Update 10

मेरी रूपाली दीदी किचन में से गुस्से में निकली और मेरे जीजू की तरफ देखते हुए अजीब नजरों से: यह ठाकुर साहब भी ना.... अजीब किस्म के मर्द है... उनका ही घर है फिर भी उनको नहीं पता होता है तो उनकी चीजें कहां पर है... और फिर ठाकुर साहब के बेडरूम में चली गई..

साथ ही साथ मेरी बहन ने दरवाजा भी थोड़ा और बंद कर लिया उस बेडरूम का.. पूरा बंद नहीं... मैं और मेरे जीजू उस दरवाजे की तरफ देख रहे थे... हैरान होकर...

थोड़ी देर में मेरी बहन बेडरूम से बाहर निकल कर आ गई.. मेरे जीजू के मन में जो शंका पैदा हुई थी शायद वह दूर हो गई थी... पर मुझे तो अच्छी तरह पता था कि इस घर में क्या खिचड़ी पक रही है... मैंने कुछ भी बोलना ठीक नहीं समझा उस वक्त किसी को भी...

हम सब ने साथ मिलकर ब्रेकफास्ट किया... ठाकुर साहब की निगाहें बार-बार में मेरी रुपाली दीदी के ऊपर ही जा रही थी... दीदी उनकी तरफ नहीं देख रही थी जानबूझकर.. उनका पति और उनका भाई जो सामने बैठा हुआ था...

वैसे तो ठाकुर साहब डरते तो किसी से भी नहीं थे.. पर फिर भी उनके अंदर कुछ मर्यादा और कुछ शर्म बची हुई थी... ब्रेकफास्ट के बाद ठाकुर साहब अपने बेडरूम में चले गय... मेरी रूपाली दीदी भी मेरे जीजू को उनके व्हीलचेयर पर घसीटते हुए उनके बेडरूम में ले गई और किसी तरह से उठाकर उनको बेड पर लिटा दि... फिर अपनी एक कॉटन की साड़ी और चोली लेकर बाथरूम में चली...

थोड़ी देर बाद मेरी रूपाली दीदी बाथरूम से बाहर निकली अपनी कॉटन की साड़ी और पुरानी चोली पहनकर...

मेरे जीजू: क्या हुआ रूपाली... तुमने अपनी साड़ी क्यों चेंज कर दी.. बहुत अच्छी लग रही थी तुम तो उस साड़ी में...

मेरी रुपाली दीदी: क्या करूं जी.... आप तो जानते ही हो ना कि मेरे पास सिर्फ दो तीन अच्छी साड़ियां है.... अभी घर के इतने सारे काम करने हैं है हमको...

साड़ी खराब ना हो जाए इसलिए उसको बदलकर मैंने नई साड़ी पहन ली है... अब आप आराम करो.. ज्यादा मत सोचो..

मेरी रुपाली दीदी की बातें सुनकर मेरे जीजू की आंखों में आंसू आ गए ... वह रोने लगे... रुपाली मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कर पाया ना... बोलते हुए उनकी आंखों से आंसू नहीं रुक रहे थे..

मेरी रूपाली दीदी ने उनको गले लगा लिया... उनके होंठों को चूमते हुए मेरी दीदी ने कहा: मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं.. आपके लिए कुछ भी कर सकती हूं... बस आप रोना बंद कीजिए..

मेरी रूपाली दीदी ने मेरे जीजू के चेहरे को अपने दोनों छातियों के बीच में दबा लिया... मेरे जीजा जी की आंखों के आंसू बंद होने लगे थे... मेरी दीदी ने उनको बिस्तर पर अच्छे से लेटा दिया...

मेरी रुपाली दीदी: आप इतना ज्यादा क्यों सोचते हैं.. सब ठीक हो जाएगा धीरे-धीरे... भगवान पर भरोसा रखिए...

मेरे जीजू को सुलाने के बाद दीदी किचन में चली गई काम करने के लिए...

