Update 14
नहाने से मेरे बाल गीले हो गए थे तो उन्हे सुखाने के लिए मे बालकनी मे आकर खड़ी हो गई और वहाँ की धूप मे अपने बाल सुखाने लगी ।
नहाकर मेरे तन मन को कुछ शान्ति मिली और मैं हॉल मे आकर सोफ़े पर बैठ गई
मेरा शरीर शान्त था पर मन मे सुकून के नाम की जगह नहीं थी आज सुबह की नितिन के साथ हुई घटना ने मेरे चित्त को बैचेन कर रखा था और उसके साथ -2 वो सब बातें भी मेरे जहन मे थी जो वरुण और गुप्ता जी के साथ हुई थी , खासकर वरुण का ध्यान बार बार मेरे दिमाग मे घूम रहा था , रह-रह कर मुझे कल शाम का वो द्रश्य याद आ रहा था "जब मैंने अपनी छत से घूमते हुए गली मे नितिन को वरुण के घर जाते देखा आखिर ऐसा क्या है जो मुझसे छिपाया जा रहा है वरुण का नितिन के साथ क्या रिश्ता हो सकता है ? मुझे तो ये भी नहीं पता की कल शाम जिसे मैंने वरुण के घर जाते देखा वो नितिन ही था या नहीं , कहीं शाम के अंधेरे मे मुझसे देखने मे कोई भूल तो नही हो गई । हो सकता है जिसे मैंने देखा था वो नितिन ना होकर कोई ओर हो , वैसे भी मैं भी कहाँ उसका चेहरा स्पष्ट रूप से देख पाई थी ? शाम के अंधेरे मे मुझसे गलती भी हो सकती है । पर अगर वो नितिन नहीं था तो आज सुबह जब मैंने नितिन से पुछा कि क्या वो कल मेरी गली मे आया था तो उसने कोई जवाब दिए बगैर बात हँसी मे क्यों टाल दी ? पता नहीं क्या सच है क्या झूठ मेरी तो कुछ समझ नहीं आता ।" वरुण पर भी मेरा विश्वाश कुछ डगमगाने लगा था एक तो उसकी हरकते ही आज-कल कुछ ऐसी थी के मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही पहले वाला वरुण है और दूसरा आज वो मुझे ग्राउंड मे भी नहीं दिखा जबकि कल उसने ही मुझे वॉक पर चलने के लिए खुद इन्वाइट किया था और फिर वो खुद ही नहीं आया और नितिन वहाँ पहले से ही मेरा इंतज़ार कर था उसे कैसे पता चला कि मैं आज ग्राउंड मे वॉक पर जाने वाली हूँ , कहीं वरुण ने ही तो उसे नहीं बता दिया अगर ऐसा है तो इसका सीधा मतलब यही है कि वरुण और नितिन का आपस मे कुछ ना कुछ कनेक्शन है जो मेरे लिए और मेरे पति अशोक के लिए घातक साबित हो सकता है इसलिए मुझे अब हर एक कदम पर सावधानी बरतनी होगी मैं इन लोगों के हाथ का खिलौना नहीं बन सकती कैसे भी करके मुझे सच का पता लगाना ही होगा अगर जैसा मे सोच रही हूँ सब कुछ वैसा ही है तो अब मुझे खुद इसके पीछे का मकसद जानना होगा पर कैसे ? " कितनी ही देर तक मैं इन्ही विचारों मे खोई हुई सोफ़े पर बैठी रही फिर फोन की घंटी से मेरा ध्यान टूटा , मैंने अपना मोबाईल उठाकर देखा तो वो अशोक की कॉल थी । मैंने कॉल रिसीव किया -
मैं - हैलो !
अशोक - हाँ हैलो पदमा !
मैं - आप ऑफिस पहुँच गए क्या ?
अशोक - हाँ बस अभी-अभी आया हूँ , क्या कर रही हो ?
मैं - बस कुछ नहीं अभी नहाकर आई हूँ ।
अशोक - हम्म । अच्छा सुनो मैंने टेलेफ़ोन कम्पनी मे बात की थी वो कह रहे थे कि वो आज अपने किसी सर्विस बॉय को भेज देंगे हमारी रेडलाइन को ठीक करने के लिए । वो 11-12 बजे तक आ जाएगा तुम उसे टेलेफ़ोन दिखा देना । ठीक है ।
मैं - जी ठीक है ।
अशोक - और सुनो पदमा ! उसे कोई फीस नहीं देनी है वो कम्पनी की जिम्मेदारी पर है ।
मैं - ओके जी , मैं समझ गई ।
अशोक - अरे वो मैं जानता हूँ मैंने बोहोत समझदार बीवी पाई है ।
मैं अशोक की बात सुनकर फोन पर ही थोड़ी मुस्कुरा दी और बोली - " हम्म अच्छा बस - 2 अब ज्यादा मस्का मत मारों । "
अशोक - मस्का नहीं है बीवी साहिबा , सच बोल रहा हूँ मेरे सारे दोस्त यही कहते है कि 'अशोक की बीवी का जवाब नहीं '।
मैं - हाँ , झूठ बोलने मे तो आपका कोई जवाब नहीं है ।
अशोक - अरे झूठ नहीं मेरी बीवी जान एकदम सच बोल रहा हूँ चाहे तो आज शाम को एक से पूछ भी लेना ।
मैं ( थोड़ी हैरानी से ) - आज शाम को ? किससे ?
अशोक - हाँ , आज शाम को रफीक घर आ रहा है ।
( रफीक मेरे पति अशोक के एक पुराने दोस्त थे जब मैं शादी करके शहर आई उसके लगभग 1.5 साल बाद अशोक , रफीक को हमारे घर लेके आए थे तब उन्होंने मुझे रफीक से मिलवाया था और तब से अब तक अक्सर रफीक हमारे घर आया करते थे । रफीक पैशे से एक डॉक्टर थे , जैसा अशोक ने मुझसे कहा था मगर मैं कभी उनके क्लिनिक नहीं गई , अशोक ने बताया था कि वो मनोवेज्ञानिक डॉक्टर है । जब कभी भी मैं रफीक से मिली वो हमेशा मुझे एक सुलझे हुए इंसान ही लगे बात करने मे , मिलने मे बिल्कुल एक सज्जन व्यक्ति की तरह । बस एक ही कमी लगती थी और वो थी कि जब भी वो हमारे घर आते थे अक्सर अशोक के साथ छत पर बैठकर शराब पिया करते थे उनकी ये बात मुझे बोहोत अखरती थी । आज काफी दिनों के बाद रफीक के हमारे घर आने की बात सुनकर मुझे भी थोड़ी खुशी हुई । )
मैं - ओह , अच्छा । किस टाइम आएंगे वो ?
