के होंठों का रसपान करने के बाद जब मैंने उन्हें आजाद किया तो देखा की भाभी की सांसें धोकनी की तरह चल रही थीं| मुझे समझते देर न लगी की भाभी की कामाग्नि उन्हें जला रही है| मैंने आस-पास देखने लगा की लेटने का कुछ जुगाड़ हो सके| तभी भाभी ने उस आधे कटे हुए पेड़ की तरफ इशारा किया| मैंने अपनी पैंट उतारी और मैं उस कटे हुए पेड़ के तने के ऊपर लेट गया| मेरी सिर्फ कमर और थोड़ी सी पीठ ही उस तने पर थी बाकी का शरीर हवा में था जो मेरी टांगों के सहारे था| भाभी ने अपनी साडी और पेटीकोट ऊपर किया और मेरी कमर के ऊपर आ गईं और लंड को अपनी पनियाई हुई बुर के ऊपर सेट किया और धीरे-धीरे लंड पर बैठने लगीं| उनकी बुर अंदर से बुरी तरह गीली थी| लंड पूरा अंदर जा चूका था और भाभी के चेहरे पर संतुष्टि के भाव झलकने लगे थे| भाभी ने ऊपर-नीचे होना शुरू किया और मैंने महसूस किया की जब भाभी ऊपर उठती तो उनकी बुर अंदर से मेरे लंड को जकड़ने लगती, जैसे की मेरे लंड को निचोड़ना चाहती हो| भाभी की गति बहुत बढ़ चुकी थी और उनके मुख से आनंदमई सुर आने लगे थे; "सससस....उम्मम्मम.... आआह......आनमममम" इधर मुझे भी बहुत आननद आ रहा था| मेरी नजरें भाभी के ब्लाउज में कैद चुचों को आनंद लेने में व्यस्त थीं जो भाभी की रफ़्तार से लय बांधने लगे थे और ऊपर-नीचे हिलने लगे थे| पर जब भाभी लंड पर नीचे आती तो मेरी कमर में पेड़ की लकड़ी चुभने लगती| मैंने भाभी को रोकना चाहा पर तभी भाभी जोर से झड़ने लगीं और उनके बुर का सारा रस मेरे लंड के साथ बहता बहता बाहर आने लगा पर भाभी थी की रुकने का नाम नहीं ले रही थी| जबतक उनके अंदर रस की सारी धार बाहर नहीं बाह गई वो ऊपर-नीचे कूदती रही| आखिर कार थक कर वो रुकीं और मेरे ऊपर से हट गईं| भाभी की सांसें बहुत तेजी से चल रही थी और उनकी प्यास आँखों से बयान हो रखी थी| मैंने उनको एक पेड़ के पास खड़ा किया उनकी दायीं टांग को उठाया और पीछे से अपना लंड अंदर पेल दिया| लंड फिसलता हुआ अंदर घुस गया| अब मेरे अंदर के ट्रक ने पूरी हार्सपावर से काम करना शुरू कर दिया था| मैंने बहुत तेज-तेज झटके मारना शुरू कर दिया था और गति कुछ इस कदर बढ़ चुकी थी कली भाभी को खुद को गिरणसे से सँभालने के लिए पेड़ का सहारा लेना पड़ा| उनके मुख से लगातार चींखें निकलने लगी थी; आआह.....न्नन्न....ममममम.....ससससस.....हाय...ह्ह्हम्मम्मम्म ....मममममम ...." ये तो शुक्र था की बाग़ के आस पास कोई गाँव-घर नहीं था वर्ण आज वहां जमावड़ा लग जाता| मेरी रगों में जोश बढ़ने लगा था और मेरी चुदाई की रफ़्तार पूरे चरम पर थी| ३-४ धक्के और भाभी फिर से झड़ गईं और हाफने लगीं| भाभी की बुर का रास उनकी बुर से निकल कर थाई से होता हुआ नीचे बहने लगा| पर मैं अब भी संतुष्ट नहीं था, इतने समय बात छूट मिली थी की क्या बताऊँ!
