Update 01

मेरी रूपाली दीदी और मेरे जीजू (विनोद) की शादीशुदा जिंदगी बेहद खुशनुमा थी.. मेरे जीजू विनोद एक छोटी सी आईटी कंपनी में काम करते थे और मेरी दीदी एक हाउसवाइफ... यह उस समय की बात है जब मैं उन दोनों के साथ ही रहता था.. मेरी उम्र उस वक्त करीबन 17 साल की थी.. और मैं 12वीं कक्षा का छात्र था... अपनी बहन के घर पर रहते हुए ही मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था... उस वक्त रुपाली दीदी की उम्र तकरीबन 28 साल थी और मेरे जीजा जी की उम्र तकरीबन 32 साल के आसपास रही होगी... हमारी बेहद साधारण मध्यवर्गीय जिंदगी चल रही थी.. उन दोनों की अरेंज मैरिज हुई थी.. उनके दो बच्चे थे.. दोनों बेटी..

मेरी बड़ी भांजी 4 साल की हो चुकी थी.. जबकि दूसरी छोटी अभी सिर्फ 2 महीने की हुई थी.. दोस्तों अब यहां से हमारी कहानी शुरू होती है...

मेरे जीजू 1 दिन ऑफिस से अपनी बाइक पर घर आ रहे थे तभी उनका एक बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया... कुछ लोगों ने उन्हें हॉस्पिटल पहुंचाया.. मैं और मेरी रुपाली दीदी इस दुनिया में अकेले थे क्योंकि हमारे माता-पिता का देहांत हो चुका था.. इसीलिए मेरी बहन मेरी देखभाल के लिए मुझे अपने साथ रख रही थी और मेरा खर्चा उठा रही थी हर प्रकार से.. जब मैं अपनी रुपाली दीदी के साथ हॉस्पिटल पहुंचा मैंने देखा मेरे जीजाजी की हालत बेहद नाजुक थी. उनकी हालत देखकर मेरी बहन तो बेहोश हो गई, मैंने उनको सहारा दिया... मेरे चीजों की हालत देखकर मेरी रूपाली दीदी के अच्छे भविष्य की पूरी संभावना उनकी आंखों के सामने ही खत्म हुई जा रही थी, खासकर जब उनके दोनों बच्चे अभी बेहद छोटे थे... हमारे लिए यह बहुत ही बुरा वक्त चल रहा था.. तकरीबन 10 दिनों के बाद मेरे जीजू को होश आया...

मेरे जीजाजी की जान तो बच गई थी पर वह अपनी कमर के नीचे पूरी तरह अपंग हो चुके थे.. वह पैरालिसिस के शिकार हो चुके थे... अपनी कमर के नीचे का हिस्सा हिला पाना मेरे जीजू के लिए असंभव था.. मेरी रूपाली दीदी ने बेहद कड़ी मेहनत की.. उनको बड़े-बड़े हॉस्पिटल बड़े-बड़े डॉक्टरों से दिखाया... पर सभी ने मेरी दीदी को बस यही सलाह दी कि अब और ज्यादा पैसा खर्च करने से कोई फायदा नहीं है.. यह इंसान शायद अपनी जिंदगी में अब फिर से कभी उठकर खड़ा नहीं हो पाएगा चाहे जितना भी इलाज कर लो इसका... मेरी बहन निराश हो चुकी थी... डॉक्टरों ने घोषित कर दिया था कि मेरे जीजू पूरी तरह से अपंग हो चुके हैं कमर के हिस्से के नीचे..कुछ चमत्कारी शायद कुछ मदद कर सकता है.. पर दवाई और इलाज से तो यह बिल्कुल संभव नहीं रह गया है..