अशोक - बस मेरे ऑफिस के खत्म होने के बाद दोनों साथ मे ही आएंगे ।
मैं - ओके ठीक है ।
अशोक - अच्छा चलों रखता हूँ फोन । बाय ।
मैं - बाय ।
फिर अशोक ने फोन रख दिया
उनके फोन रखने के बाद मैं अपने घर के टेलेफ़ोन ( रेडलाइन ) के पास गई जो पिछले 1 महीने से खराब था । मैंने अशोक से कई बार कहा भी कि इसे ठीक करवा दो, पर वो भी अपने काम मे इतने बिजी थे कि उनका भी समय नहीं लगा , लेकिन आज आखिरकार ये काम भी निपट जाएगा । मैंने एक बार के लिए टेलेफ़ोन के रिसीवर को उठाया वो अभी भी डेड था । मैंने फिर से उसे नीचे रख दिया और अपने घर के काम मे लग गई । सब काम खत्म करने के बाद मुझे ध्यान आया की "छत पर कुछ कपड़े है ,जो मैंने कल सूखने के लिए डाले थे अब मुझे वो ले आने चाहिए " ऐसा सोचकर मैं अपने घर की छत पर चली गई । छत का वातावरण मुझे हमेशा ही मनमोहक लगता था, वहाँ की खुली हवा और सुबह की मीठी-2 धूप मन को प्रफुल्लित कर देती । आज भी छत पर आकर मेरा मन वहीं घूमते रहने का करने लगा , मैं वहीं छत पर बैठ गई ओर उस मीठी धूप के लिए अपनी बाहें फैला दी ।
फिर थोड़ी देर बाद मैंने अपने कपड़े लिए और उन्हे लेकर नीचे आ गई ।
मैंने कपड़ों को अलमारी मे रखने के इरादे से अपने बेडरूम मे आकर अपनी अलमारी खोली और उसमे कपड़ों को सलीके से रखने लगी । कपड़े अलमारी मे रखने के बाद जैसे ही उसे बंद करने के लिए मैंने अपने हाथ चालये , अचानक मेरे मन मे उसी फ़ाइल का ध्यान आ गया जो रात अशोक ने मुझे रखने के लिए दी थी और जिसकी कल सुबह नितिन बात कर रहा था । मेरे मन मे उस फाइल को एक बार फिर से देखने की इच्छा होने लगी , मुझे भी लगा एक बार तो देखना ही चाहिए कि आखिर इस फाइल मे ऐसा क्या है जो नितिन और अशोक दोनों ही इसके लिए इतने फिक्रमंद है , इसलिए अपने मन की उत्सुकता को शान्त करने के लिए मैंने अलमारी का लॉकर खोलकर वो फाइल निकाली और वहीं बेडपर बैठकर उसे समझने की कोशिश करने लगी ।
फाइल को ध्यान से देखने के बाद भी मुझे उसके बारे मे कुछ खास जानकारी नहीं मिल सकी , सिर्फ इतना ही पता चल पाया की वो कुछ सरकारी और गैर-सरकारी दस्तावेज है किसी कम्पनी के बारे मे , जो देखने से काफी जरुरी भी लग रहे थे , पर फिर भी मैं ये नहीं जान सकी के इस फाइल का नितिन के यहाँ आने से क्या ताल्लुक है । नितिन तो बोल रहा था कि अशोक उसे फाइल नहीं देंगे क्योंकि वो नहीं चाहते कि वापस आकर उनके ग्रुप-हेड की पोस्ट छीन ले , पर सवाल ये था की क्या नितिन जो बोल रहा है उसमे कुछ सच्चाई है भी या नहीं ।" अशोक से मेरी शादी को 4 साल हो चुके थे और इन 4 सालों मे मैंने कुछ भी ऐसा तो नहीं देखा था जिससे ये लगे की अशोक कोई बुरे आदमी है जो अपने फायदे के लिए दूसरों का बुरा चाहता हो । " नितिन पर तो मुझे बिल्कुल भरोसा नहीं था उसकी तो शुरुवात ही झुठ से हुई थी , जो भी हो मुझे सच को जानना ही होगा , " मैं इसी उधेड़बुन मे बैठी थी ।
ऐकाक डॉर बेल बजी और मैं अपने ख्यालों से बाहर निकली ,मैंने घड़ी मे टाइम देखा तो 11:15 बज रहे थे । मैंने अंदाजा लगा लिया की ये जरूर टेलेफ़ोन वाला होगा और मैं अपने बेड से उठी और उस फाइल को जल्दी-2 अलमारी मे रखकर दरवाजा खोलने के लिए , गेट की ओर बढ़ी ।
गेट खोला तो देखा सामने ब्लू टी-शर्ट मे एक 20-22 साल का लड़का खड़ा था , सूरत देखने से तो वो लड़का काफी मासूम सा लग रहा था । उसके हाथ मे एक बॉक्स था , उसमे उसके टूल्स रहे होंगे शायद । मेरे गेट खोलने के बाद से ही वो मुझे देख रहा था पर उसका ध्यान मेरी नेवल रिंग पर था जो मैंने आज सुबह ही पहनी थी ।
फिर उसने कहा - " नमस्ते मैडम । "
मैं - नमस्ते । तुम ???.....
" वो सर ने बुलाया था आपके टेलेफ़ोन मे कुछ खराबी है शायद । " उसने कहा और फिर चुप हो गया । मैं उसकी बात समझ गई और बोली - " अरे हाँ हाँ .. आओ , अंदर आओ । " इतना कहकर मैं अंदर आ गई
और मेरे पीछे-2 वो लड़का भी अंदर आ गया । मैं उसे लेकर हॉल मे आई और टेलेफ़ोन के पास ले गई ।
मैं - यही है , पिछले 1 महीने से बंद है ।
" एक महीना .. अपने पहले शिकायत क्यों नहीं की ? " उसने थोड़ी हैरानी से कहा ।
मैं - बस क्या कहे टाइम ही नहीं लगा । अब तुम इसे चेक कर लो एक बार और कुछ चाहिए हो तो बता देना । मैं यही हूँ सामने कीचेन मे ।
उसने मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया - " जी ठीक है । " और अपने काम मे लग गया । मैं भी कीचेन मे जाकर अपने दोपहर के खाने के लिए कुछ बनाने लगी ।
खाना बनाते हुए मेरी नजर उस लड़के पर गई जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा मैं ये देखकर हैरान रह गई कि वो पहले से ही मुझे घूर रहा था । मुझे अपनी ओर देखता पाकर उसे अपनी चोरी पकड़े जाने का एहसास हुआ और वो सकपका गया , मुझसे नजरे चुराते हुए वो फिर से अपने काम मे व्यस्त होने का दिखावा करने लगा । उसकी इस हरकत से मेरी हंसी छूट गई और मैं धीरे से वहीं कीचेन मे मुस्कुरा दी ।
उसके बाद भी मैंने एक बात नोटिस की , कि जब भी उसे मौका मिलता वो चोरी छुपे मुझ पर अपनी नजरे फिरा देता ये सिलसिला तब-तक चला जब-तक मैं पानी का ग्लास लेकर खुद उसके पास नहीं गई । मैंने उसके पास जाकर उसे कहा - " हो गया क्या ? "मुझे एकदम से आपने इतने पास देखकर वो सकपका गया और थोड़ी घबराहट सी की आवाज मे बोला - " जी .. जी .. मैडम बस हो गया । " उसकी ऐसी हालत देखकर मेरे होंठों पर फिर से मुस्कान छा गई ।