भाभी मेरी तरफ पलटीं और मेरे मन में ख्याल आया की ये जर्रूर अब बोलेंगी की मैं थक गई हूँ| पर हुआ उससे उलट! "सससस....मु...नननन...अअअ.... खड़े-खड़े मैं थक गईं हूँ अब मुझे लेटने दे| मैं थोड़ा हैरान हुआ पर चुदाई का भूत सर पर सवार था तो ज्यादा ध्यान नहीं गया| अब भाभी उस कटे हुए पेड़ के तने पर पीठ के बल लेट गईं और मैंने उनकी दोनों टांगें खोलीं और बीच में आ गया| एक झटके में लैंड अंदर पेल दिया और थोड़ी बेरहमी दिखते हुए उन्हें चोदने लगा| जैसे ही मैं लंड अंदर पेलता भाभी के चुचे ऊपर को उछाल जाते और जब बाहर निकालता तो वो नीचे को वापस आ जाते| मुझसे उनके ये छलते हुए चुचों को ब्लाउज में कैद देखना मुश्किल हो रहा था सो मैंने भाभी के ब्लाउज का हुक खोल दिया और पाया की भाभी ने ब्रा नहीं पहनी थी| यानी आज भाभी पूरी तैयारी कर के आई थी चुदाई की| मैंने अपने दोनों हाथों से भाभी के चुचों को थामा और दबाना शुरू किया| मैंने उन पर इस कदर पकड़ बना ली थी की वो अब मेरे धक्कों के प्रभाव से उछाल नहीं पा रहे थे| इधर भाभी के मुंह से सिर्फ सिसकारियां ही फुट रही थीं| १५ मिनट की म्हणत और की, कि तभी भाभी को मेरे चेहरे पर संतुष्ट होने के भाव नजर आने लगे| मतलब की मैं झड़ने वाला था और भाभी जानती थी की मैं हमेशा अपना वीर्य बाहर निकालता था| पर इससे पहले की मैं लंड बाहर निकालता भाभी ने अपनी दोनों टांगों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द कास लिया और बोलीं; "अंदर छोड़ दो... मैंने गर्भ निरोधक गोली खरीदी है|" ये सुन कर मैंने अपना लंड बाहर नहीं खींचा और ४-५ धक्के मारता हुआ उनके भीतर ही झड़ गया| मेरे रस के साथ-साथ भाभी ने फिर से अपना रस छोड़ दिया और वो भी संतुष्ट हो कर मुझसे लिपट गईं|
जब दिलों में उमड़ रहा तूफ़ान थमा तो हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए| दिलों की गति सामान्य हो छुकि थी और सांसें मद्धम| मैं भाभी के ऊपर से उठा और मेरा लंड फिसलता हुआ उनकी बुर से बाहर आ गया| साथ ही उनकी बुर से मेरे वीर्य की एक धार भी बाह निकली जिसे उनकी बुर पी न पाई थी| मैं खड़ा हो के अपनी पैंट उठाने लगा तो भाभी ने मुझे रोक लिया और मेरा हाथ पकड़ के अपने पास बुलाया| फिर मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ा और उसकी ऊपरी चमड़ी को पीछे खिसका कर सुपाडे को मुंह में भर कर जीभ से साफ़ करने लगी|पूरा लंड अच्छे से साफ़ करने के बाद उन्होंने मेरे लंड को आजाद कर दिया| मैंने अपनी पेंट पहनी और कमीज ठीक करने लगा| इधर भाभी ने भी अपनी साडी ठीक की, ब्लाउज के हुक लगते समय मुझे दिखते हुए बोली; "तुम सच्ची बहुत बेरहम हो! देखो कितना दर्द कर रहे हैं ये!" मैं मुस्कुरा दिया और जैसे ही बाग़ से बहार आने के लिए मुदा की भाभी ने मुझे रोक लिया और आकर मेरे सीने से लग गईं और बोलीं; "मुझे माफ़ कर दो|" "भाभी जो आपने अभी मेरे लिए किया उसके बाद माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं है| आपने मेरी महीनों की प्यास बुझा दी अब इसके बाद माफ़ी-वाफी की कोई जर्रूरत नहीं|" इसके बाद हम दोनों अलग हुए और साथ ही बाग़ से बाहर आये और मैं पहले साईकल पर बैठ गया और फिर भाभी बैठ गईं| भाभी बोली; "मुनना तुम्हारी पूरी कमीज भीग गई है!" "अब क्या करूँ... इतनी मेहनत जो करवाती हो तुम|" मैंने हँसते हुए जवाब दिया| अच्छा भाभी एक बात बताओ, इस गोली ने तो सच में आप के भीतर इतना जोश भर दिया था जैसा मैंने कभी नहीं देखा| इतना जोश तो आपके अंदर पहले भी नहीं था! अगर