Update 13
अपने सीने से चिपका के नितिन ने अपने होंठ मेरे कंधों पर लगाए और अपना जितना हो सकता था उतना मुहँ खोलकर मेरे कँधे को अपने मुहँ मे भर लिया और उसकी चुसाई शुरू कर दी
नितिन के इस वार से तो मैं पागल ही हो गई मेरा पूरा बदन वासना की लहरों से काँपने लगा और मेरी योनि भी अब गीली होकर मचलने लगी , कब मेरे हाथों ने नितिन को अपनी बाहों मे जकड़ लिया मुझे खुद पता नहीं चला , फिर अचानक नितिन ने मुझे एक पल को मुझे खुद से अलग किया मैंने इसकी उम्मीद तो नितिन से बिल्कुल नहीं की थी मैंने अपनी हवस मे लाल हो चुकी आँखों से एक बार नितिन की ओर देखा और अगले ही पल नितिन ने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर तेजी से घूमा दिया और मेरे पीछे आकर मेरी गर्दन, कंधों पर तेजी से अपने होंठ रगड़ने लगा
उसकी इस हरकत ने आग मे घी का काम किया और मैं आहें भरने लगी बड़ी मुश्किल से मैंने अपने होंठ काटते हुए अपनी आहं को उन झाड़ियों मैं फेलने से रोका । मुझे ये भी डर था की कहीं कोई मेरी इन कामुक आंहों को सुन ना ले । नितिन के हाथ अब मेरे नितम्बों से हट गए थे पर अब वो मेरे पेट से होते हुए उस जगह आने लगे थे जहां का स्पर्श पाकर मैं अक्सर बेकाबू हो जाती और वो जगह थी मेरे 'बूब्स ' । पीछे खड़ा होने की वजह से नितिन का तना हुआ लिंग मुझे मेरे नितम्बों पर चुभने लगा और उसके हाथों ने आगे बढ़कर मेरे बूब्स को थाम लिया और उन्हे सहलाने लगे । अब नितिन मेरी गर्दन से चूमता हुआ मेरे कान तक आया और धीरे से उसे अपने होंठों मे भरकर चूसने लगा ।
सुबह के समय ठंड थी पर मेरा जिस्म वासना मे सुलगने लगा , बदन आग की भट्टी की तरह गरम हो गया । नितिन के हाथ अब मेरे बूब्स को धीरे-धीरे दबाने लगे और मेरी योनि भर-भरकर पानी छोड़ने लगी । फिर नितिन ने पीछे से मेरे कान से अपने होंठ हटाकर धीरे से मेरे कान मे कहा- "पदमा , शहद नीचे की ओर तुम्हारी पीठ पर भी फैल गया है उसे साफ करने के लिए मुझे तुम्हारा टॉप खोलना होगा ।" मुझे इस वक्त कुछ भी सूझ नहीं रहा था मैं बस जो हो रहा था होने देना चाहती थी मुझे कुछ ना कहता देख नितिन ने फिर बिना कोई सवाल कीये मेरे वॉक-टॉप की चैन को पीछे से नीचे कर दिया और बिना एक पल की देरी कीये अपने दोनों हाथों से उसे पकड़कर उतार दिया और वही जमीन पर फेंक दिया । टॉप के उतरते ही मेरे बूब्स पर सिर्फ ब्रा ही रह गई थी जो मेरे उन्नत बूब्स को बड़ी मुश्किल से थामे हुई थी नितिन के हाथों ने अब मेरे बूब्स को ब्रा के ऊपर से पकड़ लिया और अपने होंठों से मेरी पीठ को चूमते हुए उसके हाथ मेरे बूब्स को और भी दबाव के साथ मसलने लगे ।
मैं -आह ..... नितिन ..... नहीं ..... ये क्या ....... नाह ....... ?
नितिन ( एक पल को मेरी पीठ से अपने होंठ हटाते हुए ) - क्या हुआ पदमा ?
मैं - नितिन ....... .... आह ..... तुमने ..... टॉप .... नहीं ......... ओह ... ।
नितिन अब बातों के जवाब देने मे बिल्कुल दिलचस्प नहीं था उसने बिना कोई जवाब दिए मेरे बदन पर चुंबनों की झड़ी लगा दी और मैं उसके हर चुंबन के साथ मेरा जिस्म जलता हुआ अंगारे बरसाने लगा । नितिन के हाथ अब जोर-जोर से मेरे बूब्स का मान-मर्दन कर रहे थे और साथ ही साथ बीच-बीच मेरे कठोर हो चुके निप्पलस को भी मरोड़ने लगे । शरीर से शहद तो कब का साफ हो चुका था अब तो जो कुछ चल रहा था वो तो बस वासना का खेल था और मैं जानती थी के नितिन ये खेल अंत तक खेलना चाहता है पर मैं अभी ये नहीं होने दे सकती थी नितिन के हाथ मेरे बूब्स पर सख्त हो गए थे उन्हे मसलने लगे थे
और पिछे से उसका लिंग अब मेरे नितम्बों पर धक्के लगाने लगा था । मैंने अपनी हवस भारी आवाज मे नितिन से कहा - 'आह ..... नितिन ...... अब .... नहीं ..... बस ...... अब तो... शशशहद .... साफ हो ..... ओह ........ गया ......... है ...... अब ..... तुम ....... हट ....... जाओ ....... ।"
नितिन - बस थोड़ी देर और पदमा अभी कुछ हिस्सा बाकी है ।
मैं ( अपनी साँसे रोकती हुई ) - नहीं ...... नितिन ...आहं ........ अब ....... बस .......... करो ........ ना ह .......... कोई ... आह .... आ .... जाएगा ........ ।
नितिन ( बेफ़िक्री से) - यहाँ कोई नहीं आता पदमा , तुम बस मजा लो ।
मैं - नहीं .... नितिन .... प्लीज ....... आह ....... ।
मेरे इतना कहते ही नितिन ने मुझे पीछे से मजबूती से पकड़ा और मेरे दोनों पैर उठाकर नीचे गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर आ गया, मेरे साथ अचानक से हुई इस घटना से मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया मेरे कुछ बोलने से पहले ही नितिन ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और उन्हे जोर - जोर से चूसने लगा
ब्रा मे कैद मेरे उन्नत बूब्स उसकी नंगी छाती के नीचे दब गए । हवस की आग अब मुझ पर भी छा चुकी थी और अब मैं भी अपने को रोक नहीं पाई और नितिन के चुम्बन का जवाब अपने होंठों से देने लगी नितिन का एक हाथ मेरे बूब्स को पकड़े हुए था और उसे जोर -जोर से मसल रहा था और दूसरा हाथ नीचे जाकर मेरी पेंट्स मे घुसने की कोशिश कर रहा था उसके हाथ को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी और उसका हाथ मेरी पेंट्स से होते हुए नीचे मेरी पेन्टी पर पहुँच गया और उसके ऊपर से ही मेरी योनि को सहलाने लगा । अपनी योनि पर नितिन का हाथ जाते ही मैं उछल पड़ी और जोर से आहें भरने लगी,
मैं - आह ......नितिन ...... प्लीज ....... उसे ...... मत ..... छूओ ........ मैं मर ....नाह ........ जाऊँगी ......... प्लीज ....... ओह ....... नहीं ....... नहीं ........ ।"
पर नितिन मेरी कहाँ सुनने वाला था वो तो मेरी हर बात को अनसुना कर बस अपने काम मे लगा रहा योनि तो पहले से ही गीली थी नितिन के हाथ का स्पर्श मिलते ही वो पानी के साथ -साथ आग भी उगलने लगी कामुकता मैं मैंने अपने होंठ काट लिए और नितिन को जोर से अपनी बाहों मे कसकर उसकी पिठ पर अपने नाखून चुभा दिए ।