मैंने उसे पानी का ग्लास थमाया और वहीं खड़ी होकर उसका काम देखने लगी , उसे सताने मे मुझे भी एक अजीब सा मजा आ रहा था । पानी पीते हुए भी उसकी नजरे मेरे मादक जिस्म का दर्शन कर रही थी उसने तेजी के साथ पानी पिया और फिर टेलेफ़ोन के वायर को लगाने लगा । मैंने ग्लास उसके हाथ से लिया और इस दौरान मैंने जानबूझकर अपनी उंगलियों का स्पर्श उसके हाथ को कराया , जिसने उसके माथे पर पसीने को छलका दिया , वो काफी घबराया हुआ सा लग रहा था , शायद पहली बार किसी महिला के इतने करीब आया था या मुझे अजनबी समझकर थोड़ा घबराया हुआ था । उसने जल्दी-2 टेलेफ़ोन की वायर लगाई और कहा - " अब आप कोई नंबर डायल करके देखिए । " मैंने टेलेफ़ोन के रिसीवर को उठाया और अपने ही सेल फोन का नंबर डायल किया
, तुरंत ही मेरे मोबाईल पर रिंग बज गई इसका मतलब साफ था के टेलेफ़ोन ठीक हो गया है । मैंने उस लड़के से मुस्कुराते हुए कहा - " हम्म , अब ये ठीक हो गया है , थैंक्स । " मुझे मुस्कुराता देखकर उसने भी स्माइल के साथ जवाब दिया - " योर वेलकम मैम । अब मैं चलता हूँ ।" फिर वो जाने लगा , मैंने उसे पीछे से टोका - " सुनो । "
वह पलटा और बोला - " जी मैम ? "
अचानक से ना जाने क्यूँ मुझे एक शरारत सूझी मैं उसके करीब आने लगी और धीरे से उसके आगे पैर फिसलने का ड्रामा करते हुए अपनी साड़ी का पल्लू नीचे ढलाक दिया ।
पल्लू के मेरे बूब्स से थोड़ा हटते ही मेरे ब्लाउज मे बंधे भारी -भरकम गोल गोल चुचे उस नौजवान के सामने आ टपके , वो तो पहले से मेरे हुस्न का दीवाना बना हुआ था मेरे उन्नत बूब्स की एक झलक को पाते ही उसकी आँखों मे एक चमक उभर आई जिसे मैंने अपनी आँखों से बखूबी देखा । थोड़ा संभलते हुए मैं सीधी हुई और अपना पल्लू ठीक किया और उससे बोली -
मैं - " तुम्हारा नाम क्या है ? "
वो थोड़ी स्माइल देकर बोला - " विवेक ! " उसका नाम सुनकर मेरे जहन मे कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई , इसका कारण ये था कि ये नाम मैंने पहले भी सुना हुआ था । मैंने एक टक उसको देखा और आगे कहा - " विवेक , दोपहर हो गई है खाना खाओगे ?" मेरे निमंत्रण को सुनकर उसका चेहरा खिल गया आखिर जिस औरत को वो इतने समय से घूर रहा था अगर उसके साथ खाने को मिल जाए तो और क्या चाहिए उसे ? उसने एक बार अपनी घड़ी मे देखा तो उसका चेहरा उतर गया । मैंने पुछा - " क्या हुआ विवेक ?" उसने अपना ध्यान अपनी घड़ी से हटाया और कहने लगा - " सॉरी मैडम , पर मुझे आगे भी एक कस्टमर के घर जाना है खाना खाने रुका तो बोहोत लेट हो जाएगा । " मैंने उसकी बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा - " कोई बात नहीं विवेक , तुम अपना काम खत्म करो । इट्स ऑल राइट । "
उसके बाद उसने अपना बॉक्स उठाया और चला गया । मैंने भी उसके पीछे जाकर दरवाजा बंद किया और फिर अंदर हॉल मे आकर सोफ़े पर बैठ गई और अपने द्वारा अभी विवेक के साथ की हुई बातों को याद करके हंसने लगी ।
"ये तुझे क्या हो गया था पदमा ! तू कब से इतनी बोल्ड हो गई कि इस तरह से एक लड़के के साथ ठिठोली करने लगी । "- मैंने मन मे सोचा और खुद ही मुस्कुराने लगी । मैंने ऐसा पहले कभी नहीं किया था , पर आज ना जाने क्यूँ मुझे उस नौजवान को सताने मे एक अजीब सा मजा आ रहा था ,पता नहीं ये समय की नियति थी या मेरे साथ हुई पिछली घटनाओ का प्रभाव , पर मेरे लिए ये बिल्कुल नया अनुभव था, "उस लड़के को अपने हुस्न से सताने मे मुझे इसलिए भी मजा आ रहा था क्योंकि शायद मैं ये भी देखना चाहती थी कि क्या मैं खुद भी किसी मर्द को विचलित कर सकती हूँ या नहीं और इसका जवाब भी मैं जान गई थी साथ ही मुझे ये भी पता चल गया था कि कैसे मैं नितिन और वरुण के बीच की सच्चाई जान सकती हूँ और वो तरीका है अपने हुस्न के जाल का इस्तेमाल, एक औरत का जिस्म किसी भी मर्द के ईमान को डगमगा सकता है वैसे भी नितिन , गुप्ता जी , वरुण और आज विवेक की नज़रों और हरकतों ने मुझे ये तो बता ही दिया था कि मेरे कामुक बदन की आँच किसी भी मर्द को अपनी ओर खिंच सकती है , अब तक मेरे जिस जिस्म से ये लोग खेल रहे थे अब मैं खुद इसके इस्तेमाल से उनके बीच की सच्चाई का पता लगाऊँगी लेकिन मुझे उन्हे ये बिल्कुल नहीं लगने देना कि मुझे उन पर शक है और साथ ही मुझे अपनी सीमाओं और मर्यादा का भी ध्यान रखना होगा कहीं ऐसा ना हो की उन्हे उकसाने के चक्कर मे मुझसे कोई ऐसी भूल ना हो जाए जिससे मेरी दुनिया ही लूट जाए , मुझे बस ये पता करना है कि क्या कल जिस आदमी को मैंने गली मे देखा था वो नितिन ही था या नहीं ? और एक चीज ये कि क्या नितिन को ऑफिस से निकलवाने मे अशोक का कोई हाथ है या नहीं ? मुझे वैसे तो नितिन से कोई हमदर्दी नहीं है , पर मैं किसी गलत काम मे भागीदारी नहीं बन सकती अगर अशोक ने ऐसा किया है तो वो गलत है और मुझे वो फाइल नितिन को देनी ही होगी "। खैर मैं अपनी सोच से बाहर निकली और कीचेन मे जाकर अपने लिए खाना तैयार किया मुझे बोहोत भूख लग रही थी । खाना खाकर मुझे थोड़ी नींद सी आने लगी इसलिए मैं सीधे अपने बेडरूम मे गई और बेड पर लेट गई , लेटे हुए मुझे ज्यादा देर नहीं हुई थी तभी मुझे नींद आ गई और मे उसमे खोती चली गई ।
मैं 3 बजे तक सोती रही जब आँखे खुली तो मैं अपने अपने बिस्तर से उठी ओर बाहर हॉल मे आकर टीवी देखने लगी ,
