Update 02

मेरी दीदी ने जीजू की पेंट के ऊपर हाथ रखकर उनका उभार टटोलने की कोशिश की.. पर मेरे जीजाजी का मुरझाया हुआ चूहा खड़ा होने का नाम नहीं ले रहा था.. खड़ा होना तो दूर की बात है ,हल्का कड़ापन भी नहीं आया उनके मरे हुए चूहे में.. दुर्घटना के बाद यह पहला अवसर था जब मेरी दीदी जीजा जी के साथ शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास कर रही थी..

मेरी रूपाली दीदी: क्या हुआ विनोद? कुछ प्रॉब्लम है क्या.. तुम मुझे ठीक से प्यार क्यों नहीं कर रहे हो.

जीजू: नहीं रूपाली.. मेरी जान.. ऐसी कोई बात नहीं है.. कर तो रहा हूं..

मेरी रूपाली दीदी ने कुछ देर और उन को चूमने का प्रयास किया.. परंतु हालात में कोई भी परिवर्तन नहीं हुए.. थक हार कर मेरी दीदी उठ कर खड़ी हो गई और जीजू की तरफ देख कर मुस्कुराने लगी..

मेरी रूपाली दीदी: मैं खाना लगा देती हूं.

मेरे जीजू: ठीक है..

कमरे से बाहर निकलते ही मेरी दीदी की आंखों से अश्रु धारा फूट पड़ी अपनी और जीजा जी की हालत पर. उन्हें अच्छी तरह पता था कि ऐसी हालत में मेरे जीजू के लिए संभोग करना एक कठिन काम है परंतु फिर भी इस प्रकार जीवन बिताना मेरी दीदी को बेहद कठिन लग रहा था.. मेरी दीदी भगवान को दोष देना चाहती थी परंतु उन्होंने नहीं दिया.. उन्हें पता था कि सिर्फ भगवान ही उनकी मदद कर सकता है इस हालत में.. ठाकुर साहब मेरी दीदी के पीछे पड़े हुए थे... पर दीदी अच्छी तरह जानती थी कि ठाकुर साहब एक गुंडे है.. और वह उनको पसंद भी नहीं करती थी..

मेरी रूपाली दीदी घर के खर्चों के बारे में सोच रही थी.. कैसे वह अगले महीने के घर के खर्चों का इंतजाम कर पाएगी.. मेरे और सोनिया के कॉलेज की फीस, दवा दारू का खर्च जीजा जी का, घर का किराया, घर का राशन.. एक फूटी कौड़ी नहीं थी अभी उनके पास.. मैं भी भली-भांति इस इस बात से अनभिज्ञ था, पर दीदी से बात करने कि मुझ में कभी हिम्मत नहीं हुई, और भला मैं कर भी क्या सकता था..

मेरी रूपाली दीदी ने नौकरी ढूंढने का भी खूब प्रयास किया परंतु कहीं भी नौकरी नहीं मिली उनको.. मेरी दीदी को भगवान पर पूरा भरोसा था.. वह ऐसा मानती थी कि भगवान उनको और उनके परिवार को कभी भी भूखा नहीं सोने देगा.. एक बात तो तय है दोस्तों कि मेरी बहन मेरे जीजाजी से बेहद प्यार करती थी.. सारी मुसीबत वह मुस्कुराते हुए झेल रही थी.. इस बात की भनक भी नहीं होने देती थी वह जीजा जी को..

इसी प्रकार 2 दिन और गुजर गया. अब मेरी दीदी के बैंक अकाउंट में भी एक पैसा नहीं बचा हुआ था.. वाह बेहद परेशान थे.. दूसरी तरफ फीस नहीं जमा करने के कारण सोनिया के कॉलेज से भी नोटिस आया था की अगर फीस जमा नहीं किए तो आपके बच्चे को कॉलेज से निकाल दिया जाएगा.. नोटिस मेरे कॉलेज से भी मैं आया था.. पर मैंने उस नोटिस को मेरी दीदी से छुपा लिया था..

सोनिया: मम्मी मेरी फीस भर दो ना..

मेरी रूपाली दीदी: हां बेटा आपकी फीस पर दी जाएगी.

सोनिया: राखी मैडम बोल रही थी कि तुम्हारे मम्मी पापा के पास तो पैसा ही नहीं है कल से कॉलेज मत आना.