पुरूषों के लिए ऐसी गोली होती तो....." भाभी ये सुनकर एक दम से बोल पड़ी: "न बाबा ना... तुम गलती से भी मत खाना ये गोली| बिना गोली खाये तो तुमने मेरा तेल निकाल दिया अगर गोली खा ली तो मेरी बुर के साथ-साथ पड़ोसन भी फाड़ के रख दोगे|" ये सुन मैं ठहाके लगा के हंस पड़ा और हम हँसते बात करते हुए हम घर लौट आये| घर पर नीतू खाना बना चुकी थी और सब लोग खा भी चुके थे केवल हम ही बचे थे| खाना खा कर मैं भाभी और नीतू मेरे घर पर आ गए और वहां अलग-अलग चारपाइयों पर लेट गए और बातें शुरू हो गईं| नीतू बोली; "माँ आप चाचू से बहुत प्यार करती हो ना?" नीतू के सवाल ने तो मेरे होश उड़ा दिया पर भाभी ने इसका जवाब यूँ दिया; "हाँ बहुत प्यार करती हूँ मैं तेरे चाचू से! और क्यों न करूँ... तेरे पैदा होने के बाद तेरे चाचू ने मेरा इतना ख़याल रखा| सिर्फ एक ये थे जो मेरे बीमार होने पर मेरी इतनी तीमारदारी करते थे| तू जब बीमार होती थी तो अपनी पढ़ाई तक छोड़ के आ जाते थे|" ये सुन कर मैं कुछ नहीं बोलै बस आँखें बंद किये चुप-चाप लेटा रहा और ऐसे जाहिर किया जैसे मैं सो रहा हूँ| पर तभी नीतू ने मुझ पर सवाल दागा; "चाचू आप भी माँ को प्यार करते हो?" ये सुन कर मैंने थोड़ा गुस्सा दिखते हुए कहा; "नीतू... आप बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हो!" अब भाभी चुटकी लेते हुए बोली; "अरे तो गलत क्या है? बड़ी हो गई है नीतू और शादी होने जा रही है इसकी!" "पर इसका मतलब ये नहीं की ये भूल जाए की ये किस्से बात कर रही है? आप इसकी माँ हो और मैं चाचा! इसे पता होना चाहिए की अपनों से बड़ों से इस प्रकार बात नहीं करते|" मैंने ये बात थोड़ा डांटते हुए कही| पर भाभी आज बहुत चुटकी लेने के मूड में थी सो नीतू का बचाव करते हुए बोलीं; "रहने दे नीतू... तेरे चाचू थके हुए हैं.....बहुत मेहनत की है इन्होने|" ये बोलने के बाद वो 1 सेकंड के लिए चुप हो गई और फिर बोलीं; "मुझे साईकिल पर बिठा के ले गए थे और फिर वापस लाये हैं| थकना तो लाजमी है!" मैं समझ गया था की उनका मतलब क्या है पर फिर भी शांत रहा| करीब आधा घंटा आँख लगी होगी की मुझे चारपाई की चरमराहट सुनाई दी| उठ कर देखा तो नीतू मेरी तरफ देख रही थी और मुस्कुरा रही थी| उसकी ये मुस्कराहट मुझे अजीब लगी पर मैंने कुछ कहा नहीं और उठ कर बाहर चला गया| बाहर आ कर देखा तो रमाकांत भैया मेरी ही तरफ आ रहे थे| वो मुझे बड़े बप्पा के पास ले गए हम सब बैठ कर शादी की तैयारियों की बातें कर रहे थे| मुझे अगले दिन कुछ लोगों को न्योता और कैटरिंग वालों से मिलने जाना था| तो मैंने अगले दिन की साड़ी प्लानिंग कर ली की कितने बजे निकलना है, कहाँ पहले जाना है आदि| शाम को सबने बैठ कर चाय पी और बातें चलने लगी| बड़े बप्पा पिताजी को बहुत याद कर रहे थे, तो मैंने उनकी बात पिताजी से करा दी| रात को खाना खा कर मैं अपने घर लौट आया और दरवाजा बंद कर मैं लेट गया| मैं जानता था की आज भाभी नहीं आने वाली हैं पर भाभी की बुर की प्यास इतनी जल्दी कहाँ बुझने वाली थी|
डेढ़ बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मेरी आँख खुल गई| मैं समझ चूका था की हो न हो ये भाभी ही होगी| मैंने दरवाजा खोला तो भाभी ही थी और मुझे धक्का दे कर अंदर घुस गई| मैंने दरवाज़ा बंद किया और भाभी के पास आ कर बोला; "आपको चैन नहीं? आज जी भरके बुझा ो दी थी आपकी प्यास!" "हाय...इतनी जल्दी कहाँ बुझती है प्यास? साल-साल भर तुम अपनी शकल नहीं दिखाते और जब आये हो तो मुझे जी भर के प्यार करने नहीं देते!"