कोई खास प्रोग्राम तो टीवी मे आया हुआ था नहीं , तो मैं बस गानों को ही सुनने लगी । वक्त कब बीता पता ही नहीं चला और 3:30 बज गए इतने मे ही वरुण ने आकर मेरे घर की डॉर बेल बजा दी । डॉर बेल की आवाज से मैं अपने गानों की दुनिया से बाहर आई और टीवी बंद करके गेट खोलने चली गई
गेट खोला तो सामने वरुण ही खड़ा था वो मुस्कुराते हुए मुझे ही देख रहा था या यूँ कहूँ के मेरे बदन पर अपनी नजरे जमाये हुए था । मुझे देखकर वो बोला - " हैलो भाभी !" मैंने भी उसकी बात के जवाब मे उसे हैलो कहा और अंदर आने को बोला । वरुण अंदर जाने लगा और मैं वही खड़ी होकर दरवाजा बंद करने लगी , दरवाजा बंद करते हुए मैंने देखा बाहर का मौसम काफ़ी ठंडा था , आसमान मे बादल भी मँडरा रहे थे , थोड़ी-2 हवा भी चल रही थी । मैंने दरवाजा बंद किया और अंदर आ गई वरुण पहले से ही अंदर सोफ़े पर बैठ था मुझे आता देखकर उसने मुस्कुराते हुए अपनी खुशी जाहिर की ।
मैंने उसे अपनी किताबे खोलने के लिए कहा ओर उसके लिए पानी लेने कीचेन मे चली गई । जब तक मैं पानी का ग्लास लेकर आई वरुण बैठा हुआ अपनी किताब पढ़ था , वरुण से नितिन के बारे मे जानकारी पता लगाने के लिए मैंने अपना पहला पाँसा फेंकने की योजना बनाई और उसे पानी देते हुए जानबूझकर अपना आँचल थोड़ा सा नीचे गिरा दिया पर इस बार मैंने उसे उठाने मे कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई बल्कि बोहोत ही आराम से वरुण को अपने भारी चूचों के दर्शन करवाए,
वरुण ने पानी का ग्लास उठा तो लिया पर वो उसे पीना भूलकर मेरे कसे हुए बूब्स की गहरी घाटियों मे खो गया उसके होंठ खुल गए जैसे अभी लपककर मेरे चूचों को मुहँ मे भर लेंगे और फिर कभी नहीं छोड़ेंगे । अपने इस बोल्ड अंदाज से गुदगुदी तो मेरे मन मे भी हो रही थी और मेरे बूब्स कुछ ज्यादा ही तन गए , मैंने धीरे से अपना आँचल संभाला और उससे अपने बूब्स को ढका । वरुण भी अपने भ्रम से निकला और पानी के ग्लास को अपने होंठों से लगाकर पीने लगा । पानी पीकर उसने ग्लास वहीं टेबल पर रख दिया मैं उसके सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई
और उसकी एक किताब उठाकर पढ़ने लगी वरुण की नजरें मुझ पर ही थी उसने मुझे किताब पढ़ते हुए देखा तो बोला - " भाभी आज कौन सा टॉपिक पढ़ना है ? "
मैंने वरुण की ओर देखा -
मैं - आज अकाउंट्स के कुछ प्रश्न हल करेंगे तुम अपनी कॉपी खोलो ।
वरुण - जी ।
फिर वरुण ने अपनी कॉपी मे मेरे द्वारा बोले गए प्रश्न लिखे और उन्हे सुलझाने बैठ गया , वरुण सवालों मे उलझा था और मैं अपने सवालों का जवाब उससे सुनना चाहती थी मैंने आखिर उससे पूछ ही लिया -
मैं - वरुण !
वरुण ने बिना कुछ बोले मेरी ओर देखा तो मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई - " कल शाम तुम्हारे घर कोई आया था क्या ? "
वरुण ने मेरे सवाल पर कुछ सोचते हुए जवाब दिया - " कल शाम ...... हाँ याद आया , कल शाम हमारे घर इंसयोरेंस कंपनी वाला आया था , वो आपको तो पता ही है ना 4 साल पहले पापा की डेथ के बाद उनके इंसयोरेंस से ही हमारा खर्च चलता है तो वो उसी के सिलसिले मे मम्मी से कुछ बात करने आया था , पर आपने उसे कहाँ देखा ?
मैं ( थोड़ी सचेत होती हुई ) - अरे कल शाम छत पर घूमते हुए मेरी नजर पड़ गई , मुझे लगा पता नहीं कौन होगा ? इतने दिनों बाद तुम्हारे घर एक अनजान शख्स को आता देखकर ऐसे ही पूछने का मन किया ।
वरुण ने हाँ मे सर हिलाया और फिर से अपनी कॉपी मे देखने लगा , पर मैं वरुण के जवाब से संतुष्ट नहीं थी इसकी वजह ये थी के वरुण तो कह रहा था कि कल शाम उसके घर आने वाला आदमी बीमा कंपनी से था तो उसके पास कोई दस्तावेज , बेग कुछ तो होना चाहिए था पर जहां तक मुझे याद है उसके हाथ मे ऐसा कुछ नहीं था और वो इतनी जल्दी आकर चला कैसे गया ? मैंने वरुण की ओर देखा तो वो एक सवाल पर अटका हुआ था । " है तो बिल्कुल निकम्मा एक सवाल भी नहीं कर सकता अभी भी इसके दिमाग मे मेरे बूब्स की तस्वीरे ही घूम रही होंगी , जरूर ये मुझे सोफ़े पर ब्रा और पेन्टी मे कल्पना कर रहा होगा "
- मैंने मन मे सोचा ।
मैंने उसे कहा - "क्या हुआ हुआ वरुण ? हुआ नहीं क्या ?
वरुण - भाभी ये सवाल समझ नहीं आ रहा , आप समझा दो प्लीज ।
इतना कहकर वरुण ने अपनी कॉपी मेरी ओर बढ़ा दी ,मैंने उसके हाथ से कॉपी ली और उसे सामने की टेबल पर रखकर समझाने लगी । प्रश्न को हल करने के लिए मुझे थोड़ा झुककर उसे समझना पड़ा जिससे मेरे बूब्स की गहरी घाटी एक बार फिर उसकी आँखों के सामने आ गई ।
वरुण की पैनी निगाहे वही मेरे बूब्स पर चिपक गई और वो बस अपनी आँखों से ही उनका रसपान करने लगा । मैं ये जानती थी कि वरुण का ध्यान सवाल समझने मे नहीं बल्कि मेरे बदन की गुत्थियों को सुलझाने मे है पर मैं भी उसे उकसाने मे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी । यही मेरी योजना थी के वरुण को अपनी सुंदरता के जाल मे फाँसकर उससे सारी सच्चाई निकलवाई जाए , इसलिए मैं भी बिना किसी झिझक के वरुण को अपने दोनों खरबूजों के दर्शन करने दे रही थी । वरुण की निगाहों की तपन मेरे दिल मे भी हलचल मचा रही थी पर मैं खुद को उसके सवाल मे उलझे रहने का नाटक कर रही थी , सच तो ये था कि ना तो मेरा ध्यान वरुण को पढ़ाने मे था और ना ही वरुण को इन किताबी सवालों मे कोई दिलचस्पी थी वो तो बस मेरी सुंदरता और मेरे जिस्म के उभारों मे ही खोया हुआ था , जब सवाल पूरा हो गया तो मैं सीधी हो गई और वरुण की आँखों के सामने से उसका पसंदीदा नजारा हट गया जिससे वो उदास सा हो गया और मेरे चेहरे पर हँसी आ गई । कुछ देर बाद वरुण के जाने का वक्त हो गया, वरुण जाने के लिए उठा और अपनी किताबें समेटने लगा , वरुण के खड़े होने से उसकी पेंट मे बना उसके लिंग का ऊभार भी साफ नजर आ रहा था