मेरी रूपाली दीदी: नहीं ऐसी कोई बात नहीं.. कल आपकी फीस भर दी जाएगी...

सोनिया: ठीक है मम्मी मैं बाहर खेलने जा रही हूं.

दीदी... मेरे कॉलेज की फीस भी जमा नहीं हुई है.. मैंने घबराते हुए दीदी को बताया..

मेरी दीदी: हां सैंडी.. भाई मैं अच्छी तरह जानती हूं.. तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.. मैं सब ठीक कर दूंगी..

मैं भी बाहर अपने दोस्तों के साथ खेलने निकल गया..

मेरी रूपाली दीदी बाथरूम के अंदर घुस गई और फूट-फूट कर रोने लगी.. वह अपने परिवार के लिए कुछ भी नहीं कर पा रही थी.. क्या ठाकुर रणवीर सिंह ही एकमात्र रास्ता बचे हुए थे? एक 6 फुट लंबे चौड़े तगड़े मर्द को.. उस सांवले रंग के गुंडे को.. कैसे खेलने दे सकती थी अपने नाजुक बदन के साथ मेरी बहन... मेरी दीदी सोच सोच कर परेशान हो रही थी और रो रही थी..

लेकिन आप कोई चारा नहीं बचा था मेरी बहन के पास.

उन्होंने मन ही मन सोचा कि अब ठाकुर साहब से बात करनी ही पड़ेगी और उनसे कुछ पैसों की मदद मांगनी होगी... शायद ठाकुर साहब का हृदय परिवर्तन हो जाए.. ठाकुर साहब से मदद मांगने के अलावा अब मेरी रुपाली दीदी के पास कोई रास्ता नहीं था..

अगले दिन सोनिया को कॉलेज छोड़ने के बाद मेरी रूपाली दीदी वापस लौट रही थी तो रास्ते में ठाकुर साहब हमेशा की तरह खड़े थे.. मेरी दीदी ने उनकी तरफ देखा. कई दिनों के बाद दोनों की आंखें चार हो गई थी.. मेरी बहन बहुत गंभीर दिख रही थी.. वह ठाकुर साहब के पास

गई घबराते हुए..

दीदी: क्या आप मेरे घर आ सकते है.

ठाकुर साहब: जी बिल्कुल कब आ जाऊं?

मेरी दीदी: थोड़ी देर बाद आ सकते हैं क्या.

ठाकुर साहब: ठीक है मैं आधे घंटे में आता हूं..

मेरी रूपाली दीदी ने घर आकर अपने घर के बचे कामकाज निपटाए.. ठीक आधे घंटे के बाद हमारे घर के दरवाजे की घंटी बजी.. अपनी तेज धड़कनों के साथ मेरी रूपाली दीदी ने घर का दरवाजा खोल ठाकुर साहब का अंदर आने के लिए स्वागत किया.. उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी.. दिखावे के लिए ठाकुर साहब ने मेरे जीजू से मुलाकात की और मुझे भी आने वाले एग्जाम के लिए शुभकामनाएं दी.. मैं ठाकुर साहब से मिलकर बेहद खुश हुआ.. वह मुझे काफी गंभीर और अच्छे इंसान प्रतीत हो रहे थे.. मुझे उनकी नियत का अंदाजा था इसीलिए मैं उनसे डरा हुआ था.. चाय पीने के बाद ठाकुर साहब जाने के लिए दरवाजे पर बाहर खड़े थे तो थे उसी वक्त मेरे रुपाली दीदी ने उनको रोक लिया..

मेरी रूपाली दीदी: ठाकुर साहब प्लीज आप मुझको ₹2000 दे दीजिए.. मैं आपको अगले महीने लौटा दूंगी.. अगर कहीं मेरी नौकरी लग गई तो.

ठाकुर साहब: रुपाली जी आपने इतनी कोशिश तो की.. आपकी नौकरी तो कहीं नहीं लगी.. बताइए..

मेरी रूपाली दीदी: मुझे थोड़ा उधार दे दीजिए ठाकुर साहब.. बड़ी मेहरबानी होगी आपकी.. वरना मेरी बेटी सोनिया कॉलेज से निकाल दी जाएगी.. और मेरा छोटा भाई भी..

ठाकुर साहब: मैंने तो आपको पहले भी बोला था रुपाली जी.. बस आधे घंटे की बात है.. पैसे आपको मिल जाएंगे.