फिर नितिन नीचे की ओर आता हुआ मेरे बूब्स पर आया और बिना देरी किये मेरी ब्रा को ऊपर खिसका दिया और मेरे बूब्स को अपने मुहँ मे भरकर जोर -जोर से चूसने लगा ।
" आह .... नितिन ..... चूसो ...... इन्हे ..... जी ...... भरकर .......... हाँ ..... हाँ .....ये ..... तुम्हारे.......... ही है .............ओह ..... नितिन ........ । " मैं आहें भरते हुए बोलती गई । मेरी आहें सुन नितिन ओर जोश मे आ गया और मेरे बड़े -बड़े बूब्स को जितना हो सके अपने मुँह मे भरकर चूसने लगा नीचे से अब उसका हाथ भी मेरी योनि को मसलने लगा था । नितिन ने जी भरकर मेरे बूब्स का सारा दूध पिया वो पूरी शिद्दत के साथ कभी मेरे एक बूब्स को कभी दूसरे बूब्स को बिना साँस लिए चूसता गया बीच -2 मे वो मेरे निप्पलस को भी अपने होंठों मे भर लेता और उन्हे अपनी जीभ से छेड़ता । बूब्स से अपनी प्यास बुझा लेने के बाद वो उनको छोड़ नीचे मेरी नाभी पर आया और वहाँ पर चूमने चाटने लगा । नितिन ना सिर्फ मेरी नाभी को चूम रहा था बल्कि अब वो अपनी जीभ निकालकर मेरी नाभी मे घूमाने लगा था ।
बैचेनी मे मैं अपना सर इधर - उधर पटकने लगी नितिन को रोक पाना अब मेरे बस मे नहीं रहा था मैं अपनी वासना को कैसे भी मिटाना चाहती थी बस । मेरे जिस्म की वो हालत थी जो जल बिन मछली की होती है जैसे -जैसे नितिन नीचे आता गया मेरी हवस अपने परवान चढ़ती गई नितिन ने नीचे आकर मेरी वॉक-पेंट्स को अपने दोनों हाथों से पकड़ा और एक झटके मे नीचे खिंच दिया अब मैंरी योनि को उसके सामने आने से बस मेरी पेंटी ने रोका हुआ था । मैंने कभी सोचा भी नहीं था के एक दिन मैं अपने ही पति के बॉस के साथ यूँ झाड़ियों मे इस हालत मे होऊँगी शर्म से मैंने अपनी आँखे बंद करली और अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया अब किसी भी वक्त मेरी योनि नितिन के सामने आ सकती थी नितिन भी इस पल का इंतजार नहीं करना चाहता था और उसने बिना देर कीये मेरी पेन्टी को भी पकड़कर नीचे खेन्च दिया ।
" आह पदमा.... कितनी सुंदर चुत है तुम्हारी ......। "- नितिन मेरी योनि को देखते ही बोल पड़ा । उसकी बात सुनकर मैं शर्म से लाल हो गई पर कुछ बोल नहीं सकी । फिर नितिन आगे बोला - "पदमा .. तुम्हारी चुत तो रस से भीगी हुई है ... मैं ये रस पीना चाहता हूँ पदमा .. प्लीज मुझे ये रस पीने दो । "
"ये नितिन क्या बोले जा रहा है ये मुझे पागल करके छोड़ेगा ये मेरी योनि का चुतरस पीना चाहता है ऐसा तो कभी मेरे साथ किसी ने नहीं किया अब मैं क्या करूँ । "- मैंने मन मे सोचा । नितिन जिस बेबाकी के साथ ये सब बातें बोल रहा था उससे मेरी हवस की आग और भी बढ़ती जा रही थी , नितिन ने फिर से कहा - "बोलो ना पदमा ? क्या मैं ये रस पी लूँ । " मैं भी अब अपने जिस्म की आग को कैसे भी ठंडा करना चाहती थी इसलिए अपनी सभी सीमाएं और मर्यादा तोड़ते हुए नितिन से बोली - " आह ... हाँ .... पी .... लो ..... नितिन ..... अब ..... जल्दी करो ...... । " इसके बाद नितिन ने बिना कोई सवाल पूछे और बिना देरी कीये अपने होंठ मेरी योनि से लगा दिए , नितिन के होंठ अपनी योनि पर पड़ते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं हवा मे उड़ रहीं हूँ मेरे जिस्म मे चींटियाँ रेंगने लगी और मैं तड़पते हुए आहें भरने लगी नितिन के होंठ अब तेजी से चल रहे थे और वो अपनी जबान से मेरी योनि के दाने वो चाटने लगा ।
मेरे लिए ये अनुभव बिल्कुल नया था आज से पहले कभी किसी ने मेरी योनि को नहीं चाटा था मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था की इसमे इतना मज़ा आता है । और अब मैं इस मजे मे डूब जाना चाहती थी इस वक्त मुझे किसी की परवाह नहीं थी ना अपने पति की , ना उनकी इज्जत की और ना ही अपनी मर्यादाओ की मुझे बस इतना पता था कि यहाँ एक मर्द है जो मुझे वो सुख दे रहा है जो मुझे मेरे पति ने कभी नहीं दिया और शायद दे भी ना पाए । नितिन ने मेरी योनि चूसने के साथ - साथ अपनी एक उँगली भी मेरी योनि मे घुसाने की कोशिश करने लगा और फिर उसने एक पल के लिए अपने होंठ मेरी योनि से हटायें और अपनी उँगली को उसमे घूसा दिया । " आह .......... ओह .......... आह ........... "- मैं जोर से आहें भरते हुए तड़पने लगी नितिन ने अपने एक हाथ को ऊपर कर मेरे बूब्स को पकड़ लिया और उन्हे मन-मर्जी से मरोड़ने लगा । योनि मे उँगली घुसाते हुए नितिन बोला - "पदमा तुम्हारी चुत तो बोहोत कसी हुई है , लगता है अशोक तुम्हारी अच्छे से चुदाई नहीं करता । "नितिन की बात का मैं कोई जवाब नही देना चाहती थी मैं बस लेते हुए उसकी हरकतों का मज़ा उठाने लगी । पर नितिन तो मुझसे सब कुछ सुनना चाहता था ना जाने उसे इसमे क्या मजा आ रहा था उसने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे तेज करते हुए मुझसे फिर से पुछा - " बोलो ना पदमा , क्या नितिन तुम्हारी अच्छे से चुदाई नहीं करता । " अपनी योनि मे तेजी से हुए इस वार से मैं मचल उठी और नितिन से कहा - " नहीं ........... आह ........ अब उनकी ........ बात ...... ना करो .........नितिन ......... ओह ....... प्लीज ...... थोड़ा ... धीरे ..... करो .......ओह ....... । " मेरे इतना कहने पर नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे ओर तेज करदी । मैं तो पहले से वासना मे तड़प रही थी नितिन के ऊँगली की रफ्तार तेज होने से मैं ओर भी कामोत्तेजित होकर जमीन पर आहें भरते हुए अपने हाथ पैर ईधर -उधर मारने लगी । नितिन ने मुझे पुकारा - " पदमा !" मैंने आहें भरते हुए अपनी काँपती आवाज मे कहा -" आह ...... ओह ...... हाँ ..... बोलो .।" नितिन - "मुझे तुमसे कुछ काम है ।"
मैं - आहं ....... हाँ ........ जल्दी बोलो .....नितिन ...... ।
नितिन - कल अशोक एक फाइल लेकर घर आया होगा ।
मैं - हाँ ....... .... आह ...... ........ ओह ...... करो ..... ओर ...... करो ........ ।
नितिन - वो फाइल मुझे चाहिए , दोगी ना पदमा ।
मैं - आहं ...... तुम्हें .... वो ..... क्यूँ ...... चाहिए ........ ओह .......