जिसे देखकर मैं समझ गई के वरुण को वश मे करने की मेरी चाल कामयाब रही । जब वरुण जाने लगा तो मैं भी उसे गेट तक छोड़ने के लिए उसके पीछे-2 चल दी । वरुण ने आगे बढ़कर गेट खोला और बाहर का नज़ारा देखकर रुक गया ।
बाहर का मौसम बोहोत अच्छा था , ठंडी -2 हवा चल रही थी आकाश मे काले बादल छाए हुए थे सामने ग्राउंड मे चारों और पेड़-पौधे हवा मे लहर रहे थे । हम दोनों घर के अंदर थे लेकिन हवा के झोंके हम तक भी आ रहे थे । अचानक वरुण मेरी ओर मुड़ा और बोला - " भाभी , देखो ना कितना अच्छा मौसम है बाहर का ।
मैं - हाँ वरुण लगता है आज बारिश होगी ।
वरुण- चलिए थोड़ी देर ग्राउंड मे घूमते है , मन फ्रेश हो जाएगा ।
नहाकर मेरे तन मन को कुछ शान्ति मिली और मैं हॉल मे आकर सोफ़े पर बैठ गई
मेरा शरीर शान्त था पर मन मे सुकून के नाम की जगह नहीं थी आज सुबह की नितिन के साथ हुई घटना ने मेरे चित्त को बैचेन कर रखा था और उसके साथ -2 वो सब बातें भी मेरे जहन मे थी जो वरुण और गुप्ता जी के साथ हुई थी , खासकर वरुण का ध्यान बार बार मेरे दिमाग मे घूम रहा था , रह-रह कर मुझे कल शाम का वो द्रश्य याद आ रहा था "जब मैंने अपनी छत से घूमते हुए गली मे नितिन को वरुण के घर जाते देखा आखिर ऐसा क्या है जो मुझसे छिपाया जा रहा है वरुण का नितिन के साथ क्या रिश्ता हो सकता है ? मुझे तो ये भी नहीं पता की कल शाम जिसे मैंने वरुण के घर जाते देखा वो नितिन ही था या नहीं , कहीं शाम के अंधेरे मे मुझसे देखने मे कोई भूल तो नही हो गई । हो सकता है जिसे मैंने देखा था वो नितिन ना होकर कोई ओर हो , वैसे भी मैं भी कहाँ उसका चेहरा स्पष्ट रूप से देख पाई थी ? शाम के अंधेरे मे मुझसे गलती भी हो सकती है । पर अगर वो नितिन नहीं था तो आज सुबह जब मैंने नितिन से पुछा कि क्या वो कल मेरी गली मे आया था तो उसने कोई जवाब दिए बगैर बात हँसी मे क्यों टाल दी ? पता नहीं क्या सच है क्या झूठ मेरी तो कुछ समझ नहीं आता ।" वरुण पर भी मेरा विश्वाश कुछ डगमगाने लगा था एक तो उसकी हरकते ही आज-कल कुछ ऐसी थी के मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही पहले वाला वरुण है और दूसरा आज वो मुझे ग्राउंड मे भी नहीं दिखा जबकि कल उसने ही मुझे वॉक पर चलने के लिए खुद इन्वाइट किया था और फिर वो खुद ही नहीं आया और नितिन वहाँ पहले से ही मेरा इंतज़ार कर था उसे कैसे पता चला कि मैं आज ग्राउंड मे वॉक पर जाने वाली हूँ , कहीं वरुण ने ही तो उसे नहीं बता दिया अगर ऐसा है तो इसका सीधा मतलब यही है कि वरुण और नितिन का आपस मे कुछ ना कुछ कनेक्शन है जो मेरे लिए और मेरे पति अशोक के लिए घातक साबित हो सकता है इसलिए मुझे अब हर एक कदम पर सावधानी बरतनी होगी मैं इन लोगों के हाथ का खिलौना नहीं बन सकती कैसे भी करके मुझे सच का पता लगाना ही होगा अगर जैसा मे सोच रही हूँ सब कुछ वैसा ही है तो अब मुझे खुद इसके पीछे का मकसद जानना होगा पर कैसे ? " कितनी ही देर तक मैं इन्ही विचारों मे खोई हुई सोफ़े पर बैठी रही फिर फोन की घंटी से मेरा ध्यान टूटा , मैंने अपना मोबाईल उठाकर देखा तो वो अशोक की कॉल थी । मैंने कॉल रिसीव किया -
मैं - हैलो !
अशोक - हाँ हैलो पदमा !
मैं - आप ऑफिस पहुँच गए क्या ?
अशोक - हाँ बस अभी-अभी आया हूँ , क्या कर रही हो ?
मैं - बस कुछ नहीं अभी नहाकर आई हूँ ।
अशोक - हम्म । अच्छा सुनो मैंने टेलेफ़ोन कम्पनी मे बात की थी वो कह रहे थे कि वो आज अपने किसी सर्विस बॉय को भेज देंगे हमारी रेडलाइन को ठीक करने के लिए । वो 11-12 बजे तक आ जाएगा तुम उसे टेलेफ़ोन दिखा देना । ठीक है ।
मैं - जी ठीक है ।
अशोक - और सुनो पदमा ! उसे कोई फीस नहीं देनी है वो कम्पनी की जिम्मेदारी पर है ।
मैं - ओके जी , मैं समझ गई ।
अशोक - अरे वो मैं जानता हूँ मैंने बोहोत समझदार बीवी पाई है ।
मैं अशोक की बात सुनकर फोन पर ही थोड़ी मुस्कुरा दी और बोली - " हम्म अच्छा बस - 2 अब ज्यादा मस्का मत मारों । "
अशोक - मस्का नहीं है बीवी साहिबा , सच बोल रहा हूँ मेरे सारे दोस्त यही कहते है कि 'अशोक की बीवी का जवाब नहीं '।
मैं - हाँ , झूठ बोलने मे तो आपका कोई जवाब नहीं है ।
अशोक - अरे झूठ नहीं मेरी बीवी जान एकदम सच बोल रहा हूँ चाहे तो आज शाम को एक से पूछ भी लेना ।
मैं ( थोड़ी हैरानी से ) - आज शाम को ? किससे ?
अशोक - हाँ , आज शाम को रफीक घर आ रहा है ।
( रफीक मेरे पति अशोक के एक पुराने दोस्त थे जब मैं शादी करके शहर आई उसके लगभग 1.5 साल बाद अशोक , रफीक को हमारे घर लेके आए थे तब उन्होंने मुझे रफीक से मिलवाया था और तब से अब तक अक्सर रफीक हमारे घर आया करते थे । रफीक पैशे से एक डॉक्टर थे , जैसा अशोक ने मुझसे कहा था मगर मैं कभी उनके क्लिनिक नहीं गई , अशोक ने बताया था कि वो मनोवेज्ञानिक डॉक्टर है । जब कभी भी मैं रफीक से मिली वो हमेशा मुझे एक सुलझे हुए इंसान ही लगे बात करने मे , मिलने मे बिल्कुल एक सज्जन व्यक्ति की तरह । बस एक ही कमी लगती थी और वो थी कि जब भी वो हमारे घर आते थे अक्सर अशोक के साथ छत पर बैठकर शराब पिया करते थे उनकी ये बात मुझे बोहोत अखरती थी । आज काफी दिनों के बाद रफीक के हमारे घर आने की बात सुनकर मुझे भी थोड़ी खुशी हुई । )
मैं - ओह , अच्छा । किस टाइम आएंगे वो ?