मेरे रूपाली दीदी: क्या एक बेसहारा औरत का आप इस तरह से फायदा उठाएंगे साहब.. हमारे परिवार पर कुछ तो रहम कीजिए.

ठाकुर साहब: आप खुद ही बेसहारा बनना चाह रही हो. मैं तो आप को सहारा देने के लिए अपने सारे काम धंधे छोड़कर आया.. अगले चुनाव की मीटिंग के लिए मुझे जाना था.. पर मैं हाजिर हो गया आपके बस एक बार बुलाने पर.

मेरी रूपाली दीदी: आप ऐसा क्यों चाहते हैं.. मैं दो बच्चों की मां हूं.. उमर में भी मैं आप से 20 साल छोटी हूं..

ठाकुर साहब: देखो रूपाली.. मेरा समय बहुत कीमती है.. अगर तुमको इसी तरह से समय बर्बाद करने के लिए मुझे बुलाना था.. तो फिर कुछ नहीं हो सकता... मैं चाहता तो तुम्हें कभी भी उठा कर अपनी कार में ले जा सकता था.. पर मैंने ऐसा नहीं किया.. क्योंकि मैं तुम्हारी इज्जत करता हूं... मैं नीचे जा रहा हूं और अगले 10 मिनट तक इंतजार करूंगा.. चौकीदार से मैंने ऊपर वाले कमरे की चाबी ले ली है.. अगर तुम्हें मंजूर हो तो खिड़की से ही सारा कर देना..

ठाकुर साहब मेरी दीदी की तरफ देखे बिना वहां से निकल गए..

मेरी रूपाली दीदी अब बड़ी गंभीरता के साथ सोचने लगी थी.. उनके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं ठाकुर साहब के अलावा.. इस मोहल्ले में इतनी सारी औरतें हैं परंतु सिर्फ मैं ही क्यों? मेरी बहन सोच रही थी... उन्होंने खिड़की का पर्दा हटा के नीचे की ओर देखा... ठाकुर साहब टकटकी लगाए हुए खिड़की तरफ ही देख रहे थे.. मेरी बहन ने अपना मन बना लिया था..

बड़ी तेजी से मेरी रूपाली दीदी अपने कमरे में गई और उन्होंने अपनी साड़ी बदल ली.. ठीक 10 मिनट के बाद मेरी दीदी ने खिड़की खोली और ठाकुर साहब को अपनी आंखों से ऊपर आने का इशारा किया.. ठाकुर साहब बेहद खुश और उत्तेजित हो गय.. वह बड़ी तेजी से ऊपर हमारे घर की तरफ आ गए.. दरवाजा खुला था, सामने मेरी रूपाली दीदी खड़ी थी.

मेरी रूपाली दीदी को देखकर ठाकुर साहब का मुंह खुला का खुला रह गया.. मेरी रूपाली दीदी ने एक लाल रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी और काले रंग की चोली... मेरी बहन अंदर ब्रेजियर भी नहीं पहनी हुई थी. मेरी दीदी ने मन ही मन ठान लिया था कि जल्दी से जल्दी ठाकुर साहब को निपटा दूंगी.. इसीलिए उन्होंने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी.

मेरी रूपाली दीदी: सिर्फ 30 मिनट?

ठाकुर साहब: हां बिल्कुल

मेरी दीदी: अगर किसी ने देख लिया तो.

ठाकुर साहब: कोई नहीं देखेगा . मैंने सारा इंतजाम कर रखा है..

मेरे जीजू अंदर कमरे से: कौन है रूपाली.

मेरी दीदी: शर्म आंटी बुला रही है.. मैं थोड़ी देर बाद आती हूं..

जीजा जी: ठीक है रुपाली.. बाहर से दरवाजा बंद कर देना..

मेरी दीदी ने दरवाजा बंद किया और बड़ी तेजी से छत की तरफ निकल गई.. पीछे पीछे ठाकुर साहब... उन्होंने छत पर जाकर एक छोटे से बने हुए कमरे का दरवाजा खोल दिया. दोनों अंदर घुस गय.. मेरी रूपाली दीदी कमरे की हालत देख कर भ्रमित हो रही थी की ठाकुर साहब पता नहीं किस जगह पर करना चाह रहे हैं.. मेरी बहन परेशान और तकलीफ में लग रही थी..