एक पतिव्रता और आदर्श नारी होने के नाते मेरी रूपाली दीदी ने मेरे जीजू की हालत के साथ समझौता कर लिया और उन्होंने मेरे साथ मिलकर फैसला किया कि अब हम लोग जीजा जी की देखभाल हमारे घर में करेंगे.... हम जिस घर में रह रहे थे वह ... एक बेडरूम और एक हॉल था.. मैं हॉल में सोता था.. मेरी दीदी और मेरे जीजू अपने दोनों बच्चों के साथ एक छोटे से कमरे में.. एक किचन था और एक बाथरूम... कुल मिलाकर जगह बहुत कम थी हमारे घर के अंदर.. मेरे जीजाजी कि जो भी सेविंग थी उसके बारे में मेरी बहन को पूरा अंदाजा था... उनको अच्छी तरह पता था कि जो भी सेविंग है उसके साथ बहुत दिनों तक गुजारा नहीं किया जा सकता है.. मेरी बहन को अपने दोनों बच्चों के भविष्य की ...और अपने निकम्मे भाई की भी... मुझे मेरी दीदी की हालत देखकर बुरा लगता था पर मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था... जहां तक हो सके मैं अपनी बहन की मदद करने की कोशिश करता था...

मेरी रुपाली दीदी भी सिर्फ 12वीं पास थी.. 1 साल तक उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई तो की थी परंतु फिर घर के जंजाल होने के कारण पढ़ाई छोड़ दी... फिर शादी हो गई और बच्चे.. उनके पास ऐसी कोई भी क्वालीफिकेशंस नहीं थी कि उन्हें कोई अच्छी नौकरी मिल सके... किसी तरह तकरीबन 1 महीने गुजर चुके थे उस दुर्घटना के हुए .. मेरी रूपाली दीदी बेहद परेशान रहती थी, पर अपनी परेशानी को कभी भी मेरे अपंग जीजाजी पर जाहिर नहीं होने देती थी.. मेरी भांजी सोनिया जिसकी उम्र 4 साल थी उसका दाखिला एक बगल वाले कॉलेज में ही हो गया था.. मेरी दीदी को उनके ससुराल वालों की तरफ से भी कोई मदद नहीं मिल रही थी... जीजा जी के भी माता-पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था... मेरी दीदी के ससुराल में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उनकी मदद करना चाहे.. उन्हें कोई परवाह नहीं थी...

मेरी रूपाली दीदी एक बेहद कसे हुए बदन की महिला है.. उनका रंग गोरा है... उनकी लंबाई तकरीबन 5 फुट 1 इंच है.. मेरी दीदी दिखने में बेहद आकर्षक है... उनके बदन पर उस समय थोड़ी बहुत चर्बी चढ़ी हुई थी जो प्रत्येक भारतीय नारी के साथ आप लोग देख सकते हैं.. मेरी बहन साधारण सूती की साड़ियां पहनती है जो दिन भर की कड़ी मेहनत के कारण अस्त व्यस्त हो जाती है... मेरी रूपाली दीदी कभी भी अपनी साड़ी को अपनी नाभि के नीचे नहीं पहनती थी... प्रत्येक भारतीय महिला की तरह मेरी दीदी अपने अंगों को छुपाने का प्रयास करती थी..

मेरी रूपाली दीदी कभी भी खुद को प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं करती थी.. मेरी बहन बेहद खूबसूरत है.. उनकी खूबसूरत आंखें, उनके तीखे नैन नक्श, लाल लाल होंठ, और काले रेशमी लंबे बाल जो उनके नितंबों से भी नीचे तक आते है, उनकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं.. घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण मेरी रूपाली दीदी खुद पर कभी भी इतना ध्यान नहीं दे पाती थी..

वह सोमवार का दिन था... मेरी रूपाली दीदी सोनिया को कॉलेज ले जाने के लिए रेडी कर रही थी.. प्रत्येक दिन मेरी बहन ही सोनिया को कॉलेज ले जाती थी क्योंकि मैं उससे पहले ही अपने कॉलेज चला जाता था.. तो यह जिम्मेदारी भी मेरी बहन की ही थी... उस दिन मैं अपने कॉलेज नहीं गया और अपने कुछ दोस्तों के साथ बाहर मस्ती कर रहा था.. मैंने देखा कि मेरी रूपाली दीदी सोनिया के साथ है..

