Update 01
(इस कहानी के सभी पात्र और घटनाए काल्पनिक है जिसका किसी भी जीवित अथवा म्रत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है यदि किसी व्यक्ति ,वस्तु या स्थान के साथ इसका कोई संबंध मिलता है तो यह एक संयोग मात्र होगा )
जनवरी के महीने का अंत चल रहा था । पर ठंड अब भी जिस्म को कपड़ों से आजाद कराने के लिए तैयार नहीं थी । इसी ठंड को काम करने के लिए मे रोज की तरह अपनी छत पर धूप सेकने बेठी थी । ये मेरा रोज का routine बन गया था । अशोक के घर से ऑफिस जाने के बाद मे घर के सभी काम निपटा कर दोपहर मे छत पर जाकर धूप मे सर्दी को कम करने की कोशिश करती थी । उस दिन भी मे दोपहर मे छत पर घूम रही थी । मेरे घर के सामने एक प्लेग्राउन्ड है जहाँ कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे । उनमे से मे केवल एक को मैं पर्सनली जानती थी वो था ' वरुण ' वो भी इसलिए क्योंकि उसकी मम्मी के साथ मेरे अच्छे संबंध थे । वो हमारे ही मोहल्ले मे , मेरे घर से 3 घर छोड़कर रहती थी ।
हैलो , मेरा नाम है " पदमा " और ये मेरी कहानी है ।
यूं तो मे रोज ही दोपहर को अपनी छत पर धूप लेने के लिए जाती थी पर उस दिन मन कुछ अजीब सा महसूस कर रहा था कुछ घबराहट । जेसे तूफान के आने से पहले एक शान्ति सी छा जाती है बिल्कुल एसा ही लग रहा था । मैं अपनी छत की रैलिंग पकड़कर गली मे देख रही थी के तभी गली मे एक बाइक पर एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया मेने उसे ज्यादा गोर से तो नहीं देखा पर वो एक ब्लैक शर्ट उसके ऊपर एक जैकिट और ब्लू पेंट पहने हुआ था आँखों पर ब्लैक चश्मा था । उत्सुकता मुझे तब हुई जब गली के सभी घरों को पार कर वो अंत मे मेरे घर की तरफ मुड़ा और मेरे घर के सामने अपनी बाइक रोक दी । मैं उस वक्त भी छत पर ही थी और उसे ध्यान से देखने की कोशिश कर रही थी पर उसे पहचानने मे नाकामयाब रही । वह अपनी बाइक से नीचे उतरा और डोर बेल बजाई । चाहती तो मे छत से ही पूछ सकती थी की वह कोन है और क्या काम है ? पर ना जाने क्यूं मैं उसके लिए दरवाजा खोलने नीचे चली गई । ये शायद मेरा उसके लिए पहला आकर्षण था । मैं जल्दी जल्दी सीढ़ियों से नीचे उतरी और दरवाजा खोला । दरवाजा खोलने के बाद मेने पहली बार सपष्ट रूप से देखा वह एक हैन्ड़सम लगभग 5.8 का आदमी था जिसकी उम्र शायद 29 वर्ष होगी । वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था मेने उसके चेहरे से अपना ध्यान हटाया और उससे पुछा
मैं - जी , आप कोन ?
वह - पदमा , मेरा नाम नितिन है मैं अशोक का दोस्त हूँ उसी के ऑफिस मे काम करता हूँ । उसकी एक फाइल घर पर रह गई है और वो मीटिंग मे बिजी है इसलिए उसने मुझे भेजा है , फ़ाइल लाने के लिए ।
ये मेरे लिए काफी शॉकइंग था एक तो मैंने कभी इस आदमी को अशोक के साथ नहीं देखा था । ऊपर से ये मेरा नाम भी जानता था । मैंने फिर उससे पूछा -
मैं - पर अशोक ने तो मुझे किसी फ़ाइल के बारे मे कुछ नहीं बताया ।
नितिन - बताता केसे तुम्हारा मोबाईल भी तो स्विच ऑफ है ।
उसकी बात सुन मेने अंदर आकर अपना मोबाईल चेक किया वो सच मे स्विच ऑफ था । मैं अपने मोबाईल मे ही उलझी थी के नितिन बाहर से ही बोल पड़ा -
नितिन - अरे , अब अगर इजाजत हो तो क्या मैं अंदर आजाऊ ?
मैं ( पलटकर )- ओह , प्लीज आइ यम सॉरी । प्लीज कम इन ।
वह अंदर आया मैंने उसे बेठने को कहा ," प्लीज सीट " और उसके लिए पानी लेने कीचेन मे चली गई । पानी का ग्लास लेकर जैसे ही मैं नितिन को देने के लिए झुकी मेरी साड़ी का पल्लू जरा सा नीचे ढलक गया और नितिन के सामने मेने उन्नत उरोज आ गए । जैसे ही नितिन की नजर मेरे कसे हुए स्तनों पर पड़ी उसकी निगाहें वही थम गई वह घूर -घूर कर उन्हे देखने लगा जैसे आँखों से ही उनका रसपान कर रहा हो । फिर जल्दी से मैंने ग्लास नीचे टेबल पर रखा और बोली -
मैं - आप जब तक पानी पीजिए मैं फाईल देखती हूँ ।
मैं जल्दी से फाईल लेने अपने बेडरूम की तरफ भागी पर एसा लग रहा था जैसे मुझे पीछे से कोई घूर रहा है बेडरूम के दरवाजे पर जाकर मैंने पलट कर देखा तो मेरा अंदाजा बिल्कुल ठीक था नितिन मुझे पीछे से घूर रहा था । अपने आप को किसी अनजान आदमी से अपने ही घर मे एसे घूरे जाने से मेरी दिल की धड़कन बढ़ गई । मैं जल्दी से अंदर गई और अपनी साँसों को नॉर्मल करने के लिए बेड पर बेठ गई थोड़ी देर बाद साँसे नॉर्मल होने पर मैं उठी और फाइल ढूंढने लगी । मैंने अलमारी खोली पर वहाँ पर कोई एसी फाइल नजर नहीं आई जो इम्पॉर्टन्ट हो मैं फाइल ढूंढने मे लगी थी और मुझे पता भी नहीं चला कब नितिन कमरे मे आ गए और मेरे पीछे खड़े होकर बिल्कुल मेरे करीब जाकर मेरे कान के पास धीरे से बोले" मिली नहीं क्या ?"
नितिन ने मेरे कान के इतने करीब से बोल था की उनकी गरम साँसे मुझे मेरी पीठ और कान पर महसूस हुई मैं घबराकर पीछे मुड़ी तो मेरे स्तन नितिन के सीने से टकरा गए । घबराहट मे फिर मेरी धड़कने और साँसे तेज हो गई , मैंने कहा - न न .. नहीं वो अलमारी मे तो नहीं है ।
नितिन अब भी मुझसे सट कर खड़े थे और हमारे बीच गेप ना के बराबर था । फिर नितिन ने कहा " शायद अलमारी के ऊपर रखी होगी "
मैंने दोबारा पलटकर अलमारी की और देखा तो कुछ फाइले अलमारी के ऊपर राखी थी पर अलमारी काफी ऊँची होने की वजह से वहाँ तक नितिन का ही हाथ नहीं पहुँच सकता था तो मेरा तो क्या ही जाता ?