यह स्टोर रूम था.. इसमें कुछ पुरानी सड़ी गली हुई चीजें पढ़ी हुई थी.. अंधेरे में मेरी रुपाली दीदी खड़ी थी.. ठाकुर साहब ने एक नाइट बल्ब जला अंदर थोड़ी बहुत रोशनी करने की कोशिश की... मेरी बहन कमरे के अंदर खड़ी हुई पसीने से लथपथ थरथरआ रही थी.. डरी हुई थी.. ठाकुर साहब ने दरवाजे की कुंडी बंद की... यह एक बेहद छोटा सा कमरा था.. इस कमरे में लकड़ी का सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा था.. मेरी बहन ने तो कल्पना भी नहीं की थी कि कभी इस कमरे में आएगी..

ठाकुर साहब नीचे जमीन पर बैठ गय.. उन्होंने अपनी दोनों मजबूत टांगे दोनों तरफ फैला मेरी बहन को आमंत्रित किया..

ठाकुर साहब: आओ रूपाली. बैठो मेरी गोद में..

मेरे रूपाली दीदी ठाकुर साहब के नजदीक आ गई थी.. ठाकुर साहब ने मेरी बहन की कलाई पकड़ कर अपनी तरफ खींचा...

मेरी रूपाली दीदी घबराते हुए ठाकुर साहब के बगल में बैठ गई..

ठाकुर साहब: रूपाली: तुम बहुत खूबसूरत हो. तुम्हारे जैसी खूबसूरत औरत मैंने आज तक नहीं देखी..

मेरी रूपाली दीदी: ठाकुर साहब.. जल्दी कीजिए.. मेरी बेटी सो रही है.. अगर जग गई तो परेशानी हो जाएगी..

ठाकुर साहब ने अपना पर्स निकाला.. 500 के चार नोट निकालकर उन्होंने मेरी रूपाली दीदी के हाथ में रख दिया.. मेरी दीदी, जो अपना छोटा सा पर्स पहले से ही लेकर आई थी उन्होंने रख लिया अंदर.. बेहद शर्मिंदगी का अहसास हो रहा था मेरी दीदी को... माफ कर देना विनोद.. बस आपके लिए ही कर रही हूं मैं.. मेरी दीदी मन ही मन खुद को सांत्वना दे रही थी..

ठाकुर साहब ने मेरी बहन को अपनी गोद में बैठने का इशारा किया.. मेरी रूपाली दीदी समझ नहीं पाई ठाकुर साहब का इशारा.. वह चुपचाप ठाकुर साहब की तरफ देख रही थी.. ठाकुर साहब ने हाथ पकड़ कर मेरी बहन को अपनी तरफ खींचा..

ठाकुर साहब: रुपाली जी.. अपनी दोनों टांगे फैला दो और मेरे ऊपर बैठ जाओ.. यहां इधर इसके ऊपर..

ठाकुर साहब के लिए मेरी रूपाली दीदी के मन में बड़ी नफरत थी इसके बावजूद भी मेरी दीदी उनके ऊपर सवार हो गई थी...

कपड़े के ऊपर से ही सही पर मेरी रूपाली दीदी ठाकुर साहब के लंड पर चढ़कर बैठी हुई थी..

…हाँ..हाँ…हाँ…’ रूपाली.. ठाकुर साहब के मुंह से कामुक चीत्कार सुनकर मेरी दीदी भी हैरान हो गई..

मेरी रूपाली दीदी ने महसूस किया कि कैसे उनकी दोनों टांगों की जोड़ों के बीच का तापमान बढ़ने लगा है... ठाकुर साहब भी अपनी टांगों के बीच बैठी हुई औरत की गर्मी का एहसास पाकर निहाल हो गए थे.. उन्होंने मेरी बहन की साड़ी का पल्लू उनके सीने से हटा दिया.. क्या खूबसूरत और मादक नजारा था.. मेरी बहन ने तो अपनी आंखें बंद कर ली थी,

पर ठाकुर साहब सब कुछ देख रहे थे..