"भाभी बात को समझा करो! किसी ने अगर देख लिया तो आपकी बहुत बदनामी होगी|" "वो सब मुझे नहीं पता.... बस मेरी तन की आग बुझा दो!" "आप ने फिर से गोली तो नहीं खा ली?" मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा| "नहीं ... ले कर आई हूँ, सोचा यहीं खा लुंगी|" "आप पागल हो क्या? एक दिन में दो बार गोलियाँ खा लीं!" "हाय! इससे कोई बिमारी हो जाती है?" भाभी ने उत्सुकता दिखते हुआ पूछा| तभी मेरे मन में ख्याल आया की क्यों ना मैं भी थोड़ी चुटकी ले लूँ| "और क्या! ओवरडोज़ से बीमारियां होती हैं जैसे बुर में से पानी बहना, बुर में जलन, धड़कन की तेज गति और तो और स्वप्न बुर झाड़न|" अंतिम वाला नाम मैंने अपने आप ही बना लिया था| ये सब सुन कर भाभी निराश हो गई और सोच में पड़ गई| भाभी को इस तरह उदास देख मैंने सोचा की अब और ज्यादा इन्हें तंग नहीं करूँगा| सो मैंने उनसे कहा; "भाभी परेशान मत हो| आपको मेरा प्यार चाहिए ना? तो उसके लिए आपको हमेशा गोली खाने की जर्रूरत नहीं|" "पर मैं तुम्हारा साथ कैसे दे पाउंगी .... मैं तुम्हें आधे रास्ते में तड़पता नहीं छोड़ सकती!" "आप उसकी चिंता मत करो ... मेरे पास एक उपाय है|" "वो क्या" भाभी ने उत्सुकतावश पूछा| "वो सब आपको बताना मुश्किल है आप बस वो करो जो मैं कहता हूँ और हम दोनों संतुष्ट हो जायेंगे|" ये सुन कर भाभी के मुख पर आशा की किरण जाग उठी| फिर मैंने भाभी को उनके तमाम कपडे उतारने को कहा और खुद भी सारे कपडे उतार कर उनके समुख खड़ा हो गया| मेरा लंड तन्नाया हुआ था और जिस पर भाभी की नजरें तिकी हुई थीं| मेरे कुछ करने से पहले ही भाभी ने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और अपनी बुर के पास ले जाने लगीं| इससे पता चलता है की उनके अंदर मेरे प्रति कितनी भूख थी! मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका और उनके होठों को चूमा| मुझे इस बात का ख़ास ध्यान रखना था की मैं भाभी को ज्यादा उत्तेजित न करूँ वरना वो जल्दी ही झड़ जाएँगी| मैंने उनके हाथ से अपना लंड छुड़ाया और उन्हें चारपाई की ओर चलने को कहा| वहां पहुँच कर मैं चारपाई पर लेट गया और उन्हें अपने ऊपर आने का मूक इशारा किया| भाभी अंदर से इतनी उत्सुक थीं की वो सीधे मेरे लंड के ऊपर अपनी बुर को ले आईं और उस पर बैठने ही वाली थीं की मैंने उन्हें कंधे से दबा कर नीचे जाने को कहा और मेरे लंड को अपने मुंह में ले कर चूसने का आदेश दिया| भाभी अब समझ गई थीं की खेल क्या है सो उन्होंने सबसे पहले मेरे लंड को चूमा और उसकी खुशबु को अपने नथुनों में भरने लगी| मेरे लंड के सुपाडे को वो अपने नथुनबों में ठूसने लगी और मैं इधर देख रहा थी की उनके अंदर की प्यास बढ़ने लगी है| मैंने उनके गालों पर हाथ फेरा और उन्हें मूक इशारे से चूसने को कहा| भाभी ने अपने निचले होंठ को मेरे सुपडे पर ऊपर से नीचे रगड़ना शुरू कर दिया| अगला हमला उनकी जीभ का था जिसने मेरे सुपाडे के छेड़ को कुरेदा| भाभी ने अपनी जीभ बाहर निकाली और मेरे लंड को ऊपर से नीचे की तरफ और नीचे से ऊपर की तरफ चाटने लगीं| भाभी की खुरदरी जीभ और