मैं - पर वह तो बहुत ऊँची है मैं कोई स्टूल लेकर आती हूँ ।
मैं स्टूल लेने जाने लगी पर अचानक नितिन ने मेरी बाँह पकड़ ली और कहा -
नितिन - रहने दो मैं लेट हो रहा हूँ ।
इतना कहकर नितिन ने बिना मुझसे पूछे मेरी कमर के उस भाग को जहां साड़ी नहीं थी को मजबूती से पकडा उसे मुझे ऊपर उठा दिया । ये सब इतनी जल्दी मे हुआ की मैं कुछ कह न सकी बस एक "आह" निकाल गई जिसे नितिन ने भी बखूबी सुना । नितिन ने मेरी कमर के दोनों नंगे भागों को मजबूती दे पकडा हुआ था और एक बार फिर उसकी गरम साँसे मुझे मेरी कमर पर महसूस हो रही थी । मेरी धड़कनों की रफ्तार बढ़ती जा रही थी । मैं ज्यादा देर एसे नहीं रह सकती थी इसलिए मेने जल्दी से फाइल ढूंढना शुरू कर दिया पर इधर नितिन ने मेरी मुशकील ओर बढा दी थी उसने अपनी नाक पूरी मेरी नंगी कमर पर लगा दी ओर अब उसके होंठों का स्पर्श मेरी कमर पर होने लगा पर इससे पहले की स्थिति मेरे काबू से बाहर हो मुझे वो फाइल मिल गई । मैंने कहा - मिल गई फाइल
पर नितिन ने तो जैसे सुना ही ना हो वो तो मेरे जिस्म से आने वाली मादक खुशबू मे व्यस्त था । मैंने एक बार फिर थोड़ा तेज आवाज मे कहा - नितिन फाइल मिल गई ।
इतना सुन नितिन जैसे नींद से बाहर आया और कहा - ओह अच्छा ।
इतना कह उसने मुझे नीचे उतारा और नीचे उतरते हुए एक बार फिर मेरी पीछे से नंगी पीठ उसके कठोर सीने से रगड़ कहा गई पर इस बार मुझे अपने नितम्बों (गांड) पर एक चीज और चुभती महसूस हुई मुझे समझते देर ना लगी की ये क्या है वो नितिन का लिंग था पर मेरे लिए चोकाने वाली बात ये थी की उसके लिंग की लंबाई मुझे कुछ ज्यादा ही महसूस हुई मेने उत्सुकतावश नीचे उतारकर उसे फाइल दी और अपनी आँखों से उसकी पेंट पर बने ऊभार की लंबाई को मापने की कोशिश करने लगी ये सिर्फ मेरा भ्रम नहीं था वाकई मे उसका लिंग पेंट मे भी बोहोत लंबा और मोटा महसूस हो रहा था मैं तो जैसे अपने होश ही खोने लगी थी कुछ तो नितिन की वो कामुक हरकते और कुछ उसके उस लिंग का आकार मुझे और उत्तेजित कीये जा रहा था
नितिन फाइल चेक कर रहा था उनसे फाइल चेक की , कि सही है या नहीं फिर कुछ देखकर मेरी ओर देखकर बोला "सब ठीक है यही है वो फाइल " इतना कह वो मुझे थैंक्स कह कर जाने लगा मैं उसे छोड़ने गेट तक गई । गेट पर जाकर अचानक नितिन पीछे मुड़ा और बोला - सॉरी पदमा ।
मैं - वो किस लिए ?
नितिन - वो .. मेने तुमसे बिना पूछे तुम्हें पीछे से उठा लिया था ना । वो मैं लेट हो रहा था इसलिए जल्दी मे कुछ सुझा ही नहीं।
मैं - कोई बात नहीं नितिन , इट्स ओके । पर मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ ?
नितिन - हाँ बोलो . ..
मैं - अशोक के सभी दोस्तों को तो मैं जानती हूँ , पर तुम्हें कभी नहीं देखा । ना ही काभी आज से पहले तुम्हारा नाम ही सुना था । एसा क्यूं ?
नितिन - इसका जवाब तो तुम्हें अशोक ही देगा पर मैं इतना तो समझ गया हूँ की अशोक ने मुझे तुमसे क्यूं नहीं मिलवाया ?
मैं - अच्छा , तो बताओ क्यूं नहीं मिलवाया ?
नितिन- जिसकी इतनी सुंदर पत्नी होगी उसे डर तो रहेगा ही कही मैं ना चुरा लूँ उसकी बीवी ।
इतना कहकर वो जोर से हंसने लगा । मैं उसके इस जवाब पर बस शर्माकर रह गई और कुछ ना बोल सकी । फिर वो बोला - अच्छा , चलो बाय मैं चलता हूँ फिर मिलेंगे । अब तो मेने अशोक के चाँद को देख लिया है अब इसे देखने तो मैं आता रहूँगा ।
उसकी ये बाते फिर से मेरे दिल की धड़कनों को बढ़ा रही थी । मैंने उसके कमेन्ट का जवाब दिए बिना उसे बाय बोला और दरवाजा बंद करके अंदर आ गई ।
अंदर आकर सबसे पहले मैं कीचेन मे गई ओर 2 ग्लास पानी पिया फिर सोफ़े पर बेठकर थोड़ी नॉर्मल होने की कोशिश करने लगी । बाहर काफी सर्दी थी पर मेरे माथे पर पसीना आया हुआ था वजह आप सब जानते है। मैं सोचने लगी की ये अशोक का एसा कोन सा दोस्त है जिसका अशोक ने कभी नाम भी नहीं लिया । मेरी और अशोक की शादी को 4 साल हो चुके थे पर कभी उसके एसे किसी दोस्त से नहीं मिली जो मुझे भाभी ना कहकर नाम से बुलाता हो । इन सब सवालों के जवाब तो अशोक के ऑफिस से आने के बाद ही मिलेंगे
नितिन चला तो गया पर उसके आने से जो मेरे मन जो हलचल मच गई थी वह नही गई । पता नहीं कब 4 बज गए जब मैंने घड़ी देखी तो याद आया की मुझे तो गुप्ता जी के पास साड़ी के ब्लाउस और पेटीकोट को सिलवाने के लिए भी जाना है । रमेश गुप्ता जी एक 50 साल के आदमी हमारे मोहल्ले के दर्जी थे , मोहल्ले की ज्यादातर औरते उन्ही से कपड़े सिलवाया करती थी । सभी उन्हे गुप्ता जी कहकर बुलाते थे मैं भी उन्ही मे से एक थी गुप्ता जी एक किराये के कमरे मे अकेले रहते थे उनका परिवार गाँव मे था । मैंने जल्दी से अपना फोन जो चार्जिंग पर लगा हुआ था को हटाया ओर उसे ऑन करके देखा तो पाया की उसमे अशोक की 3 मिस्सड कॉल थी मैं समझ गई की ये उसने फाइल के लिए ही की होंगी मैंने उसे कॉल बैक किया तो वो बिजी बता रहा था मैंने सोचा की वो मीटिंग मे होंगे फिर मैं उठकर अपना समान समेटने लगी और सिलाई का कपड़ा लेकर घर से बाहर निकली ।
बाहर आकर घर का दरवाजा लॉक किया और गली मे चल पड़ी । घर के बाहर ज्यादा ठंड थी कुछ लोग आग तापने के लिए एक जगह इकट्ठे खड़े थे पर मुझे आता देख वो सब आग को छोड़कर मुझपर आंखे सेकने लगे । मेरे लिए ये कोई नई बात नहीं थी मैं जब भी किसी काम से घर से निकलती थी तो मोहल्ले के कई मर्द अपने होश खो बेठते थे । मैं थोड़ा आगे चली तो वो सब मेरी बलखती कमर और मेरे बड़े नितम्बों को देखने लगे जैसे खा ही जाएगे
फिर मैं थोड़ा ओर आगे चली तो उनमे से बोल पड़ा - "हाए क्या गदराई जवानी है एक बार मिल जाए तो इसका सारा रस पी लूँ । "
ये सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा भी आया मैंने पलटकर पीछे देखा तो वो सब बड़ी बेशर्मी के साथ हँस रहे थे मैंने उन्हे जवाब देने की सोची भी पर वो 6-7 थे और मैं कोई बखेड़ा खडा नहीं करना चाहती थी इसलिए मुड़कर फिर आ से आगे की ओर बढ़ी इस बार उनमे से किसी ने कुछ कहा तो नहीं पर उनके हँसने की आवाज मेरे कानों तक पहुँच रही थी मैंने जल्दी जल्दी से कदम बढ़ाए और गुप्ता जी के फ्लैट के नीचे तक पहुँच गई गुप्ता जी का फ्लैट एक मंजिल ऊपर था नीचे किराने की 1 पुरानी दुकान थी और एक सिलाई के समान जैसे सुई ,रील या सिलाई मशीन वगैरह की दुकान थी गुप्ता जी यहाँ से ही अपनी सिलाई का सारा सामान लेते थे और गली के बाकी लोग भी । ऊपर की मनजिल पर जाने के लिए लोहे की सीढ़िया बाहर से ही जाती थी मैंने जल्दी से सीढ़ियाँ चढ़ी और जल्द ही गुप्ता जी की दुकान मे परवेश किया
गुप्ता जी की दुकान एक छोटा पर सिलाई के लिए पर्याप्त कमरा था जिसके फर्श पर काफी कटे हुए कपड़े पड़े थे एक ओर रस्सी पर एक पर्दा लगा था जिसके पीछे जाकर सभी औरते चेंज करती थी । कमरे मे हीटर चल रहा था जिससे उसमे काफी गरमाई थी। गुप्ता जी उस समय किसी का घागरा सि रहे थे मुझे देखते ही बोले -
गुप्ता जी - आओ , आओ पदमा बेठो । कहो केसे आना हुआ ?