उनको देखते ही मैं छुप गया और अपने दोस्तों की आड़ में से देखने लगा..

सोनिया मेरी रुपाली दीदी को परेशान कर रही थी.. वह उछल कूद मचा रही थी.. तभी अचानक उसका पानी का बोतल गिर गया.. मेरी बहन पानी का बोतल उठाने के लिए नीचे झुकी तो उनकी साड़ी का पल्लू उनके सीने से सरक गया... मेरे सभी दोस्तों के मुंह से एक सिसकारी निकली... मैं शर्मिंदा हो गया क्योंकि सभी मेरी बहन के सीने को लार टपकाते हुए घूर घूर के देख रहे थे...

खुली सड़क पर मेरी रुपाली दीदी की टाइट चोली के अंदर का सामान सबके सामने प्रदर्शित हो चुका था.. दुर्भाग्यवश वहां से थोड़ी दूर पर अपनी बाइक पर एक व्यक्ति बैठा हुआ था जो हमारे मोहल्ले का मशहूर गुंडा है और आने वाले विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी ... ठाकुर रणवीर सिंह.. वह अपनी बाइक पर बैठे हुए सिगरेट पी रहे थे...

जब उन्होंने मेरी रूपाली दीदी को देखा उनको बिजली का झटका लगा.. ठाकुर साहब को अच्छी तरह पता था कि हमारा परिवार इसी मोहल्ले में रहता है, परंतु आज से पहले उन्होंने कभी भी हमारी परवाह नहीं की थी. सुबह-सुबह ही उनको जिस चीज का दर्शन हुआ था वह शायद उनके जीवन का सबसे खूबसूरत पल था.. एक जवान शादीशुदा दो बच्चों की मां खूबसूरत के पहाड़ों के दुर्लभ दर्शन शायद उन्हें अपनी जिंदगी में पहली बार ही हुए थे... उन्होंने मन ही मन मेरी बहन के पहाड़ों को देखते हुए चोली के अंदर छुपे हुए उनके दोनों बड़े बड़े सफेद पके हुए आम के बारे में कल्पना की... ठाकुर साहब अपनी जुबान अपने होठों फिरआते हुए मेरी बहन को देखने लगे .. मेरी रूपाली दीदी ने जब ठाकुर साहब की तरफ देखा तो उन्होंने पाया कि ठाकुर साहब उनकी तरफ कामुक निगाहों से देख रहे हैं..

पलक झपकते ही मेरी रूपाली दीदी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाल लिया और अपने सीने पर चिपके हुए दोनों फुटबॉल को अपने आंचल में समेट लिया.. और बड़ी तेजी से कॉलेज की तरफ जाने लगी.. जब मेरी दीदी कॉलेज की तरफ तेज कदमों के साथ भाग रही थी तो उनकी गांड दाएं बाएं दाएं बाएं करके हिल रही थी.. ठाकुर साहब देखते हुए सोच रहे थे.. कितनी खूबसूरत औरत है... क्या मस्त माल है ... उनकी नियत खराब हो चुकी थी.. कॉलेज की तरफ बढ़ चले ठरकी ठाकुर साहब और मेरी रूपाली दीदी के लौटने का इंतजार करने लगे..

