Update 03

ये सब देख कर मैं हैरान रह गया| कुछ समझ नहीं आया की भाभी ने नीतू को इस तरह क्यों मेरी ओर धकेला? मैंने नीतू की तरफ देखा तो वो रो रही थी और भाभी का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था|

मैं ने नीतू को संभाला और वो आकर सीधा मेरे गले से लग गयी| ये देख भाभी और गुस्से से मेरी तरफ आई और नीतू को मेरे जिस्म से अलग कर दूर कर दिया| उनके भीतर गुस्सा इतना था की नीतू धम से जा गिरी| मैं तुरंत उसे उठाने के लिए बढ़ा तो भाभी बीच में आ गई और बोली; "पड़ी रहने दो इसे!" मैंने भाभी को साइड किया और नीतू को उठाके खड़ा किया| नीतू पुनः मुझसे लिपट के रोने लगी और ये देख भाभी गुस्से में बोली; "जानते हो क्यों टेसुए बहा रही है ये? महारानी जी कह रही हैं की ये शादी नहीं करना चाहती|" "भाभी शांत हो जाओ, शादी से पहले लड़कियों को इस तरह की घभराहट होती है| एक नई जगह, नया परिवार...." मेरे आगे कुछ बोलने से भाभी चिल्ला कर बोली; "जी नहीं! कहती है तुमसे प्यार करती है और तुम ही से शादी करेगी!" ये सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए! मैंने नीतू को खुद से अलग किया और उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "बेटा ये आप क्या बोल रहे हो? ये सब.... " मैं आगे कुछ बोल नहीं पाया ... शायद शब्दों का अकाल पड़ गया था! मैंने नीतू को खुद से अलग किया और वापस आ कर सीढ़ी पर बैठ गया| करीब-करीब दस मिनट तक सबकुछ शांत था या फिर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था| ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरे कान के पास आकर कोई बेम फोड़ दिया और उस धमाके से मेरे कानों में बस 'सननन' की आवाज ही आ रही थी! दिमाग सुनन पड़ चूका था!

दस मिनट बाद नीतू मेरे पास आई और मेरा हाथ पकड़ कर कुछ बोलने वाली थी की भाभी फिर से बीच में आई और मेरा हाथ छुड़ा कर बोली; "दूर से बात कर! ज्यादा नगिचे जाने की जर्रूरत नहीं है|" मैंने भाभी का ऐसा रूप कभी नहीं देखा था, वो मुझे इस तरह बचा रही थी जैसे की कोई मादा अपने नवजात बच्चे की रक्षा खूंखार जानवरों से करती है| नीतू ने अपने आंसूं खुद पोछे और बोली; "चाचू ... मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ! आपको अपना पति मान चुकी हूँ| मैं सिर्फ और सिर्फ आपसे ही शादी करुँगी वरना अपनी जान दे दूँगी|" नीतू ने जैसे रटी-रटाई बातें बोल दीं| शायद इन लीनों को वो बहुत दिनों से अभ्यास कर रही थी| मैं कुछ बोलता उससे पहले ही भाभी बोल पड़ी; "छिनाल! तुझे सिर्फ ....." इतना खा कर वो तेजी से नीतू की ओर लपकी और मैंने फुर्ती दिखते हुए उनका हाथ पकड़ कर रोक लिया और उन्हें चुप कर दिया| "नीतू... बेटा मुझे नहीं पता की ये बात आपके मन में कैसे आई या क्यों आप मेरे बारे में ऐसा सोचते हो? मैं बस इतना कहना चाहता हूँ की जो आप कह रहे हो वो मेरे लिए पाप है! मैंने आपको हमेशा अपनी बेटी की तरह चाहा है, कभी आपके बाजरे में कुछ गलत नहीं सोचा| क्यों आप मेरे प्यार को इस दिशा की ओर ले जा रहे हो? ये विचार लाना पाप है! प्लीज मुझे इस पाप का भागी मत बनाओ!" "आप और माँ जो करते हैं वो भी तो पाप है! फिर मेरे साथ शादी करने में आपको क्या परेशानी है? मैं अपने अरमानों का गाला घोंट दूँ और किसी और से शादी कर लूँ क्या ये पाप नहीं है?" नीतू की बात सुन भाभी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंची और वो नीतू की ओर लपकी और मेरे कुछ करने से पहले ही उन्होंने नीतू के गाल पर एक जोरदार झापड़ जड़ दिया|

"तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कुछ बोलने की? तुझे पता है की पाप क्या होता है? शादी के बाद तेरा बाप मुझे रोज मारता था, जबरदस्ती मुझे चोदता था, शराब पी कर मेरे जिस्म पर पिघलती हुई मोमबत्ती गिराता था, जलती हुई लकड़ी से मेरे जिस्म को सुलगाता था और जब डर के मैं अपने मायके जाती तो वहाँ आकर मेरे सामने आस-पड़ोस की रंडियों को बुला कर मेरे सामने चोदता था! तेरे चाचू मुझे बचाते थे मेरी रक्षा करते थे| तुझे तो पता भी नहीं की तेरे पैदा होने के बाद इन्होने किस तरह से मुझे और तुझे संभाला है| तेरे बाप की गन्दी नजर से बचा कर रखा तुझे वरना वरना वो तुझे कबका भोग चूका होता और तुझे माँ भी बना चूका होता! बदले में आज तक इन्होने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा और मांगते तो भी इनका ये क़र्ज़ नहीं उतार सकती थी| मेरी हर ख़ुशी का ख़याल रखते थे, वो इनका सम्मान था मेरे लिए| तेरे चाचू ने कभी कोई पहल नहीं की, ये तो मैं थी जिसने शुरुरात की थी क्योंकि मैं भी तेरी तरह इनके सम्मान को प्यार का नाम दे बैठी और इनसे दिल लगा लिया| कल जब तूने मुझे यहाँ से जाते हुए देखा तब मैं बहुत डर गई थी और जब मैंने कल इन्हें बात बताई तो जानती है क्या बोले ये? मुझसे बोले की नीतू से कहना की ये सब मैंने किया है! मैंने ही तुम्हें अपनी बातों से बरगलाया है! सारे आरोप मुझ पर लगा देना और कहना मैंने तुम्हारे साथ जबरदस्तीकी थी| अब बता कौन है पापी? मैं या ये?" इतना सब कुछ भाभी एक ही साँस में बोल गई और ये सुन कर नीतू का सर शर्म से झुक गया| ये मौका सही था उसे समझाने के लिए; “नीतू बेटा प्लीज मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ, प्लीज इस शादी से इंकार मत कर|" मैंने नीतू के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| जवाब में नीतू ने मेरे हाथों को अपने हाथों में थामा और कहा; "ठीक है चाचू|" और फिर वहाँ से चली गई|