मैं - नमस्ते गुप्ता जी । वो दरसल एक साड़ी का ब्लाउस और पेटीकोट सिना है ।
इतना कह मैं पास मे रखे स्टूल पर बैठ गई ।
गुप्ता जी ( आँखों से चश्मा हटाते हुए ) - हाँ बिल्कुल हो जाएगा । और सुनाओ सब ठीक है घर ?
मैं - जी हाँ सब ठीक है । और आप केसे है ?
गुप्ता जी - बस सब सही है । समय निकल रहा है । अच्छा तुम तैयार जो जाओ मैं फीता लेकर आता हूँ ।
गुप्ता जी को मैं अच्छी तरह से जानती थी तैयार होने से उनका मतलब था की मैं अपनी साड़ी उतार दूँ और ब्लाउस और पेटीकोट मे आ जाऊ । एसा वो हर बार करते थे मैं अपनी जगह से उठी औरं एक छोटे से परदे के पीछे जाकर साड़ी को निकालने लगी पर्दा काफी हल्का था और उसके आर पार देखा जा सकता था मतलब परदे के दूसरी ओर से कोई भी आदमी ये देख सकता था की मैंने कितने कपड़े उतार दिए है और कितने पहने है ।
मैंने अपना पर्स वही परदे के पीछे साइड मे रखा और पर्दा लगा कर साड़ी उतारने लगी के तभी गुप्ता जी ने कमरे मे परवेश किया और जैसे ही उनकी नजर परदे के पीछे मुझ पर पड़ी उनकी नजरे वही टिक गई परदे का होना , ना होना बराबर था और वो परदे के पीछे भी मुझे स्पष्ट रूप से देख सकते थे ।
जैसे ही मेरी नजर गुप्ता जी पर गई मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया और दिल धड़कने लगा । शर्म के मारे मेने अपना चेहरा दूसरी ओर घूमा लिया पर गुप्ता जी कहाँ मानने वाले थे वो पीछे से मेरी पतली कमर और नितम्बों वो निहारने लगे । मैंने अपनी साड़ी तो उतार दी पर ये समझ नहीं आ रहा था की एसी हालत मे गुप्ता जी के सामने जाऊ केसे ? आज मुझे उत्तेजना हो भी कुछ ज्यादा रही थी उसका कारण था नितिन ने जो मेरे साथ दोपहर मे हरकते की थी ।
गुप्ता जी जानते थे की मैंने साड़ी उतार दी थी और उसे नीचे पड़े कपड़ों के ढेर पर रख दिया ।
पर उनके सामने जाने मे हिचकिचा रही थी । मेरी मनोदशा समझ कर गुप्ता जी परदे के बिल्कुल पीछे आकर खड़े हो गए और बोले -
गुप्ता जी - पदमा , क्या तुमने साड़ी उतार दी ?
मैं - जी जी .. गुप्ता जी ।
गुप्ता जी - ठीक है ।
इतना कहकर गुप्ता जी ने बिना मुझसे कुछ पूछे और बिना देरी कीये परदे को एक ओर को खेन्च दिया । अब मेरी बैक उनके सामने सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज मे थी
पहले कुछ देर गुप्ता जी ने पीछे से ही मेरी जवानी के रस को आँखों से पिया फिर अचानक उन्होंने मेरे कंधे पर अपना हाथ रक दिया । मैं एक दम से सिहर उठी ।
गुप्ता जी बोले- "मेंरी ओर घूमो पदमा मुझे नाप लेना है। "
मैं बिना कुछ बोले गुप्ता जी की ओर घूम गई । गुप्ता जी ने एक बार फिर मुझे ऊपर से नीचे तक फिर नीचे से ऊपर तक निहारा और अपना फीता उठाया । शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल और साँसे तेज हो रही थी यूं तो गुप्ता जी ने पहले भी मेरा 2 बार नाप लिया था पर कभी मुझे इतनी एक्साइटमेंट महसूस नहीं हुई थी पर आज मुझे कुछ अलग ही नशा छा रहा था । शायद ये सब दोपहर मे हुई गतिविधियों का नतीजा था ।
फिर गुप्ता जी ने फीते को मेरे एक कंधे से दूसरे कंधे पर लगाया और नाप नोट किया इस दोरान उनकी उंगलियाँ मेरी गर्दन और पीछे पीठ को छूती रही । फिर उन्होंने कमर से अपना फीता हटाया और उसे मेरे बाजू पर लपेट कर बाजू का नाप लेने लगे एसा करने मे उनके हाथ मेरे बूब्स से साइड से टकरा गए और मेरे पहले से टाइट बूब्स और तन गए अब साँसों की रफ्तार भी बढ़ गई थी फिर उन्होंने दाएं बाजू का नाप नोट किया और बाएं बाजू की ओर बढ़े और एक बार फिर गुप्ता जी के हाथ मेरे बाएं बूब्स पर टच हो गए साँसे अब काबू से बाहर हो रही थी और बूब्स साँसे लेने के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे ।
बाएं बाजू का नाप लेने के बाद गुप्ता जी अब आगे बढ़ना चाहते थे और वो मेरे पीछे जा खड़े हुए और मुझ से लगभग बिल्कुल सट गए फिर गुप्ता जी ने पीछे से मेरे कान मे कहा -"अपने हाथ ऊपर उठाओ, पदमा । "
गुप्ता जी ने मेरे कान के इतने नजदीक से कहा की उनकी गरम साँसे मुझे अपने कान और गर्दन पर महसूस हुई ।
मैं जानती थी के गुप्ता जी अब क्या करना चाहते है वो मेरे सीने का नाप लेना चाहते थे और फिर मैंने गुप्ता जी के लिए अपने हाथ ऊपर उठा दिए । गुप्ता जी ने बिना देरी कीये अपना फीता मेरी बाहों के नीचे से मेरे सीने के आगे किया और उसे मेरे सीने से लगाकर एक दम से अपनी ओर खींचा ,खिंचाव इतना तेज था के मुझे संभालने का मौका नहीं मिला और मैं गुप्ता जी के जिस्म से जा टकराई और मैंने पहली बार अपने नितम्बों पर गुप्ता जी का गरम कड़ा लिंग महसूस किया एक बार को तो मेरे होश ही उड़ गए ये क्या गुप्ता जी का लिंग इतना कठोर इसका मतलब गुप्ता जी भी उत्तेजित हो चुके है ।
है भगवान गुप्ता जी मुझसे कितने बड़े है और इस तरह मेरे पीछे अपना लिंग अड़ाए खड़े है यही सोचकर मेरे होंठों से अचानक एक कामुक आह निकाल पड़ी । गुप्ता जी का लिंग मुझे अपने नितम्बों पर चुभता हुआ महसूस हो रहा था और मुझे अपने नीचे योनि पर एक अजीब हलचल का भाव लग रहा था मेरी योनि गीली होने लगी थी । मेरे हाथ अभी भी ऊपर ही थे जिसकी वजह से मेरे तने हुए बूब्स के बीच की घाटी को गुप्ता जी पीछे से घूर रहे थे गुप्ता जी कभी फ़ीते को थोड़ा ऊपर कभी थोड़ा नीचे करके मेरे बूब्स का पूरा माप ले रहे थे । कुछ तो कमरे मे हीटर की गर्मी कुछ कामाग्नि मे जलता मेरा बदन । मेरी हालत खराब होने लगी । मेरे निप्पल तानकर बिल्कुल कड़े हो चुके थे । जिस्म मे उत्तेजना , रोमांच और डर तीनों के भाव एक साथ दोड़ रहे थे । गुप्ता जी भी अब आगे बढ़ना चाहते थे अब वो फ़ीते के साथ साथ अपने हाथ भी मेरे बूब्स पर फिराने लगे और अपने होंठ बिल्कुल मेरे कान से लगा दिए मानो किसी भी वक्त उसे अपने होंठों मे भरकर चूस लेंगे । उनका लिंग अब मुझे और भी सख्त लगने लगा था और वो जैसे धीरे से उसे मेरे पीछे रगड़ने लगे ।
हालत मेरे काबू से बाहर हो रहे थे इसलिए मेने गुप्ता जी से उत्तेजना मे कापंती आवाज से बोला -
मैं - गुप्ताआआआ.. .. जीईईई.. .. नाप पूरा हो गया क्या ? मेरे हाथ दुखने लगे है ।
गुप्ता जी मेरी स्थिति को जानते थे वो बोले-
गुप्ता जी - बस थोड़ी देर और ..