उस वक्त ठाकुर रणवीर सिंह की उम्र तकरीबन 45 साल थी... बेहद लंबे कद के... तकरीबन 6 फुट 2 इंच के... साधारण लोगों से उनकी लंबाई कुछ ज्यादा ही थी... चौड़ी छाती और मजबूत भुजाएं... अपनी शर्ट के आगे के दो बटन वह हमेशा खुले रखते थे... उनकी छाती पर काले बाल थे.. उनका रंग भी काला था.. पर दिखने में ठाकुर साहब बेहद आकर्षक लगते थे.. सोने का ब्रेसलेट पहनते थे.. और बेहद भारी भरकम गोल्ड चेन भी... ठाकुर साहब की घनी और काली कड़क दार मूछें बेहद रुबाबदार लगती थी... ठाकुर साहब का तलाक हो चुका था.. कुछ लोग बताते हैं कि उनकी पत्नी बच्चे पैदा करने में असमर्थ थी.. इसीलिए उनका तलाक हुआ था.. पर कई लोगों के मुंह से मैंने यह भी सुना था कि ठाकुर साहब जब बिस्तर पर अपनी पत्नी के साथ प्यार करते थे उनकी पत्नी झेल नहीं पाती थी.. और इसीलिए उनका तलाक हो गया था... जितने मुंह उतनी बातें.. खैर उन्होंने दोबारा फिर से शादी करने की कभी कोशिश नहीं की...

ठाकुर साहब ने देखा मेरी रूपाली दीदी सोनिया को कॉलेज छोड़ने के बाद वापस आ रही है.. मेरी दीदी ने खुद को अच्छी तरह से ढक लिया था अपने पल्लू से अपने सीने को भी.. मेरी दीदी ने ठाकुर साहब को देख कर भी अनदेखा करने की कोशिश की... और अपने फ्लैट की तरफ आने लगी.. ठाकुर साहब का दिल मेरी रुपाली दीदी पर आ चुका था.. उन्होंने मेरी बहन का रास्ता रोका ठीक हमारे घर में घुसने से पहले..

ठाकुर साहब: नमस्ते रुपाली जी..

मेरी रूपाली दीदी: (घबराते हुए) जी नमस्ते..

ठाकुर साहब: विनोद जी कैसे हैं..

मेरी दीदी: जी ठीक है..

ठाकुर साहब: कुछ तकलीफ हो तो बताइएगा.

मेरे रूपाली दीदी: जी धन्यवाद..

मेरी रूपाली दीदी घबराते हुए अपने अपार्टमेंट की तरफ भागने लगी.. भागते हुए उन्हें बिल्कुल इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनकी गांड बेहद मादक तरीके से दाएं बाएं गोते खा रही है.. ठाकुर साहब सब कुछ देख रहे थे.. उन्होंने मन ही मन ठान लिया था मेरी बहन का सत्यानाश करेंगे.. उनके दूध की टंकियों पर अपनी जुबान रखेंगे..

अगले दिन भी ठीक उसी प्रकार से हुआ.. ठाकुर साहब मेरी रुपाली दीदी का इंतजार करते रहे.. मेरी रूपाली दीदी ने उनको अनदेखा कर दिया.. ठाकुर रणवीर सिंह ने बातचीत करने की कोशिश की मेरी बहन से... मेरी दीदी ने बड़ी शालीनता के साथ में जवाब दिया और वहां से निकल गई... ठाकुर साहब मेरी बहन को पाने के लिए बेचैन हुए जा रहे थे.. अगले दिन उन्होंने मेरी दीदी की चूड़ी और कंगन से भरे हुए हाथ को छूने का भी प्रयास किया... दीदी ने किसी तरह खुद को बचाया.. मेरी रूपाली दीदी अच्छी तरह समझ रही थी कि ठाकुर साहब के अंदर वासना की आग जल रही है उनके लिए .. ठाकुर रणवीर सिंह मेरी बहन की लेने के लिए बेचैन हुए जा रहे थे.. अगले 2 दिन तक ऐसा ही होता रहा... मेरी दीदी बेहद घबराई हुई थी उन दिनों.. उन्होंने मुझसे इस बात का जिक्र तो नहीं किया पर मुझे ठीक-ठाक अंदाजा था इस बात का कि ठाकुर साहब की नियत खराब हो चुकी है मेरी बहन के लिए..