उनकी लार मेरे लंड को गीला कर रही थी और मेरे अंदर की वासना को हवा दे रही थी| दो मिनट की इस चटाई ने मेरी वासना को पूरी तरह से जागृत कर दिया था और मेरा हाथ स्वथा ही उनके सर पर पहुँच गया था| मैंने उनके सर पर दबाव डाला की वो मेरे लंड को अपने रसीले होठों की गिरफ्त में ले लें और उन्होंने ऐसा ही किया| मेरे लंड को अपने मुंह में भर कर भाभी स्थिर हो गईं| दस सेकंड तक भाभी ने मेरे लंड को अपने मुंह में कैद रखा| ना तो वो उसे अपनी जीभ से छेड़ रही थीं न ही कुछ और कर रही थीं| शायद वो मुझे तंग कर रहीं थीं.....
जब मेरी बेचैनी बढ़ने लगी तो मैंने भाभी के गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाईं| भाभी समझ गई और उन्होंने अपनी जीभ को मेरे लंड के सुपडे पर चलाना शुरू कर दिया| उनकी पूरी तरह से गीली जीभ ने मेरे लंड को उनके मुँह के रसों से सरोबोर कर दिया| अब भाभी ने मेरे लंड को अपने मुँह के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| मेरे पूरा लंड उनके थूक से गीला हो चूका था और चुदाई के लिए तैयार था पर न भाभी रूक रही थी और न ही मैं उन्हें रोक रहा था| डा मिनट की ताबड़तोड़ चुसाई के बाद अब मैं अपने चरम पर पहुँचने वाला था तो मैंने भाभी को रुकने का इशारा किया पर भाभी थी की मेरा लंड छोड़ ही नहीं रही थी| मुझे उनके मुँह से अपना लंड बाहर निकालना पड़ा और मैंने उनसे कहा; "इतना क्या मोहित हो इस (मेरे लड़) पर की छोड़ती ही नहीं?" जवाब में भाभी बोली; "मेरा बस चले तो इसे अपनी बुर में जिंदगी भर डाले रहूँ!" ये सुन कर उनकी प्यास कितनी बढ़ चुकी है ये मैं समझ गया था| मैंने भाभी को अपने नीचे लिटाया और उनकी दोनों टांगों को खोल उनके बीच में आगया और उनके थूक से चुपड़े लंड को भाभी की छूट में ठेल दिया और पूरा का पूरा लंड अंदर जड़ तक पेल कर मैं उनपर सारा वजन डालकर पड़ गया|" अब भाभी को तड़पाने की बारी मेरी थी....
भाभी की बुर में अपना लंड डाले मैं उनपर पड़ा रहा| दो सेकंड नहीं हुए होंगे और भाभी का शरीर कसमसाने लगा| उनका शरीर कामवासना से भरने लगा था और भाभी के मुँह से एक घुटी से आवाज आई; "उम्म्म...ससस... करो ... ना..." मैंने भाभी के मुंख पर देखा और उन्हें याद दिलाया की उन्होंने मुझे कितनी यातना दी थी! खेर मैं भी उनपर जुल्म करने के मूड में नहीं था तो मैंने उनकी धक्कापेल चुदाई शुरू कर दी| मेरे हर धक्के में भाभी के चुके ऊपर-नीचे होने लगे थे और मुझसे उनकी ये थिरकन बर्दाश्त नहीं हो रही थी सो मैंने उनके दाहिने चुके पर अपने दाँत गड़ा दिए! इस हमले से भाभी की कराह निकल गई पर उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा बस मेरे बालों में हाथ फिराने लगी| 10 मिनट की चुदाई में ही भाभी और मैं अपने चार्म पर पहुँचने लगे| एक और ठस्सा और मेरे अंदर का जवाला मुखी फुट पड़ा और सारा लावा भाभी की बुर में भरने लगा| लावे की गर्माहट से भाभी भी अपने चार्म पर पहुँच गई और अपना रस बहा कर निढाल हो कर रह गईं| मैं भी उनके ऊपर पड़ा रहा की तभी दरवाजे पर दस्तक हुई जिसे सुन हम दोनों के प्राण निकल गए!