अगले कई घंटों तक मेरी रूपाली दीदी घर के कामों में व्यस्त रही.. किचन में खाना तैयार करना, फिर सारे बर्तन साफ करना उसके बाद घर की साफ सफाई इत्यादि.. मैं हॉल में बैठा हुआ पढ़ाई कर रहा था आपने टेबल कुर्सी पर.. मेरे और मेरे दीदी के बीच में कोई बातचीत नहीं हो रही थी... मेरे जीजू अपने बेडरूम में आराम कर रहे थे.. ठाकुर साहब हर दिन की तरह अपने काम से घर से बाहर निकल चुके थे.. सोनिया को कॉलेज छोड़ने के बाद वह उधर से ही चले गए... दोपहर के बाद मेरी रूपाली दीदी सोनिया को कॉलेज लेने गई.. सोनिया की कॉलेज से आने के बाद हम सब ने मिलकर एक साथ लंच किया और फिर अपने अपने काम में लग चुके थे.. ठाकुर साहब के बेडरूम में मेरी रूपाली दीदी, मेरे जीजु और सोनिया उनके बेड पर ही आराम कर रहे थे... वह सभी अंदर खेल रहे थे.. मैं हॉल में सोने की कोशिश कोशिश कर रहा था... पर मुझे कुछ खास नींद नहीं आई थी...

शाम को तकरीबन 5:30 बजे हमारे घर की डोर बेल बजी तुम अपनी आधी नींद से जाग गया... डोरबेल बजते ही मेरी रूपाली दीदी बेडरूम से निकलकर आ गई... मैंने देखा मेरी दीदी ने एक बार फिर वही सुबह वाली पीली साड़ी पहन रखी थी और पीली वाली मैचिंग चोली, जो उन्होंने सुबह पहन रखी थी.. उनके चेहरे पर लाइट मेकअप, आंखों में काजल, और होठों पर लिपस्टिक लगी हुई थी.. आप दोस्तों को बताने की जरूरत नहीं है कि मेरी दीदी एक बार फिर कयामत ढा रही थी... मेरी बहन ने दरवाजा खोला तो सामने ठाकुर साहब ही खड़े थे.. ठाकुर साहब मेरी रुपाली दीदी को देख कर मुस्कुराए... मेरी बहन ने बाजू हट कर ठाकुर साहब को घर में के अंदर आने का रास्ता दिया... ठाकुर साहब ने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर अपने बेडरूम( वही बेडरूम जिसके अंदर मेरे जीजू सोते थे पहले, लेकिन एयर कंडीशन खराब होने के बाद वह ठाकुर साहब के बेडरूम में सोने लगे थे) के अंदर चले गए...

मेरी रूपाली दीदी किचन के अंदर चली गई चाय नाश्ता तैयार करने के लिए..

मैं अपने बेड से उठ कर अपने चेयर टेबल पर जाकर बैठ गया और पढ़ाई का झूठा नाटक करने लगा.... थोड़ी ही देर में मेरे जीजू भी बेडरूम से व्हीलचेयर पर निकलकर हॉल में आ गया मेरे पास... सोनिया अभी भी बेडरूम के अंदर ही थी और मेरे जीजू के मोबाइल में कुछ वीडियो देख रही थी.... ठाकुर साहब के बेडरूम से शावर की आवाज आ रही थी... शायद वह नहा रहे थे.. हॉल में आने के बाद जीजू ने टीवी चालू कर दिया और उस पर न्यूज़ देखने लगे... मेरी रूपाली दीदी किचन से ट्रेन में चाय और क्रीम बिस्किट लेकर किचन से बाहर निकल कर आई... मेरी दीदी ने चाय का एक प्याला मुझे और मेरे जीजू को देने के बाद जीजू के लिए दो क्रीम बिस्किट एक छोटे से प्लेट में रखकर उनको पकड़ा दी... मेरी बहन ने क्रीम बिस्किट मुझे नहीं दी ... मैं समझ रहा था आखिर ऐसा क्यों है... वह अभी भी मुझसे नाराज लग रही थी... वैसे नाराज मुझे होना चाहिए था उनसे....

मेरी दीदी चाय का ट्रे लेकर ठाकुर साहब के बेडरूम के अंदर चली गई, और एक झटके में धक्का देकर उन्होंने बेडरूम का दरवाजा भी बंद कर लिया अंदर से.. मेरी रूपाली दीदी की इस हरकत पर मेरी जीजू तो हैरान होकर देखने लगे मेरी तरफ... मैंने अपना चेहरा अपनी किताब के अंदर गड़ा दिया... मैं अपने जीजा जी की निगाहों का सामना करना नहीं चाहता था... उनके चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी... उनको बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था कि मेरी बहन ने ठाकुर साहब के कमरे के अंदर जाकर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है... यह उनका चेहरा देखकर साफ पता चल रहा था.. लेकिन उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा और अपना मन मार कर टीवी की तरफ देखने लगे... मेरे मन के अंदर भी खलबली मचने लगी थी... बेडरूम के अंदर ना जाने क्या-क्या हो रहा है... क्योंकि तकरीबन 5 मिनट हो चुके थे...