अशोक - बस मेरे ऑफिस के खत्म होने के बाद दोनों साथ मे ही आएंगे ।
मैं - ओके ठीक है ।
अशोक - अच्छा चलों रखता हूँ फोन । बाय ।
मैं - बाय ।
फिर अशोक ने फोन रख दिया
उनके फोन रखने के बाद मैं अपने घर के टेलेफ़ोन ( रेडलाइन ) के पास गई जो पिछले 1 महीने से खराब था । मैंने अशोक से कई बार कहा भी कि इसे ठीक करवा दो, पर वो भी अपने काम मे इतने बिजी थे कि उनका भी समय नहीं लगा , लेकिन आज आखिरकार ये काम भी निपट जाएगा । मैंने एक बार के लिए टेलेफ़ोन के रिसीवर को उठाया वो अभी भी डेड था । मैंने फिर से उसे नीचे रख दिया और अपने घर के काम मे लग गई । सब काम खत्म करने के बाद मुझे ध्यान आया की "छत पर कुछ कपड़े है ,जो मैंने कल सूखने के लिए डाले थे अब मुझे वो ले आने चाहिए " ऐसा सोचकर मैं अपने घर की छत पर चली गई । छत का वातावरण मुझे हमेशा ही मनमोहक लगता था, वहाँ की खुली हवा और सुबह की मीठी-2 धूप मन को प्रफुल्लित कर देती । आज भी छत पर आकर मेरा मन वहीं घूमते रहने का करने लगा , मैं वहीं छत पर बैठ गई ओर उस मीठी धूप के लिए अपनी बाहें फैला दी ।
फिर थोड़ी देर बाद मैंने अपने कपड़े लिए और उन्हे लेकर नीचे आ गई ।
मैंने कपड़ों को अलमारी मे रखने के इरादे से अपने बेडरूम मे आकर अपनी अलमारी खोली और उसमे कपड़ों को सलीके से रखने लगी । कपड़े अलमारी मे रखने के बाद जैसे ही उसे बंद करने के लिए मैंने अपने हाथ चालये , अचानक मेरे मन मे उसी फ़ाइल का ध्यान आ गया जो रात अशोक ने मुझे रखने के लिए दी थी और जिसकी कल सुबह नितिन बात कर रहा था । मेरे मन मे उस फाइल को एक बार फिर से देखने की इच्छा होने लगी , मुझे भी लगा एक बार तो देखना ही चाहिए कि आखिर इस फाइल मे ऐसा क्या है जो नितिन और अशोक दोनों ही इसके लिए इतने फिक्रमंद है , इसलिए अपने मन की उत्सुकता को शान्त करने के लिए मैंने अलमारी का लॉकर खोलकर वो फाइल निकाली और वहीं बेडपर बैठकर उसे समझने की कोशिश करने लगी ।
फाइल को ध्यान से देखने के बाद भी मुझे उसके बारे मे कुछ खास जानकारी नहीं मिल सकी , सिर्फ इतना ही पता चल पाया की वो कुछ सरकारी और गैर-सरकारी दस्तावेज है किसी कम्पनी के बारे मे , जो देखने से काफी जरुरी भी लग रहे थे , पर फिर भी मैं ये नहीं जान सकी के इस फाइल का नितिन के यहाँ आने से क्या ताल्लुक है । नितिन तो बोल रहा था कि अशोक उसे फाइल नहीं देंगे क्योंकि वो नहीं चाहते कि वापस आकर उनके ग्रुप-हेड की पोस्ट छीन ले , पर सवाल ये था की क्या नितिन जो बोल रहा है उसमे कुछ सच्चाई है भी या नहीं ।" अशोक से मेरी शादी को 4 साल हो चुके थे और इन 4 सालों मे मैंने कुछ भी ऐसा तो नहीं देखा था जिससे ये लगे की अशोक कोई बुरे आदमी है जो अपने फायदे के लिए दूसरों का बुरा चाहता हो । " नितिन पर तो मुझे बिल्कुल भरोसा नहीं था उसकी तो शुरुवात ही झुठ से हुई थी , जो भी हो मुझे सच को जानना ही होगा , " मैं इसी उधेड़बुन मे बैठी थी ।
ऐकाक डॉर बेल बजी और मैं अपने ख्यालों से बाहर निकली ,मैंने घड़ी मे टाइम देखा तो 11:15 बज रहे थे । मैंने अंदाजा लगा लिया की ये जरूर टेलेफ़ोन वाला होगा और मैं अपने बेड से उठी और उस फाइल को जल्दी-2 अलमारी मे रखकर दरवाजा खोलने के लिए , गेट की ओर बढ़ी ।
गेट खोला तो देखा सामने ब्लू टी-शर्ट मे एक 20-22 साल का लड़का खड़ा था , सूरत देखने से तो वो लड़का काफी मासूम सा लग रहा था । उसके हाथ मे एक बॉक्स था , उसमे उसके टूल्स रहे होंगे शायद । मेरे गेट खोलने के बाद से ही वो मुझे देख रहा था पर उसका ध्यान मेरी नेवल रिंग पर था जो मैंने आज सुबह ही पहनी थी ।
फिर उसने कहा - " नमस्ते मैडम । "
मैं - नमस्ते । तुम ???.....
" वो सर ने बुलाया था आपके टेलेफ़ोन मे कुछ खराबी है शायद । " उसने कहा और फिर चुप हो गया । मैं उसकी बात समझ गई और बोली - " अरे हाँ हाँ .. आओ , अंदर आओ । " इतना कहकर मैं अंदर आ गई
और मेरे पीछे-2 वो लड़का भी अंदर आ गया । मैं उसे लेकर हॉल मे आई और टेलेफ़ोन के पास ले गई ।
मैं - यही है , पिछले 1 महीने से बंद है ।
" एक महीना .. अपने पहले शिकायत क्यों नहीं की ? " उसने थोड़ी हैरानी से कहा ।
मैं - बस क्या कहे टाइम ही नहीं लगा । अब तुम इसे चेक कर लो एक बार और कुछ चाहिए हो तो बता देना । मैं यही हूँ सामने कीचेन मे ।
उसने मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया - " जी ठीक है । " और अपने काम मे लग गया । मैं भी कीचेन मे जाकर अपने दोपहर के खाने के लिए कुछ बनाने लगी ।
खाना बनाते हुए मेरी नजर उस लड़के पर गई जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा मैं ये देखकर हैरान रह गई कि वो पहले से ही मुझे घूर रहा था । मुझे अपनी ओर देखता पाकर उसे अपनी चोरी पकड़े जाने का एहसास हुआ और वो सकपका गया , मुझसे नजरे चुराते हुए वो फिर से अपने काम मे व्यस्त होने का दिखावा करने लगा । उसकी इस हरकत से मेरी हंसी छूट गई और मैं धीरे से वहीं कीचेन मे मुस्कुरा दी ।
उसके बाद भी मैंने एक बात नोटिस की , कि जब भी उसे मौका मिलता वो चोरी छुपे मुझ पर अपनी नजरे फिरा देता ये सिलसिला तब-तक चला जब-तक मैं पानी का ग्लास लेकर खुद उसके पास नहीं गई । मैंने उसके पास जाकर उसे कहा - " हो गया क्या ? "मुझे एकदम से आपने इतने पास देखकर वो सकपका गया और थोड़ी घबराहट सी की आवाज मे बोला - " जी .. जी .. मैडम बस हो गया । " उसकी ऐसी हालत देखकर मेरे होंठों पर फिर से मुस्कान छा गई ।