दस्तक सुन मैं और भाभी दोनों हड़बड़ा गए! हम दोनों की धड़कनें तेज थी और दिमाग के तोते उड़े हुए थे| बहार न जाने कौन होगा? अम्मा, बप्पा या भैया? जर्रूर भाभी को बिस्ता पर ना पाकर वो सब भाभी को ढूढ़ने निकले होंगे! इन्हीं ख्यालों ने मेरा दिमाग सनन कर रखा था की दुबारा दस्तक हुई और मैंने जल्दी से अपनी बनियान पहनी और तहमद लपेटा| भाभी को मैंने कहा की वो अंदर वाले कमरे में जा कर छुपे| मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा और अपनी साँसों को नियंत्रण में किया और सोचा की ऐसे जताऊँगा जैसे नींद से उठा हूँ| दरवाजे तक पहुँचने तक एक बार और दस्तक हुई; "आ रहा हूँ!" मैंने ऐसे कहा जैसे मेरी नींद अब खुली हो| दरवाजा खोला तो बाहर नीतू खड़ी थी; "क्या हुआ इतनी रात गए?" मैंने अंगड़ाई लेते हुए कहा| "चाचू वो...." इतना कह कर वो चुप हो गई और फिर कुछ सूंघने लगी| मैं सोच में पड़ गया की ये क्या सूंघ रही है? दारु या सिगेरट तो मैंने पी नहीं| मैं अभी अपनी सोच में डूबा था की वो बोली; "चाचू आप मुझसे नाराज तो नहीं? मैंने दोपहर मैं आपसे....." इतना कह कर वो रुक गई और उसकी नजर मेरे तहमद पर गई जिसमें गीले निशान पड़ गए थे| जब नीतू की नजरों का पीछा करते हुए मेरी नजर मेरे तहमद पर गई तो मुझे समझ आया की नीतू क्या देख रही थी| ये निशान दरअसल मेरे और भाभी की कामरस से भीगे लंड से आये थे| "नीतू आप पगला गए हो क्या? इतनी रात गए ये पूछने आये हो?" मैंने अपने तहमद से अपने लंड को ढकते हुए गुस्से में कहा| नीतू समझ गई थी की मैंने उसकी चोर निगाहों को पकड़ लिया है तो उसने अपनी आँखें नीचे कर लीं| उसका उदास चेहरा देख मैं भी थोड़ा पिघल गया और उससे समझते हुआ कहा; "मैं आपसे नाराज नहीं हूँ बस अपनी हद्द में रह कर बात किया करो| मेरे लिए आप अभी भी बच्चे हो और मैं आपका चाचा, हमेशा इस रिश्ते का लिहाज किया करो| अब जाओ और सो जाओ रात बहुत हो गई है, किसी ने देख लिया तो खामखा बवाल हो जायेगा| आईन्दा जो भी बात करनी हो दिन में किया करो|" इतना सुन नीतू ने हाँ में सर हिलाया और चली गई| मुझे उसके चेहरे पर ख़ुशी नहीं दिखी और मन ही मन मैं भी थोड़ा दुखी था क्योंकि वो तो बच्ची है और गलत काम तो मैं और भाभी कर रहे थे| मैंने दरवाजा बंद किया और वापस भाभी के पास पहुँचा| इससे पहले की भाभी पूछती मैंने स्वयं ही उन्हें बता दिया; "नीतू थी|" ये सुन कर उन्होंने थोड़ा चैन की साँस ली| "लेकिन कल से रात में आप यहाँ मत आना किसी ने देख लिया तो आफत हो जाएगी|" ये सुन कर भाभी का दिल टूट गया पर मैं उस समय कर भी क्या सकता था? भाभी बाहर जाने लगी तो उनका दिल रखने के लिए मैंने उन्हें पीछे से थामा| मेरी बाहें उनकी कमर से लिपट गई थीं और मैं उनकी गर्दन पर अपने होठ गड़ाए खड़ा था| मेरे इस अंदाज से भाभी पिघलने लगीं और जल्द ही उनके मुँह से सिसकारियां फूटने लगीं| बात आगे बढ़ पाती इससे पहले ही मैंने खुद को रोक लिया और मैं उनके कान में खुसफुसाया; "शुभ रात्रि!!" ये सुनकर भाभी के चेहरे पर मुस्कान लौट आई और वो ख़ुशी-ख़ुशी चली गईं|