उस कमरे के अंदर से मेरी रूपाली दीदी की चूड़ियों की खनक ने की आवाज आने लगी... और साथ में ही मेरी बहन की पायल भी खनखनआ रही थी... मैं अच्छी तरह समझ गया अंदर कमरे में क्या होने लगा है.. क्योंकि मैं पिछले कई रातों से ऐसी आवाजें सुन रहा था....

जब मेरे जीजू के कानों में यह आवाज गई तो उन्होंने टीवी का वॉल्यूम कम कर दिया.... और मेरी तरफ देखकर पूछने लगे..

मेरे जीजू: सैंडी तुमने सुना क्या.. यह क्या आवाज थी?

मैं: नहीं जीजू मैंने तो कुछ भी नहीं सुना... आपको क्या सुनाई दिया..

मेरे जीजू निराश होकर एक बार फिर टीवी की तरफ देखने लगे... और उन्होंने टीवी का वॉल्यूम तेज कर दिया... अंदर कमरे से एक बार फिर मेरी रूपाली दीदी की चूड़ियों की खनखनआहट और पायल की छम छम और साथ में पलंग के हिलने और चरमरआने की आवाज भी लयबद्ध तरीके से आने लगी...

मन ही मन मैंने ठाकुर साहब के दिमाग का लोहा मान लिया... शायद वह टीवी का वॉल्यूम कम होने पर अपनी कामलीला को रोक दे रहे थे... और जैसे ही मेरे जीजू टीवी का वॉल्यूम तेज कर रहे थे ठाकुर साहब अंदर तेजी से झटके मार रहे थे मेरी बहन को... मुझे तो अंदर बेडरूम से आने वाली आवाज साफ-साफ सुनाई दे रही थी... जाहिर है ठाकुर साहब अंदर मेरी बहन को नीचे लिटा कर उनके ऊपर सवार थे और ऊपर से जोर लगाकर हचक के लंड पेल रहे थे.... जब मैंने जीजू की तरफ देखा तो पाया कि वह अब टीवी की तरफ भी नहीं देख रहे थे... उनका सिर नीचे जमीन की तरफ झुका हुआ था.. उनके चेहरे पर गहरी चिंता के भाव दिखाई दे रहे थे... ना जाने क्यों उन्होंने टीवी का वॉल्यूम और भी थोड़ा तेज कर दिया था... तभी अचानक अंदर कमरे से एक तेज आवाज आई..

मेरी रूपाली दीदी: ऊऊऊऊऊईईईईई ...माम्मईईईई.. मर गई रे...

मेरे जीजू तपाक से मेरी तरफ मुड़ कर बोले: सैंडी तुमने सुना क्या... यह तुम्हारी रुपाली दीदी की आवाज ही है ना..

मैं: नहीं जीजू मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं दिया... शायद आपके कान बज रहे होंगे... मेरी दीदी क्यों चिल्लाएगी... वह तो ठाकुर साहब के साथ उनके बेडरूम के अंदर है... शायद घर के बाहर किसी औरत औरत के चिल्लाने की आवाज थी...

मेरी बात सुनकर तो मेरे जीजू और भी असमंजस में पड़ गए... उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो रहा है इस घर में... या हो सकता है कि उन्हें अच्छी तरह बताओ कि क्या हो रहा है इस घर में..

मैंने जीजू से ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा..

तकरीबन 25 मिनट हो चुके थे... और उस बेडरूम के अंदर से मेरी रूपाली दीदी की कामुक सिसकियां रुक रुक कर मेरे कानों में आ रही थी.. जाहिर है मेरे जीजू के कानों में भी जा रही होंगी...

अब उस कमरे के अंदर का तूफान शांत हो गया था... मेरे जीजू भी अब ठीक लग रहे थे...

उस बेडरूम का दरवाजा खुला... मेरी रूपाली दीदी निकल कर बाहर आ गई... दीदी जिस हालत में बेडरूम के अंदर गई थी लगभग उसी हालत में बाहर निकली थी... वही पीली साड़ी वही पीली चोली.... लेकिन जो फर्क मैंने देखा... वह मेरी जीजू देख पाए या नहीं वह तो मैं बता नहीं सकता.. लेकिन आप सभी दोस्तों को बता सकता हूं...

मेरी रूपाली दीदी के होठों की लिपस्टिक गायब थी... माथे पर पसीना था... मेरी बहन चलते हुए थोड़ी बहुत लड़खड़ा रही थी... और उनकी नाभि के बगल में कमर पर एक सफेद चिपचिपा पदार्थ लगा हुआ था... जो ठाकुर साहब का वीर्य ही हो सकता है मेरे मन में तो कोई संदेह नहीं था... मेरे जीजू का पता नहीं...