क्या नजारा था? ठाकुर साहब ने देखा कि उनकी आंखों के सामने दो बड़ी-बड़ी चूचियां अपनी चोली में ऊपर नीचे ऊपर नीचे हो रही है.. मेरी दीदी का क्लीवेज कुछ ज्यादा ही बड़ा था... आधी से ज्यादा चूंचियां चोली के बाहर झांक रही थी... ठाकुर साहब को तो समझ में आ गया था कि मेरी बहन की चूचियां, जितना उन्होंने सोचा था उससे कहीं ज्यादा बड़ी और मदमस्त है... मेरी दीदी ने तो शर्म के मारे अपनी आंखें बंद कर ली थी... होने वाले समय के इंतजार में..

ठाकुर साहब ने अपनी शर्ट उतार के नीचे जमीन पर फेंक दी.. चौड़ी छाती के ऊपर काले घने बाल देखकर मेरी रुपाली दीदी शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी... ठाकुर साहब की मर्दानगी और मेरी रूपाली दीदी की जवानी आग और घी का काम कर रहे थे..

ठाकुर रणवीर सिंह एक तगड़े मजबूत जानवर की तरह अपनी छाती खुली करके मेरी बहन को गोद में बिठाकर आनंद ले रहे थे.. मेरी बहन सिमटी हुई डरी हुई केवल अपनी साड़ी और चोली में ठाकुर साहब के सामने प्रस्तुत थी.. ठाकुर साहब ने मेरी बहन के सीने से उनकी साड़ी का आंचल हटा दिया था.. मेरी रूपाली दीदी एक बेबी डॉल की तरह ठाकुर साहब की गोद में बैठी हुई थी..

ठाकुर साहब की चौड़ी छाती देख कर मेरी रूपाली दीदी घबरा रही थी शर्म आ रही थी.. पर साथ ही साथ उनसे नफरत भी कर रही थी.. मेरी बहन की गोलाई देखकर ठाकुर रणवीर सिंह का मुंह खुला का खुला रह गया था.. उन्होंने मेरी बहन की पतली कमर थाम ली और अपना मुंह मेरी दीदी के खुले गले पर रख दिया और चूमने लगे. उनका एक हाथ पीछे मेरी रूपाली दीदी की पीठ के ऊपर घूम रहा था.. ठाकुर साहब का चेहरा मेरी बहन के पहाड़ों के ऊपरी हिस्से पर आ गया था.. मेरी रूपाली दीदी ने पीछे की तरफ झुकने का प्रयास किया परंतु ठाकुर साहब ने उनकी कमर को अच्छी तरह जकड़ रखा था.. ठाकुर साहब किसी जंगली जानवर की तरह हुंकार भरते हुए मेरी बहन को दबोच उनकी छाती के ऊपरी भाग को चूम रहे थे... बड़ी तेजी से हो उन्होंने अपना एक हाथ मेरी रुपाली दीदी की बाईं चूची पर रख दिया और मसल दिया पूरी ताकत से.. मेरी बहन तड़पने और कसमसआने लगी..

मेरी बहन की चूचियों की नरमी और गर्मी अपने हाथों में महसूस करके ठाकुर साहब को बेहद आश्चर्य हुआ.. उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरी बहन की दोनों चुचियों को जकड़ लिया और दबाने और मसलने लगे,

चोली के ऊपर से ही.

मेरी रूपाली दीदी: अह्ह्ह ! आहह… ठाकुर साहब... प्लीज.. आराम से... धीरे कीजिए ना..

ठाकुर साहब: आह्ह्हह्ह ! रूपाली... यह क्या है.. क्या चीज हो तुम.. कयामत हो तुम रूपाली... इतने बड़े बड़े..आह्ह्.. रूपाली..

बड़ी नरम हो तुम..

ठाकुर रणवीर सिंह मेरी बहन की चोली खोलने का प्रयास करने लगे परंतु चोली का बटन ढूंढने में उन्हें परेशानी हो रही थी.. ठाकुर साहब बेहद उत्तेजित हो चुके थे...

किसी तरह प्रयास करके ठाकुर साहब ने मेरी रूपाली दीदी की चोली के सारे बटन खोल दीय.. मेरी बहन की चोली खुलते ही ठाकुर साहब का संयम टूट गया.. अपनी हवस भरी आंखों से उन्होंने मेरी बहन की दोनों बड़ी बड़ी चूचियों के दर्शन किए.. खड़े-खड़े भूरे रंग के निपल्स देखकर ठाकुर साहब के अरमान जाग चुके थे.. मेरी रूपाली दीदी ने अपनी जांघों के जोड़ के बीच में ठाकुर साहब की मर्दानगी का एहसास किया.. ठाकुर साहब के बड़े मर्दानगी का एहसास पाकर मेरी दीदी मचलने लगी थी.. मेरी दीदी उनसे नफरत तो कर रही थी पर उनका बदन उन्हें धोखा दे रहा था.. ठाकुर साहब के औजार ने मेरी बहन को बेहाल कर दिया था.. मेरी रूपाली दीदी को पूरी तरह एहसास था कि इतना बड़ा मोटा फिर से उनको कभी भी नसीब नहीं होगा...