नितिन - मेरे लिए वो फाइल बोहोत जरूरी है पदमा, उस फाइल के मिलने के बाद ही मैं वापस शहर आ पाऊँगा , बोलो तुम मेरे लिए उसे लाओगी ना ।
मैं - आह .... पर ..... वो ... तो .... अशोक के ..... पास ........ ओह ..... है ......, मेरे पास ...... नहीं ....... ।
नितिन - तो तुम्हें अशोक के पास से उसे मेरे लिए लाना होगा । लाओगी ना ..... ?
नितिन की इस बात का मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस वहीं लेटे-2 आहें भरती रही । मैंने सोचा "पता नहीं इस नितिन के बच्चे को वो फाइल क्यों चाहिए और वो भी इस समय ये उसकी बात क्योँ कर रहा है । " मुझे कोई जवाब ना देता देख नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे धीमी करदी और बोला - " बताओ पदमा .. ? दोगी ना मुझे वो फाइल .... बोलो नहीं तो मैं रुक जाऊँगा .... । "
मैं कुछ भी बर्दास्त कर सकती थी पर इस वक्त नितिन का रुकना नहीं । मैं बोहोत प्यासी थी और मैं अपने चरम पर पहुँचने के बोहोत करीब थी और अब मेरे लिए रुकना संभव नहीं था मैंने नितिन की बात का जवाब देते हुए कहा - "आह ..... हाँ ... लाऊँगी ....... ओह ........ बस ........अब रुको ........ मत नितिन ........ आह ....... करते ....... रहो ......... आहं .... मैं ..... अब ..... रुक .... नहीं .... सकती ...... ।"
नितिन को अपना जवाब मिल गया था और अब वो फिर से अपने छोड़े हुए काम मे लग गया । उसने फिर से अपने होंठ मेरी योनि पर लगाकर चूसना शुरू किया और अपने एक हाथ से मेरे बूब्स को पकड़कर जोर - जोर से उन्हे मसलने लगा और दूसरे हाथ की उँगली को तेजी से मेरी योनि के अंदर -बाहर करने लगा और मैं एक बार फिर मेरी आहे उन झाड़ियों मे गूंजने लगी मैंने अपने हाथ नितिन के सर के बालों मे उलझा दिए और उसके सर को अपनी योनि पर दबाने लगी नितिन भी समझ गया था की मैं झडने के बोहोत करीब हूँ इसलिए उसने भी मेरी योनि को जमकर चूसना शुरू कर दिया और अपनी ऊँगली को मेरी योनि ने डालकर अंदर जोर-जोर से घुमाने लगा ।
मैं - आहं .... हाँ ..... नितिन ...... ओर करो ....... तेजी से ....... हाँ ...हाँ ... हाँ ....... वहीं पर ...... ऐसे ही दबाओ ......... मेरे बूब्स को ......... आह .... आह ...... आह ...... ओह ... जोर ........ से ....... चाटों मेरी ........ मेरी .... भगनसा ........ को ........ आहं ..... लूट ...... लो ....... मुझे ..... लूट ...लो ...... आह ..... ।
अपनी जिस्म की हवस मे मुझे कुछ होश ही नहीं रहा मैं क्या बोले जा रही हूँ नितिन की हरकतों ने मुझे बिल्कुल पागल कर दिया मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं बता नहीं सकती । नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार ओर भी तेज करदी थी और उसने मेरी योनि के दाने को अपने होंठों मे भरकर चूसना शुरू कर दिया मैं अपने चरमसुख पर कभी भी पहुँच सकती थी फिर मुझे अपने अंदर वोही जाना पहचाना सैलाब आता हुआ महसूस हुआ और एक कामुक लंबी आहं के साथ मेरी योनि ने ढेर सारा चुतरस छोड़ दिया नितिन ने अपनी उँगली मेरी योनि के अंदर से निकाल ली और मेरे बूब्स को भी छोड़ दिया और मेरी योनि से निकलने वाले सारे रस को अपना मुहँ वही लगाकर पी गया ।
मैं कितनी ही देर वहाँ ऐसे ही लेती हुई तेज -तेज साँसे लेती रही मेरी हवस का की आग अब बुझ चुकी थी और अब मुझे अपनी हालत देखकर शर्म आ रही नितिन भी अब मेरी योनि से हटकर खड़ा हो गया और अपना ट्रेक-सूट उठाकर पहनने लगा । मैं भी धीरे -2 अपनी जगह से उठी मेरा जिस्म पूरा थका हुआ लग रहा था और मैं पसीने से भीगी हुई थी । जब मुझे अपनी हालत का होश आया तो मैंने अपनी ब्रा को ठीक किया
और खड़े होकर अपनी पेन्टी और वॉक-पेंट्स ऊपर चढ़ा ली । सामने नितिन खड़ा होकर मुस्कुरा रहा वो मेरी हालत देखकर खुश हो रहा था और मैं उसके सामने सिर्फ ब्रा मे खड़ी होकर शर्मिंदा हो रही थी अपने जिस्म को उसकी नज़रों से बचाने के लिए मैंने उसकी ओर से घूम गई और अपनी पीठ उस ओर करके अपना वॉक-टॉप उठाकर पहहने लगी नितिन अभी भी पीछे से अपनी नजरे मेरी पीठ और कमर पर गड़ाएं हुए था । मैंने जल्दी -2 अपने कपड़े पहने और अपने शरीर पर लगी मिट्टी और घास कर तिनको को साफ करने लगी । मुझे वहाँ रुकने मे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी की मैं क्या बताऊ मैं जल्द से जल्द अपने घर जाना चाहती थी इसलिए अपने आप को सहज करके मैंने नितिन की ओर देखा वो पहले से ही मुझे देख रहा था ।
मैं - ये सब ठिक नहीं हो रहा नितिन ।
नितिन(अनजान बनते हुए ) - क्या पदमा ?
मैं - तुम सब जानते हो । ये सही नहीं तुम्हें मुझसे नहीं मिलना चाहिए , मैं एक शादीशुदा औरत हूँ और तुम भी शादीशुदा हो ।
नितिन (लापरवाही से )- तो क्या हुआ पदमा ? शादीशुदा लोग आपस मे मिल नहीं सकते क्या ?
मैं - तुम समझते क्यों नहीं नितिन ? अगर कुछ ऊँच - नीच हो गई तो तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर मैं कहीं की नहीं रहूँगी , इसलिए आज के बाद तुम मुझसे कभी मत मिलना और मेरे घर भी मत आना ।
नितिन मेरी बात सुनकर मेरे करीब आ गया और कहा -"तुम ज्यादा परेशान ना हो पदमा , कुछ नहीं होगा । "
मैं - नहीं नितिन ये सब गलत है और हमे इसे रोकना होगा ।
नितिन - पदमा मैं क्या करूँ तुम हो ही इतनी सुंदर तुम्हें देखते ही मैं अपने होश-हवाश खो देता हूँ ।
नितिन की बात सुनकर मैंने अपनी नजरे नीची करते हुए बोली - "तुम ये सब बातें ना कहो नितिन , बोहोत देर हो गई है अशोक मुझे ढूंढ रहे होंगे ।"
नितिन - ठीक है पर तुम्हें अपना प्रोमिस तो याद है ना ?
मैं - कौन सा प्रोमिस ?
नितिन - ये भी भूल गई , वही प्रोमिस जो तुमने अभी थोड़ी देर पहले मुझसे मजे लेते हुए किया ।
मैं ( थोड़ा गुस्से से ) - मजे लेते हुए क्या मतलब है तुम्हारा ?