और फिर उन्होंने अचानक से अपने हाथ मेरे दोनों निप्पलो पर रख दिए और उन्हे सहलाने लगे ।
मैं- आहहह.. ... . गुप्ता जी ये आप क्या कर रहे है ?
गुप्ता जी- पदमा मैं तुम्हारे निप्पलो के कप का साइज़ ले रहा हूँ इसे हाथों से ही लेना पड़ता है ।
अपने लिए निप्पल जैसे शब्द सुनकर मेरी आग और भड़क उठी ।
मैं - परर र .... गुप्ता जी .... आपने पहले तो कभी एसा नहीं किया । फिर आज क्यूं ?
गुप्ता जी - ये मेरी एक नई तकनीक है ।
गुप्ता जी के लिंग का दबाव अब मेरे नितम्बों पर और भी सख्त हो गया था उनका लिंग उनकी पेंट को फाड़कर बाहर आने को आतुर था । मेरी योनि अब चुत रस से भीग चुकी थी और पेन्टी पूरी गीली थी । मैं अपने जिस्म की आग मे सब भूल चुकी थी की मैं एक शादीशुदा औरत हूँ जिसकी कुछ मर्यादाएं भी है ।
मैं - अच्छाआआआ.. .. तो आपने कितनी औरतो पर ये नई तकनीक इस्तेमाल की है ।
गुप्ता जी - तुम पहली हो पदमा ।
मैं - आह.... .. गुप्ता जी...... प्लीज नहीं ......
मैं इतना ही कह पाई क्योंकि गुप्ता जी ने मेरे कान को पूरी तरह अपने होंठों मे भर लिया और उसकी चुसाई शुरू करदी । उनकी पकड़ मेरे बूब्स पर भी सख्त हो गई और वो मेरे बूब्स को मसलने लगे । मेरा जिस्म अंगारे बरसाने लगा हाथ नीचे आकर गुप्ता जी के हाथों को रोकने की नाकाम कोशिश करने लगे ।
तभी अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी जिसकी आवाज से हम दोनों घबराकर अलग हो गए । मैंने दोड़कर पर्स से फोन निकाला तो देखा यह अशोक का फोन था मेरी घबराहट और भी बढ़ गई। मैं अशोक का फोन उठाना चाहती थी पर मेरी धड़कन और साँसे इतनी तेज चल रही थी के मैं चाहकर भी उसका फोन ना उठा सकी । फिर मैंने गुप्ता जी की ओर देखा उनकी हालत तो और भी खराब थी वो कुछ नहीं बोल रहे थे पर उनके नीचे पेंट मे तना हुआ लिंग सब कुछ बयान कर रहा था ।
मैंने गुप्ता जी से कहा मुझे जाना होगा और परदे के पीछे जाकर अपनी साड़ी पहनने लगी । गुप्ता जी कुछ नहीं बोले । तब तक फोन भी कट चुका था । मैंने झटपट अपनी साड़ी पाहनी और जाने लगी , की तभी गुप्ता जी बोले
गुप्ता जी - पदमा !
मैं ( पलटकर) - जी ?
गुप्ता जी - पेटीकोट का नाप अभी बाकी है ।
मैं - मैं फिर कभी दे जाऊँगी गुप्ता जी , पर अभी मुझे जाना होगा ।
गुप्ता जी - आज के लिए मुझे माफ कर देना पदमा प्लीज आइ यम सॉरी । दरसल हालत ही कुछ एसे बने की मैं अपने पर काबू नहीं रख पाया । तुम तो जानती हो मेरी बीवी तो यहाँ है नहीं वो तो मुझसे कितनी दूर है । मैं प्यार के लिए तरस जाता हूँ इसलिए बस तुम्हारा हुस्न देखकर मैं अपने पर काबू नहीं रख पाया ।
गुप्ता जी ने कितनी ही बात एक साथ कह डाली पर मैं क्या कहती , मैं तो खुद अपनी हवस पर काबू नहीं रख सकी थी । और ऊपर से गुप्ता जी मेरी तारीफ भी कर रहे थे । मैंने सोचा कह तो बेचारे ठीक ही रहे है अब आदमी इतने दिन तक घर से बाहर अकेला रहेगा तो तन्हा तो हो ही जाएगा ।
मैं - मुझे देर हो रही है ।
बस इतना ही बोलकर मैं उनके फ्लैट से बाहर निकल गई और सीढ़ियों से नीचे जाने लगी । उनके कमरे से बाहर आकर मुझे कुछ ठंडक मिली मेरा तो सारा शरीर ही जल रहा था। फिर मैं धीरे धीरे अपने घर पहुँची दरवाजा खोला और धड़ाम से जाके अपने बिस्तर पर गिर पड़ी । मुझे बोहोत थकान हो रही थी । फिर मैंने पर्स से फोन निकाला और अशोक को फोन किया -
मैं - हैलो
अशोक - हैलो , पदमा कहाँ हो तुम आज ? कभी मोबाईल स्विच ऑफ तो कभी तुम कॉल रिसीव ही नहीं कर रही ?
मैं - जी वो मोबाईल की बैटरी डाउन हो गई थी इसलिए स्विच ऑफ था । और फिर मैंने आपको कॉल किया था तो आप बिजी थे । अब जब आपका कॉल आया तो मैं छत पर थी औरं मोबाईल नीचे इसलिए पता ही नहीं चला ।
अशोक - ओह अच्छा । चलो छोड़ो ये सब बात सुनो मेरी एक फाइल घर रह गई थी उसे लेने .. ..
अशोक के बात पूरा करने से पहले ही मैं बीच मे बोल पड़ी
मैं - हाँ , आपके दोस्त आए थे उसे लेने ।
अशोक - दोस्त ? कोन दोस्त ?
मैं - हाँ , आपके दोस्त नितिन !
अशोक - नितिन मेरा दोस्त ? हा हा हा .. ..
इतना कहकर अशोक जोर से हँसने लगे । मैंने हैरत से पुछा -
मैं - क्यूं क्या हुआ ? क्या वो आपके दोस्त नहीं है ?
अशोक - लगता है तुम्हें कोई गलत फहमी हुई है । नितिन मेरे दोस्त नहीं है ।
मैं ( उत्सुकता से )- तो फिर ?
अशोक - अरे वो मेरे .. अच्छा सुनो मैं तुमसे बाद मे बात करता हूँ , अभी मुझे जाना होगा ।
इतना बोलकर अशोक ने फोन रख दिया । पर मेरे मन मैं एक सवाल छोड़ दिया की नितिन आखिर है कोन ?