नीतू के जाने के बाद मैं चारपाई पर सर नीचे झुका कर बैठ गया| पांच मिनट तक शान्ति छाई रही और फिर तभी भाभी शान्ति भंग करते हुए बोली; "इस लड़की को और कोई नहीं मिला? दिल भी आया तो आप पर जिस पर मेरा हक़ है!" ये सुन कर मेरे अंदर गुस्सा भड़कने लगा और मैंने गुस्से में कहा; "बस भाभी! थोड़ी देर के लिए मुझे अकेला छोड़ दो!" मेरे गुस्से डर के मारे भाभी वहां से चली गईं| मैं चारपाई पर पीठ के बल लेट कर छत की ओर देखने लगा ओर सोचने लगा| मुझे लगता है की मेरा औरतों के सामने भाव खाना कारन है की वो मुझसे चुदना चाहती हैं जबकि ये उनका मेरे प्रति खिंचाव था! कितना गलत सोच रहा था! खेर सारी रात न सोने के कारण आँखें बोझिल हो गई और मैं सो गया| मेरी नींद तब खुली जब बप्पा ने आ कर मुझे खाना खाने के लिए जगाया| अम्मा होती तो उन्हें खाने के लिए मना कर देता पर बप्पा को मना नहीं कर सकता था| सो मैं, बप्पा ओर भैया खाना खाने बैठ गए| मैंने खाना बहुत कम परोसवाया ये कह की कल बाहर से खाने के कारण पेट ख़राब है| खाना खाने के समय बस मैं, बप्पा, अम्मा और भैया ही बोल रहे थे| ना तो नीतू कुछ बोल रही थी और ना ही भाभी कुछ बोल रही थी| मैं बप्पा को हिसाब दे रहा था और तम्बू कनाट वालों की बातें हो रही थी की तभी नीतू (जिसने खाना बनाया था) वो रसोई से उठ के चली गई| हमारे यहाँ रिवाज है की जब तक सब खाना नहीं खा लेते रसोइया रसोई से बाहर नहीं जाता| नीतू को जाता देख अम्मा ने गुस्से से नीतू को बैठे रहने को कहा तो नीतू वापस जा कर बैठ गई| आज से पहले नीतू ने कभी ऐसा नहीं किया था! खाना खाने के बाद मैं बहाना बना कर वहां से निकल आया| अगले दो दिन तक यूँ ही चलता रहा, मैं सिर्फ खाना खाने दिखता था| बाकी समय मैं किसी न किसी काम से बहार ही रहता था| ना तो मैं भाभी से कुछ बात कर रहा था और ना ही नीतू से!

तीसरे दिन बप्पा ने मेरी ड्यूटी घर पर रह कर अनाज की डिलीवरी और शादी के कुछ सामान को घर रखवाने लगा दी| अम्मा, बप्पा और भैया तीनों जेवर लेने के लिए चले गए| मैं अपने घर पर चारपाई पर लेटा मोबाइल में गेम खेल रहा था की तभी भाभी भागी-भागी मेरे पास आईं और हाँफते हुए बोली; "मुनना.... नीतू दरवाजा नहीं खोल रही है!" इतना सुन्ना था की मैं तुरंत हरकत में आया और उसके कमरे की तरफ भागा और देखा की दरवाजा अंदर से बंद है| मैंने बाहर खड़े हो कर बहुत आवाज लगाईं पर वो कुछ नहीं बोली| ये देख कर मेरी बोखलाहट बढ़ गई और मैंने तीन-चार बार दरवाजे को लात मारी पर दरवाजा नहीं खुला| मैंने अपने कंधे के दरवाजे को धकेलना शुरू किया और दस मिनट तक मशक्कत करने के बाद दरवाजा जा गिरा| मैं तुरंत अंदर घुसा तो देखा नीतू स्टूल पर खड़ी रस्सी के फंदे को गले में डाल रही थी| मैंने तुरंत नीतू के पाँव पकड़ के उसे ऊपर उठा लिया और भाभी ने चारपाई आगे खींच कर उस पर चढ़ गई और नीतू के गले से रस्सी निकाल दी| मैंने नीतू को नीचे उतारा और उसे स्टूल पर बिठा दिया| उसका चेहरा पूरी तरह फीका पद चूका था, न तो वो रो रही थी न गुस्से में दिख रही थी| ऐसा लग रहा था मनो उसके चेहरे पर कोई भाव ही नहीं थे| मैंने कई बार नीतू-नीतू पुकारा पर वो कुछ नहीं बोली बस एक टक बांधे सामने दिवार को देखती रही| इतने में भाभी ने पीछे से उसके गाल पर चमाट दे मारी, पर नीतू फिर भी कुछ नहीं बोली| भाभी बोली; "ये ऐसे कुछ नहीं बोलेगी! लातों के भूत बातों से नहीं मानते|" और इतना कहते हुए नीतू के दोनों गाल पर एक-एक चमाट और धर दिया| इससे पहले की भाभी उसे और मारती या कुछ बोलती मैंने भाभी का दाहिना हाथ पकड़ लिया और बोलै; "बस! आप बाहर जाओ और मुझे नीतू से बात करने दो|" पर भाभी मान नहीं रही थी और नीतू को मारना चाहती थी| मैंने भाभी को आँखें दिखा कर डराया और जबरदस्ती बाहर जाने को कहा|

भाभी के जाते ही नीतू फफक कर रो पड़ी और आ कर मेरे गले से लग गई और मेरी छाती को अपने अश्रुओं से भिगोने लगी| कहीं न कहीं मैं उसके प्यार को समझ पा रहा था| खुद को उसकी जगह रख कर उसके दुःख को समझने की कोशिश कर रहा था| मैंने नीतू को पुचकारा और उसे समझने की कोशिश करने लगा; "बेटा ये आप क्या करने जा रहे थे? आपको कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता!" नीतू ने अपने आँसूं पोछे और सुबकते हुए बोली; "चाचू... मैंने बहुत कोशिश की.... पर नहीं हो पा रहा .... मैं..... आपको नहीं...... शादी नहीं ......" नीतू से बोल पाना बहुत मुश्किल था वो बस सुबके जा रही थी| मैं उसकी बात तो समझ ही गया था तो उसे समझाने लगा; "बेटा, आपको ये सब भूल कर आगे बढ़ना होगा| शादी करके अपना घर बसाना होगा! आपके शादी ना करने से घर में बवाल हो जाएगा! जिंदगी इतनी आसान नहीं होती जितना दिखती है| मैं मानता हूँ की मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं है|” अब तक नीतू ने सुबकना बंद कर दिया था; "चाचू ... अगर आप चाहते हो की मैं ये शादी करूँ तो क्या आप मेरी एक इच्छा पूरी करोगे?" "हाँ-हाँ बोल!" मैंने फटैक से बोल दिया|

"मुझे आपका प्यार चाहिए, शादी से पहले भी और शादी के बाद भी! अगर आप मुझे ये वचन दो तो मैं आपसे वादा करती हूँ की मैं ये शादी करुँगी और दुनिया की नजर में इसे निभाऊंगी भी! पर मेरा पहला और आखरी प्यार आप ही होंगे| मेरे जिस्म पर मेरे दिल पर सिर्फ आप ही का हक़ होगा|" नीतू ये सब एक सांस पर बोल गई और उसकी आवाज में मैंने एक अजीब से गौरव महसूस किया|

नीतू की बात के जवाब में मैंने नीतू के बाएं गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद किया| मेरा हाथ इतना जोरदार था की नीतू के नीचले होंठ से खून निकल आया| "नीतू! आज तुने सारी हदें पार कर दीं! मैंने तुझे क्या समझा था और तू क्या निकली? मुझे लग रहा था की ये तेरा सच्चा प्यार है पर ये तो तेरे अंदर की वासना है जो अब बाहर आ रही है| तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है! मैं तेरा चाचा हूँ तुझे से आठ साल बड़ा हूँ और जब मैंने तुझे साफ़-साफ बोल दिया की मैं तुझसे प्यार नहीं करता तो तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है?"