नितिन - अरे तुम तो नाराज हो गई मैं तो मजाक कर रहा था मेरा मतलब उस फाइल से था वो तुम मुझे कब तक ला सकती हो ।
मैं - मुझे नहीं पता देखूँगी , वैसे तुम्हें वो क्यूँ चाहिए ?
नितिन - मेरे लिए वो फाइल बोहोत जरूरी है पदमा , एक वही जरिया है मेरे लिए शहर मे वापिस आने का ।
मैं - तो तुम वो फाइल अशोक से ही क्यों नहीं ले लेते ।
नितिन - नहीं पदमा , उसे तो इसकी खबर भी नहीं लगनी चाहिए वो इसे मुझे कभी देगा
मैं(हैरानी से ) - क्योँ ?
नितिन - क्योंकि मेरे यहाँ आने से उसके हाथ से ग्रुपहेड की पॉजिशन चली जाएगी । बस तुम मुझे वो फाइल ला दो पदमा मैं तुम्हें सब कुछ समझा दूंगा ।
मैं - ठीक है कोशिश करूंगी पर अभी मुझे जाना है देर हो रही है अशोक मुझे ढूंढ रहे होंगे ।
नितिन - हाँ मैं भी चलता हूँ मुझे भी देर हो रही है ।
मैं - रुको तुम अभी , मेरे जाने के थोड़ी देर बाद जाना अगर किसी ने हमे साथ मे निकलते हुए देख लिया तो गजब हो जाएगा ।
नितिन - तुम घबराओ मत पदमा , मैं ग्राउंड से नहीं जाऊँगा ।
मैं ( थोड़ी हैरानी से )- तो फिर कहाँ से ........ ?
नितिन - मैं बाग को पार करके सीधे पुरानी फाटक से निकलूँगा , वहीं मेरी बाइक खड़ी है ।
इतना कहकर नितिन जाने लगा अचानक मुझे कल वाली बात ध्यान आई और मैंने नितिन को टोकते हुए कहा - " नितिन ।"
मेरी आवाज सुनकर नितिन वापस मुड़ा पर कुछ बोला नहीं ।
मैं - क्या तुम कल मेरी गली मे किसी के घर आए थे ?
मेरी बात सुनकर नितिन ने पहले तो मुझे एक बार तिरछी निगाहों से देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोला - " फाइल तैयार रखना , मैं लेने आऊँगा । " और बस इतना कहकर तेजी से उन झाड़ियों से निकलकर भाग के अंदर भाग गया ।
मैं वहाँ अबोध सी ऐसे ही खड़ी रह गई फिर मुझे भी होश आया और मैं वहाँ उन झाड़ियों के बीच से धीरे -धीरे निकलने लगी झाड़ियों से निकलकर मैं बाग मे से होते हुए ग्राउंड पर पहुँची । अब तक सूरज भी पूरा निकल आया था मैंने छिपकर देखा ग्राउंड पूरा खाली था लोग घूमकर जा चुके थे । मैं जल्दी से ग्राउंड से अपने घर की ओर भागी । "देर बोहोत हो चुकी है, अशोक ऑफिस के लिए निकलने वाले होंगे " - इसका अंदाजा मुझे हो चुका था । मुझे इतनी देर से घर पर ना पाकर पता नही वो क्या-2 सवाल पूछेंगे ? इन सब सवालों को सोचते हुए मैं अपने घर पहुँची और गेट पर जाकर डॉर बेल बजाई थोड़ी देर बाद अशोक ने आकर दरवाजा खोला । मैं बोहोत हाफ रही थी , साँस चढ़ी हुई थी । मुझे देखते ही अशोक बोले - " अरे कहाँ रह गई थी तुम ? "
मैं (अपनी घबराहट छिपाते हुए ) - "जी वो बस आज पहला दिन था ना तो मुझे जाने मे देर हो गई और फिर वहाँ जाकर वक्त का पता ही नहीं चला । "
मेरे चेहरे पर कितने ही भाव एक साथ उमड़ रहे थे जिन्हे देखकर अशोक ने कहा - "चलो कोई बात नहीं आओ अंदर चलो तुम्हें तो बोहोत पसीना आया हुआ है लगता है आज बोहोत मेहनत की है । "
अशोक की बात सुनकर मैं थोड़ी घबरा गई अब मैं उन्हे क्या बताती की मैंने कहाँ मेहनत की है और अंदर आकर सीधे हॉल मे सोफ़े पर पसर गई । मुझे बोहोत थकान हो रह थी । अशोक - " अच्छा मैं चलता हूँ तुम अपना ध्यान रखना । " मैं अशोक की बात सुनकर सोफ़े से उठी और कहा - " रुकिए मैं आपका नाश्ता बना देती हूँ । "
अशोक - नहीं रहने दो , देर हो जाएगी । मैं ऑफिस मे कर लूँगा ।
इतना कहकर अशोक ने अपना ऑफिस-बेग उठाया और घर से चले गए । अशोक के जाने के बाद मैं वापस वहीं सोफ़े पर बैठ गई । मुझे आज इस बात का बोहोत दुख था की इस नितिन के कारण मैं अपने पति को नाश्ता भी ना करवा सकी , आज पहली बार मैं अपने पत्नी धर्म मे चूक गई । यही सब सोचते हुए मैं कितनी ही देर वहीं सोफ़े पर लेटी रही , और उस फाइल के बारे मे सोचने लगी जिसकी नितिन अभी बात कर रहा था "क्या अशोक ही नितिन के आउट ऑफ टाउन जाने का कारण है , क्या ग्रुप हेड बनने के लिए ही अशोक ,नितिन को यहाँ नहीं आने दे रहे जितना मैं अशोक को जानती हूँ उसके हिसाब से तो अशोक ऐसे नहीं है पर नितिन ने जो कुछ कहा वो भी झूठ नहीं लग रहा था पता नहीं क्या सच है क्या झूठ कुछ समझ नहीं आ रहा । " मैं इन्ही सब उलझनों मे उलझी थी ।
फिर जब पसीना सूख गया तो मैं अपने सोफ़े से उठकर बाथरूम की ओर गई , नीचे जमीन पर लेटने की वजह से मिट्टी के कण शरीर पर लगे हुए थे । मैं नहाना चाहती थी इसलिए बाथरूम मे जाकर मैंने तुरंत अपना वॉक सूट निकाल दिया और शावर खोलकर नहाने लगी ।
शावर की ताजी पानी की बुँदे मेरे जिस्म पर दमकने लगी और मैं उनका आनंद उठाते हुए अपनी आँखे बंद करके उनका मजा लेने लगी । नहाते हुए मेरे दिमाग मे कितनी ही बाते घूमने लगी जो मेरे साथ हुए आज और पिछले दिनों के वाक्यों को दोहरा रही थी । पता नहीं क्या खेल चल रहा था मेरे चारों ओर एक अनजान आदमी जो कहने को मेरे पति का बॉस है पर अपने पति से ज्यादा मैं उसे जानने लगी थी , एक 19 साल का जवान लड़का जिसे मैं पिछले 4 साल से जानती थी मेरे लिए वो नहीं रहा जो पहले हुआ करता था मेरे भाव उसके लिए बिल्कुल बदल चुके थे और सबसे आखिर मे एक 50 साल का टेलर जिसके हाथों का स्पर्श ही मेरी कामअग्नि को हवा देने के लिए काफी था और ये सब बस जनवरी की उस सुबह से शुरू हुआ जब मैं अपनी छत पर खड़ी होकर धूप सेक रही थी उसी दिन मैंने पहली बार नितिन को देखा था । ना जाने कब ये बाते सोचते हुए मैंने नहा लिया और फिर शावर बंद करके एक नई ब्रा और पेन्टी पहनने लगी क्योंकि पहले वाली पेन्टी तो पूरी चुतरस से भीगी हुई थी और ब्रा भी गंदी हो गई थी ।
अपने कपड़े पहनकर मैं बाथरूम से बाहर आई ।