जैसे ही मेरी मेरी रूपाली दीदी मेरे जीजू के पास पहुंच कर नीचे झुक कप प्लेट उठाने लगी उनका, मेरे जीजू की नजर मेरी बहन की कमर पर लगे हुए उस पदार्थ पर पड़ी...

मेरे जीजू( आश्चर्य से): अरे रूपाली... यह तुम्हारी कमर पर यह चिकना चिकना क्या लगा हुआ है...

मेरी रूपाली दीदी( मुस्कुराते हुए): नहीं कुछ नहीं है जी... वह तो मेरी कमर पर एक चींटी चल रही थी, उसी को हटाने के लिए मैंने अपने हाथ से छू लिया था ..मेरी हाथ में लगा हुआ बटर भी लग गया है यहां पर...

थोड़ा रुक कर मेरी रुपाली दीदी एक बार फिर बोली... अबकी बार उनके तेवर बहुत तेज हो गए थे: और हां.. मैंने बेडरूम का दरवाजा इसलिए बंद किया था कि ठाकुर साहब मुझसे बात करना चाहते थे... घर के खर्चे के बारे में और भी कुछ बातें थी... वह नहीं चाहते थे कि आप और सैंडी इस बारे में कुछ भी सुने, और किसी तरह का टेंशन ले.... इसीलिए ठाकुर साहब के कहने पर ही मैंने बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद किया था.... यह आखरी लाइन बोलते हुए मेरी दीदी मेरे जीजू की तरफ नफरत की निगाह से देख रही थी...

मेरे जीजू अपनी घबराहट और शर्मिंदगी के वजह से नीचे सर झुका कर देखने लगे.. मेरी रूपाली दीदी वहां से उठकर किचन में चली गई और काम करने लगी... थोड़ी देर में ही ठाकुर साहब अपने बेडरूम से बाहर निकले... उन्होंने सिर्फ एक लूंगी पहन रखी थी... उनका ऊपर का पूरा बदन नंगा था... उनकी चौड़ी छाती के ऊपर काले काले घने बाल थे, साथ ही साथ कुछ सफेद बाल भी दिखाई दे रहे थे... ठाकुर साहब की बॉडी और उनकी पर्सनैलिटी देखकर मैं घबरा उठा था.. और अपने किताब की तरफ देखने लगा था... मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं उनकी आंखों से आंखें मिला कर देख सकूं..... मेरे जीजू की हालत भी कुछ वैसे ही थी... वैसे भी ठाकुर साहब ने हम दोनों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया था और आकर सोफे पर बैठ गए थे और टीवी पर न्यूज़ देखने लगे थे..

अगले तकरीबन 1 घंटे तक कुछ भी नहीं हुआ... 7:00 बजे के आसपास सोनिया बाहर से खेल कर आई थी... सोनिया को ठाकुर साहब ने अपने पास बुलाया और उसको अपने गोद में बिठा कर उससे बात करने लगे.

ठाकुर साहब: मेरी सोनिया बेटी किसके साथ खेल रही थी..

सोनिया: अंकल.. अंकल मैं वह दूसरे बच्चों के साथ खेल रही थी.. बहुत मजा आ रहा था खेलने में आज...

ठाकुर साहब सोनिया से कुछ देर तक बात करते रहे, उसने आज दिन भर क्या क्या किया इसके बारे में पूछते रहे... सोनिया भी उनको बड़े प्यार से जवाब दे रही थी... मेरी भांजी भी ठाकुर साहब को पसंद करने लगी थी... और उनके अंदर अपने पिता की छवि देख रही थी... थोड़ी देर में ही मेरी रूपाली दीदी किचन से निकलकर बाहर आई और सोनिया को को बोली...

मेरी रूपाली दीदी: अच्छा सोनिया... अब तुम अपने कमरे में जाओ और ठाकुर साहब को परेशान करना बंद कर दो... हाथ पैर धो कर पढ़ाई करना उसके बाद हम लोग डिनर करेंगे..

सोनिया: जी मम्मी... बोलकर ठाकुर साहब के बेडरूम में चली गई...

मेरे जीजू: ठाकुर साहब... आपने जो कुछ भी हमारे लिए और हमारे परिवार के लिए किया उसके लिए मैं किस तरह से आपका शुक्रिया अदा करूं मुझे समझ नहीं आ रहा है.... आपने जो कुछ भी किया है वह शायद ही कोई किसी के लिए करता है...