मैंने उसे पानी का ग्लास थमाया और वहीं खड़ी होकर उसका काम देखने लगी , उसे सताने मे मुझे भी एक अजीब सा मजा आ रहा था । पानी पीते हुए भी उसकी नजरे मेरे मादक जिस्म का दर्शन कर रही थी उसने तेजी के साथ पानी पिया और फिर टेलेफ़ोन के वायर को लगाने लगा । मैंने ग्लास उसके हाथ से लिया और इस दौरान मैंने जानबूझकर अपनी उंगलियों का स्पर्श उसके हाथ को कराया , जिसने उसके माथे पर पसीने को छलका दिया , वो काफी घबराया हुआ सा लग रहा था , शायद पहली बार किसी महिला के इतने करीब आया था या मुझे अजनबी समझकर थोड़ा घबराया हुआ था । उसने जल्दी-2 टेलेफ़ोन की वायर लगाई और कहा - " अब आप कोई नंबर डायल करके देखिए । " मैंने टेलेफ़ोन के रिसीवर को उठाया और अपने ही सेल फोन का नंबर डायल किया
, तुरंत ही मेरे मोबाईल पर रिंग बज गई इसका मतलब साफ था के टेलेफ़ोन ठीक हो गया है । मैंने उस लड़के से मुस्कुराते हुए कहा - " हम्म , अब ये ठीक हो गया है , थैंक्स । " मुझे मुस्कुराता देखकर उसने भी स्माइल के साथ जवाब दिया - " योर वेलकम मैम । अब मैं चलता हूँ ।" फिर वो जाने लगा , मैंने उसे पीछे से टोका - " सुनो । "
वह पलटा और बोला - " जी मैम ? "
अचानक से ना जाने क्यूँ मुझे एक शरारत सूझी मैं उसके करीब आने लगी और धीरे से उसके आगे पैर फिसलने का ड्रामा करते हुए अपनी साड़ी का पल्लू नीचे ढलाक दिया ।
पल्लू के मेरे बूब्स से थोड़ा हटते ही मेरे ब्लाउज मे बंधे भारी -भरकम गोल गोल चुचे उस नौजवान के सामने आ टपके , वो तो पहले से मेरे हुस्न का दीवाना बना हुआ था मेरे उन्नत बूब्स की एक झलक को पाते ही उसकी आँखों मे एक चमक उभर आई जिसे मैंने अपनी आँखों से बखूबी देखा । थोड़ा संभलते हुए मैं सीधी हुई और अपना पल्लू ठीक किया और उससे बोली -
मैं - " तुम्हारा नाम क्या है ? "
वो थोड़ी स्माइल देकर बोला - " विवेक ! " उसका नाम सुनकर मेरे जहन मे कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई , इसका कारण ये था कि ये नाम मैंने पहले भी सुना हुआ था । मैंने एक टक उसको देखा और आगे कहा - " विवेक , दोपहर हो गई है खाना खाओगे ?" मेरे निमंत्रण को सुनकर उसका चेहरा खिल गया आखिर जिस औरत को वो इतने समय से घूर रहा था अगर उसके साथ खाने को मिल जाए तो और क्या चाहिए उसे ? उसने एक बार अपनी घड़ी मे देखा तो उसका चेहरा उतर गया । मैंने पुछा - " क्या हुआ विवेक ?" उसने अपना ध्यान अपनी घड़ी से हटाया और कहने लगा - " सॉरी मैडम , पर मुझे आगे भी एक कस्टमर के घर जाना है खाना खाने रुका तो बोहोत लेट हो जाएगा । " मैंने उसकी बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा - " कोई बात नहीं विवेक , तुम अपना काम खत्म करो । इट्स ऑल राइट । "
उसके बाद उसने अपना बॉक्स उठाया और चला गया । मैंने भी उसके पीछे जाकर दरवाजा बंद किया और फिर अंदर हॉल मे आकर सोफ़े पर बैठ गई और अपने द्वारा अभी विवेक के साथ की हुई बातों को याद करके हंसने लगी ।
"ये तुझे क्या हो गया था पदमा ! तू कब से इतनी बोल्ड हो गई कि इस तरह से एक लड़के के साथ ठिठोली करने लगी । "- मैंने मन मे सोचा और खुद ही मुस्कुराने लगी । मैंने ऐसा पहले कभी नहीं किया था , पर आज ना जाने क्यूँ मुझे उस नौजवान को सताने मे एक अजीब सा मजा आ रहा था ,पता नहीं ये समय की नियति थी या मेरे साथ हुई पिछली घटनाओ का प्रभाव , पर मेरे लिए ये बिल्कुल नया अनुभव था, "उस लड़के को अपने हुस्न से सताने मे मुझे इसलिए भी मजा आ रहा था क्योंकि शायद मैं ये भी देखना चाहती थी कि क्या मैं खुद भी किसी मर्द को विचलित कर सकती हूँ या नहीं और इसका जवाब भी मैं जान गई थी साथ ही मुझे ये भी पता चल गया था कि कैसे मैं नितिन और वरुण के बीच की सच्चाई जान सकती हूँ और वो तरीका है अपने हुस्न के जाल का इस्तेमाल, एक औरत का जिस्म किसी भी मर्द के ईमान को डगमगा सकता है वैसे भी नितिन , गुप्ता जी , वरुण और आज विवेक की नज़रों और हरकतों ने मुझे ये तो बता ही दिया था कि मेरे कामुक बदन की आँच किसी भी मर्द को अपनी ओर खिंच सकती है , अब तक मेरे जिस जिस्म से ये लोग खेल रहे थे अब मैं खुद इसके इस्तेमाल से उनके बीच की सच्चाई का पता लगाऊँगी लेकिन मुझे उन्हे ये बिल्कुल नहीं लगने देना कि मुझे उन पर शक है और साथ ही मुझे अपनी सीमाओं और मर्यादा का भी ध्यान रखना होगा कहीं ऐसा ना हो की उन्हे उकसाने के चक्कर मे मुझसे कोई ऐसी भूल ना हो जाए जिससे मेरी दुनिया ही लूट जाए , मुझे बस ये पता करना है कि क्या कल जिस आदमी को मैंने गली मे देखा था वो नितिन ही था या नहीं ? और एक चीज ये कि क्या नितिन को ऑफिस से निकलवाने मे अशोक का कोई हाथ है या नहीं ? मुझे वैसे तो नितिन से कोई हमदर्दी नहीं है , पर मैं किसी गलत काम मे भागीदारी नहीं बन सकती अगर अशोक ने ऐसा किया है तो वो गलत है और मुझे वो फाइल नितिन को देनी ही होगी "। खैर मैं अपनी सोच से बाहर निकली और कीचेन मे जाकर अपने लिए खाना तैयार किया मुझे बोहोत भूख लग रही थी । खाना खाकर मुझे थोड़ी नींद सी आने लगी इसलिए मैं सीधे अपने बेडरूम मे गई और बेड पर लेट गई , लेटे हुए मुझे ज्यादा देर नहीं हुई थी तभी मुझे नींद आ गई और मे उसमे खोती चली गई ।
मैं 3 बजे तक सोती रही जब आँखे खुली तो मैं अपने अपने बिस्तर से उठी ओर बाहर हॉल मे आकर टीवी देखने लगी ,
कोई खास प्रोग्राम तो टीवी मे आया हुआ था नहीं , तो मैं बस गानों को ही सुनने लगी । वक्त कब बीता पता ही नहीं चला और 3:30 बज गए इतने मे ही वरुण ने आकर मेरे घर की डॉर बेल बजा दी । डॉर बेल की आवाज से मैं अपने गानों की दुनिया से बाहर आई और टीवी बंद करके गेट खोलने चली गई
गेट खोला तो सामने वरुण ही खड़ा था वो मुस्कुराते हुए मुझे ही देख रहा था या यूँ कहूँ के मेरे बदन पर अपनी नजरे जमाये हुए था । मुझे देखकर वो बोला - " हैलो भाभी !" मैंने भी उसकी बात के जवाब मे उसे हैलो कहा और अंदर आने को बोला । वरुण अंदर जाने लगा और मैं वही खड़ी होकर दरवाजा बंद करने लगी , दरवाजा बंद करते हुए मैंने देखा बाहर का मौसम काफ़ी ठंडा था , आसमान मे बादल भी मँडरा रहे थे , थोड़ी-2 हवा भी चल रही थी । मैंने दरवाजा बंद किया और अंदर आ गई वरुण पहले से ही अंदर सोफ़े पर बैठ था मुझे आता देखकर उसने मुस्कुराते हुए अपनी खुशी जाहिर की ।