यही सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई ।
जनवरी के महीने का अंत चल रहा था । पर ठंड अब भी जिस्म को कपड़ों से आजाद कराने के लिए तैयार नहीं थी । इसी ठंड को काम करने के लिए मे रोज की तरह अपनी छत पर धूप सेकने बेठी थी । ये मेरा रोज का routine बन गया था । अशोक के घर से ऑफिस जाने के बाद मे घर के सभी काम निपटा कर दोपहर मे छत पर जाकर धूप मे सर्दी को कम करने की कोशिश करती थी । उस दिन भी मे दोपहर मे छत पर घूम रही थी । मेरे घर के सामने एक प्लेग्राउन्ड है जहाँ कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे । उनमे से मे केवल एक को मैं पर्सनली जानती थी वो था ' वरुण ' वो भी इसलिए क्योंकि उसकी मम्मी के साथ मेरे अच्छे संबंध थे । वो हमारे ही मोहल्ले मे , मेरे घर से 3 घर छोड़कर रहती थी ।
हैलो , मेरा नाम है " पदमा " और ये मेरी कहानी है ।
यूं तो मे रोज ही दोपहर को अपनी छत पर धूप लेने के लिए जाती थी पर उस दिन मन कुछ अजीब सा महसूस कर रहा था कुछ घबराहट । जेसे तूफान के आने से पहले एक शान्ति सी छा जाती है बिल्कुल एसा ही लग रहा था । मैं अपनी छत की रैलिंग पकड़कर गली मे देख रही थी के तभी गली मे एक बाइक पर एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया मेने उसे ज्यादा गोर से तो नहीं देखा पर वो एक ब्लैक शर्ट उसके ऊपर एक जैकिट और ब्लू पेंट पहने हुआ था आँखों पर ब्लैक चश्मा था । उत्सुकता मुझे तब हुई जब गली के सभी घरों को पार कर वो अंत मे मेरे घर की तरफ मुड़ा और मेरे घर के सामने अपनी बाइक रोक दी । मैं उस वक्त भी छत पर ही थी और उसे ध्यान से देखने की कोशिश कर रही थी पर उसे पहचानने मे नाकामयाब रही । वह अपनी बाइक से नीचे उतरा और डोर बेल बजाई । चाहती तो मे छत से ही पूछ सकती थी की वह कोन है और क्या काम है ? पर ना जाने क्यूं मैं उसके लिए दरवाजा खोलने नीचे चली गई । ये शायद मेरा उसके लिए पहला आकर्षण था । मैं जल्दी जल्दी सीढ़ियों से नीचे उतरी और दरवाजा खोला । दरवाजा खोलने के बाद मेने पहली बार सपष्ट रूप से देखा वह एक हैन्ड़सम लगभग 5.8 का आदमी था जिसकी उम्र शायद 29 वर्ष होगी । वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था मेने उसके चेहरे से अपना ध्यान हटाया और उससे पुछा
मैं - जी , आप कोन ?
वह - पदमा , मेरा नाम नितिन है मैं अशोक का दोस्त हूँ उसी के ऑफिस मे काम करता हूँ । उसकी एक फाइल घर पर रह गई है और वो मीटिंग मे बिजी है इसलिए उसने मुझे भेजा है , फ़ाइल लाने के लिए ।
ये मेरे लिए काफी शॉकइंग था एक तो मैंने कभी इस आदमी को अशोक के साथ नहीं देखा था । ऊपर से ये मेरा नाम भी जानता था । मैंने फिर उससे पूछा -
मैं - पर अशोक ने तो मुझे किसी फ़ाइल के बारे मे कुछ नहीं बताया ।
नितिन - बताता केसे तुम्हारा मोबाईल भी तो स्विच ऑफ है ।
उसकी बात सुन मेने अंदर आकर अपना मोबाईल चेक किया वो सच मे स्विच ऑफ था । मैं अपने मोबाईल मे ही उलझी थी के नितिन बाहर से ही बोल पड़ा -
नितिन - अरे , अब अगर इजाजत हो तो क्या मैं अंदर आजाऊ ?
मैं ( पलटकर )- ओह , प्लीज आइ यम सॉरी । प्लीज कम इन ।
वह अंदर आया मैंने उसे बेठने को कहा ," प्लीज सीट " और उसके लिए पानी लेने कीचेन मे चली गई । पानी का ग्लास लेकर जैसे ही मैं नितिन को देने के लिए झुकी मेरी साड़ी का पल्लू जरा सा नीचे ढलक गया और नितिन के सामने मेने उन्नत उरोज आ गए । जैसे ही नितिन की नजर मेरे कसे हुए स्तनों पर पड़ी उसकी निगाहें वही थम गई वह घूर -घूर कर उन्हे देखने लगा जैसे आँखों से ही उनका रसपान कर रहा हो । फिर जल्दी से मैंने ग्लास नीचे टेबल पर रखा और बोली -
मैं - आप जब तक पानी पीजिए मैं फाईल देखती हूँ ।
मैं जल्दी से फाईल लेने अपने बेडरूम की तरफ भागी पर एसा लग रहा था जैसे मुझे पीछे से कोई घूर रहा है बेडरूम के दरवाजे पर जाकर मैंने पलट कर देखा तो मेरा अंदाजा बिल्कुल ठीक था नितिन मुझे पीछे से घूर रहा था । अपने आप को किसी अनजान आदमी से अपने ही घर मे एसे घूरे जाने से मेरी दिल की धड़कन बढ़ गई । मैं जल्दी से अंदर गई और अपनी साँसों को नॉर्मल करने के लिए बेड पर बेठ गई थोड़ी देर बाद साँसे नॉर्मल होने पर मैं उठी और फाइल ढूंढने लगी । मैंने अलमारी खोली पर वहाँ पर कोई एसी फाइल नजर नहीं आई जो इम्पॉर्टन्ट हो मैं फाइल ढूंढने मे लगी थी और मुझे पता भी नहीं चला कब नितिन कमरे मे आ गए और मेरे पीछे खड़े होकर बिल्कुल मेरे करीब जाकर मेरे कान के पास धीरे से बोले" मिली नहीं क्या ?"
नितिन ने मेरे कान के इतने करीब से बोल था की उनकी गरम साँसे मुझे मेरी पीठ और कान पर महसूस हुई मैं घबराकर पीछे मुड़ी तो मेरे स्तन नितिन के सीने से टकरा गए । घबराहट मे फिर मेरी धड़कने और साँसे तेज हो गई , मैंने कहा - न न .. नहीं वो अलमारी मे तो नहीं है ।
नितिन अब भी मुझसे सट कर खड़े थे और हमारे बीच गेप ना के बराबर था । फिर नितिन ने कहा " शायद अलमारी के ऊपर रखी होगी "
मैंने दोबारा पलटकर अलमारी की और देखा तो कुछ फाइले अलमारी के ऊपर राखी थी पर अलमारी काफी ऊँची होने की वजह से वहाँ तक नितिन का ही हाथ नहीं पहुँच सकता था तो मेरा तो क्या ही जाता ?