ठाकुर साहब: देखो विनोद... भले ही तुम लोग मुझे अपना नहीं समझते हो... पर मैं तो तुम लोगों को ही अपना परिवार समझता हूं... मैं सोनिया और नूपुर को अपनी बेटी की तरह ही समझता हूं... तुम्हारे, सैंडी और रूपाली की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है... मेरी रूपाली दीदी का नाम लेते हुए ठाकुर साहब मेरी दीदी की तरफ ही देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे... मेरी बहन भी मुस्कुरा कर उनकी तरफ देख रही थी..

अगले 1 घंटे में कुछ भी नहीं हुआ... मेरी रूपाली दीदी किचन में काम करती रही... किचन का काम खत्म करने के बाद मेरी रूपाली दीदी बाहर निकल कर आ गई और सोफे पर ठाकुर साहब के बगल में बैठ गई.. जब मैंने दीदी के ऊपर गौर किया तो मैंने पाया कि उन्होंने अपनी कमर के ऊपर लगा हुआ वह चिकना पदार्थ अभी तक साफ नहीं किया था.. साफ जाहिर है मेरी रूपाली दीदी के चरित्र में काफी परिवर्तन हो चुका था... मेरी बहन के मन में अब कुछ खास ज्यादा डर बचा नहीं था... जीजू ने भी गौर किया था मेरी बहन की कमर के ऊपर.. पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.. तो फिर भला मेरी हिम्मत कैसे हो सकती थी कुछ कहने की... हम सब लोग अपनी अपनी जगह पर बैठकर चुपचाप टीवी की तरफ देख रहे थे... रात के 9:00 बजे सोनिया बेडरूम से निकलकर बाहर आई... मम्मी मम्मी मुझे भूख लग गई है...

हम सब ने मिलकर एक साथ खाना खाया... खाना खाते वक्त हम लोगों के बीच में कुछ खास बातचीत नहीं हो रही थी... बस ठाकुर साहब ही मेरे जीजू से बात करते हुए मिल रुपाली दीदी की तरफ देख रहे थे... खाना खत्म होने के बाद सोनिया भागकर ठाकुर साहब के बेडरूम में चली गई और उनके बिस्तर पर सो गई.. नूपुर तो पहले से ही उसी कमरे में पालने में सो रही थी... बाकी हम चारों लोग हॉल में बैठे हुए बातचीत कर रहे थे..

मेरी रूपाली दीदी ठाकुर साहब के बगल में सोफे पर बैठी हुई थी और मेरे जीजू अपने व्हीलचेयर पर... मैं अपने बेड पर बैठा हुआ था... मुझ पर तो कोई ध्यान भी नहीं दे रहा था..

मेरी रूपाली दीदी: ठाकुर साहब... आपने ऐसी रिपेयर करने वाले मकैनिक को बोला था क्या.. वह तो आज भी नहीं आया ठीक करने के लिए...

ठाकुर साहब: वह माफ करो रूपाली... काम के चक्कर में मैं भूल गया.. कल पक्का ठीक करवा दूंगा..

मेरी रूपाली दीदी कुछ बोल पाती इसके पहले ही मेरे जीजू बीच में टपक पड़े...

मेरे जीजू: रूपाली तुम ठाकुर साहब को क्यों परेशान कर रही हो... मैं तो बिना एसी के ही सो जाऊंगा... मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है ठाकुर साहब...

मेरी रूपाली दीदी: नहीं विनोद आप कैसी बातें कर रहे हो... रात में आपको बहुत तकलीफ हो सकती है गर्मी के कारण... अगर हम लोगों को गर्मी लगेगी तो हम लोग तो उठकर हॉल में भी आ सकते हैं... आप तो नहीं आ सकते हो ना....

मेरी बहन की बातों की डबल मीनिंग को मैं अच्छी तरह समझ रहा था पर मेरा नासमझ जीजा, उसे तो कुछ समझ नहीं आ रहा था.

मेरी रूपाली दीदी: एक काम कीजिए आप आज की रात भी ठाकुर साहब के बेडरूम में ही सो जाइए...

मेरी रूपाली दीदी की बात सुनकर ठाकुर साहब को पहले मन में गुस्सा आया.. फिर वह समझ गय और मुस्कुराने लगे मेरी तरफ देख कर... अपने मन के किसी कोने में ठाकुर साहब मुझे जलील करना चाहते थे... मैंने अपना सर नीचे झुका दिया था...