नितिन के इस वार से तो मैं पागल ही हो गई मेरा पूरा बदन वासना की लहरों से काँपने लगा और मेरी योनि भी अब गीली होकर मचलने लगी , कब मेरे हाथों ने नितिन को अपनी बाहों मे जकड़ लिया मुझे खुद पता नहीं चला , फिर अचानक नितिन ने मुझे एक पल को मुझे खुद से अलग किया मैंने इसकी उम्मीद तो नितिन से बिल्कुल नहीं की थी मैंने अपनी हवस मे लाल हो चुकी आँखों से एक बार नितिन की ओर देखा और अगले ही पल नितिन ने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर तेजी से घूमा दिया और मेरे पीछे आकर मेरी गर्दन, कंधों पर तेजी से अपने होंठ रगड़ने लगा
उसकी इस हरकत ने आग मे घी का काम किया और मैं आहें भरने लगी बड़ी मुश्किल से मैंने अपने होंठ काटते हुए अपनी आहं को उन झाड़ियों मैं फेलने से रोका । मुझे ये भी डर था की कहीं कोई मेरी इन कामुक आंहों को सुन ना ले । नितिन के हाथ अब मेरे नितम्बों से हट गए थे पर अब वो मेरे पेट से होते हुए उस जगह आने लगे थे जहां का स्पर्श पाकर मैं अक्सर बेकाबू हो जाती और वो जगह थी मेरे 'बूब्स ' । पीछे खड़ा होने की वजह से नितिन का तना हुआ लिंग मुझे मेरे नितम्बों पर चुभने लगा और उसके हाथों ने आगे बढ़कर मेरे बूब्स को थाम लिया और उन्हे सहलाने लगे । अब नितिन मेरी गर्दन से चूमता हुआ मेरे कान तक आया और धीरे से उसे अपने होंठों मे भरकर चूसने लगा ।
सुबह के समय ठंड थी पर मेरा जिस्म वासना मे सुलगने लगा , बदन आग की भट्टी की तरह गरम हो गया । नितिन के हाथ अब मेरे बूब्स को धीरे-धीरे दबाने लगे और मेरी योनि भर-भरकर पानी छोड़ने लगी । फिर नितिन ने पीछे से मेरे कान से अपने होंठ हटाकर धीरे से मेरे कान मे कहा- "पदमा , शहद नीचे की ओर तुम्हारी पीठ पर भी फैल गया है उसे साफ करने के लिए मुझे तुम्हारा टॉप खोलना होगा ।" मुझे इस वक्त कुछ भी सूझ नहीं रहा था मैं बस जो हो रहा था होने देना चाहती थी मुझे कुछ ना कहता देख नितिन ने फिर बिना कोई सवाल कीये मेरे वॉक-टॉप की चैन को पीछे से नीचे कर दिया और बिना एक पल की देरी कीये अपने दोनों हाथों से उसे पकड़कर उतार दिया और वही जमीन पर फेंक दिया । टॉप के उतरते ही मेरे बूब्स पर सिर्फ ब्रा ही रह गई थी जो मेरे उन्नत बूब्स को बड़ी मुश्किल से थामे हुई थी नितिन के हाथों ने अब मेरे बूब्स को ब्रा के ऊपर से पकड़ लिया और अपने होंठों से मेरी पीठ को चूमते हुए उसके हाथ मेरे बूब्स को और भी दबाव के साथ मसलने लगे ।
मैं -आह ..... नितिन ..... नहीं ..... ये क्या ....... नाह ....... ?
नितिन ( एक पल को मेरी पीठ से अपने होंठ हटाते हुए ) - क्या हुआ पदमा ?
मैं - नितिन ....... .... आह ..... तुमने ..... टॉप .... नहीं ......... ओह ... ।
नितिन अब बातों के जवाब देने मे बिल्कुल दिलचस्प नहीं था उसने बिना कोई जवाब दिए मेरे बदन पर चुंबनों की झड़ी लगा दी और मैं उसके हर चुंबन के साथ मेरा जिस्म जलता हुआ अंगारे बरसाने लगा । नितिन के हाथ अब जोर-जोर से मेरे बूब्स का मान-मर्दन कर रहे थे और साथ ही साथ बीच-बीच मेरे कठोर हो चुके निप्पलस को भी मरोड़ने लगे । शरीर से शहद तो कब का साफ हो चुका था अब तो जो कुछ चल रहा था वो तो बस वासना का खेल था और मैं जानती थी के नितिन ये खेल अंत तक खेलना चाहता है पर मैं अभी ये नहीं होने दे सकती थी नितिन के हाथ मेरे बूब्स पर सख्त हो गए थे उन्हे मसलने लगे थे
और पिछे से उसका लिंग अब मेरे नितम्बों पर धक्के लगाने लगा था । मैंने अपनी हवस भारी आवाज मे नितिन से कहा - 'आह ..... नितिन ...... अब .... नहीं ..... बस ...... अब तो... शशशहद .... साफ हो ..... ओह ........ गया ......... है ...... अब ..... तुम ....... हट ....... जाओ ....... ।"
नितिन - बस थोड़ी देर और पदमा अभी कुछ हिस्सा बाकी है ।
मैं ( अपनी साँसे रोकती हुई ) - नहीं ...... नितिन ...आहं ........ अब ....... बस .......... करो ........ ना ह .......... कोई ... आह .... आ .... जाएगा ........ ।
नितिन ( बेफ़िक्री से) - यहाँ कोई नहीं आता पदमा , तुम बस मजा लो ।
मैं - नहीं .... नितिन .... प्लीज ....... आह ....... ।
मेरे इतना कहते ही नितिन ने मुझे पीछे से मजबूती से पकड़ा और मेरे दोनों पैर उठाकर नीचे गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर आ गया, मेरे साथ अचानक से हुई इस घटना से मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया मेरे कुछ बोलने से पहले ही नितिन ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और उन्हे जोर - जोर से चूसने लगा
ब्रा मे कैद मेरे उन्नत बूब्स उसकी नंगी छाती के नीचे दब गए । हवस की आग अब मुझ पर भी छा चुकी थी और अब मैं भी अपने को रोक नहीं पाई और नितिन के चुम्बन का जवाब अपने होंठों से देने लगी नितिन का एक हाथ मेरे बूब्स को पकड़े हुए था और उसे जोर -जोर से मसल रहा था और दूसरा हाथ नीचे जाकर मेरी पेंट्स मे घुसने की कोशिश कर रहा था उसके हाथ को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी और उसका हाथ मेरी पेंट्स से होते हुए नीचे मेरी पेन्टी पर पहुँच गया और उसके ऊपर से ही मेरी योनि को सहलाने लगा । अपनी योनि पर नितिन का हाथ जाते ही मैं उछल पड़ी और जोर से आहें भरने लगी,
मैं - आह ......नितिन ...... प्लीज ....... उसे ...... मत ..... छूओ ........ मैं मर ....नाह ........ जाऊँगी ......... प्लीज ....... ओह ....... नहीं ....... नहीं ........ ।"
पर नितिन मेरी कहाँ सुनने वाला था वो तो मेरी हर बात को अनसुना कर बस अपने काम मे लगा रहा योनि तो पहले से ही गीली थी नितिन के हाथ का स्पर्श मिलते ही वो पानी के साथ -साथ आग भी उगलने लगी कामुकता मैं मैंने अपने होंठ काट लिए और नितिन को जोर से अपनी बाहों मे कसकर उसकी पिठ पर अपने नाखून चुभा दिए ।
फिर नितिन नीचे की ओर आता हुआ मेरे बूब्स पर आया और बिना देरी किये मेरी ब्रा को ऊपर खिसका दिया और मेरे बूब्स को अपने मुहँ मे भरकर जोर -जोर से चूसने लगा ।