अगली सुबह चूँकि मुझे कुछ न्योते बाँटने जल्दी निकलना था सो चाय भाभी ले कर आईं और जब वो आईं तो उनके चेहरे के रंग उड़े हुए थे| "क्या हुआ? चेहरा फीका क्यों है?" मैंने गंभीरता से पूछा| "वो....रात को.... मुझे यहाँ से जाते हुए नीतू ने देख लिया|" भाभी ने काँपते हुए स्वर में कहा| ये सुन कर मैं भी हैरान रह गया और मैंने भाभी को एक समाधान बताया| समाधान क्या ये तो कुर्बानी थी! "मेरी बात ध्यान से सुनो| अगर किसी ने कुछ पूछा तो कह देना की मैंने आपको रात में बुलाया था| सारे आरोप मुझ पर अलग देना, कहना मैं जबरदस्ती कर रहा था!" ये सुन कर भाभी स्तब्ध रह गईं; "पर ... मैं.....नहीं ... मैं ऐसा कुछ नहीं कहूँगी| फिर जो होना है वो हो जाए|" "जरा दिमाग लगा कर सोचो, अगर खुद पर आरोप लोगी तो सब आपको कुलटा कहेंगे! और नीतू का क्या? उसका ब्याह है, ये बात फ़ैल गई तो उससे कोई शादी नहीं करेगा! मेरा क्या है मैं घर-बार छोड़ दूँगा, किसी दूसरी जगह... दूसरे शहर गुजरा कर लूंगा| आप मेरी चिंता मत करो और नीतू के भविष्य के बारे में सोचो|" ये कह कर मैंने कपडे पहने और तभी अम्मा आ गईं और मुझे एक थैला दे कर घर लौटते समय कुछ सामना लेन को भी कहा| थैला ले कर मैं बप्पा और भैया से मिला और घर से निकल पड़ा| सब कुछ शांत था क्योंकि नीतू अभी तक सो रही थी पर मेरा दिल ये कह रहा था की आज घर लौट कर मुझे तूफ़ान का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा|
सारा काम निपटा कर घर लौटते-लौटते मुझे शाम के सात बज गए थे| घर लौटते समय मैं बस मन ही मन खुद को आने वाले सवालों के लिए तैयार कर रहा था| मैंने सोच लिया था की आज रात ही मैं घर छोड़के चला जाऊँगा और फिर कभी वापस नहीं आऊँगा| बस एक ही बात का गम था की मैं अपनी प्यारी हतिजी जिसे मैं अपनी बेटी की तरह चाहता था उसकी नजरों में गिर जाऊँगा और फिर कभी उससे मिल नहीं पाउँगा| पर इसमें सब मेरी ही गलती थी... अगर मैं भाभी को बहने से पहले ही रोक लेता तो आज मेरा ये छोटा सा आशियाँ बाढ़ में बह ना जाता| भारी-भारी क़दमों से मैं अपने घर पहुँचा और सीधा अम्मा के पास पहुँचा और उन्हें थैला दिया| पर अम्मा ने मुझे प्यार से बिठाया और पानी और गुड़ दिया| बप्पा और भैया भी आ गए और सब बड़े आराम से बातें कर रहे थे| मैंने ये सब देख अचंभित था और मेरी नजरें भाभी को ढूंढने लगीं| कुछ देर बाद अंदर से भाभी निकलीं और वो भी बहुत शांत थी और मुस्कुरा रही थी| इसका मतलब नीतू ने किसी से कुछ भी नहीं कहा था| मैं उठा और नीतू को ढूंढने लगा ताकि उससे बात करके उसे झूठ बता सकूँ की ये सब उसकी माँ की नहीं बल्कि मेरी गलती है| पर वो मुझे कहीं नहीं मिली, मेरे पूछने पर भैया ने बताया की वो सो चुकी है| मैं घर के आँगन में पहुँचा तो देखा नीतू वहां लेटी हुई थी मैं उसके पास पहुँच कर मैंने नीतू को आवाज लगाईं पर वो कुछ नहीं बोली और चुप चाप लेटी रही| मेरा मन किया की मेंमैंने नीतू के सर पर हाथ फेरने को हाथ बढ़ाया पर फिर खुद को रोक लिया| मेरा मन अंदर से कचोट ने लगा और मैं आत्मग्लानि