मेरी रूपाली दीदी मेरे जीजू को उनके व्हीलचेयर पर घसीटते हुए ठाकुर साहब के बेडरूम में लेकर गई और किसी तरह से उनको उठा कर ठाकुर साहब के बिस्तर पर लिटा दी... उनके माथे को चूम कर मेरी बहन बोली..

मेरी रूपाली दीदी: देखिए जी मैं तो आपके साथ ही सोना चाहती हूं.. मगर ठाकुर साहब को बहुत बुरा लगेगा... हम दोनों उनके ही घर में एयर कंडीशन में सो रहे हैं और वह गर्मी में पंखे के नीचे... इसलिए मैं ठाकुर साहब के पास जा रही हूं... प्लीज आप बुरा मत मानिए...

मेरे जीजू: इसमें बुरा मानने की क्या बात है रुपाली... ठाकुर साहब वैसे भी हम लोगों को अपना समझते हैं.. तुम जाओ और उनके पास सो जाओ... तुम दिनभर थक गई होगी काम कर करके... मुझे तुम दोनों पर पूरा भरोसा है.. मेरी बहन ने मेरी जीजू के होठों पर एक चुम्मा देकर कमरे की लाइट बंद कर दी... और उस बेडरूम से बाहर निकल कर आ गई..

ठाकुर साहब के बेडरूम के अंदर जाने से पहले मेरी दीदी ने मुझे तेज निगाहों से देख अपना गुस्सा जताया... ना जाने क्यों मेरी बहन मुझसे बहुत नाराज थी... डर के मारे मैंने भी हॉल की लाइट बंद कर दी और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया... मेरी रुपाली दीदी अब ठाकुर साहब के बेडरूम के अंदर चली गई थी और उन्होंने दरवाजा भी बंद कर लिया था अंदर से... मैं अपनी सांसे रोककर बेडरूम के अंदर होने वाली हलचल को सुनने का प्रयास कर रहा था...

कमरे के अंदर ठाकुर साहब बिस्तर पर लेटे हुए थे...

मेरी रूपाली दीदी को अपने कमरे के अंदर आते हुए देखकर ठाकुर साहब अपनी शराब की बोतल को नीचे रख दिय... वह दारू पी रहे थे पहले से... लेकिन उनको आश्चर्य तब हुआ जब उन्होंने मेरी दीदी को अच्छी तरह देखा... आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक, चेहरे पर हल्का मगर प्यार मेकअप, मेरी रूपाली दीदी सजधज के तैयार थी...

ठाकुर साहब( अपना मुसल अपने हाथ में पकड़े हुए): इतनी देर क्यों लगा दी तुमने रूपाली?

मेरी रूपाली दीदी: वह ...वह.. मैं विनोद को सुलाने की कोशिश कर रही थी.. इसीलिए देर हो गई...

ठाकुर साहब: उसको सुलाने में तुमको इतना टाइम लग गया?

मेरी रूपाली दीदी अब ठाकुर साहब के बगल में जाकर लेट चुकी थी.

मेरी रूपाली दीदी: मैं उनकी बीवी हूं... बस उनको सुलाना ही मेरा काम नहीं है.. उनके साथ सोना भी मेरा धर्म है.. अगर उनको सुलाने में थोड़ा वक्त लगा दी तो आपको बुरा नहीं मानना चाहिए ठाकुर साहब...

ठाकुर साहब ने मेरी बहन की एक चूची पकड़कर कसके मसल दिया..

मेरी रुपाली दीदी: "हाईई... मर गई .... ऑईईई... उहह... उम्म्म्म..

ठाकुर साहब: ऐसे मत करो रूपाली... तुम्हारा भाई बाहर ही सो रहा है... तुम्हारा पति अभी भी जगा हुआ ही होगा...

मेरी रूपाली दीदी: उम्म्म्म... अपने आप को फ्रेश करने में और मेकअप करने में इतना टाइम लग गया... अपने पति को सुलाने में नहीं..

ठाकुर साहब: तुमको मेकअप करने की क्या जरूरत है... रूपाली.. तुम तो दुनिया की सबसे हसीन औरत हो...

मेरी रूपाली दीदी: आप मेरी झूठी तारीफ करते हैं...उहह... उम्म्म्म हाय मां... धीरे.....

कुछ ही देर में ठाकुर साहब मेरे रूपाली दीदी को नंगी कर चुके थे और खुद भी नंगे होकर मेरी बहन के ऊपर सवार हो गए थे..

बेदर्दी से सुपर स्पीड से चोद रहे ठाकुर साहब मेरी बहन के मुंह से कामुक सिसकियां निकलवा रहे थे... मैं दरवाजे के बाहर खड़ा होकर कान लगाकर सुन रहा था...