ठाकुर साहब ने अपना मुंह मेरी रूपाली दीदी की एक चूची पर रख दिया और बुरी तरह चूसने लगे.. ठाकुर साहब के मुंह से एक औरत की चूची पीने की आवाजें निकलने लगी थी.. मीठे दूध की धार मेरी बहन की चूचियों से निकलने लगी थी.. ठाकुर साहब ने मेरी बहन को इशारा किया कि वह उनको अपनी बाहों में भर ले... परंतु मेरी दीदी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. मेरी रूपाली दीदी पहली और आखरी बार यह घिनौना काम कर रही थी.. उनकी आंखों में आंसू थे साथ ही साथ उनकी दोनों चूचियां चूसी जा रही थी ठाकुर साहब के द्वारा.. बारी बारी.. मेरी रूपाली दीदी.. 1 घरेलू पतिव्रता नारी... अपनी मजबूरी में ठाकुर साहब को अपना दूध पिला रही थी.. ठाकुर साहब तो अपनी पूरी मस्ती में थे.. दूध की धार निकल रही थी और ठाकुर साहब बिना एक बूंद को भी बर्बाद किए हुए मेरी बहन की छाती को पिए जा रहे थे...

अचानक मेरी बहन ने ठाकुर साहब के गले में अपनी बाहों का घेरा डाल दिया.. ठाकुर साहब मेरी बहन का दूध पिए जा रहे थे और खुद को बेहद खुशनसीब मान रहे थे. अपने सपनों की रानी , अपनी महबूबा, कि दोनों छाती उनके हवाले थी.... ठाकुर साहब मेरी बहन की चूचियों का खुलकर मजा ले रहे थे...

ऊपर की तरफ हिलने डुलने के कारण मेरी दीदी की गांड की दरार के ऊपर ठाकुर साहब का लण्ड आ गया था.. इस बात का एहसास होते ही ठाकुर साहब नीचे के झटके मारने लगे...

ठाकुर साहब पागलों की तरह उत्तेजित हो चुके थे. वह मेरी बहन की चूची से दूध पीते रहे.. और दीदी की गांड पर हाथ फिरआते रहे.. मेरी बहन की दोनों चूची और उसके ऊपर का भाग पूरी तरह गीला हो चुका था ठाकुर साहब के चूमने चूसने और चाटने के कारण.

ठाकुर साहब नीचे से झटके मारते रहे.. मेरी रूपाली दीदी की गांड की नरमी और उनकी खूबसूरती के कारण ठाकुर साहब का संयम टूट गया , उनके लोड़े का पानी निकल गया... मेरी रूपाली दीदी ने भी महसूस किया था अपनी साड़ी के ऊपर से... ठाकुर साहब का झड़ना.

ठाकुर साहब के लोड़े से ढेर सारा पानी निकला था ,परंतु वह पानी उनकी पैंट और अंडरवियर के अंदर ही रह गया..

मेरी रूपाली दीदी ने घड़ी की तरफ देखा.. तकरीबन 30 मिनट हो चुके थे.. ठाकुर साहब ने मेरी बहन की चोटियों पर कई बार चुम्मा लिया.. फिर मेरे रूपाली दीदी को आजाद कर दिया.

मेरे रूपाली दीदी उठ कर खड़ी हो गई और अपनी चोली के बटन बंद कर ठाकुर साहब की की तरफ देखने लगी... ठाकुर साहब भी मेरी बहन को देख कर मुस्कुरा रहे थे...

ठाकुर रणवीर सिंह: अगर अपनी नाभि चूमने दोगी तो ₹500 और दूंगा तुमको.. रूपाली..

मेरी रूपाली दीदी : प्लीज ठाकुर साहब.. आप दरवाजे की कुंडी खोल दीजिए और मुझे जाने दीजिए...