" आह .... नितिन ..... चूसो ...... इन्हे ..... जी ...... भरकर .......... हाँ ..... हाँ .....ये ..... तुम्हारे.......... ही है .............ओह ..... नितिन ........ । " मैं आहें भरते हुए बोलती गई । मेरी आहें सुन नितिन ओर जोश मे आ गया और मेरे बड़े -बड़े बूब्स को जितना हो सके अपने मुँह मे भरकर चूसने लगा नीचे से अब उसका हाथ भी मेरी योनि को मसलने लगा था । नितिन ने जी भरकर मेरे बूब्स का सारा दूध पिया वो पूरी शिद्दत के साथ कभी मेरे एक बूब्स को कभी दूसरे बूब्स को बिना साँस लिए चूसता गया बीच -2 मे वो मेरे निप्पलस को भी अपने होंठों मे भर लेता और उन्हे अपनी जीभ से छेड़ता । बूब्स से अपनी प्यास बुझा लेने के बाद वो उनको छोड़ नीचे मेरी नाभी पर आया और वहाँ पर चूमने चाटने लगा । नितिन ना सिर्फ मेरी नाभी को चूम रहा था बल्कि अब वो अपनी जीभ निकालकर मेरी नाभी मे घूमाने लगा था ।
बैचेनी मे मैं अपना सर इधर - उधर पटकने लगी नितिन को रोक पाना अब मेरे बस मे नहीं रहा था मैं अपनी वासना को कैसे भी मिटाना चाहती थी बस । मेरे जिस्म की वो हालत थी जो जल बिन मछली की होती है जैसे -जैसे नितिन नीचे आता गया मेरी हवस अपने परवान चढ़ती गई नितिन ने नीचे आकर मेरी वॉक-पेंट्स को अपने दोनों हाथों से पकड़ा और एक झटके मे नीचे खिंच दिया अब मैंरी योनि को उसके सामने आने से बस मेरी पेंटी ने रोका हुआ था । मैंने कभी सोचा भी नहीं था के एक दिन मैं अपने ही पति के बॉस के साथ यूँ झाड़ियों मे इस हालत मे होऊँगी शर्म से मैंने अपनी आँखे बंद करली और अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया अब किसी भी वक्त मेरी योनि नितिन के सामने आ सकती थी नितिन भी इस पल का इंतजार नहीं करना चाहता था और उसने बिना देर कीये मेरी पेन्टी को भी पकड़कर नीचे खेन्च दिया ।
" आह पदमा.... कितनी सुंदर चुत है तुम्हारी ......। "- नितिन मेरी योनि को देखते ही बोल पड़ा । उसकी बात सुनकर मैं शर्म से लाल हो गई पर कुछ बोल नहीं सकी । फिर नितिन आगे बोला - "पदमा .. तुम्हारी चुत तो रस से भीगी हुई है ... मैं ये रस पीना चाहता हूँ पदमा .. प्लीज मुझे ये रस पीने दो । "
"ये नितिन क्या बोले जा रहा है ये मुझे पागल करके छोड़ेगा ये मेरी योनि का चुतरस पीना चाहता है ऐसा तो कभी मेरे साथ किसी ने नहीं किया अब मैं क्या करूँ । "- मैंने मन मे सोचा । नितिन जिस बेबाकी के साथ ये सब बातें बोल रहा था उससे मेरी हवस की आग और भी बढ़ती जा रही थी , नितिन ने फिर से कहा - "बोलो ना पदमा ? क्या मैं ये रस पी लूँ । " मैं भी अब अपने जिस्म की आग को कैसे भी ठंडा करना चाहती थी इसलिए अपनी सभी सीमाएं और मर्यादा तोड़ते हुए नितिन से बोली - " आह ... हाँ .... पी .... लो ..... नितिन ..... अब ..... जल्दी करो ...... । " इसके बाद नितिन ने बिना कोई सवाल पूछे और बिना देरी कीये अपने होंठ मेरी योनि से लगा दिए , नितिन के होंठ अपनी योनि पर पड़ते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं हवा मे उड़ रहीं हूँ मेरे जिस्म मे चींटियाँ रेंगने लगी और मैं तड़पते हुए आहें भरने लगी नितिन के होंठ अब तेजी से चल रहे थे और वो अपनी जबान से मेरी योनि के दाने वो चाटने लगा ।
मेरे लिए ये अनुभव बिल्कुल नया था आज से पहले कभी किसी ने मेरी योनि को नहीं चाटा था मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था की इसमे इतना मज़ा आता है । और अब मैं इस मजे मे डूब जाना चाहती थी इस वक्त मुझे किसी की परवाह नहीं थी ना अपने पति की , ना उनकी इज्जत की और ना ही अपनी मर्यादाओ की मुझे बस इतना पता था कि यहाँ एक मर्द है जो मुझे वो सुख दे रहा है जो मुझे मेरे पति ने कभी नहीं दिया और शायद दे भी ना पाए । नितिन ने मेरी योनि चूसने के साथ - साथ अपनी एक उँगली भी मेरी योनि मे घुसाने की कोशिश करने लगा और फिर उसने एक पल के लिए अपने होंठ मेरी योनि से हटायें और अपनी उँगली को उसमे घूसा दिया । " आह .......... ओह .......... आह ........... "- मैं जोर से आहें भरते हुए तड़पने लगी नितिन ने अपने एक हाथ को ऊपर कर मेरे बूब्स को पकड़ लिया और उन्हे मन-मर्जी से मरोड़ने लगा । योनि मे उँगली घुसाते हुए नितिन बोला - "पदमा तुम्हारी चुत तो बोहोत कसी हुई है , लगता है अशोक तुम्हारी अच्छे से चुदाई नहीं करता । "नितिन की बात का मैं कोई जवाब नही देना चाहती थी मैं बस लेते हुए उसकी हरकतों का मज़ा उठाने लगी । पर नितिन तो मुझसे सब कुछ सुनना चाहता था ना जाने उसे इसमे क्या मजा आ रहा था उसने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे तेज करते हुए मुझसे फिर से पुछा - " बोलो ना पदमा , क्या नितिन तुम्हारी अच्छे से चुदाई नहीं करता । " अपनी योनि मे तेजी से हुए इस वार से मैं मचल उठी और नितिन से कहा - " नहीं ........... आह ........ अब उनकी ........ बात ...... ना करो .........नितिन ......... ओह ....... प्लीज ...... थोड़ा ... धीरे ..... करो .......ओह ....... । " मेरे इतना कहने पर नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे ओर तेज करदी । मैं तो पहले से वासना मे तड़प रही थी नितिन के ऊँगली की रफ्तार तेज होने से मैं ओर भी कामोत्तेजित होकर जमीन पर आहें भरते हुए अपने हाथ पैर ईधर -उधर मारने लगी । नितिन ने मुझे पुकारा - " पदमा !" मैंने आहें भरते हुए अपनी काँपती आवाज मे कहा -" आह ...... ओह ...... हाँ ..... बोलो .।" नितिन - "मुझे तुमसे कुछ काम है ।"
मैं - आहं ....... हाँ ........ जल्दी बोलो .....नितिन ...... ।
नितिन - कल अशोक एक फाइल लेकर घर आया होगा ।
मैं - हाँ ....... .... आह ...... ........ ओह ...... करो ..... ओर ...... करो ........ ।
नितिन - वो फाइल मुझे चाहिए , दोगी ना पदमा ।
मैं - आहं ...... तुम्हें .... वो ..... क्यूँ ...... चाहिए ........ ओह .......