मेरी रूपाली दीदी की चूत तो आग की भट्ठी बन ... इतनी तेज ठुकाई से चूत की दीवारे जलने लगी थी...

बिना कुछ सोचे समझे मैं अपना छोटा चेतन पकड़ कर हिला रहा था...

अपनी सगी बहन की ठुकाई की आवाजें सुनकर मैं अपना हिला रहा था..

कमरे के अंदर मेरी रूपाली दीदी की साड़ी चोली उनका पेटीकोट नीचे जमीन पर पड़ा हुआ था... दीदी की ब्रा और पेंटी बिस्तर पर ही थी... ठाकुर साहब की लूंगी के ऊपर... और मेरी बहन ठाकुर साहब के नीचे पड़ी हुई सिसकारियां मार रही थी...

आज पहली बार मैं अपनी बहन के नाम की मुठ मार रहा था..

… आह्ह मर गई … ओह्ह, उफ्फ … उई माँ, .. थोड़ा धीरे, हाँ अब ठीक है.. थोड़ा जोर से …” रूपाली दीदी बोल रही थी.

अंदर से मेरी रूपाली दीदी के कराहने की आवाज के साथ फच-फच जैसी आवाज भी आ रही थी जो मैं अच्छी तरह समझ रहा था..

मैं भी जोर जोर से अपना छोटा चेतन हिलाने लगा था..

बाहर खड़े हुए मैं अपने आप को कंट्रोल नहीं कर सका और मेरा लंड वहीं पर खड़े हुए ही झड़ गया. पता नहीं क्या हो गया था कि इतनी उत्तेजना हो गई थी कि मेरा पानी वहीं पर निकल गया. मैं जल्दी से बिस्तर पर आकर लेट गया.

रात भर मेरी बहन ठाकुर साहब के नीचे पड़ी हुई चुदती रही ..

सुबह जब मेरी दीदी की नींद खुली.. तो उन्हें खुद पर ही शर्म आने लगी थी.... मेरी रूपाली दीदी नंगी ठाकुर साहब के सीने पर लेटी हुई थी.... ठाकुर साहब का खड़ा मुसल देखकर मेरी बहन के मुंह में पानी आ रहा था.. मेरी बहन उनका पकड़ कर हिलाने लगी थी... ठाकुर साहब की आंख खुल गई थी... मेरी रूपाली दीदी शर्म से पानी पानी हो गई..

मेरी रूपाली दीदी: आज तो संडे है ना ठाकुर साहब... आप तो घर पर ही रहोगे.... क्या आप सोनिया को बाल कटवाने के लिए हजाम के पास ले जा सकते हो प्लीज...

ठाकुर साहब: नहीं रुपाली मैं नहीं जा सकता हूं आज.. बहुत काम है मुझे आज के दिन.. तुम चली जाओ ना..

मेरी दीदी: मैं कैसे जाऊंगी.. इतना सारा काम होता है घर में..

मेरी रूपाली दीदी ठाकुर साहब के लंड को ऊपर नीचे करते हुए बोल रही थी.. उनका मुट्ठ मार रही थी...

ठाकुर साहब: एक काम करो रूपाली.. तुम भीमा के पास चली जाओ... वह सोनिया के बाल अच्छी तरह काट देगा...

मेरी रूपाली दीदी: यह भीमा कौन है ठाकुर साहब..

ठाकुर साहब: भीमा मेरा खास आदमी है.. नाई की दुकान चलाता है यहीं पर बगल में.. तुम सोनिया को लेकर उसके पास चले जाना दिन में.. आज मुझे बहुत काम है ...मैं उसको बोल दूंगा...

"इस्स्स... आहह... ... आहह.." मेरी रूपाली दीदी ने अपने हाथों से ही ठाकुर साहब के मुसल से उनका मक्खन निकाल लिया था..

तुम बड़ी मस्त माल रुपाली.. ठाकुर साहब चीखने लगे थे...

मेरी रूपाली दीदी उठकर बाथरूम में चली गई थी नंगी अपने बदन को साफ करने के लिए...