मैंने उसे अपनी किताबे खोलने के लिए कहा ओर उसके लिए पानी लेने कीचेन मे चली गई । जब तक मैं पानी का ग्लास लेकर आई वरुण बैठा हुआ अपनी किताब पढ़ था , वरुण से नितिन के बारे मे जानकारी पता लगाने के लिए मैंने अपना पहला पाँसा फेंकने की योजना बनाई और उसे पानी देते हुए जानबूझकर अपना आँचल थोड़ा सा नीचे गिरा दिया पर इस बार मैंने उसे उठाने मे कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई बल्कि बोहोत ही आराम से वरुण को अपने भारी चूचों के दर्शन करवाए,
वरुण ने पानी का ग्लास उठा तो लिया पर वो उसे पीना भूलकर मेरे कसे हुए बूब्स की गहरी घाटियों मे खो गया उसके होंठ खुल गए जैसे अभी लपककर मेरे चूचों को मुहँ मे भर लेंगे और फिर कभी नहीं छोड़ेंगे । अपने इस बोल्ड अंदाज से गुदगुदी तो मेरे मन मे भी हो रही थी और मेरे बूब्स कुछ ज्यादा ही तन गए , मैंने धीरे से अपना आँचल संभाला और उससे अपने बूब्स को ढका । वरुण भी अपने भ्रम से निकला और पानी के ग्लास को अपने होंठों से लगाकर पीने लगा । पानी पीकर उसने ग्लास वहीं टेबल पर रख दिया मैं उसके सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई
और उसकी एक किताब उठाकर पढ़ने लगी वरुण की नजरें मुझ पर ही थी उसने मुझे किताब पढ़ते हुए देखा तो बोला - " भाभी आज कौन सा टॉपिक पढ़ना है ? "
मैंने वरुण की ओर देखा -
मैं - आज अकाउंट्स के कुछ प्रश्न हल करेंगे तुम अपनी कॉपी खोलो ।
वरुण - जी ।
फिर वरुण ने अपनी कॉपी मे मेरे द्वारा बोले गए प्रश्न लिखे और उन्हे सुलझाने बैठ गया , वरुण सवालों मे उलझा था और मैं अपने सवालों का जवाब उससे सुनना चाहती थी मैंने आखिर उससे पूछ ही लिया -
मैं - वरुण !
वरुण ने बिना कुछ बोले मेरी ओर देखा तो मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई - " कल शाम तुम्हारे घर कोई आया था क्या ? "
वरुण ने मेरे सवाल पर कुछ सोचते हुए जवाब दिया - " कल शाम ...... हाँ याद आया , कल शाम हमारे घर इंसयोरेंस कंपनी वाला आया था , वो आपको तो पता ही है ना 4 साल पहले पापा की डेथ के बाद उनके इंसयोरेंस से ही हमारा खर्च चलता है तो वो उसी के सिलसिले मे मम्मी से कुछ बात करने आया था , पर आपने उसे कहाँ देखा ?
मैं ( थोड़ी सचेत होती हुई ) - अरे कल शाम छत पर घूमते हुए मेरी नजर पड़ गई , मुझे लगा पता नहीं कौन होगा ? इतने दिनों बाद तुम्हारे घर एक अनजान शख्स को आता देखकर ऐसे ही पूछने का मन किया ।
वरुण ने हाँ मे सर हिलाया और फिर से अपनी कॉपी मे देखने लगा , पर मैं वरुण के जवाब से संतुष्ट नहीं थी इसकी वजह ये थी के वरुण तो कह रहा था कि कल शाम उसके घर आने वाला आदमी बीमा कंपनी से था तो उसके पास कोई दस्तावेज , बेग कुछ तो होना चाहिए था पर जहां तक मुझे याद है उसके हाथ मे ऐसा कुछ नहीं था और वो इतनी जल्दी आकर चला कैसे गया ? मैंने वरुण की ओर देखा तो वो एक सवाल पर अटका हुआ था । " है तो बिल्कुल निकम्मा एक सवाल भी नहीं कर सकता अभी भी इसके दिमाग मे मेरे बूब्स की तस्वीरे ही घूम रही होंगी , जरूर ये मुझे सोफ़े पर ब्रा और पेन्टी मे कल्पना कर रहा होगा "
- मैंने मन मे सोचा ।
मैंने उसे कहा - "क्या हुआ हुआ वरुण ? हुआ नहीं क्या ?
वरुण - भाभी ये सवाल समझ नहीं आ रहा , आप समझा दो प्लीज ।
इतना कहकर वरुण ने अपनी कॉपी मेरी ओर बढ़ा दी ,मैंने उसके हाथ से कॉपी ली और उसे सामने की टेबल पर रखकर समझाने लगी । प्रश्न को हल करने के लिए मुझे थोड़ा झुककर उसे समझना पड़ा जिससे मेरे बूब्स की गहरी घाटी एक बार फिर उसकी आँखों के सामने आ गई ।
वरुण की पैनी निगाहे वही मेरे बूब्स पर चिपक गई और वो बस अपनी आँखों से ही उनका रसपान करने लगा । मैं ये जानती थी कि वरुण का ध्यान सवाल समझने मे नहीं बल्कि मेरे बदन की गुत्थियों को सुलझाने मे है पर मैं भी उसे उकसाने मे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी । यही मेरी योजना थी के वरुण को अपनी सुंदरता के जाल मे फाँसकर उससे सारी सच्चाई निकलवाई जाए , इसलिए मैं भी बिना किसी झिझक के वरुण को अपने दोनों खरबूजों के दर्शन करने दे रही थी । वरुण की निगाहों की तपन मेरे दिल मे भी हलचल मचा रही थी पर मैं खुद को उसके सवाल मे उलझे रहने का नाटक कर रही थी , सच तो ये था कि ना तो मेरा ध्यान वरुण को पढ़ाने मे था और ना ही वरुण को इन किताबी सवालों मे कोई दिलचस्पी थी वो तो बस मेरी सुंदरता और मेरे जिस्म के उभारों मे ही खोया हुआ था , जब सवाल पूरा हो गया तो मैं सीधी हो गई और वरुण की आँखों के सामने से उसका पसंदीदा नजारा हट गया जिससे वो उदास सा हो गया और मेरे चेहरे पर हँसी आ गई । कुछ देर बाद वरुण के जाने का वक्त हो गया, वरुण जाने के लिए उठा और अपनी किताबें समेटने लगा , वरुण के खड़े होने से उसकी पेंट मे बना उसके लिंग का ऊभार भी साफ नजर आ रहा था
जिसे देखकर मैं समझ गई के वरुण को वश मे करने की मेरी चाल कामयाब रही । जब वरुण जाने लगा तो मैं भी उसे गेट तक छोड़ने के लिए उसके पीछे-2 चल दी । वरुण ने आगे बढ़कर गेट खोला और बाहर का नज़ारा देखकर रुक गया ।
बाहर का मौसम बोहोत अच्छा था , ठंडी -2 हवा चल रही थी आकाश मे काले बादल छाए हुए थे सामने ग्राउंड मे चारों और पेड़-पौधे हवा मे लहर रहे थे । हम दोनों घर के अंदर थे लेकिन हवा के झोंके हम तक भी आ रहे थे । अचानक वरुण मेरी ओर मुड़ा और बोला - " भाभी , देखो ना कितना अच्छा मौसम है बाहर का ।
मैं - हाँ वरुण लगता है आज बारिश होगी ।
वरुण- चलिए थोड़ी देर ग्राउंड मे घूमते है , मन फ्रेश हो जाएगा ।