एक दिन जब मेरी रूपाली दीदी ने ठाकुर साहब को अनदेखा करने की कोशिश की तो उन्होंने मेरी बहन का हाथ पकड़ लिया अपनी मर्दाना ताकत दिखाने के लिए.. दीदी ने जब अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो सफल नहीं हो पाई.. ठाकुर रणवीर सिंह ठहाका लगाकर हंसने लगे फिर मेरी दीदी को जाने दिया..

इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मेरी रूपाली दीदी जीजू को कुछ भी नहीं बताती थी.. मुझे भी नहीं.. जीजू तो हमेशा बिस्तर पर ही पड़े हो गए रहते थे.. वह खुद से कोई भी काम नहीं कर पाते थे.. मैं अपनी 12वीं की परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ था.. मेरी रूपाली दीदी की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक होती जा रही थी... उन्होंने नौकरी ढूंढने की भी कोशिश की पर कहीं सफलता नहीं मिली... थक हार कर मेरी रुपाली दीदी निराश होने लगी.. कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा था उनकी जिंदगी में..

अब मेरी रूपाली दीदी बेहद मजबूर और कमजोर महसूस कर रही थी.. मेरे और सोनिया की कॉलेज के अगले महीने की फीस देने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे.. मेरी रूपाली दीदी इन्हीं सोचो में डूबी हुई परेशान हो रही थी तभी अचानक हमारे घर की बेल बजी...

जब मेरी रूपाली दीदी ने दरवाजा खोला दोसा में ठाकुर रणवीर सिंह खड़े थे.. लंबे चौड़े ..हमारे घर का पूरा दरवाजा ही उनके शरीर से ढक गया था...

ठाकुर साहब: रुपाली जी.. अंदर आ सकता हूं क्या.. आपके पति विनोद से मिलना था..

मेरे रूपाली दीदी: जी ठाकुर साहब.. अंदर आइए.. मेरे पति अभी सो रहे हैं..

ठाकुर साहब: कोई बात नहीं रुपाली जी , मैं इंतजार कर लूंगा..

मेरी दीदी ठाकुर साहब का इरादा पूरी तरह से समझ रही थी .. कुछ ही देर में उन्होंने इंतजाम कर दीया मेरे जीजा जी को ठाकुर साहब से मिलवाने का.. जीजू के कमरे में घुसने के बाद ठाकुर साहब थोड़े हैरान हुए.. हमारे घर की गरीबी देख..

ठाकुर साहब: नमस्ते विनोद जी.. कैसे हैं आप.. मेरा नाम ठाकुर रणवीर सिंह.. मैं इसी मोहल्ले में रहता हूं.. आप का हाल-चाल जानने के लिए आया हूं..

मेरे जीजू: (घबराते हुए मुस्कुराते हुए) नमस्ते ठाकुर साहब...

ठाकुर साहब: आपकी पत्नी रुपाली जी बहुत अच्छी हैं.. आपकी बड़ी सेवा करती हैं.. मुझे देख कर बड़ा अच्छा लगा..

जीजू: जी धन्यवाद.

ठाकुर साहब: अच्छा विनोद जी.. मैं अब आपसे विदा लेता हूं.. कभी भी किसी भी चीज की जरूरत हो तो बेझिझक मुझसे कह सकते है आप..

ठाकुर रणवीर सिंह खड़े हो गए और बाहर की ओर जाने लगे.. मेरी दीदी भी उनके पीछे-पीछे दरवाजे तक आई.. दरवाजा बंद करने के लिए.. उसके पहले ही ठाकुर साहब ने मेरी रूपाली दीदी से पूछ लिया..

ठाकुर साहब: आपकी छोटी बेटी कहां है?

मेरी रुपाली दीदी: अभी वह सो रही है..

ठाकुर साहब: 2 महीने की है ना..

मेरे रूपाली दीदी: हां ठाकुर साहब..