"प्यार तो आप माँ से भी नहीं करते पर फिर भी उनकी ख़ुशी के लिए आप उन्हें प्यार तो 'देते' हो न, और उम्र में तो माँ भी आपसे बड़ी हैं फिर उनके साथ आपको .... 'करने' में कोई दुःख नहीं!" नीतू के शब्दों में उसका क्रोध साफ़ दिख रहा था पर उसके जवाब ने मेरे अंदर की क्रोध की ज्वाला को और भड़का दिया था| मैंने खींच के एक और झापड़ उसे रसीद किया; "बहुत जुबान लड़ाने लग गई है तू! शादी तो तेरे अच्छे भी करेंगे और अगर तू ने ना नुकुर की तो मैं ये सब बातें अम्मा-बप्पा के सामने रख दूँगा! ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? मुझे घर से निकाल देंगे, पर तेरी शादी तो तय है क्योंकि उन्हें अपनी 'नाक' ज्यादा प्यारी है| और मेरा क्या है मैं किसी दूसरे शहर चला जाऊँगा, नई जिंदगी शुरू करूँगा ..... और हो सकता है की तेरी माँ मेरे साथ भाग आये! फिर तो हम दोनों एक साथ रह भी सकते हैं, और तू सड़ती रहना अपने ससुराल में!" इतना कह कर मैं बाहर निकला तो भाभी दरवाजे पर टकटकी बांधें खड़ी थी|

मैंने भाभी से कुछ नहीं कहा और सीधा अपने घर की ओर चल दिया| भाभी ने पीछे से मुझे कई बार पुकारा पर मैं कुछ नहीं बोला| जैसे ही मैंने अपने घर में घुसा भाभी पीछे से आगे ओर बोली; "कुछ तो बताओ?" मैंने उनसे नीतू की कही हुई बात छुपाई क्योंकि जानता था की ये सुन कर वो नीतू की चमड़ी उधेड़ देंगी| "मैंने उसे समझा दिया है! आगे से वो ऐसी कोई हरकत नहीं करेगी|" ये सब मैंने इतने यकीन से इसलिए कहा क्योंकि मैं समझ चूका था की मेरी गीदड़ भबकी से नीतू बुरी तरह डर गई है| मेरी बात सुन कर भाभी को दिलासा हो गया था की सब कुछ ठीक हो जायेगा| "पर तुम मुझसे इतना उखड़े-उखड़े क्यों रहते हो?" मैंने भाभी की बात का कोई जवाब नहीं दिया ओर आकर सीढ़ी पर बैठ गया| भाभी मेरे और नजदीक आई, मेरा दिमाग पहले ही बहुत गर्म था और भाभी के सवाल ने तो मेरी क्रोधाग्नि को और भड़का दिया; "माँ-बेटी मिल कर मेरे दो टुकड़े कर लो! एक आप रख लो और एक उसे दे दो!" ये सुन कर एक पल के लिए भाभी दहल गई थी| ये ही नहीं उनके पीछे नीतू भी मेरी आवाज सुन कर सहम गई और वापस चली गई| मेरी नजर नीतू पर देर से पड़ी थी सो मैं ने उसे जोर से आवाज लगा कर पुकारा| नीतू डर के मारे दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई और सर झुका कर खड़ी हो गई और और नीचे झुकाये हुए बोली; "चाचू मुझे माफ़ कर दो! मैं दुबारा ऐसी कोई हरकत नहीं करुँगी|" ये सुन कर भाभी भी हैरान रह गई की मेरा इतना खौफ है? मैंने आगे कुछ नहीं खा बस नीतू के सर पर हाथ रख कर उसे माफ़ कर दिया| इससे ज्यादा मैं उसे क्या कहता? मेरे लिए इतना ही काफी था की नीतू को अकाल आ गई है!

नीतू आगे कुछ नहीं बोली और जाने लगी, तभी मैंने उसे पुकारा और कहा; "बेटा आज भरता खाने का मन है|" "जी चाचू" उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर खाना बनाने की तैयारी करने चली गई| ये सब मैंने चेक करने के लिए किया था की कहीं वो मेरे सामने ड्रामा तो नहीं कर रही अच्छा बनने का| मुझे तसल्ली हो गई थी की अब सब कुछ ठीक है| इधर जब मेरी नजर भाभी पर पड़ी तो वो ऐसे घूर रही थी जैसे कह रही हो उससे तो प्यार से बात करते हो पर मुझे घास तक नहीं डालते| मैं उनके मन के विचारों को भांप चूका था पर मेरे अंदर थोड़ा गुस्सा उनके प्रति भी था| खेर भाभी ने मुझे कुछ नहीं कहा और मुँह टेढ़ा करके चली गई| थोड़ी देर बाद घर पर प्रधान की बहु आई, उसके साथ चार आदमी भी थे जो ट्रेक्टर में हमारे घर का सामान ले कर आये थे| वे लोग गलती से उनके घर पहुँच गए थे और प्रधान की बहु उन्हें मेरे पास ले आई थी| सारा सामान उतार कर मैंने उन लोगों को पैसे दिए और वे लोग चले गए| अब मैं और प्रधान की बहु रह गए थे| “कब आये शहर से बताया भी नहीं?" उसने पूछा| "मैं तो आपको जानता भी नहीं हूँ, फिर भला आपको क्यों बताऊँ?" "है हमहीं से सब लेना देना और हमें ही नहीं बताओगे!" वो बुदबुदाते हुए बोली| "क्या?" मैंने पूछा तो वो बात पलटते हुए बोली; "हम कह रहे थे की, हम बहुत सुने हैं आपके बारे में!" उसने छेड़खानी भरे अंदाज में कहा| "मेरे बारे में? अच्छा...किस्से?" मैंने पूछा| "उमा से!" ये सुनते ही मैं समझ गया की इसने क्या सुना होगा| "क्या-क्या सुना मेरे बारे में" मैंने भी उसी के अंदाज में पूछा| ".............." वो आगे कुछ बोल पाती की तभी भाभी आ गई और मुझे ऐसे घूर रही थी जैसे मेरी चोरी पकड़ ली हो! "अच्छा तुम आई हो! तभी मैं कहूं ...." भाभी को वहां देख तो प्रधान की बहु के प्राण सूख गए और वो अच्छा चलती हूँ बोल कर निकल गई|

भाभी मेरी ओर गुस्से से देखने लगी और बुदबुदाते हुए बोली; "मुझमें क्या काटें लगे हैं|" मैंने ये सुन लिया और थोड़ा जोर से बोला; "और क्या" ये सुन कर भाभी और गुस्सा हो गई और पैर पटक कर वहां से चली गई| दोपहर को खाने के समय घर पर मैं, भाभी और नीतू ही थे| अम्मा, बप्पा और भैया शाम को आने वाले थे| मैंने नीतू और भाभी को भी साथ खाने के लिए कहा क्योंकि बहुत दिन से हम तीनों के बीच दिवार सी खड़ी हो गई थी| खाना खाने के समय मैं ही बातों का सञ्चालन कर रहा था और कोशिश कर रहा था की नीतू अपनी माँ से पुनः बात करना शुरू कर दे और भाभी भी नीतू से बात करना शुरू कर दें| हमने काफी देर तक इधर-उधर की बातें की और तभी मुझे भैया का फ़ोन आया और मुझे काम बताया गया जिसके लिए मुझे घर से थोड़ा दूर जाना था| मुझे ये भी बताय गाया की जेवर अभी तक पूरे नहीं बने हैं सो वे सभी शहर चले गए है और उन्हें आने में रात हो जाएगी| मैंने उन्हें रात को जेवर घर नहीं लाने की सलाह दी और उन्होंने मान भी ली| मैं पैसे ले कर घर से निकला और फटा-फट पेडल मारते हुए अपनी साईकिल दौड़ा दी| आधे घंटे का रास्ता २० मिनट में पूरा किया और वहां पहुँच कर भैया के बताये हुए आदमी से उनकी बात कराई और उसे पैसे दिए| मैं लौटने लगा तो नीतू का फ़ोन आया और उसने चॉकलेट लाने की फरमाइश की और भाभी ने घर जल्दी आने की फरमाइश! मैंने चॉकलेट खरीदी और वापस आ रहा था की तभी भाभी का फोन आया और वो मुझसे बतियाने लगी| जो बात मुझे अटपटी सी लगी वो ये की वो बार-बार मुझसे पूछ रही थी की मैं कहाँ तक पहुँचा| जब मैं घर से करीब दस मिनट दूर था तभी वो बोली की मैं हमारे खेत वाले रस्ते से आऊं और खेत से गन्ना तोड़ लाऊँ क्योंकि नीतू गन्ना खाना चाहती है| सो मैंने अपनी साईकिल दूसरी तरफ घुमा ली और सायकिल खेत के बरा-बर खड़ी कर अंदर घुस गया | जैसे ही मैं खेत के बीचों बीच पहुँचा तो देखा…….

खेत के बीचों बीच एक चादर बिछी हुई थी, जिसे देख कर मैं सतर्क हो गया और मुझे लगा कहीं ये नीतू की चाल तो नहीं! मैं तुरंत पीछे मुड़ा और देखा भाभी पीछे ल्हाडी है| भाभी वहां छुपी पहले ही से मेरा इंतजार कर रही थी|

मैं इससे पहले कुछ बोल पाटा उन्होंने जोर से मेरी कमीज के कॉलर को पकड़ लिया और दाँत पीसते हुए बोली; "बहुत हुआ मुझे तड़पाना! ख़बरदार जो चूं-चपड़ की तो! चुप-चाप जो कह रही हूँ वो करो वरना..." "वरना क्या कर लोगे?" मैंने उनकी आँखों में घूर के देखते हुए कहा| "कभी सुना है की किसी मर्द का बलात्कार किया हो?" भाभी ने गुस्से से घूर के देखते हुए कहा| ये सुन कर मैं थोड़ा हैरान हो गया की ऐसा कभी हो सकता है क्या? मेरा ये सोचना ही मुझ पर भारी पड़ा क्योंकि भाभी ने इसका फायदा उठाया और मुझे इस कदर धकेला की मैं सीधा चादर पर जा गिरा| मैं संभल पाता इससे पहले ही भाभी मेरे सीने पर सवार हो गई और अपने दोनों हाथों से मेरी कमीजों को इस कदर फाड़ा की सारे बटन टूट गए| "ये.....ये.....क्या......." मैं इतना ही बोल पाया था की भाभी ने अपने होंठ मेरे होठों पर धर दिए और मेरे होठों को अपने मुँह में भर चूसने लगी! मेरी छाती में उन्होंने अपने नाखून गड़ा दिए थे और ऐसा लग रहा था मानों किसी जंगली जानवर ने अपने शिकार को दबोच लिया हो| उस समय मुझे बहुत बेचैनी हो रही थी और थोड़ी बहुत सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी थी| भाभी की हैवानियत देख कर मैं हैरान था, मैंने कभी नहीं सोचा था की भाभी अपनी छूट की आग से वशीभूत हो कर इस कदर हैवान बन सकती है| अचानक भाभी ने जोश में आ कर मेरा निचला होंठ दांतों से काट लिया और उसमें से खून निकलने लगा| मैं दर्द के मारे करहाना चाहता था पर उनके होंठ मेरी आवाज को बाहर जाने ही नहीं दे रहे थे| मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वो उन्हें मेरे होंठ से निकल रहे खून को पीने में बहुत मज़ा आ रहा है| अभी तक तो मैं इस लिहाज से खुद को काबू करके बैठा था की ये औरत मेरी भाभी है पर अब मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा था|

मैं अपने दोनों हाथों से उनको मुझसे दूर करने लगा तो मेरे हाथों में उनके दूध आ गए और मैंने गुस्से में आ कर उन्हें बहुत जोर से दबा दिया! मेरे इस हमले से भाभी को असहनीय दर्द का एहसास हुआ और वो बिल-बिला कर चीखी और मेरी गर्दन पर अपने नाखूनों से खरोंच दिया जिसमें से खून निकल आया था|! मैंने उन्हें अपने ऊपर से धक्का दिया और वो दूसरी करवट लिए अपने दूध को अपने हाथों से थामे दर्द से कराहने लगी| मैंने जबअपनी छाती की ओर देखा तो मेरी छाती पर उनके नाखूनों से नोचने के निशान थे और कुछ जगह से खून की कुछ बूँदें भी निकल आई थी| मैंने उठ कर खड़े होने की कोशिश की तो मेरे दाहिने कूल्हे में दर्द होने लगा, क्योंकि भाभी ने जब मुझे धक्का दिया था तो मैं धम से सीधा अपने कूल्हों के बल ही गिरा था| जैसे-तैसे मैं उठ कर खड़ा हुआ और देखा तो भाभी की आँखें भरी हुई थी और वो मुझे दर्द से तड़पता हुआ देख रही थी| मैं लंगड़ाते हुए खेत से बाहर निकला और साइकिल को खींच कर अपने घर तक लाया| मेरे कूल्हे के दर्द ने मुझे साईकिल पर सवार तक नहीं होने दिया| मुझे दर लग रहा था की कहीं मेरा कुल्हा तो नहीं टूट गया!

बड़ी मुश्किल से मैं घर पहुँचा ओर टाला खोला| घर के अंदर तो मैं जैसे-तैसे घुस गया पर चारपाई को देख कर मुझे नानी याद आ गई! क्योंकि दर्द इतना था की चारपाई पर बैठने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी| मैं वहीँ खड़े-खड़े भाभी को मन ही मन कोस रहा था| दस मिनट तक मैं अपने कूल्हे पर हाथ रखे खड़ा रहा और सोचता रहा की कैसे बैठूं? मैंने एक बार तरय करने का खतरा उठाना ठीक समझा पर चारपाई तक दस कदम चला ना जाए! मैं पैर घसीट के चलने लगा और चारपाई तक पहुँचते-पहुँचते अपने कमीज उतार के अपने जिस्म पर खून की बूँदें साफ़ कर कोने में फेंक दी| जैसे ही बैठने के लिए झुका की मेरा कुल्हा चमक गया और मैं गिरने को हुआ की तभी नीतू ने आकर मुझे संभाल लिया| मेरे नंगे बदन पर उसके स्पर्श से ही मैं सिंहर उठा और नीतू के देख के थोड़ा इत्मीनान आया| "चाचू क्या हुआ? आप इस तरह...." नीतू ने बहुत चिंतित होते हुए पुछा! "आह...बेटा कुछ नहीं.... तू मेरा एक काम कर गाँव के किसी मालिश करने वाले को बुला कर ले आ| मुझे बहुत दर्द हो रहा है|" "पर चाचू...." नीतू ने आगे कुछ बोलना चाहा पर मैंने उसकी बात काट दी; "प्लीज बेटा जो कह रहा हूँ वो कर दे|" नीतू ये सुन तुरंत वहाँ से ममालिश वाले को बुलाने भाग गई| दर्द के मारे मेरे दिमाग में भाभी के लिए गुस्सा ही गुस्सा भरने लगा था| मन तो कर रहा था की अभी जाके भाभी की गांड तोड़ दूँ ताकि उन्हें पता चले की दर्द क्या होता है| पाँच मिनट में नीतू भागी-भागी वापस आई और बोली; "चाचू... दीनू काका तो शहर गए हैं, तीन दिन बाद आएंगे|" ये सुन कर तो मेरी कराह निकल गई| नीतू मेरे और पास आई और बोली; "चाचू मुझे तो बताओ की हुआ क्या है?" "कुछ नहीं बेटा मैं साईकिल से आ रहा था और सामने से एक पागल कुतिया आ गई और मैं साईकिल संभाल नहीं पाया और गिर पड़ा| इसलिए मेरे कूल्हे में बहुत दर्द हो रहा है|" ये सुन कर नीतू बहुत परेशान हुई पर फिर उसकी नज़र मेरी लहू-लुहान छाती पर गई; "चाचू पर ये आपकी छाती से इतना खून क्यों निकल रहा है?" "ये भी उस कुतिया के करना हुआ| जब मैं साईकिल से गिरा तो उसने मुझे काटने की कोशिश की, उसका मुँह तो मैंने पकड़ लिया पर उसके नाख़ूनी पंजों ने.... मेरा ये हाल किया|" ये सब मैंने आपने दाँत पीसते हुए कहा| ये सब सुन नीतू बहुत दुखी हुई और तुरंत रुई और डेटोल ले आई| "शुक्र है चाचू उसने काटा नहीं|” ये कहते हुए उसकी भर आईं| मैंने उसके सर पर हाथ फेरा और उसने डेटोल लगा कर मलहम लगा दिया| "चलो चाचू मुझे बताओ कहाँ दर्द है मैं उसपर ये आयुर्वेदिक तेल लगा देती हूँ|" "नहीं बेटा रहने दे... मैं ब्रूफेन की गोली खा लूंगा उससे ठीक हो जायेगा|" "मैं आपकी एक नहीं सुनने वाली| चुप-चाप बताओ नहीं तो मैं आपसे बात नहीं करुँगी|" नीतू ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा|

मैंने उसे एक बार समझाने की कोशिश की; "बेटा मुझे कूल्हे पर दर्द है और तुम्हारे सामने कैसे......"

"आप उसकी चिंता मत करो| मैं अपनी आँखें बंद कर लुंगी| मैं मन ही मन सोचने लगा की बेटा आँखें बंद करने से थोड़े ही कुछ होता है| खेर मरता क्या ना करता नीतू को नाराज नहीं करना चाहता था क्योंकि शादी के बाद फिर कहाँ मुलाकात होती| मैंने नीतू से कहा की अंदर बैग से वोलिनी ले कार आये| इसका फायदा ये था की नीतू को इसकी ज्यादा मालिश नहीं करनी पड़ती और मुझे कम से कम देर के लिए उसे अपने 'चूतड़' दिखाने थे| अब मेरे लिए चुनौती ये थी की मैं दवाई कैसे लगवाऊँ? यदि खड़े-खड़े लगवाता हूँ तो अगर पैंट और कच्छा नीचे गिर गया तो? पर लेट भी तो नहीं सकता था क्योंकि कूल्हे मुझे ज्यादा हिलने नहीं दे रहे थे| जब नीतू दवाई ले कर आई तो मुझे सोच में देख वो बोली; "चाचू आप चारपाई पर औंधे मुंह लेट जाओ और मैं आँख बंद करके दवाई लगा दूंगी|" "बेटा वही तो मुसीबत है की मुझसे हिला भी नहीं जा रहा|"

"रुको मैं आपको सहारा देती हूँ|" नेहा ने मेरे एक हाथ को अपने कंधे पर रख कर मुझे सहारा दिया और मैं जैसे-तैसे करहाता हुआ औंधे मुँह लेट गया| मैंने अपनी पैंट के हुक खोल दिए और नीतू ने उसे नीचे कर दिया| अब बारी थी मेरे कच्छे की| नीतू ने जैसे ही कच्छे की इलास्टिक को हाथ लगाया मेरे शरीर में एक झुरझुरी सी छूटी और लंड महाराज तननाने लगे| इधर नीतू ने कच्छे को नीचे सरका कर मेरे चूतड़ और गांड को खुली हवा का अनुभव कराया| मुझे बहुत शर्म आने लगी थी; "आँखें बंद हैं ना?" मैंने नीतू से पूछा तो उसने "हम्म्म" में जवाब दिया| अब मुझे नहीं पता की उसकी आँखें बंद थी या नहीं| अब नीतू ने अपने हाथ से मेरे कूल्हे को छुआ तो एक सेकंड के लिए मैं चुप रहा| "चाचू? बताओ कहाँ दर्द है?" मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो आंखें बंद किये अपने हाथ को मेरे चूतड़ों पर चला रही है| फिर मैंने उसका हाथ पकड़ कर lower back में जगह बताई| नीतू ने आँख जर्रूर खोल ली थी क्योंकि उसने बड़े आराम से सही जगह दवाई लगाईं| नीतू की उँगलियाँ दवाई लगा रही थी पर मुझे बहुत अजीब लग रहा था की मैं अपनी भतीजी के सामने चूतड़ निकाले लेटा हुआ हूँ| दवाई लगाते-लगाते यका-यक ही उसकी एक ऊँगली मेरे गांड के छेद तक जाप हुन्ची और उसकी ऊँगली का नाखून मेरी गांड के छेद पर जा लगा और मैं जोर से चिहुंका; "आह!" मेरी चिहुंक सुन नीतू डर गई और बोली; 'sorry चाचू! आँखें बंद हैं ना इसलिए………" आगे वो कुछ नहीं बोली और मैं ये सोच के जाने दिया की ये उसने गलती से किया होगा| दो मिनट बाद मैंने उसे रुकने को कहा और अपनी पैंट ठीक कर ली| नीतू ने फिर से मुझे सहारा दे कर सीधा लिटा दिया था और वो हाथ धोने चली गई| हाथ धो कर नीतू मेरे लिए नीम्बू का शरबत बना कर लाइ और मैंने एक गोली ब्रूफेन ली ताकि दर्द कम हो जाए| वो मेरे पास ही बैठ गई ताकि मुझे कोई तकलीफ न हो| मैं नीतू को अलग-अलग शहर के किस्से सुनाता रहा और वो भी मुझसे अपने कॉलेज के दिनों की बातें कर रही थी| अँधेरा होने को आया था और अम्मा, बप्पा और भैया घर लौट आये थे| मेरे एक्सीडेंट की बात सुन तीनों मेरे पास भागे-भागे आये और हाल पूछने लगे| इतने में पीछे से भाभी भी आ गई और मैंने उन्हें 'सुनाने' के लिए कुतिया वाली बात दोहराई! ये सुन कर भाभी के चेहरे पर गुस्सा साफ़ झलक रहा था, आखिर मैंने उन्हें कुतिया जो कहा था!

ये सुन कर अम्मा ने भाभी को डाँट लगाईं; "तूने मुनना का ख़याल क्यों नहीं रखा| मुनना को कुछ भी काम कहो फ़ौरन दौड़ कर देता है, और इसे चोट लगी और तू इधर झाँकने भी नहीं आई! ऐसा क्या काम कर रही थी?" भाभी क्यों नहीं जानती थी ये तो मैं जानता था, डर के मारे फटी जो हुई थी उनकी! खेर अम्मा ने रात को उन्हें के पास घर में सोने को कहा ताकि वहां मेरी देख भाल की जा सके| बप्पा के सामने म ऐन उनका विरोध कर नहीं सकता था सो मैंने उनकी बात मान ली| रात को खाना खाने के बाद मेरा बिस्तर नीतू ने अपने बिस्तर से करीब २० कदम दूर लगाया ताकि वो रात में उसकी नजर मुझ पर रहे| आमतौर पर हमारे गाँव में मर्द और औरतें अलग-अलग सोते हैं| (जब तक की उनका कोई चुदाई प्रोग्राम ना हो!) पर चूँकि मेरी हालत ऐसी थी मुझे ये ख़ास treatment मिल रहा था| अम्मा और भाभी का बिस्तर नीतू के बगल में था और बप्पा और भैया का बिस्तर दूर पेड़ के पास था|

रात में मेरी आदत है की मैं एक बार तो मूतने अवश्य उठता हूँ| पर आज की रात में मूतने के लिए उठने में जैसे मौत आ रही थी| मैं कोशिश कर रहा था की कम से कम आवाज करूँ ताकि कोई जाग ना जाए| पर मूतने के लिए जब उठने लगा तो अचानक से कूल्हे पर हुई चमक से मेरी कराह निकल गई; "आह!" जिसे सुन नीतू दौड़ती हुई मेरे पास आई| "आह! अरे बेटा आप सोये नहीं?" "नहीं चाचू... मुझे लगा कहीं आपको उठना पड़े तो मैं आपको मदद कर दूँ|”

"THANK YOU बेटा!" नेहा ने मुझे सहारा देकर उठा के बैठा दिया| "बस बेटा मैं अब चला जाऊँगा ... आप सो जाओ!" मैंने नेहा से कहा और जैसे-तैसे उठ खड़ा हुआ| मैं मूतने के लिए थोड़ी दूर गया और जब वापस आया तो पाया नीतू अब भी जाग रही थी| "एक बार आपको लिटा दूँ फिर सो जाऊँगी|" फिर नीतू ने मुझे सहारा दे कर लेटने में मदद की और मैंने फिर उसे सो जाने को कहा| पर मेरा मन कह रहा था की वो सोने वाली नहीं है| थोड़ी देर बाद मैंने करहाते हुए करवट ली तो देखा की नीतू अब भी जाग रही थी और उसकी नजरें मुझ पर टिकी हुई थी| मैंने खुस-फुसा कर उसे सोने को कहा और फिर मेरी कब आँख लग गई पता नहीं चला|

सुबह जब आँख खुली तो नीतू ने मुझे उठा के बिठाया, उसकी शक्ल देख कर लग रहा था की वो रात भर तनिक न सोइ है| "बेटा...आप मेरे लिए रात भर जागे हो| अब आप आराम करो दोपहर में उठना|" मेरी बात सुनते हुए अम्मा भी वहाँ आ गई और उन्होंने भी नेहा को तारीफ की| अम्मा की बात सुन नीतू मान गई और सोने चली गई और अम्मा ने सबको कह दिया की उसे कोई नहीं जगायेगा| मैं रुपये में एक आने बेहतर महसूस कर रहा था सो मैं ने अम्मा से एक डंडा माँगा और उसे लाठी की तरह इस्तेमाल करता हुआ अपने घर आ गया| अम्मा ने मदद करनी चाही पर मैंने उन्हें मन कर दिया| अब अम्मा ने बी भाभी की ड्यूटी लगाईं को मेरी देख भाल करें जो मुझे गंवारा नहीं था| पर मरता क्या न करता, कुछ बोल नहीं पाया| मेरे घर पहुँचते ही भाभी भी पीछे से आ गई और बोली; "मैं....." पर मैंने उन्हें वहीँ चुप करा दिया; "मुझे कुछ नहीं सुनना बस मुझे एक बाल्टी गर्म पानी ला दो|"

भाभी कुछ नहीं बोली और पानी लेने चली गई| करीब आधे घंटे बाद उन्होंने मुझे गर्म पानी ला दिया और फिर से कुछ बोलने को मुंह खोला ही था की मैंने कहा; "GET OUT!" भाभी मेरी तरफ मुंह फाड़े देखती रही| "सुना नहीं? निकल जाओ यहाँ से! या फिर फिर से मेरे साथ 'बलात्कार' करने का मन है?" ये सुन कर भाभी का सर झुक गया और वो वहां से चली गई| मैंने दरवाजा बंद किया और गर्म पानी से नहाया और फिर खुद ही किसी तरह दवाई लगा ली और गर्म पट्टी बाँध ली| चाय पीने के बाद बप्पा दूसरे गाओं से एक मालिश वाले को ले आये और उसने जो जम के मेरी मालिश की! मेरे सारे अंजार-पंजर हिल गए!!! उसने बताया की कोई नस चढ़ने के कारन मुझे इतना दर्द हो रहा है| कुतिया वाली बात सुन कर वो बहुत हँसा और मुझे तो इसमें कुछ अजीब सा सुख मिल रहा था| दोपहर में खाना नीतू ले कर आई और खाना रख कर मेरा हाल-चाल पूछने लगी| जब मैंने उसे बताया की मालिश वाले ने कैसे मेरे अंजार-पंजर ढीले किये तो वो बहुत हँसी और उसे हँसता हुआ देख मुझे भी अच्छा महसूस होने लगा| मैंने नीतू को मेरी कल वाली पैंट थाके लाने को कहा और उसमें से चॉकलेट निकलने को कहा| जब नीतू ने चॉकलेट निकाली तो उसका काचुम्भर निकल चूका था जिसे देख वो बहुत हँसी और मेरी हँसी छूट गई| खेर ये हँसी-मजाक चलता रहा और अगले तीन-चार दिन नीतू ने मेरा बहुत ख़याल रखा और उस मालिश वाले ने जम कर मेरी हड्डियां ढीली कीं| पाँचवे दिन मैं पंद्रह आने ठीक हुआ तो भाभी बीमार पड़ गई!

सुबह का समय था और मैं कपडे पहन के तैयार हो रहा था, मुझे अपने दोस्त को मिलने जाना था| तभी नीतू मुझे बुलाने आई; "चाचू... माँ को बहुत तेज बुखार है|" आमतौर पर ये सुन कर मैं भाग कर उनके पास पहुँच जाया करता था पर आज मैंने बाल बनाते हुए कहा; "ठीक है... आता हूँ|" मेरा जवाब सुन नीतू को बहुत बुरा लगा ये उसकी उत्तरी हुई शक्ल बता रही थी| नीतू वहांसे गई नहीं और मेरी तरफ देखती रही जैसे पूछ रही हो की क्यों आपको मेरी माँ की कदर नहीं रही| मैंने बाल बनाये और पीछे मुड़ा और नीतू की तरफ देख कर ऐसे बोलै जैसे मुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ा; "क्या हुआ? आ रहा हूँ ना ....चल तू!" पर नीतू वहां से हिली नहीं| मुझे एहसास होने लगा की उसका सब्र का बाँध टूटने वाला है ... जो टूट भी गया| "आपको क्या होगया है चाचू? जब से आप का एक्सीडेंट हुआ है आपने माँ से बात-चीत करना बंद कर दिया है? आज माँ बीमार है तब भी आपको कुछ फर्क नहीं पड़ रहा?"

"नीतू समय आने पर आपको सब पता चल जायेगा|" मैंने इतना बोला और चारपाई पर बैठ जूते पहनने लगा| मेरा ये रवैय्या देख नीतू वहाँ से पाँव-पटकते हुए वापस चली गई| मैंने आराम से जूते पहने और आराम से टहलते हुए भाभी के पास पहुँचा| भाभी चारपाई पर लेती थी और उन्होंने एक चादर ओढ़ राखी थी| अम्मा उन्हीं के पास बैठी थी और उनसे हाल-चाल पूछ रही थी| मैं जब कमरे में घुसा तो मुझे जानी-पहचानी सी सुंगंध आई और मैं साड़ी बात समझ गया| मैं वहाँ पहुँच कर जेब में हाथ डाले खड़ा था और मेरा बर्ताव ऐसा था जैसे मुझे कुछ फर्क ही नहीं पड़ रहा| "नीतू ... तेरी माँ ने कुछ खाया-पीया है? बहुत कमजोर लग रही है!" अम्मा ने चिंतित होते हुए कहा| "नहीं अम्मा... माँ ने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया|" नीतू ने ये मेरी तरफ देखते हुए कहा जैसे की कह रही हो की अब तो पिघल जा! पर ये सुन कर भी मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ा और मैं जेब में हाथ डाले खड़ा रहा| अम्मा भाभी से उनके खाना ना खाने का कारन पूछने लगी तो भाभी बात को घुमाने लगी ये कह के; "मेरा मन नहीं करता कुछ खाने को|" अम्मा कुछ कहती उससे पहले ही मैंने अपनी पहली चाल चली; "अम्मा होता है ऐसा... अब माँ को ही तो सबसे ज्यादा दुःख होता है की उसकी बेटी दूसरे घर जा रही है| कितने नाजों से माँ पालती है अपनी बेटी को और फिर एक दिन उसे दूसरे घर जाता देख मन तो दुखता ही है|" मैंने भाभी का बचाव करते हुए कहा| मेरी बात अम्मा को जाची और वो भाभी को समझाने लगी; "अरे पगली बेटी तो होती है पराया धन, आज नहीं तो कल तो उसे जाना ही होता है| उसके चक्कर में तू अपनी तबियत ख़राब कर लेगी तो कैसे चलेगा! चल अब और जिद्द मत कर और खाना खा ले| नीतू चल मेरे साथ मैं कुछ बना देती हूँ|" ये बोल कर अम्मा नीतू को अपने साथ ले गई और अब कमरे में बस मैं और भाभी ही रह गए| मैं भी जाने लगा तो भाभी ने लेटे-लेटे ही मेरा हाथ पकड़ लिया और रोने लगी| "मुनना... मुझे माफ़ कर दो! मैं.... मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ| उस दिन .... सब मेरी गलती थी .... तुमने इतने दिन से मुझसे बात नहीं की थी इसलिए मैं तुम्हारे प्यार के लिए प्यासी हो गई थी ... और इसी अंधी प्यास के चलते मैंने ....वो गोली..... खाली! ये सब जो कुछ हुआ वो सब उस गोली के कारन हुआ... सच्ची .... वर्ण तुम्हें तो पता है की मैं ऐसी नहीं हूँ| मैं तो तुमसे कितना प्यार करती हूँ....." भाभी इतना ही बोल पाई थी की नीतू सत्तू ले आई और उसे देख भाभी एक दम से चुप हो गई जैसे की उन्हें कोई सांप सूंघ गया हो| नीतू के हाथ में थाली थी और थाली में सत्तू, हमारे यहाँ नाश्ते में सत्तू और प्याज खाते हैं| मैंने नीतू से पूछा; "बेटा आप प्याज तो लाये ही नहीं! खेर कोई बात नहीं प्याज मैं ला देता हूँ|" ये कहते हुए मैंने भाभी के ऊपर से चादर खेंच दी और उनकी कांख (बगल) में दबे हुए प्याज उजागर हो गए| मैंने दोनों प्याज बाहर निकाले और नीतू को देते हुए कहा; "ये ले... और हाँ भाभी ..... मुझे पता है की आप मुझसे कितना प्यार करते हो| ये (प्याज) गवाह हैं|" मैंने बस इतना कहा और नखरे वाली मुस्खूरहत के साथ वहाँ से चला गया|

मैं पैदल ही अपने दोस्त के घर चल दिया और पूरे रास्ते यही सोच रहा था की मैंने भाभी की क्या गत बना दी उन्हीं की बेटी के सामने, और मुझे अपनी सैतानी हरकत पर बहुत हसीं आई| सच है की बदले का स्वाद बहुत जबरदस्त होता है….. पर मेरा बदला अभी पूरा नहीं हुआ था! ये तो पहली ही किश्त थी .....!!!

दोस्त के घर से वापस आते-आते मुझे रात हो गई थी और खाने का समय भी हो चूका था| मैंने सोच लिया था की मुझे अब क्या करना और मैंने आते ही अपने प्लान पर काम करना शुरू कर दिया| मैं सीधा अपने घर पहुंचा और नहाने लगा और जैसे ही मेरा नहाना खत्म हुआ नीतू आ गई| उसे देख कर मैं थोड़ा नाराज हो गया क्योंकि सुबह सुने मुझसे बहुत उखड के बात की थी| "sorry चाचू! मुझे सब पता चल गया की कैसे आपको चोट लगी और......" नीतू इतना कहते हुए चुप हो गई|उसकी आँखों में मुझे पछतावा नजर आ रहा था इसलिए मेरा दिल पिघल गया और मैंने उसे कहा; "कोई बात नहीं बेटा... आपकी कोई गलती नहीं थी|"

"पर माँ ने आपके साथ इस तरह जबरदस्ती क्यों की? मतलब आप उन्हें हमेशा प्यार ....." नीतू की झिझक उसके शब्दों में साफ़ दिख रही थी| एक बात जो मुझे महसूस हुई वो थी 'जलन'| जब उसने कहा 'आप उन्हें हमेशा प्यार....' और फिर बिना बात पूरे किये ही चुप हो गई| "बेटा हर चीज को पाने का तरीका जबरदस्ती नहीं होता| कुछ चीजें प्यार से भी पाई जा सकती हैं| पर काम अग्नि में जल रहा इंसान सिर्फ जबरदस्ती ही जानता है|" मैंने इतना खा और अपने कमरे में घुस के कपडे बदल कर आया| मैंने बाहर आकर देखा तो नीतू स्नानघर के पास थी और मेरे उतारे हुए कच्छे को छू कर कुछ कर रही थी| दरअसल नीतू मेरे कच्छे के सामने वाले हिस्से, जहाँ पर लंड बाहर निकलने का छेड़ होता है वहां लगे मेरे रास की बूंदों को हाथ से छू रही थी और कुछ सूंघने की कोशिश कर रही थी| "नीतू ये क्या कर रही हो?" मैंने उसे हड़काते हुए पूछा| "वो....वो... मैं ... इसे धो ....ने जारही थी|" नीतू ने सकपकाते हुए कहा| "नीतू ये गलत...." मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही भैया आ गए| "चलो मुनना खाना खाते हैं और तू कपडे धो कर आजा जल्दी से, जब देखो सारा दिन खाली बैठी मखियाँ मारती रहती है|" इतना कह भैया मुझे अपने साथ ले गए और मैं मन ही मन सोच रहा था की नीतू मेरे कच्छे के साथ क्या कर रही होगी?

आँखें बंद किये हुए उस कपडे को अपने नथुनों के पास लाकर सूंघना.... मदहोश कर देने वाली लंड की खुशबु को अपने मन में बसा लेना.... अपने गुलाबी होठों से कपडे को चूमना..... जीभ से चाटना.... कच्छे में लिप्त मेरी पिशाब की बूंदों की महक को सूंघ कर मदहोश हो जाना.... मेरे लंड की पसीने बूंदों का नमकीन स्वाद..... ये सब नीतू को पागल बना रहा होगा ये सोच कर ही मेरे मन में अजीब सी बेचैनी होने लगी थी|

खाना परोसा गया पर मैं भाभी से कुछ बात नहीं कर रहा था| खाना परोसने के 20 मिनट बाद नीतू भी वहां आ गई और उसके चेहरे पर मुझे संतोष नजर आने लगा था| जैसे की उसकी मन की मुराद पूरी हो गई हो! खाना खा के मैं अपने घर आ गया, भैया और बाप्पा अपने-अपने बिस्तर पर चले गए और उनके बीच कुछ बातें होने लगी| मैं कुछ देर तक पाने घर के बाहर ही छिप कर खड़ा रहा और करीब आधे घंटे बाद मैं नांद (जहाँ बैलों को बाँधा जाता है|) के पास आकर छिप गया| मुझे पता था की भाभी रोज की तरह खाना खाके, बचा हुआ खाना बैलों को डालने के लिए नांद पर आएगी| नांद वाली जगह तीन तरफ से ढकी हुई थी और ऊपर छत थी ताकि जानवरों को धुप और बारिश से बचाया जा सके| रात होने के कारन अंदर अँधेरा था और कोई अगर वहां छुप जाए तो उसे देख पाना मुश्किल था| जब भाभी वहां अपनी थाली ले कर आई तो मैं डीएम साढ़े वहां छुप कर खड़ा रहा और जब उन्होंने बचा हुआ खाना बैलों को डाल दिया और मुड के जाने लगी तो मैंने उन्हें पीछे से दबोच लिया| सीधे हाथ से उनका मुंह बंद कर दिया ताकि वो चिल्ला ना सके और बाएं हाथ से उनकी कमर के ऊपर से होते हुए खुद से चिपका लिया| मेरा अकड़ा हुआ लंड उनकी गांड पर अपना दबाव डालने लगा था| "मैं हूँ मुनना.... चिल्लाना मत|" इतना कह कर मैंने उनका विश्वास हासिल किया और भाभी शिथिल पड़ गई| फिर उनकी गर्दन पर अपने होंठ रख कर मैं उन्हें चूमने लगा और भाभी का कसमसाना शुरू हो गया| मेरे दाएं हाथ ने उनके चुचों को धीरे-धीरे मसलना शुरू किया और बाएं हाथ से मैंने उनकी बुर को साडी के ऊपर से टटोलना शुरू कर दिया| भाभी की सिसकारियां फूटने लगी; "सससस.....मम..."| मैंने उनके कान के पास अपने होठों को ले गया और फिर धीरे से काट लिया और भाभी की प्यार भरी आह निकल गयी| "आह!!!"

मैंने खुसफुसाते हुए कहा; "साढ़े बारह बजे ....सससस..... मैं... इंतजार करूँगा...!" ये सुन कर तो जैसे भाभी की साड़ी इच्छा पूरी हो गई| "मुझे माफ़......" भाभी खुसफुसाते हुए बोलना चाह रही थी पर मैंने उनके होठों पर अपनी बीच वाली रख दी और उन्हें अपनी तरफ घुमाया और; "खाना तो खा लिया अब थोड़ा मीठा भी खालो|" मैंने भाभी का हाथ अपने तननाये हुए लंड पर रखते हुए कहा| "मुनना..... मैंने अभी खाना खाया है| कहीं उलटी न हो जाये! मैं आउंगी ना रात को तब जो चाहे.कर लेना|" इतना सुन में गुस्से में जाने लगा तो भाभी समझ गई की मुझे गुस्सा आ गया है| उन्होंने मुझे रोका और नीच बैठ गई और पाजामे से मेरा लंड बहार निकल कर एक ही सांस में निगल गई​
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