आज सुबह-सुबह ही मेरी रूपाली दीदी नहा धोकर तैयार हो चुकी थी और बिल्कुल फ्रेश महसूस कर रही थी... ठाकुर साहब तो अपने काम से जल्द ही घर से निकल गए थे... आज मेरी बहन को भीमा नाई की दुकान पर जाना था सोनिया के बाल कटवाने के लिए... घर के सारे काम निपटाने के बाद मेरी दीदी अपने बेडरूम में गई और तैयार होने लगी.. 10:00 बज चुके थे... मेरी रूपाली दीदी अपने बेडरूम में खड़ी अपने आदमकद आईने के सामने में खुद को निहार रही थी.. मेरी बहन आज बदली बदली सी लग रही थी.. कुछ दिनों पहले की एक पतिव्रता सीधी साधी औरत क्या से क्या बन चुकी थी... दीदी अपने आपको आईने में देख कर हैरान थी...

मेरी बहना आज बेहद खूबसूरत लग रही थी, जैसे स्वर्ग से उतर के कोई अप्सरा धरती पर आ गई हो.... मेरी रूपाली दीदी, छोटे कद की मगर फिर भी बेहद उत्तेजक और आकर्षक लग रही थी आज....

मेरी रूपाली दीदी के मादक शरीर से निकल रही खुशबू पूरे घर के वातावरण को कामुक बना रही थी... मेरी बहन आदम कद आईने के सामने एक स्टूल पर बैठ कर अपने एक-एक अंग को निहार रही थी..

कल रात को जिस तरह से ठाकुर साहब ने मेरी बहन को रगड़ा था..पेला था.. उसकी मस्ती अभी भी मेरी बहन के चेहरे पर साफ साफ दिखाई दे रही थी ... मेरी रूपाली दीदी के गुलाबी चिकने छेद में अभी भी मीठा मीठा दर्द हो रहा था.. ठाकुर साहब के मुसल ने रात भर मेरी बहन को बहुत तकलीफ दी थी... मेरी बहन का छेद रात भर की कुटाई से अभी भी जलन का अनुभव कर रहा था..

मेरी दीदी लाल रंग की साड़ी में और स्लीवलेस चोली में खुद को देखकर ही शर्म आ रही थी... मेरे जीजू के एक्सीडेंट होने के बाद आज मेरी बहन पहली बार इतनी सज धज के तैयार हुई थी... वह भीमा के बारे में सोच रही थी ..जिस इंसान से आज तक वह कभी नहीं मिली थी...

मेरी बहन एक पतिव्रता नारी की तरह नहीं बल्कि एक कामुक वेश्या की तरह सोच रही थी... मेरी दीदी उठ कर खड़ी हो गई..

मेरी रूपाली दीदी अपने हाथों से अपनी चूचियों को पकड़ कर दबाने लगी थी और मन ही मन: कितने बड़े बड़े हैं मेरे.... हाय मां... 36 के हो चुके होंगे..... अब इसमें मेरा क्या कसूर है... इतने बड़े बड़े हो गए हैं तो मैं क्या करूं... पिछले 1 महीने से ठाकुर साहब भी तो इतनी मेहनत कर रहे हैं इनके ऊपर... जब से 18 साल की हुई थी... तभी से मर्दों की गंदी नजर से बचाती आ रही हूं... बस अपने पति के लिए... जो अपाहिज हो चुका है..

मेरे रुपाली दीदी: ठाकुर साहब... हा हा... आप नहीं होते तो क्या होता मेरे इन गुब्बारों का... कौन चूसता इनको.. कौन दबाता इनको... कौन इनको अपने मुंह में लेकर प्यार करता..... मेरा नाकारा पति तो अपने व्हील चेयर पर बैठा हुआ है.. मेरे पति का खड़ा भी नहीं होता..

- "हाय री... मेरी किस्मत... सुहागरात में ही सारी कसर निकलने के बाद पति तो अपाहिज होकर व्हीलचेयर के ऊपर बैठ गया... दो बेटियां ... कैसे संभालू मैं इन दोनों को... मेरा भाई भी तो नाकारा है.. किसी काम का नहीं है..... मेरी रुपाली दीदी अपनी चुचियों को अपने कोमल हाथों से मसल रही थी.. रुपाली दीदी सिसक रही थी..

मेरी बहन ठाकुर साहब के मर्दाना हाथों की कमी को महसूस कर रही थी..

अब कम से कम दूसरे मर्द को दिखा दिखा कर मेरी यह दोनों बड़ी बड़ी ... कम से कम लोगों का खड़ा तो कर देती होगी.. तो इसमें बुरा क्या है... किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए.....

आईईई उईईई... मेरी रूपाली दीदी अपनी साड़ी उठाकर अपने छेद में अपनी बीच वाली उंगली से अंदर बाहर कर रही थी...नाजुक गुलाबी चूत से रस का फव्वारा निकलने लगा था जो शीशे के ऊपर जाकर टकरा रहा था..​
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