ठाकुर साहब: रुपाली जी बुरा ना मानो तो आपसे एक बात पूछूं? आपके घर का खर्चा कैसे चलता है..

मेरी रूपाली दीदी: जी वह कुछ सेविंग है.. कोई तकलीफ नहीं है..

ठाकुर साहब: अच्छा रुपाली जी.. किसी भी चीज की जरूरत हो तो बताइएगा..

मेरी दीदी: जी ठाकुर साहब धन्यवाद..

जाने से पहले ठाकुर ने मेरी रूपाली दीदी के भरपूर जोबन को अपनी निगाहों से घूर घूर के देख अपनी लार टपका दी.. मेरी दीदी ने अपने बदन को अच्छी तरह से ढक के रखा हुआ था.. उन्होंने कोई मौका नहीं दिया ठाकुर साहब को... यहां तक कि मेरी बहन ने अपने पेट के हिस्से को भी ढक के रखा था... मेरी बहन को देखकर ठाकुर साहब मुस्कुराए.. मेरी दीदी ने दरवाजा बंद कर लिया... ठाकुर साहब चले गय..

अगले दिन फिर से ठाकुर साहब हमारे घर पर उपस्थित थे... मेरे जीजू से मिलने के बहाने.. उनका ज्यादातर समय मेरे रूपाली दीदी से ही बातचीत करने में गुजरा.. ठाकुर साहब तो चले गए थे... पर पिछले कुछ दिनों में हमारे घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब होने लगी थी...

मेरी रूपाली दीदी खुद को बेहद असहाय महसूस करने लगी थी.. उन्होंने जिस से भी मदद मांगी सब इंकार कर देते थे.. ठाकुर साहब प्रतिदिन मेरी बहन से बातचीत करते थे... मेरी रूपाली दीदी के मन में ठाकुर साहब के प्रति जो डर था वह कम होने लगा था.. इसके बावजूद भी मेरी दीदी हमेशा उनसे बच के रहना चाहती थी...

कुछ दिनों के बाद ठाकुर साहब हमारे घर पर आए... और मेरे जीजू से मुलाकात की.. जब वह जाने के लिए दरवाजे पर खड़े थे.. तब मेरी रूपाली दीदी ने उनको रोक लिया..

मेरी रूपाली दीदी: ठाकुर साहब मुझे आपसे कुछ बात करनी है.. अगर आप बुरा ना मानो तो..

ठाकुर तो बहुत खुश ..... हां बोलो रुपाली जी..

मेरी रूपाली दीदी: मुझे कुछ पैसों की जरूरत है.. प्लीज मेरी मदद कीजिए..

ठाकुर साहब: पैसे? देखिए रुपाली जी.. बुरा मत मानिए मगर यहां कोई किसी की मदद पैसों से बेवजह नहीं करता...

मेरी दीदी: प्लीज ठाकुर साहब मैं बहुत मजबूर हूं..

ठाकुर साहब: क्या जरूरत आ गई है आपको..

मेरी रूपाली दीदी: मेरा छोटा भाई और मेरी बड़ी बेटी के कॉलेज की फीस देनी है...

ठाकुर साहब: कितने पैसों की जरूरत है आपको रुपाली जी.

मेरी रूपाली दीदी: 2000 ... प्लीज ठाकुर साहब..

ठाकुर साहब: 2,000 तो कुछ ज्यादा है रुपाली जी.. मैं आपको पैसे तो दे दूंगा पर मेरी एक शर्त है..

मेरी रूपाली दीदी: क्या ठाकुर साहब?

ठाकुर साहब: क्या हम छत के ऊपर चल सकते हैं.. वहां पर कोई भी नहीं होगा.. मैं वही बताऊंगा..

मेरी रूपाली दीदी: प्लीज ठाकुर साहब यहीं पर बता दीजिए ना..

ठाकुर साहब: ठीक है रुपाली जी जैसी आपकी मर्जी... मुझे आपकी चोली खोल के 30 मिनट तक आपका दूध पीना है.. बदले में मैं आपको ₹2000 दे दूंगा...