मैं - पर वह तो बहुत ऊँची है मैं कोई स्टूल लेकर आती हूँ ।
मैं स्टूल लेने जाने लगी पर अचानक नितिन ने मेरी बाँह पकड़ ली और कहा -
नितिन - रहने दो मैं लेट हो रहा हूँ ।
इतना कहकर नितिन ने बिना मुझसे पूछे मेरी कमर के उस भाग को जहां साड़ी नहीं थी को मजबूती से पकडा उसे मुझे ऊपर उठा दिया । ये सब इतनी जल्दी मे हुआ की मैं कुछ कह न सकी बस एक "आह" निकाल गई जिसे नितिन ने भी बखूबी सुना । नितिन ने मेरी कमर के दोनों नंगे भागों को मजबूती दे पकडा हुआ था और एक बार फिर उसकी गरम साँसे मुझे मेरी कमर पर महसूस हो रही थी । मेरी धड़कनों की रफ्तार बढ़ती जा रही थी । मैं ज्यादा देर एसे नहीं रह सकती थी इसलिए मेने जल्दी से फाइल ढूंढना शुरू कर दिया पर इधर नितिन ने मेरी मुशकील ओर बढा दी थी उसने अपनी नाक पूरी मेरी नंगी कमर पर लगा दी ओर अब उसके होंठों का स्पर्श मेरी कमर पर होने लगा पर इससे पहले की स्थिति मेरे काबू से बाहर हो मुझे वो फाइल मिल गई । मैंने कहा - मिल गई फाइल
पर नितिन ने तो जैसे सुना ही ना हो वो तो मेरे जिस्म से आने वाली मादक खुशबू मे व्यस्त था । मैंने एक बार फिर थोड़ा तेज आवाज मे कहा - नितिन फाइल मिल गई ।
इतना सुन नितिन जैसे नींद से बाहर आया और कहा - ओह अच्छा ।
इतना कह उसने मुझे नीचे उतारा और नीचे उतरते हुए एक बार फिर मेरी पीछे से नंगी पीठ उसके कठोर सीने से रगड़ कहा गई पर इस बार मुझे अपने नितम्बों (गांड) पर एक चीज और चुभती महसूस हुई मुझे समझते देर ना लगी की ये क्या है वो नितिन का लिंग था पर मेरे लिए चोकाने वाली बात ये थी की उसके लिंग की लंबाई मुझे कुछ ज्यादा ही महसूस हुई मेने उत्सुकतावश नीचे उतारकर उसे फाइल दी और अपनी आँखों से उसकी पेंट पर बने ऊभार की लंबाई को मापने की कोशिश करने लगी ये सिर्फ मेरा भ्रम नहीं था वाकई मे उसका लिंग पेंट मे भी बोहोत लंबा और मोटा महसूस हो रहा था मैं तो जैसे अपने होश ही खोने लगी थी कुछ तो नितिन की वो कामुक हरकते और कुछ उसके उस लिंग का आकार मुझे और उत्तेजित कीये जा रहा था
नितिन फाइल चेक कर रहा था उनसे फाइल चेक की , कि सही है या नहीं फिर कुछ देखकर मेरी ओर देखकर बोला "सब ठीक है यही है वो फाइल " इतना कह वो मुझे थैंक्स कह कर जाने लगा मैं उसे छोड़ने गेट तक गई । गेट पर जाकर अचानक नितिन पीछे मुड़ा और बोला - सॉरी पदमा ।
मैं - वो किस लिए ?
नितिन - वो .. मेने तुमसे बिना पूछे तुम्हें पीछे से उठा लिया था ना । वो मैं लेट हो रहा था इसलिए जल्दी मे कुछ सुझा ही नहीं।
मैं - कोई बात नहीं नितिन , इट्स ओके । पर मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ ?
नितिन - हाँ बोलो . ..
मैं - अशोक के सभी दोस्तों को तो मैं जानती हूँ , पर तुम्हें कभी नहीं देखा । ना ही काभी आज से पहले तुम्हारा नाम ही सुना था । एसा क्यूं ?
नितिन - इसका जवाब तो तुम्हें अशोक ही देगा पर मैं इतना तो समझ गया हूँ की अशोक ने मुझे तुमसे क्यूं नहीं मिलवाया ?
मैं - अच्छा , तो बताओ क्यूं नहीं मिलवाया ?
नितिन- जिसकी इतनी सुंदर पत्नी होगी उसे डर तो रहेगा ही कही मैं ना चुरा लूँ उसकी बीवी ।
इतना कहकर वो जोर से हंसने लगा । मैं उसके इस जवाब पर बस शर्माकर रह गई और कुछ ना बोल सकी । फिर वो बोला - अच्छा , चलो बाय मैं चलता हूँ फिर मिलेंगे । अब तो मेने अशोक के चाँद को देख लिया है अब इसे देखने तो मैं आता रहूँगा ।
उसकी ये बाते फिर से मेरे दिल की धड़कनों को बढ़ा रही थी । मैंने उसके कमेन्ट का जवाब दिए बिना उसे बाय बोला और दरवाजा बंद करके अंदर आ गई ।
अंदर आकर सबसे पहले मैं कीचेन मे गई ओर 2 ग्लास पानी पिया फिर सोफ़े पर बेठकर थोड़ी नॉर्मल होने की कोशिश करने लगी । बाहर काफी सर्दी थी पर मेरे माथे पर पसीना आया हुआ था वजह आप सब जानते है। मैं सोचने लगी की ये अशोक का एसा कोन सा दोस्त है जिसका अशोक ने कभी नाम भी नहीं लिया । मेरी और अशोक की शादी को 4 साल हो चुके थे पर कभी उसके एसे किसी दोस्त से नहीं मिली जो मुझे भाभी ना कहकर नाम से बुलाता हो । इन सब सवालों के जवाब तो अशोक के ऑफिस से आने के बाद ही मिलेंगे
नितिन चला तो गया पर उसके आने से जो मेरे मन जो हलचल मच गई थी वह नही गई । पता नहीं कब 4 बज गए जब मैंने घड़ी देखी तो याद आया की मुझे तो गुप्ता जी के पास साड़ी के ब्लाउस और पेटीकोट को सिलवाने के लिए भी जाना है । रमेश गुप्ता जी एक 50 साल के आदमी हमारे मोहल्ले के दर्जी थे , मोहल्ले की ज्यादातर औरते उन्ही से कपड़े सिलवाया करती थी । सभी उन्हे गुप्ता जी कहकर बुलाते थे मैं भी उन्ही मे से एक थी गुप्ता जी एक किराये के कमरे मे अकेले रहते थे उनका परिवार गाँव मे था । मैंने जल्दी से अपना फोन जो चार्जिंग पर लगा हुआ था को हटाया ओर उसे ऑन करके देखा तो पाया की उसमे अशोक की 3 मिस्सड कॉल थी मैं समझ गई की ये उसने फाइल के लिए ही की होंगी मैंने उसे कॉल बैक किया तो वो बिजी बता रहा था मैंने सोचा की वो मीटिंग मे होंगे फिर मैं उठकर अपना समान समेटने लगी और सिलाई का कपड़ा लेकर घर से बाहर निकली ।
बाहर आकर घर का दरवाजा लॉक किया और गली मे चल पड़ी । घर के बाहर ज्यादा ठंड थी कुछ लोग आग तापने के लिए एक जगह इकट्ठे खड़े थे पर मुझे आता देख वो सब आग को छोड़कर मुझपर आंखे सेकने लगे । मेरे लिए ये कोई नई बात नहीं थी मैं जब भी किसी काम से घर से निकलती थी तो मोहल्ले के कई मर्द अपने होश खो बेठते थे । मैं थोड़ा आगे चली तो वो सब मेरी बलखती कमर और मेरे बड़े नितम्बों को देखने लगे जैसे खा ही जाएगे
फिर मैं थोड़ा ओर आगे चली तो उनमे से बोल पड़ा - "हाए क्या गदराई जवानी है एक बार मिल जाए तो इसका सारा रस पी लूँ । "
ये सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा भी आया मैंने पलटकर पीछे देखा तो वो सब बड़ी बेशर्मी के साथ हँस रहे थे मैंने उन्हे जवाब देने की सोची भी पर वो 6-7 थे और मैं कोई बखेड़ा खडा नहीं करना चाहती थी इसलिए मुड़कर फिर आ से आगे की ओर बढ़ी इस बार उनमे से किसी ने कुछ कहा तो नहीं पर उनके हँसने की आवाज मेरे कानों तक पहुँच रही थी मैंने जल्दी जल्दी से कदम बढ़ाए और गुप्ता जी के फ्लैट के नीचे तक पहुँच गई गुप्ता जी का फ्लैट एक मंजिल ऊपर था नीचे किराने की 1 पुरानी दुकान थी और एक सिलाई के समान जैसे सुई ,रील या सिलाई मशीन वगैरह की दुकान थी गुप्ता जी यहाँ से ही अपनी सिलाई का सारा सामान लेते थे और गली के बाकी लोग भी । ऊपर की मनजिल पर जाने के लिए लोहे की सीढ़िया बाहर से ही जाती थी मैंने जल्दी से सीढ़ियाँ चढ़ी और जल्द ही गुप्ता जी की दुकान मे परवेश किया
गुप्ता जी की दुकान एक छोटा पर सिलाई के लिए पर्याप्त कमरा था जिसके फर्श पर काफी कटे हुए कपड़े पड़े थे एक ओर रस्सी पर एक पर्दा लगा था जिसके पीछे जाकर सभी औरते चेंज करती थी । कमरे मे हीटर चल रहा था जिससे उसमे काफी गरमाई थी। गुप्ता जी उस समय किसी का घागरा सि रहे थे मुझे देखते ही बोले -
गुप्ता जी - आओ , आओ पदमा बेठो । कहो केसे आना हुआ ?