की आग में जलने लगा| मेरे अंतर मन ने मुझे नीतू को छूने भी नहीं दिया| मैं ने अपनी जेब में हाथ डाला और नीतू के लिए लाइ हुई चॉकलेट निकाल कर उसके पास छोड़ के वापस मुड़ा| पीछे देखा तो भाभी खड़ी सब कुछ देख रही थी| मैंने भाभी से कुछ नहीं कहा और अपने घर लौट आया और कपडे बदलने लगा| तभी अम्मा और भाब ही खाना खाने को बुलाने आये तो मैंने उन्हें ये कहकर मना कर दिया की मैंने बाहर खाना खा लिया था सो मैं अभी खाना न यहीं खाऊँगा| अम्मा तो मेरा झूठ मान गई पर भाभी जान चुकी थी की मैं झूठ बोल रहा हूँ| अम्मा के जाने के बाद भाभी बोली; "क्यों झूठ बोल रहे हो?.... तुम नहीं खाओगे तो मैं भी खाना नहीं खाउंगी!" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और सर झुकाये बैठ गया| मेरा सर झुका हुआ देख भाभी बोली; "मैंने अभी देखा .... तुम.....बहुत चाहते हो नीतू को और मेरे कारन वो.... तुमसे बात भी नहीं कर रही|" ये बोलते हुए भाभी की आँखें छलक आईं| "हम्म्म...पर आज नहीं तो कल....उसने अपने ससुराल चले जाना था| फिर तो क्या ही .... मैं उससे मिलता..." इतना कह कर मैं चुप होगया और खुद को सँभालने लगा की मैं रो न पडूँ| "नहीं.... ये सब मेरे कारण हुआ है|" भाभी ने रोते हुए कहा| "नहीं.... गलती मेरी थी! मुझे आपको शुरू में ही ये सब करने से पहले रोक देना चाहिए था| खेर छोडो जो होगया उसे तो मैं बदल नहीं सकता आप बस चुप रहना और नीतू से कुछ मत कहना| अगर उसने पूछा तो वही कहना जो मैंने कहा था| सारा इल्जाम मुझ पर लगा देना और कहना मैंने आपको बरगलाया था| आप उसकी माँ हो और मैं नहीं चाहता की उसकी नजरों में कभी आपकी इज्जत कम हो| रही मेरी बात तो मैं था ही कौन? उसका चाचा... मेरे ना होने से उसे इतना दुःख नहीं होगा जितना अपने माँ के नहोने से होगा!" मैंने भाभी के आँसूं पोछते हुए कहा| मैंने आगे उन्हें कुछ कहने नहीं दिया और उन्हें अपनी कसम से बाँध कर चुप करा कर घर भेज दिया|
भाभी के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और पलंग पर लेट गया पर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी| सारी रात मैंने जाग कर काटी और नीतू के बचपन की यादों को याद करता रहा| सुबह होते ही मैं नाहा-धो कर तैयार हुआ और बप्पा के पास आ कर बैठ गया| मुझे इतनी जल्दी उठा देख कर बप्पा खुश हुए और हम खेत की तरफ निकल गए| उस समय कोई नहीं उठा था सो मैं और बप्पा एक सैर पर चल दिए| जब हम वापस आये तो मुझे और बप्पा को साथ देख सब हैरान रह गए| सिर्फ नीतू अभी तक उठी नहीं थी, बाकी सब उठ चुके थे| सबने साथ बैठ कर चाय पी और फिर अम्मा और बप्पा दूसरे गाँव पूजा में चले गए और भैया भी किसी काम से चले गए| मुझे घर रह कर आराम करने का काम दिया गया था क्योंकि की कल मैंने बहुत सारा काम किया था! मैं अपने घर लौट आया और सीढ़ी पर बैठा किताब में हिसाब लिखने लगा| करीब एक घंटे बाद भाभी और नीतू आये| भाभी ने नीतू का हाथ जोर से पकड़ रखा था और दोनों बहुत तेजी से मेरी तरफ आ रहे थे| मेरे पास पहुँच कर भाभी ने नीतू को मेरी ओर धकेल दिया|