वैसे तो ठाकुर साहब मेरी रूपाली दीदी का दूध पीकर ही संतुष्ट हो गए थे परंतु वह आगे भी करना चाहते थे... उन्होंने जोर जबरदस्ती करना मेरी बहन के साथ ठीक नहीं समझा.. दरवाजे की कुंडी खोल कर उन्होंने मेरी रुपाली दीदी को जाने दिया.. मेरी रूपाली दीदी भागती हुई अपने घर में आ गई... रोते हुए बाथरूम में समा गई..

मेरी रूपाली दीदी को बेहद बुरा लग रहा था.. उन्होंने एक अनजान मर्द को अपनी छाती का दूध पिलाया था.. कुछ पैसों के लिए..

मेरी रूपाली दीदी नहा कर बाथरूम से वापस आ गई.. वह बेहद परेशान लग रही थी. उनकी परेशानी देखकर मैंने उनसे पूछ लिया कि दीदी क्या हुआ कोई. दीदी ने जवाब दिया : नहीं सैंडी... मैं बिल्कुल ठीक हूं..

मेरी रूपाली दीदी किचन में घुस गई और अपने घर के काम करने लगी.

दूसरी तरफ ठाकुर रणवीर सिंह अपने कमरे में लेटा हुआ अपने हाथ में अपना लोड़ा थाम के मेरी रूपाली दीदी को याद कर रहा था .. ठाकुर साहब बेहद उत्तेजित हो चुके थे... वह मेरी बहन को अपने बिस्तर पर लाना चाहते थे.. किसी भी कीमत पर... मेरी बहन को अपनी रंडी अपनी रखेल बनना चाहते थे.. उनका दिमाग बहुत तेजी से चल रहा था..

मेरी रूपाली दीदी की नरम बाहों का एहसास अपनी गर्दन के इर्द-गिर्द.. नर्म मुलायम चूचियां उनके मुंह में... ठाकुर साहब मेरी रूपाली दीदी के बारे में सोच सोच कर अपने बाथरूम में अपना लौड़ा हिला रहे थे.. एक पिचकारी निकली और ठाकुर साहब शांत हो गए और अपने बिस्तर पर आकर लेट गय..

अब मेरी रूपाली दीदी ने ठाकुर साहब को पूरी तरह से नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था.. ऐसा लगता था कि मेरी दीदी अब उनकी कोई परवाह नहीं कर रही है.. ठाकुर साहब हर दिन मेरी बहन का इंतजार करते थे रास्ते में खड़े होकर.. उनकी हवस की अग्नि शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.. उनके दिमाग में बस एक ही बात थी कि वह मेरी बहन को अपने बिस्तर पर ले जाकर उनकी अच्छे से ठुकाई करें..

ठाकुर साहब बेहद परेशान रहने लगे थे.. उनकी रातों की नींद उड़ी हुई थी.. 45 साल की उम्र में जहां दूसरे मर्दों की मर्दानगी काम करना बंद कर चुकी होती है वहीं पर ठाकुर साहब की मर्दानगी नई उमंग और नई अंगड़ाई ले रही थी.. मेरी बहन के लिए... तलाक होने के बाद ठाकुर साहब ने कई रंडियों को अपने घर पर लाया था और उनके साथ जी भर के संभोग भी किया था.. परंतु जो मजा आज मेरी दीदी के साथ आया था.. ठाकुर साहब तो बस उसी के बारे में सोच रहे थे..

उछलते हुए मेरी बहन के दोनों पहाड़ ठाकुर साहब की आंखों के सामने बार-बार घूम रहे थे.. भूरे निपल्स... बिल्कुल खड़े-खड़े.. आमंत्रित करते हुए ठाकुर साहब को पागल बना रहे थे अपने ही ख्यालों में.. ठाकुर साहब ने अपनी चुनाव की मीटिंग कैंसिल कर दी...

27 साल की मेरी रुपाली दीदी.. दो बच्चों की मां... ठाकुर साहब की हवास का सामान बनी हुई थी....

मेरी रूपाली दीदी सुबह सुबह 6:00 बजे से रात 10:00 बजे तक जीजा जी की सेवा में लगी हुई थी इन दिनों.. अपने पाप का बोझ कम करने के लिए.... घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी.. मेरी रूपाली दीदी नौकरी के लिए न्यूज़पेपर में देख रही थी..​
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