मैं - नमस्ते गुप्ता जी । वो दरसल एक साड़ी का ब्लाउस और पेटीकोट सिना है ।
इतना कह मैं पास मे रखे स्टूल पर बैठ गई ।
गुप्ता जी ( आँखों से चश्मा हटाते हुए ) - हाँ बिल्कुल हो जाएगा । और सुनाओ सब ठीक है घर ?
मैं - जी हाँ सब ठीक है । और आप केसे है ?
गुप्ता जी - बस सब सही है । समय निकल रहा है । अच्छा तुम तैयार जो जाओ मैं फीता लेकर आता हूँ ।
गुप्ता जी को मैं अच्छी तरह से जानती थी तैयार होने से उनका मतलब था की मैं अपनी साड़ी उतार दूँ और ब्लाउस और पेटीकोट मे आ जाऊ । एसा वो हर बार करते थे मैं अपनी जगह से उठी औरं एक छोटे से परदे के पीछे जाकर साड़ी को निकालने लगी पर्दा काफी हल्का था और उसके आर पार देखा जा सकता था मतलब परदे के दूसरी ओर से कोई भी आदमी ये देख सकता था की मैंने कितने कपड़े उतार दिए है और कितने पहने है ।
मैंने अपना पर्स वही परदे के पीछे साइड मे रखा और पर्दा लगा कर साड़ी उतारने लगी के तभी गुप्ता जी ने कमरे मे परवेश किया और जैसे ही उनकी नजर परदे के पीछे मुझ पर पड़ी उनकी नजरे वही टिक गई परदे का होना , ना होना बराबर था और वो परदे के पीछे भी मुझे स्पष्ट रूप से देख सकते थे ।
जैसे ही मेरी नजर गुप्ता जी पर गई मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया और दिल धड़कने लगा । शर्म के मारे मेने अपना चेहरा दूसरी ओर घूमा लिया पर गुप्ता जी कहाँ मानने वाले थे वो पीछे से मेरी पतली कमर और नितम्बों वो निहारने लगे । मैंने अपनी साड़ी तो उतार दी पर ये समझ नहीं आ रहा था की एसी हालत मे गुप्ता जी के सामने जाऊ केसे ? आज मुझे उत्तेजना हो भी कुछ ज्यादा रही थी उसका कारण था नितिन ने जो मेरे साथ दोपहर मे हरकते की थी ।
गुप्ता जी जानते थे की मैंने साड़ी उतार दी थी और उसे नीचे पड़े कपड़ों के ढेर पर रख दिया ।
पर उनके सामने जाने मे हिचकिचा रही थी । मेरी मनोदशा समझ कर गुप्ता जी परदे के बिल्कुल पीछे आकर खड़े हो गए और बोले -
गुप्ता जी - पदमा , क्या तुमने साड़ी उतार दी ?
मैं - जी जी .. गुप्ता जी ।
गुप्ता जी - ठीक है ।
इतना कहकर गुप्ता जी ने बिना मुझसे कुछ पूछे और बिना देरी कीये परदे को एक ओर को खेन्च दिया । अब मेरी बैक उनके सामने सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज मे थी
पहले कुछ देर गुप्ता जी ने पीछे से ही मेरी जवानी के रस को आँखों से पिया फिर अचानक उन्होंने मेरे कंधे पर अपना हाथ रक दिया । मैं एक दम से सिहर उठी ।
गुप्ता जी बोले- "मेंरी ओर घूमो पदमा मुझे नाप लेना है। "
मैं बिना कुछ बोले गुप्ता जी की ओर घूम गई । गुप्ता जी ने एक बार फिर मुझे ऊपर से नीचे तक फिर नीचे से ऊपर तक निहारा और अपना फीता उठाया । शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल और साँसे तेज हो रही थी यूं तो गुप्ता जी ने पहले भी मेरा 2 बार नाप लिया था पर कभी मुझे इतनी एक्साइटमेंट महसूस नहीं हुई थी पर आज मुझे कुछ अलग ही नशा छा रहा था । शायद ये सब दोपहर मे हुई गतिविधियों का नतीजा था ।
फिर गुप्ता जी ने फीते को मेरे एक कंधे से दूसरे कंधे पर लगाया और नाप नोट किया इस दोरान उनकी उंगलियाँ मेरी गर्दन और पीछे पीठ को छूती रही । फिर उन्होंने कमर से अपना फीता हटाया और उसे मेरे बाजू पर लपेट कर बाजू का नाप लेने लगे एसा करने मे उनके हाथ मेरे बूब्स से साइड से टकरा गए और मेरे पहले से टाइट बूब्स और तन गए अब साँसों की रफ्तार भी बढ़ गई थी फिर उन्होंने दाएं बाजू का नाप नोट किया और बाएं बाजू की ओर बढ़े और एक बार फिर गुप्ता जी के हाथ मेरे बाएं बूब्स पर टच हो गए साँसे अब काबू से बाहर हो रही थी और बूब्स साँसे लेने के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे ।
बाएं बाजू का नाप लेने के बाद गुप्ता जी अब आगे बढ़ना चाहते थे और वो मेरे पीछे जा खड़े हुए और मुझ से लगभग बिल्कुल सट गए फिर गुप्ता जी ने पीछे से मेरे कान मे कहा -"अपने हाथ ऊपर उठाओ, पदमा । "
गुप्ता जी ने मेरे कान के इतने नजदीक से कहा की उनकी गरम साँसे मुझे अपने कान और गर्दन पर महसूस हुई ।
मैं जानती थी के गुप्ता जी अब क्या करना चाहते है वो मेरे सीने का नाप लेना चाहते थे और फिर मैंने गुप्ता जी के लिए अपने हाथ ऊपर उठा दिए । गुप्ता जी ने बिना देरी कीये अपना फीता मेरी बाहों के नीचे से मेरे सीने के आगे किया और उसे मेरे सीने से लगाकर एक दम से अपनी ओर खींचा ,खिंचाव इतना तेज था के मुझे संभालने का मौका नहीं मिला और मैं गुप्ता जी के जिस्म से जा टकराई और मैंने पहली बार अपने नितम्बों पर गुप्ता जी का गरम कड़ा लिंग महसूस किया एक बार को तो मेरे होश ही उड़ गए ये क्या गुप्ता जी का लिंग इतना कठोर इसका मतलब गुप्ता जी भी उत्तेजित हो चुके है ।
है भगवान गुप्ता जी मुझसे कितने बड़े है और इस तरह मेरे पीछे अपना लिंग अड़ाए खड़े है यही सोचकर मेरे होंठों से अचानक एक कामुक आह निकाल पड़ी । गुप्ता जी का लिंग मुझे अपने नितम्बों पर चुभता हुआ महसूस हो रहा था और मुझे अपने नीचे योनि पर एक अजीब हलचल का भाव लग रहा था मेरी योनि गीली होने लगी थी । मेरे हाथ अभी भी ऊपर ही थे जिसकी वजह से मेरे तने हुए बूब्स के बीच की घाटी को गुप्ता जी पीछे से घूर रहे थे गुप्ता जी कभी फ़ीते को थोड़ा ऊपर कभी थोड़ा नीचे करके मेरे बूब्स का पूरा माप ले रहे थे । कुछ तो कमरे मे हीटर की गर्मी कुछ कामाग्नि मे जलता मेरा बदन । मेरी हालत खराब होने लगी । मेरे निप्पल तानकर बिल्कुल कड़े हो चुके थे । जिस्म मे उत्तेजना , रोमांच और डर तीनों के भाव एक साथ दोड़ रहे थे । गुप्ता जी भी अब आगे बढ़ना चाहते थे अब वो फ़ीते के साथ साथ अपने हाथ भी मेरे बूब्स पर फिराने लगे और अपने होंठ बिल्कुल मेरे कान से लगा दिए मानो किसी भी वक्त उसे अपने होंठों मे भरकर चूस लेंगे । उनका लिंग अब मुझे और भी सख्त लगने लगा था और वो जैसे धीरे से उसे मेरे पीछे रगड़ने लगे ।
हालत मेरे काबू से बाहर हो रहे थे इसलिए मेने गुप्ता जी से उत्तेजना मे कापंती आवाज से बोला -
मैं - गुप्ताआआआ.. .. जीईईई.. .. नाप पूरा हो गया क्या ? मेरे हाथ दुखने लगे है ।
गुप्ता जी मेरी स्थिति को जानते थे वो बोले-
गुप्ता जी - बस थोड़ी देर और ..