मेरी रूपाली दीदी: क्या?

मेरी रूपाली दीदी ने बड़ी शालीनता के साथ ठाकुर साहब को दरवाजे से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया... मेरी दीदी ने बड़े संयम के साथ काम लिया था उस वक्त... ठाकुर साहब नाराज तो हुए थे उस वक्त पर वह चले गए... मेरी दीदी दरवाजा बंद करने के बाद रोने लगी..

ठाकुर साहब की बातें सुनकर मेरी रूपाली दीदी शर्मिंदा हो गई थी.. उनका चेहरा लाल हो गया था... आज तक किसी मर्द ने मेरी बहन के साथ इतनी गंदी बात नहीं की थी..

जाते जाते ठाकुर साहब ने कहा था: एक बार फिर से सोच लो रुपाली जी.. दोबारा क्या पता मैं आऊं ही नहीं.. मेरी दीदी ने ठाकुर के मुंह पर ही दरवाजा बंद कर दिया था... ठाकुर साहब समझ चुके थे की घरेलू पतिव्रता नारी को अपने जाल में फंसा ना इतना आसान नहीं है.. वह आगे कुछ बोले बिना वहां से निकल गय... उनके जाने के बाद मेरी रूपाली दीदी अपने ख्यालों में खोई सोच रही थी... कितना घटिया आदमी है .. एक औरत की मजबूरी का फायदा उठाना चाहता है.. कुछ देर में ही मेरी दीदी अपने घर के कामों में ही व्यस्त हो गई...

अगले दिन भी जब मेरी रूपाली दीदी अपनी बेटी को कॉलेज छोड़ने के लिए जा रही थी उस वक्त भी ठाकुर साहब रास्ते में खड़े थे.. मुस्कुराते हुए सिगरेट पीते हुए मेरी बहन को घूर रहे थे... मेरी दीदी ने उनको अनदेखा करने की कोशिश की... अब तो दिनचर्या बन चुकी थी ठाकुर साहब की.. मेरी बहन को दूर से देख कर ही परेशान करना.. वह कभी भी मेरी बहन के पास नहीं आते थे... दूर से ही देखते थे... मेरी रूपाली दीदी के लिए यह सब कुछ बेहद अजीब था... मेरी रूपाली दीदी ठाकुर साहब से नफरत करने लगी थी.. और ठाकुर रणवीर सिंह उनकी वासना तो और भी ज्यादा बढ़ती जा रही थी मेरी बहन के लिए... किसी भी कीमत पर वह मेरी दीदी को अपने बिस्तर पर ले जाना चाहते थे... मेरी बहन की अनदेखी की वजह से उनके अंदर का जानवर जाग जाता था.... वह और भी ज्यादा उत्तेजित हो जाते थे मेरी दीदी को पटक के उनकी लेने के लिए..

दूसरी तरफ मेरी रूपाली दीदी भी हमेशा डरी हुई रहती थी कि ठाकुर साहब ने अगर उनके साथ कोई जोर जबरदस्ती करने की कोशिश की तो वह क्या कर पाएगी... अपनी जान देने के अलावा मेरी रूपाली दीदी के पास और कोई चारा नहीं था.. मेरी दीदी आत्महत्या करने के बारे में सोच रही थी अगर ठाकुर साहब ने उनको जबरदस्ती कुछ किया तो..

किसी तरह दिन गुजरते रहे.. 2 महीने हो चुके थे मेरे जीजा जी के एक्सीडेंट के.. हमारे घर की माली हालत बिल्कुल खत्म हो चुकी थी.. घर में एक पैसा नहीं बचा हुआ था... मेरी बहन परेशान थी... मेरे जीजू बोल तो पाते थे पर कुछ कर नहीं पाते थे.. घर में राशन की भी तकलीफ होने लगी थी.. बनिया उधार देने से मना करने लगा था... मेरी रूपाली दीदी मुस्कुराते हुए सारा दर्द झेल रही थी... सारा का सारा पैसा तो मेरे जीजू की दवा दारू में ही खर्च हो रहा था.. और उनकी स्थिति भी संभल नहीं रही थी ..

एक दिन मेरे रुपाली दीदी बनिया की दुकान से राशन लेकर लौट रही थी तो रास्ते में एक बाइक आके रुक उनके सामने खड़ी हो गई... ठाकुर साहब ने मेरी बहन को रोक लिया था... पहले तो मेरी दीदी ठाकुर साहब को देखकर घबरा गई फिर उन्होंने खुद को संभाला...

ठाकुर साहब: रुपाली जी. आओ बैठ जाओ.. मेरी बाइक पर.. मैं आपको घर तक पहुंचा देता हूं..

मेरी रूपाली दीदी उनको अनदेखा करते हुए आगे की तरफ बढ़ने लगी.

ठाकुर साहब मेरी दीदी का पीछा करने लगे.. साड़ी के अंदर छुपी हुई मेरी बहन की गांड बुरी तरह हिल रही थी... ठाकुर साहब का लोड़ा खड़ा हो गया था मेरी बहन की हिलती गांड देखकर...

ठाकुर साहब ने आगे बढ़ते हुए मेरे रूपाली दीदी का हाथ पकड़ लिया.. उन्होंने इतनी जोर से मेरी दीदी का हाथ थामा कि मेरी बहन के हाथ की एक चूड़ी टूट गई.. मेरी दीदी कसमसआने लगी.. ठाकुर साहब को छोड़ने की गुहार करने लगी... बीच सड़क पर..

ठाकुर रणवीर सिंह: मेरे साथ बैठ जा मेरी बाइक पर.. क्यों इतना तमाशा कर रही हो.. ज्यादा तो नहीं कह रहा तुमसे.. आओ बैठो ना रूपाली..

मेरी रूपाली दीदी: क्यों आप मुझे परेशान कर रहे हैं? मुझे जाने दीजिए ठाकुर साहब.. मेरे बच्चे मेरे घर पर इंतजार कर रहे होंगे..

ठाकुर साहब: क्यों? क्या करोगी घर पर जाकर... अपने बच्चों को अपना दूध पिलाओगी...

मेरी रूपाली दीदी : आप जाइए यहां से वरना वरना मैं शोर मचा के लोगों को बुला लूंगी..

ठाकुर साहब: शोर मचाने से क्या होगा रूपाली..तुमको क्या लगता है कोई तुमको बचाने आएगा.. मैं चाहूं तो अभी तुम्हें यही सड़क पर ही पटक तुम्हारी... खैर छोड़ो जाने दो..

ठाकुर साहब वहां से बिना देरी किए हुए चले गए.. मेरी दीदी ने देखते हुए राहत की सांस ली.. और तेज कदमों से अपने अपार्टमेंट में घुस गई..

मेरी रूपाली दीदी बेहद अपमानित महसूस कर रही थी.. वह सोच रही थी अगर उनका पति अपाहिज नहीं होता तो ठाकुर साहब की हिम्मत नहीं होती उनसे इतनी गंदी भाषा में बात करने के लिए...

मेरी रूपाली दीदी जीजाजी के बेडरूम में गई ... उन्होंने मेरे जीजू का हाथ पकड़ा... मेरे जीजू सोए हुए नहीं थे... वह मेरी बहन की तरफ ही देख रहे थे..

मेरी रूपाली दीदी: विनोद मुझे चुम्म लो ना.. मुझे प्यार करो ना...

जीजू ने मेरी बहन को अपनी बाहों में भर लिया उनके होठों को अपने होठों में दबोच को चूसने लगे... मेरी दीदी उनको चूसने लगी... पर मेरे जीजू निढाल हो कर लेट गय.. उनके अंदर शक्ति नहीं बची थी...​
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