नितिन - मेरे लिए वो फाइल बोहोत जरूरी है पदमा, उस फाइल के मिलने के बाद ही मैं वापस शहर आ पाऊँगा , बोलो तुम मेरे लिए उसे लाओगी ना ।
मैं - आह .... पर ..... वो ... तो .... अशोक के ..... पास ........ ओह ..... है ......, मेरे पास ...... नहीं ....... ।
नितिन - तो तुम्हें अशोक के पास से उसे मेरे लिए लाना होगा । लाओगी ना ..... ?
नितिन की इस बात का मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस वहीं लेटे-2 आहें भरती रही । मैंने सोचा "पता नहीं इस नितिन के बच्चे को वो फाइल क्यों चाहिए और वो भी इस समय ये उसकी बात क्योँ कर रहा है । " मुझे कोई जवाब ना देता देख नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार मेरी योनि मे धीमी करदी और बोला - " बताओ पदमा .. ? दोगी ना मुझे वो फाइल .... बोलो नहीं तो मैं रुक जाऊँगा .... । "
मैं कुछ भी बर्दास्त कर सकती थी पर इस वक्त नितिन का रुकना नहीं । मैं बोहोत प्यासी थी और मैं अपने चरम पर पहुँचने के बोहोत करीब थी और अब मेरे लिए रुकना संभव नहीं था मैंने नितिन की बात का जवाब देते हुए कहा - "आह ..... हाँ ... लाऊँगी ....... ओह ........ बस ........अब रुको ........ मत नितिन ........ आह ....... करते ....... रहो ......... आहं .... मैं ..... अब ..... रुक .... नहीं .... सकती ...... ।"
नितिन को अपना जवाब मिल गया था और अब वो फिर से अपने छोड़े हुए काम मे लग गया । उसने फिर से अपने होंठ मेरी योनि पर लगाकर चूसना शुरू किया और अपने एक हाथ से मेरे बूब्स को पकड़कर जोर - जोर से उन्हे मसलने लगा और दूसरे हाथ की उँगली को तेजी से मेरी योनि के अंदर -बाहर करने लगा और मैं एक बार फिर मेरी आहे उन झाड़ियों मे गूंजने लगी मैंने अपने हाथ नितिन के सर के बालों मे उलझा दिए और उसके सर को अपनी योनि पर दबाने लगी नितिन भी समझ गया था की मैं झडने के बोहोत करीब हूँ इसलिए उसने भी मेरी योनि को जमकर चूसना शुरू कर दिया और अपनी ऊँगली को मेरी योनि ने डालकर अंदर जोर-जोर से घुमाने लगा ।
मैं - आहं .... हाँ ..... नितिन ...... ओर करो ....... तेजी से ....... हाँ ...हाँ ... हाँ ....... वहीं पर ...... ऐसे ही दबाओ ......... मेरे बूब्स को ......... आह .... आह ...... आह ...... ओह ... जोर ........ से ....... चाटों मेरी ........ मेरी .... भगनसा ........ को ........ आहं ..... लूट ...... लो ....... मुझे ..... लूट ...लो ...... आह ..... ।
अपनी जिस्म की हवस मे मुझे कुछ होश ही नहीं रहा मैं क्या बोले जा रही हूँ नितिन की हरकतों ने मुझे बिल्कुल पागल कर दिया मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं बता नहीं सकती । नितिन ने अपनी उँगली की रफ्तार ओर भी तेज करदी थी और उसने मेरी योनि के दाने को अपने होंठों मे भरकर चूसना शुरू कर दिया मैं अपने चरमसुख पर कभी भी पहुँच सकती थी फिर मुझे अपने अंदर वोही जाना पहचाना सैलाब आता हुआ महसूस हुआ और एक कामुक लंबी आहं के साथ मेरी योनि ने ढेर सारा चुतरस छोड़ दिया नितिन ने अपनी उँगली मेरी योनि के अंदर से निकाल ली और मेरे बूब्स को भी छोड़ दिया और मेरी योनि से निकलने वाले सारे रस को अपना मुहँ वही लगाकर पी गया ।
मैं कितनी ही देर वहाँ ऐसे ही लेती हुई तेज -तेज साँसे लेती रही मेरी हवस का की आग अब बुझ चुकी थी और अब मुझे अपनी हालत देखकर शर्म आ रही नितिन भी अब मेरी योनि से हटकर खड़ा हो गया और अपना ट्रेक-सूट उठाकर पहनने लगा । मैं भी धीरे -2 अपनी जगह से उठी मेरा जिस्म पूरा थका हुआ लग रहा था और मैं पसीने से भीगी हुई थी । जब मुझे अपनी हालत का होश आया तो मैंने अपनी ब्रा को ठीक किया
और खड़े होकर अपनी पेन्टी और वॉक-पेंट्स ऊपर चढ़ा ली । सामने नितिन खड़ा होकर मुस्कुरा रहा वो मेरी हालत देखकर खुश हो रहा था और मैं उसके सामने सिर्फ ब्रा मे खड़ी होकर शर्मिंदा हो रही थी अपने जिस्म को उसकी नज़रों से बचाने के लिए मैंने उसकी ओर से घूम गई और अपनी पीठ उस ओर करके अपना वॉक-टॉप उठाकर पहहने लगी नितिन अभी भी पीछे से अपनी नजरे मेरी पीठ और कमर पर गड़ाएं हुए था । मैंने जल्दी -2 अपने कपड़े पहने और अपने शरीर पर लगी मिट्टी और घास कर तिनको को साफ करने लगी । मुझे वहाँ रुकने मे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी की मैं क्या बताऊ मैं जल्द से जल्द अपने घर जाना चाहती थी इसलिए अपने आप को सहज करके मैंने नितिन की ओर देखा वो पहले से ही मुझे देख रहा था ।
मैं - ये सब ठिक नहीं हो रहा नितिन ।
नितिन(अनजान बनते हुए ) - क्या पदमा ?
मैं - तुम सब जानते हो । ये सही नहीं तुम्हें मुझसे नहीं मिलना चाहिए , मैं एक शादीशुदा औरत हूँ और तुम भी शादीशुदा हो ।
नितिन (लापरवाही से )- तो क्या हुआ पदमा ? शादीशुदा लोग आपस मे मिल नहीं सकते क्या ?
मैं - तुम समझते क्यों नहीं नितिन ? अगर कुछ ऊँच - नीच हो गई तो तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर मैं कहीं की नहीं रहूँगी , इसलिए आज के बाद तुम मुझसे कभी मत मिलना और मेरे घर भी मत आना ।
नितिन मेरी बात सुनकर मेरे करीब आ गया और कहा -"तुम ज्यादा परेशान ना हो पदमा , कुछ नहीं होगा । "
मैं - नहीं नितिन ये सब गलत है और हमे इसे रोकना होगा ।
नितिन - पदमा मैं क्या करूँ तुम हो ही इतनी सुंदर तुम्हें देखते ही मैं अपने होश-हवाश खो देता हूँ ।
नितिन की बात सुनकर मैंने अपनी नजरे नीची करते हुए बोली - "तुम ये सब बातें ना कहो नितिन , बोहोत देर हो गई है अशोक मुझे ढूंढ रहे होंगे ।"
नितिन - ठीक है पर तुम्हें अपना प्रोमिस तो याद है ना ?
मैं - कौन सा प्रोमिस ?
नितिन - ये भी भूल गई , वही प्रोमिस जो तुमने अभी थोड़ी देर पहले मुझसे मजे लेते हुए किया ।
मैं ( थोड़ा गुस्से से ) - मजे लेते हुए क्या मतलब है तुम्हारा ?
नितिन - अरे तुम तो नाराज हो गई मैं तो मजाक कर रहा था मेरा मतलब उस फाइल से था वो तुम मुझे कब तक ला सकती हो ।
मैं - मुझे नहीं पता देखूँगी , वैसे तुम्हें वो क्यूँ चाहिए ?
नितिन - मेरे लिए वो फाइल बोहोत जरूरी है पदमा , एक वही जरिया है मेरे लिए शहर मे वापिस आने का ।
मैं - तो तुम वो फाइल अशोक से ही क्यों नहीं ले लेते ।
नितिन - नहीं पदमा , उसे तो इसकी खबर भी नहीं लगनी चाहिए वो इसे मुझे कभी देगा
मैं(हैरानी से ) - क्योँ ?
नितिन - क्योंकि मेरे यहाँ आने से उसके हाथ से ग्रुपहेड की पॉजिशन चली जाएगी । बस तुम मुझे वो फाइल ला दो पदमा मैं तुम्हें सब कुछ समझा दूंगा ।
मैं - ठीक है कोशिश करूंगी पर अभी मुझे जाना है देर हो रही है अशोक मुझे ढूंढ रहे होंगे ।
नितिन - हाँ मैं भी चलता हूँ मुझे भी देर हो रही है ।
मैं - रुको तुम अभी , मेरे जाने के थोड़ी देर बाद जाना अगर किसी ने हमे साथ मे निकलते हुए देख लिया तो गजब हो जाएगा ।
नितिन - तुम घबराओ मत पदमा , मैं ग्राउंड से नहीं जाऊँगा ।
मैं ( थोड़ी हैरानी से )- तो फिर कहाँ से ........ ?
नितिन - मैं बाग को पार करके सीधे पुरानी फाटक से निकलूँगा , वहीं मेरी बाइक खड़ी है ।
इतना कहकर नितिन जाने लगा अचानक मुझे कल वाली बात ध्यान आई और मैंने नितिन को टोकते हुए कहा - " नितिन ।"
मेरी आवाज सुनकर नितिन वापस मुड़ा पर कुछ बोला नहीं ।
मैं - क्या तुम कल मेरी गली मे किसी के घर आए थे ?
मेरी बात सुनकर नितिन ने पहले तो मुझे एक बार तिरछी निगाहों से देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोला - " फाइल तैयार रखना , मैं लेने आऊँगा । " और बस इतना कहकर तेजी से उन झाड़ियों से निकलकर भाग के अंदर भाग गया ।
मैं वहाँ अबोध सी ऐसे ही खड़ी रह गई फिर मुझे भी होश आया और मैं वहाँ उन झाड़ियों के बीच से धीरे -धीरे निकलने लगी झाड़ियों से निकलकर मैं बाग मे से होते हुए ग्राउंड पर पहुँची । अब तक सूरज भी पूरा निकल आया था मैंने छिपकर देखा ग्राउंड पूरा खाली था लोग घूमकर जा चुके थे । मैं जल्दी से ग्राउंड से अपने घर की ओर भागी । "देर बोहोत हो चुकी है, अशोक ऑफिस के लिए निकलने वाले होंगे " - इसका अंदाजा मुझे हो चुका था । मुझे इतनी देर से घर पर ना पाकर पता नही वो क्या-2 सवाल पूछेंगे ? इन सब सवालों को सोचते हुए मैं अपने घर पहुँची और गेट पर जाकर डॉर बेल बजाई थोड़ी देर बाद अशोक ने आकर दरवाजा खोला । मैं बोहोत हाफ रही थी , साँस चढ़ी हुई थी । मुझे देखते ही अशोक बोले - " अरे कहाँ रह गई थी तुम ? "
मैं (अपनी घबराहट छिपाते हुए ) - "जी वो बस आज पहला दिन था ना तो मुझे जाने मे देर हो गई और फिर वहाँ जाकर वक्त का पता ही नहीं चला । "
मेरे चेहरे पर कितने ही भाव एक साथ उमड़ रहे थे जिन्हे देखकर अशोक ने कहा - "चलो कोई बात नहीं आओ अंदर चलो तुम्हें तो बोहोत पसीना आया हुआ है लगता है आज बोहोत मेहनत की है । "
अशोक की बात सुनकर मैं थोड़ी घबरा गई अब मैं उन्हे क्या बताती की मैंने कहाँ मेहनत की है और अंदर आकर सीधे हॉल मे सोफ़े पर पसर गई । मुझे बोहोत थकान हो रह थी । अशोक - " अच्छा मैं चलता हूँ तुम अपना ध्यान रखना । " मैं अशोक की बात सुनकर सोफ़े से उठी और कहा - " रुकिए मैं आपका नाश्ता बना देती हूँ । "
अशोक - नहीं रहने दो , देर हो जाएगी । मैं ऑफिस मे कर लूँगा ।
इतना कहकर अशोक ने अपना ऑफिस-बेग उठाया और घर से चले गए । अशोक के जाने के बाद मैं वापस वहीं सोफ़े पर बैठ गई । मुझे आज इस बात का बोहोत दुख था की इस नितिन के कारण मैं अपने पति को नाश्ता भी ना करवा सकी , आज पहली बार मैं अपने पत्नी धर्म मे चूक गई । यही सब सोचते हुए मैं कितनी ही देर वहीं सोफ़े पर लेटी रही , और उस फाइल के बारे मे सोचने लगी जिसकी नितिन अभी बात कर रहा था "क्या अशोक ही नितिन के आउट ऑफ टाउन जाने का कारण है , क्या ग्रुप हेड बनने के लिए ही अशोक ,नितिन को यहाँ नहीं आने दे रहे जितना मैं अशोक को जानती हूँ उसके हिसाब से तो अशोक ऐसे नहीं है पर नितिन ने जो कुछ कहा वो भी झूठ नहीं लग रहा था पता नहीं क्या सच है क्या झूठ कुछ समझ नहीं आ रहा । " मैं इन्ही सब उलझनों मे उलझी थी ।
फिर जब पसीना सूख गया तो मैं अपने सोफ़े से उठकर बाथरूम की ओर गई , नीचे जमीन पर लेटने की वजह से मिट्टी के कण शरीर पर लगे हुए थे । मैं नहाना चाहती थी इसलिए बाथरूम मे जाकर मैंने तुरंत अपना वॉक सूट निकाल दिया और शावर खोलकर नहाने लगी ।
शावर की ताजी पानी की बुँदे मेरे जिस्म पर दमकने लगी और मैं उनका आनंद उठाते हुए अपनी आँखे बंद करके उनका मजा लेने लगी । नहाते हुए मेरे दिमाग मे कितनी ही बाते घूमने लगी जो मेरे साथ हुए आज और पिछले दिनों के वाक्यों को दोहरा रही थी । पता नहीं क्या खेल चल रहा था मेरे चारों ओर एक अनजान आदमी जो कहने को मेरे पति का बॉस है पर अपने पति से ज्यादा मैं उसे जानने लगी थी , एक 19 साल का जवान लड़का जिसे मैं पिछले 4 साल से जानती थी मेरे लिए वो नहीं रहा जो पहले हुआ करता था मेरे भाव उसके लिए बिल्कुल बदल चुके थे और सबसे आखिर मे एक 50 साल का टेलर जिसके हाथों का स्पर्श ही मेरी कामअग्नि को हवा देने के लिए काफी था और ये सब बस जनवरी की उस सुबह से शुरू हुआ जब मैं अपनी छत पर खड़ी होकर धूप सेक रही थी उसी दिन मैंने पहली बार नितिन को देखा था । ना जाने कब ये बाते सोचते हुए मैंने नहा लिया और फिर शावर बंद करके एक नई ब्रा और पेन्टी पहनने लगी क्योंकि पहले वाली पेन्टी तो पूरी चुतरस से भीगी हुई थी और ब्रा भी गंदी हो गई थी ।
अपने कपड़े पहनकर मैं बाथरूम से बाहर आई ।