और फिर उन्होंने अचानक से अपने हाथ मेरे दोनों निप्पलो पर रख दिए और उन्हे सहलाने लगे ।
मैं- आहहह.. ... . गुप्ता जी ये आप क्या कर रहे है ?
गुप्ता जी- पदमा मैं तुम्हारे निप्पलो के कप का साइज़ ले रहा हूँ इसे हाथों से ही लेना पड़ता है ।
अपने लिए निप्पल जैसे शब्द सुनकर मेरी आग और भड़क उठी ।
मैं - परर र .... गुप्ता जी .... आपने पहले तो कभी एसा नहीं किया । फिर आज क्यूं ?
गुप्ता जी - ये मेरी एक नई तकनीक है ।
गुप्ता जी के लिंग का दबाव अब मेरे नितम्बों पर और भी सख्त हो गया था उनका लिंग उनकी पेंट को फाड़कर बाहर आने को आतुर था । मेरी योनि अब चुत रस से भीग चुकी थी और पेन्टी पूरी गीली थी । मैं अपने जिस्म की आग मे सब भूल चुकी थी की मैं एक शादीशुदा औरत हूँ जिसकी कुछ मर्यादाएं भी है ।
मैं - अच्छाआआआ.. .. तो आपने कितनी औरतो पर ये नई तकनीक इस्तेमाल की है ।
गुप्ता जी - तुम पहली हो पदमा ।
मैं - आह.... .. गुप्ता जी...... प्लीज नहीं ......
मैं इतना ही कह पाई क्योंकि गुप्ता जी ने मेरे कान को पूरी तरह अपने होंठों मे भर लिया और उसकी चुसाई शुरू करदी । उनकी पकड़ मेरे बूब्स पर भी सख्त हो गई और वो मेरे बूब्स को मसलने लगे । मेरा जिस्म अंगारे बरसाने लगा हाथ नीचे आकर गुप्ता जी के हाथों को रोकने की नाकाम कोशिश करने लगे ।
तभी अचानक से मेरे फोन की घंटी बजी जिसकी आवाज से हम दोनों घबराकर अलग हो गए । मैंने दोड़कर पर्स से फोन निकाला तो देखा यह अशोक का फोन था मेरी घबराहट और भी बढ़ गई। मैं अशोक का फोन उठाना चाहती थी पर मेरी धड़कन और साँसे इतनी तेज चल रही थी के मैं चाहकर भी उसका फोन ना उठा सकी । फिर मैंने गुप्ता जी की ओर देखा उनकी हालत तो और भी खराब थी वो कुछ नहीं बोल रहे थे पर उनके नीचे पेंट मे तना हुआ लिंग सब कुछ बयान कर रहा था ।
मैंने गुप्ता जी से कहा मुझे जाना होगा और परदे के पीछे जाकर अपनी साड़ी पहनने लगी । गुप्ता जी कुछ नहीं बोले । तब तक फोन भी कट चुका था । मैंने झटपट अपनी साड़ी पाहनी और जाने लगी , की तभी गुप्ता जी बोले
गुप्ता जी - पदमा !
मैं ( पलटकर) - जी ?
गुप्ता जी - पेटीकोट का नाप अभी बाकी है ।
मैं - मैं फिर कभी दे जाऊँगी गुप्ता जी , पर अभी मुझे जाना होगा ।
गुप्ता जी - आज के लिए मुझे माफ कर देना पदमा प्लीज आइ यम सॉरी । दरसल हालत ही कुछ एसे बने की मैं अपने पर काबू नहीं रख पाया । तुम तो जानती हो मेरी बीवी तो यहाँ है नहीं वो तो मुझसे कितनी दूर है । मैं प्यार के लिए तरस जाता हूँ इसलिए बस तुम्हारा हुस्न देखकर मैं अपने पर काबू नहीं रख पाया ।
गुप्ता जी ने कितनी ही बात एक साथ कह डाली पर मैं क्या कहती , मैं तो खुद अपनी हवस पर काबू नहीं रख सकी थी । और ऊपर से गुप्ता जी मेरी तारीफ भी कर रहे थे । मैंने सोचा कह तो बेचारे ठीक ही रहे है अब आदमी इतने दिन तक घर से बाहर अकेला रहेगा तो तन्हा तो हो ही जाएगा ।
मैं - मुझे देर हो रही है ।
बस इतना ही बोलकर मैं उनके फ्लैट से बाहर निकल गई और सीढ़ियों से नीचे जाने लगी । उनके कमरे से बाहर आकर मुझे कुछ ठंडक मिली मेरा तो सारा शरीर ही जल रहा था। फिर मैं धीरे धीरे अपने घर पहुँची दरवाजा खोला और धड़ाम से जाके अपने बिस्तर पर गिर पड़ी । मुझे बोहोत थकान हो रही थी । फिर मैंने पर्स से फोन निकाला और अशोक को फोन किया -
मैं - हैलो
अशोक - हैलो , पदमा कहाँ हो तुम आज ? कभी मोबाईल स्विच ऑफ तो कभी तुम कॉल रिसीव ही नहीं कर रही ?
मैं - जी वो मोबाईल की बैटरी डाउन हो गई थी इसलिए स्विच ऑफ था । और फिर मैंने आपको कॉल किया था तो आप बिजी थे । अब जब आपका कॉल आया तो मैं छत पर थी औरं मोबाईल नीचे इसलिए पता ही नहीं चला ।
अशोक - ओह अच्छा । चलो छोड़ो ये सब बात सुनो मेरी एक फाइल घर रह गई थी उसे लेने .. ..
अशोक के बात पूरा करने से पहले ही मैं बीच मे बोल पड़ी
मैं - हाँ , आपके दोस्त आए थे उसे लेने ।
अशोक - दोस्त ? कोन दोस्त ?
मैं - हाँ , आपके दोस्त नितिन !
अशोक - नितिन मेरा दोस्त ? हा हा हा .. ..
इतना कहकर अशोक जोर से हँसने लगे । मैंने हैरत से पुछा -
मैं - क्यूं क्या हुआ ? क्या वो आपके दोस्त नहीं है ?
अशोक - लगता है तुम्हें कोई गलत फहमी हुई है । नितिन मेरे दोस्त नहीं है ।
मैं ( उत्सुकता से )- तो फिर ?
अशोक - अरे वो मेरे .. अच्छा सुनो मैं तुमसे बाद मे बात करता हूँ , अभी मुझे जाना होगा ।
इतना बोलकर अशोक ने फोन रख दिया । पर मेरे मन मैं एक सवाल छोड़ दिया की नितिन आखिर है कोन ?
यही सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई ।