Update 17

जब तक मैं गली के बाहर सड़क पर पहुँची तब तक एक टेक्सी भी आ गई और मैं तुरंत उसमे बैठ गई ।

वहाँ से बैंक तक का सफर कोई 30 मिनट का था । लगभग 4:35 बजे मैं बैंक के ठिक सामने ऊतर गई,

अभी भी बैंक के बन्द होने मे 25 मिनट बचे थे । बैंक मे दाखिल होने के और बाहर आने के लिए 2 अलग-2 गेट बने हुए थे , एक बार अगर 5 बजे से पहले कोई बैंक के अन्दर चला जाय तो वो किसी भी समय बाहर आ सकता था लेकिन 5 बजे के बाद बैंक मे प्रवेश नामुमकिन था । बैंक के बाहर सुरक्षा के लिए गार्ड्स खड़े रहते थे । मेरे पास अभी समय था और मैं बोहोत ही इतमेनान से बैंक के अन्दर दाखिल हुई सिल्क साड़ी पहने होने की वजह से वो बार सरक जाती थी जिसकी वजह से मेरे दूधिया बूब्स सामने आ जाते ।

जिसे संभालने मे मुझे थोड़ी परेशानी भी हो रही थी । जब मैं बैंक के अन्दर जा रही थी तो गैलरी मे घूमने वाले बैंक के कर्मचारी और दूसरे अपने काम से आए लोग अपनी नज़रों से मुझे घूरते हुए मेरे बेदाग हुस्न का दीदार करने लगे ।

मैं ये सब जानती थी के इन लोगों का ध्यान मेरे जिस्म की खूबसूरती पर है , लेकिन मैंने अपने काम पे ध्यान देते हुए इन सबको नजर-अंदाज किया और अपने अकाउंट की जानकारी लेने के लिए सीधे लेखाकार की मेज पर गई ।

लेखाकार से अपने खाते के बारे मे पुछा और उन्हे अपनी अकाउंट-बुक दिखाई तो उसने मुझे बताया कि "आप एक बार प्रबंधक से मिल ले हो सकता है कि कोई दस्तावेज़ संलग्न करना हो , वैसे तो आपके अकाउंट मे कोई समस्या नहीं है । " मैंने उनकी बात बड़े ही ध्यान से सुनी और प्रबंधक से मिलने के लिए घूमी । और तभी मेरी नज़रों ने अपने बदन के ऊपर चलती हुई किसी की नज़रों का पीछा किया तो पाया उन्हे ........... हाँ उन्हे ही ...... " गुप्ता जी "

गुप्ता जी बिल्कुल मेरे पीछे एक कुर्सी पर टेक लगाए बैठे थे और मुझे एक अलग ही अंदाज से देख रहे थे ।

मुझे समझ नहीं आया कि वो यहाँ इस समय क्यों है ? मगर उन्हे देखते ही मेरी दिल धड़कनों मे एक रुकाव सा आ गया और एक पल के लिए मेरे दिमाग मे गुप्ता जी कि वो ही पुरानी करतूतें घूम गई , आज कितने दिनों बाद मैंने गुप्ता जी को देखा था । मेरे कदम तो जहाँ थे वही रुक गए

और गुप्ता जी मुझे वहीं अपनी जगह पर बैठे हुए ऊपर से नीचे तक हवस भरी निगाहों से घूरने लगे । जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो गुप्ता जी अपनी जगह से उठे और मेरी ओर बढ़ने लगे । गुप्ता जी को अपनी ओर आता देखकर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई , हम एक दूसरे को जानते थे और ऐसे एक दूसरे को देखकर नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता था , बस इंतज़ार था तो इसका कि पहल कौन करे ? और आखिर गुप्ता जी पहल करते हुए मेरे पास आए ।

गुप्ता जी - पदमा , तुम यहाँ ....... ?

मैं - गुप्ता जी नमस्ते । हाँ वो एक जरूरी काम था ।

गुप्ता जी ने मेरी नमस्ते स्वीकार की और कहा - अच्छा , तो काम हो गया क्या ?

मैं - नहीं , बस एक बार प्रबंधक से मिलना है । वैसे आप यहाँ कैसे ?

गुप्ता जी - हाँ , मुझे भी एक बार प्रबंधक से मिलना है ।

मैं - अच्छा , तो आप अभी तक मिले क्यों नहीं ?

गुप्ता जी - मैं जाने ही वाला था , तभी मैंने तुम्हें देखा और फिर सोचा पहले तुमसे ही एक बार बात कर लूँ ।

मैं जान गई थी के गुप्ता जी को प्रबंधक से मिलना होता तो अभी तक चले गए होते यहाँ बैठकर इंतज़ार नहीं कर रहे होते उन्हे तो बस मेरे जिस्म को यहाँ बैठकर ताड़ना और मेरी गदराई जवानी का रस पीना था ।

गुप्ता जी - किस सोच मे डूब गई पदमा ?

मैं - कक् कुछ नहीं गुप्ता जी .. ।

गुप्ता जी - अच्छा तो चलो , प्रबंधक से मिलते है ।

उसके बाद मैं और गुप्ता जी प्रबंधक से मिलने जाने लगे , तभी मुझे दरवाजा बन्द होने की आवाज आई । मैंने अपने मोबाईल मे देखा तो 5 बजे हुए थे इसका मतलब था कि बैंक का प्रवेश द्वार बन्द कर दिया गया है और अब जो लोग बैंक के अन्दर है वो ही बाहर जा सकते है , इसके अलावा कोई अन्दर नहीं आ सकता । मैं और गुप्ता जी गुप्ता जी प्रबंधक से मिलने जा रहे थे , प्रबंधक से मिलने के लिए एक गैलरी से होकर जाना पड़ता था और उस गैलरी मे कोई लाइट का होने की वजह से काफी अंधेरा भी था , इतना कि उसमे खड़े व्यक्ति को गैलरी से बाहर वाला तो दूर खुद आगे खड़ा आदमी भी सही से नहीं देख सकता था । जब मैं और गुप्ता जी वहाँ पहुंचे तो हमारे आगे कुछ लाइन मे लोग खड़े थे केवल मैं और गुप्ता जी सबसे आखिर मे आए थे और हमारे पीछे कोई ओर था भी नहीं क्योंकि एंट्री गेट अब बन्द हो चुका था । मैं गुप्ता जी से आगे नहीं खड़ी होना चाहती थी इसलिए मैंने उनसे कहा - " गुप्ता जी , पहले आप आगे आइये आप मुझसे पहले आए थे । "

मगर गुप्ता जी ने मेरी बात नकारते हुए कहा - " नहीं पदमा पहले तुम ही जाओ , मुझे ज्यादा काम नहीं है , तुम्हारा काम जरूरी है । "

गुप्ता जी की बात का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था तो मुझे उनके आगे लगना ही पड़ा ।

अब स्थिति ये थी कि उस अंधेरी गैलरी मे , मैं खड़ी थी और मेरे बिल्कुल पीछे और हमे देखने वाला उनके पीछे कोई नहीं था , मेरे आगे जो लोग खड़े थे वो मैं उनसे थोड़ा पीछे की ओर हटकर खड़ी थी ताकि उन्हे मेरे और गुप्ता जी की बातें ना सुनाई दें ।

गुप्ता जी के आगे खड़े होने मे मुझे थोड़ी घबराहट हो रही थी और ये घबराहट तब और भी बढ़ गई जब गुप्ता जी पीछे से मेरे करीब आकर बोले - " पदमा एक बात कहूँ ? "

मैं धीरे से पीछे मुड़ी तो पाया गुप्ता जी बिल्कुल मेरे पीछे थे और मेरी गोरी पीठ पर उनका मजबूत सीना रगड़ खा रहा था । मैंने गुप्ता जी से कहा - " बोलिए गुप्ता जी , क्या कहना चाहते है ? "

गुप्ता जी मेरे कान के और भी करीब आकर बोले - " तुम आज बोहोत सुंदर लग रही हो पदमा । "

मैं -"शश्श्श् ....गुप्ता जी आप भी ना । "

गुप्ता जी - सच मे पदमा , आज तुम तुम बिल्कुल कयामत लग रही हो ।

मैं अपने मन मे ही अपने आप को कोसने लगी , ' क्या जरूरत थी इतना सज-धज कर घर से निकलने की , अब फँस गई ना अपनी खूबसूरती की वजह से । '

मैंने गुप्ता जी बात का कोई जवाब नहीं दिया और बात को पलटते हुए उन्हे कहा -

मैं - गुप्ता जी , आप मेरे करीब ना खड़े हो किसी ने हमे ऐसे देख लिया तो गलत समझेगा ।

गुप्ता जी - यहाँ कोई हमे देखने वाला नहीं है पदमा , एंट्री गेट बंद हो चुका है और यहाँ बोहोत अँधेरा भी है । वैसे भी यहाँ काफी ठंड है पदमा , अगर हम एक दूसरे के करीब रहेंगे तो हमे गरमाई मिलती रहेगी ।

इतना बोलकर गुप्ता जी ने मेरे और भी करीब आकर अपने आप को मुझसे बिल्कुल चिपका दिया और अपने हाथ मेरे कंधों पर रख दिए और अपने गाल को मेरे गाल और अपने होंठों को मेरे कंधे से लगभग बिल्कुल मिल दिया मानो उसे चूमने ही वाले हो ।

मैं - आह .. गुप्ता जी इतना करीब होना ठीक नहीं ।

कहते हुए मैं गुप्ता जी की पकड़ से निकलते हुए थोड़ी आगे सरक गई । इससे मैं गुप्ता जी से तो दूर हट गई मगर अगले ही पल गुप्ता जी ने अपने कदम आगे बढ़ाकर मुझे फिर से अपनी पहुँच मे ले लिया और बोले -

गुप्ता जी - पदमा , तुम्हारे बालों की खुशबू से मेरा मन अन्दर तक महक गया है और तुम्हारी इस बैकलेस साड़ी मे तुम्हारी ये कोमल कमर , उफ्फ़ हद है .....

मैं - क्या बात है गुप्ता जी ? आपका ऐसी बातें बोलने का क्या मकसद है ?

गुप्ता जी - पदमा मैं एक बार तुम्हारी कमर को छु कर देखना चाहता हूँ ।

मैं - नन्न् ... क्यूँ गुप्ता जी , रहने दीजिए आप हर बार ऐसी ही बातें क्यों करते है ?

गुप्ता जी - मैं एक बार बस तुम्हारी कमर की कोमलता को महसूस करना चाहता हूँ ।

ऐसा कहकर गुप्ता जी ने अपना हाथ मेरी बैकलेस साड़ी मे बंधी कमर और पीठ पर धीरे-धीरे फिराया और मेरी धड़कनों के साथ-साथ मेरी साँसों मे भी उछाल आ गया , मेरी कमर गुप्ता जी के हाथों के स्पर्श से मचलते हुए थिरकने लगी ।

अपनी तेज गति से चलती साँसों पर काबू करने की कोशिश करते हुए गुप्ता जी से कहा -

मैं - गुप्ता जी ... अब .. तो .. आपका .. मन .. भर .. गया .. ना.. अब .. अपने .. हाथों को .. मेरी ... कमर ... से .... दूर ... कर लीजिए ...... ।

गुप्ता जी - क्या तुम्हें ये अच्छा नहीं लग रहा पदमा ?

अब मैं भला गुप्ता जी के इस सवाल का क्या जवाब दूँ ? उन्हे हाँ भी तो नहीं कह सकती वरना वो यहाँ खड़े-2 ही मुझे बर्बाद कर देंगे । वैसे भी उनके होंठ अब भी मेरे कान पर अपनी गरम साँसे छोड़ रहे थे जो मेरे रोम-रोम मे जलन पैदा कर रही थी । गुप्ता जी मेरी पीठ और फिर कमर पर अपने हाथ से शरारत करते हुए नीचे की ओर झुक गए ।

मैं - नन्न् ही ... गुप्ता जी ... आपको .. जो महसूस करना था अपने कर लिया अब कृप्या अपने हाथ हटा लीजिए ।

गुप्ता जी अभी भी नीचे मेरे भारी नितम्बों के पास झुके हुए थे जिसका एहसास मुझे उनके मुहँ से आती गरम साँसों से हो रहा था जैसे ही गुप्ता जी ने ये अल्फ़ाज़ मेरे मुहँ से सुने तो गुप्ता जी कुछ इस अंदाज मे ऊपर की और आए कि अपने हाथ से साथ-2 अपने होंठों को भी मेरी कमर और पीठ से बिल्कुल चिपकाए यहाँ -वहाँ मुझे चूम लिया ।

अब गुप्ता जी को अपने हाथ मेरी कमर से तो हटा लिए लेकिन वहाँ से हटाते ही , मुझे संभलने का मौका दिए बिना अपने दोनों हाथों से साड़ी के ऊपर से मेरी कमर को थाम लिया और मुझसे बिल्कुल लग गए ।

"आह .."- धीरे से मेरे होंठों से निकली मैंने सिर्फ पलटकर देखा था इतने मैं ही गुप्ता जी ने अपने होंठ जो अब तक मेरे कानों पर अपनी गरम हवा छोड़ रहे थे उन्हे मेरी गर्दन से चिपका दिया और उस पर जोरों शोरों से चूमा ।

मैं - आह ... गुप्ता जी ... आप ... फिर ... नहीं ...

बोलते हुए मैं अपनी गर्दन को जोर से झटका लेकिन गुप्ता जी की कैद से मैं अब भी आजाद नहीं हो पाई । क्योंकि गुप्ता जी ने अपने हाथ मेरी नंगी कमर से गुजारते हुए मेरे पेट के इर्द-गिर्द कस लिए

और मुझे ओर भी अपने से चिपका लिया, जैसे चंदन के पेड़ से साँप लिपट जाता है ठीक वैसे ही गुप्ता जी मुझसे लिपटने लगे । मेरी सिल्क साड़ी का पल्लू भी बार-बार सरक जा रहा था और आखिर मेरी पकड़ से छूटकर वो नीचे ही गिर गया । मेरी साँसे तो यूँ ही परवान चढ़ी हुई थी और अब गुप्ता जी की हद से ज्यादा उत्तेजना ने फिर से मेरे अरमानों को भड़का दिया ।

मैं - गुप्ता जी ..... नहीं ... छोड़ .... दीजिए ..... कोई ..... देख लेगा ..... ।

पर गुप्ता जी कहाँ मानने वाले थे उन्होंने मेरी किसी भी बात कि परवाह कीये बिना अपने होंठों से मेरी गर्दन पर लगातार चूमना जारी रखा । इधर गुप्ता जी के होंठ मेरी गर्दन और कंधों पर थिरकते हुए मुझे चूमे जा रहे थे और उधर मेरे अंदर की कामवासना भी मेरे बदन मे एक झुरझुरी लगा रही थी ।

गुप्ता जी के हाथ अब सिर्फ पेट और कमर तक सीमित नहीं रहने वाले थे बल्कि अब उन्होंने भी अपना आगे बढ़ने का रास्ता खोज लिया और उनके बेकाबू हाथ मेरी चूचियों तक जा पहुंचे । मेरी चूचियाँ जो गुप्ता जी के पहले स्पर्श से ही फूलनी शुरू हो गई थी अब गुप्ता जी के हाथों के दबाव मे आकर अपने पूरे आकार मे तनने लगी थी । बैंक की उस अंधेरी गैलरी मे किस तरह से मैं अपने होंठों से उखड़ती आहों को रोक रही थी ये बस मैं ही जानती हूँ , अगर मेरे होंठ मेरे दाँतों के नीचे ना दबे होते तो उन्हे भी रोकना नामुमकिन था ।

मैं - ओह ... गुप्ता जी ....मैंने आपको ..... उफ्फ़ ........ मुझे चूमने से मना किया था ना , मम्म्म्म्म ना.....ह ।

गुप्ता जी - मैं क्या करूँ पदमा ,ये तुम्हारा संगमरमर जैसा तरासा हुआ जिस्म है ना जिस पर मेरे होंठ खुद ही फिसल पड़ते है । थोड़ी देर मुझे इस आनंद के सागर मे डूबे रहने दो पदमा बस ......... ।

" है ईश्वर ... गुप्ता जी को तो कोई शर्म , हया ही नहीं है । इन्हे तो कोई डर नहीं है , मगर मैं ऐसे तो बर्बाद हो जाऊँगी गुप्ता जी को कैसे रोकूँ । कहीं किसी ने देख लिया तो मेरा क्या होगा ?"

मेरे मन मे डर के भाव उमड़ रहे थे और शरीर तो यूँ समझे गुप्ता जी ने अपनी हवस का गुलाम बना लिया था । डर तो था इस बात का कि कहीं कोई पीछे मुड के ना देख ले कि क्या हो रहा है ? अगर ऐसा हो गया तो मैं तो आज जीते जी मर जाऊँगी । और गुप्ता जी इन सब से बेपरवाह बस अपने जिस्म की आग मेरे जिस्म की आग मे मिलाकर उसे ज्वाला-मुखी का रूप दे रहे थे । अब तो गुप्ता जी का लिंग भी मुझे मेरे नितम्बों पर चुभने लगा था

और गुप्ता जी पीछे से मेरी चूचियों को पकड़े हुए अपने लिंग की ठोकरे मेरे गुदा स्थल पर मारने लगे । अब मुझसे भी अपनी आहों को रोक नहीं जा रहा था और धीमे-धीमे मेरी आहे भी अब निकलने लगी ।

इस पूरे वासना के खेल के दौरान गुप्ता जी ने एक बात का पूरा ध्यान रखा हुआ था कि उनके होंठ मेरे बदन से अलग ना हो पाएं और किसी भी पल उन्होंने ऐसा होने नहीं दिया ।

गुप्ता जी के हाथो ने अब मेरी चूचियों के निप्पलस को भी मेरे ब्लाउज के ऊपर से ही छेड़ना शुरू कर दिया ,मेरी हालत अब बोहोत ज्यादा खराब होने लगी योनि मे पानी भर आया और मेरी पेंटी मेरे चुतरस से भीगने लगी । मैं जान गई के अगर अब ना रुकी तो आज खुद ही गुप्ता जी को अपना जिस्म पूरी तरह से भोगने के लिए दे दूँगी और गुप्ता जी तो मुझे लूटने के लिए ना जाने कब से तड़प रहे है । लाइन भी अब लगभग समाप्त ही होने वाली थी मेरे आगे केवल 3 लोग बचे होंगे शायद ।

मैं(धीरे से ) - अब ... बस .. कीजिए । गुप्ता जी जाने दीजिए .... आह ... मेरा नंबर आने वाला है ।

गुप्ता जी को अभी भी वासना का खुमार चढ़ा हुआ था और उसे मे वो अब भी अपनी हवस की ही बातें कर रहे थे । गुप्ता जी ने मुझे पकड़े हुए ही अपने होंठों को मुझे चूमने से विराम देते हुए कहा - " एक शर्त पर .. । "

मैं इस समय तो गुप्ता जी की कोई भी शर्त मानने को तैयार थी फिर चाहे जैसे भी हो , मुझे बस उनकी पकड़ से आजाद होना था ।

मैं - क्या ... आह .. शर्त है गुप्ता जी ... जल्दी बोलिए .... ।

गुप्ता जी - तुम मुझे वो शरबत पिलाओगी ।

"शरबत ?? कौन सा शरबत ? क्या गुप्ता जी उसी शरबत की बात कर है जो मैं समझ रही हूँ ।"

मैं - क्या ? .. कौन सा शरबत ... चाहिए आपको .... गुप्ता जी ..... बोलिए ... ?

गुप्ता जी - वही तुम्हारे इन सुर्ख लाल होंठों का शरबत पदमा , मेरी प्यास सिर्फ उसी से बुझेगी ।

क्या अपने होंठों का शरबत ..? नहीं ये नहीं हो सकता ये मैं कैसे करूंगी ... ?

मैं - उफ्फ़ ... गुप्ता जी ... ये आप क्या बोल रहे हो ?

गुप्ता जी - यही चाहिए मुझे पदमा बस तुम्हारे होंठों का शरबत , जल्दी बोलो पिलाओगी ना ।

ऐसा कहकर गुप्ता जी ने अपने एक हाथ को मेरी चूचियों पर से हटाया और मेरे होंठों को अपने हाथ मे पकड़कर उन्हे भींचते हुए कहने लगे -

गुप्ता जी - यही है ... इनका ही शरबत पीना है मुझे ।

मेरे पास कोई ओर चारा नहीं था गुप्ता जी के हाथ ने अभी भी मेरी एक चुची को पकड़ा हुआ था और लाइन बिल्कुल समाप्त होने को थी ।

मैं - अच्छा .... ठीक है ..... गुप्ता जी ..... मुझे मंजूर है । अब प्लीज मुझे छोड़ दीजिए वरना किसी ने देख लिया तो बवाल हो जाएगा ।

गुप्ता जी की तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई जैसे ही उन्होंने ये सुना बिना एक पल की देरी कीये मुस्कुराते हुए मुझे छोड़ दिया । गुप्ता जी से छूटते ही मैंने जल्दी से अपने कपड़ों और हुलिये को ठीक किया । मेरा नंबर आने ही वाला था घबराहट मे मेरी साँसे भी बोहोत तेज चल रही थी जिन्हे नॉर्मल करने मे भी मुझे समय लगा । जब मेरा नंबर आया तो मैं प्रबंधक के केबिन मे गई । प्रबंधक लगभग 40 वर्षीय एक मर्द था जो मेरे सामने एक कुर्सी पर बैठा हुआ मुस्कुरा रहा था । मुझे देखकर उसने मुझे बैठने के लिए कहा और पूछा - " कहिए मोहतरमा क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए ? "

मैं प्रबंधक के तमीजदार रवैयए से काफी प्रभावित हुई और उनकी टेबल के सामने कुर्सी पर बैठकर बोली - " सर बैंक से प्रविष्टियों के संबंध मे एक कॉल आया था उसी के बारे मे जानकारी लेने के लिए आई थी । बाहर लेखाकर ने कहा कि एक बार आप से मिल लूँ । "

ऐसा कहते हुए मैंने अपने जरूरी दस्तावेज प्रबंधक की और बढ़ा दिए प्रबंधक साहब ने उन्हे अपने हाथ मे लिया और बड़े ध्यान से देखकर कहा - " ये कोई ज्यादा गंभीर समस्या नहीं है । आप बस अपने ............. कागज और एक फ़ोटो मुझे दे दीजिए । "

मैंने प्रबंधक के कहे अनुसार जरूरी दस्तावेज़ उन्हे सौंप दिए और उन्हे धन्यवाद कहकर जाने लगी तो प्रबंधक ने मुझे पीछे से आवाज दी ।

प्रबंधक - सुनिए ..। मिस पदमा ।

मैं प्रबंधक की ओर घूमी

और उन्हे कहा - " जी सर कहिए .... ?"

प्रबंधक - आप एक बार कुछ दिनों बाद फिर से आ जाइएगा ।

मैंने थोड़ी आश्चर्य की नजर प्रबंधक पर डाली ।

मैं - क्या हुआ सर ?

प्रबंधक - वैसे कुछ खास नहीं बस एक बार चेक कर लेना की सब ठिक से हो गया है या नहीं मेरा मतलब अकाउंट वेरीफाई हो गया या नहीं ।

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन हाँ मे हिला दी और वहाँ से बाहर चली आई । बाहर आते हुए मैंने सोचा कि अब तो गुप्ता जी अंदर जाएंगे और जब तक गुप्ता जी प्रबंधक से मिलकर आएंगे तबतक मैं गुप्ता जी से बचकर यहाँ से निकल जाऊँगी इसलिए मैं जल्दी से बाहर वाले गेट से बैंक से बाहर आ गई ।

बैंक से बाहर आकर मैंने चैन की साँस ली और फिर अपनी घड़ी मे टाइम देखा तो पाया 5:30 हो रहे थे अब इस समय तक तो अँधेरा भी होने लगा था । मैंने अपने चारों ओर देखा तो पाया की अब लोगों की भीड़ भी बोहोत कम होने लगी थी और थोड़ी-2 हवा भी चलने लगी थी । घर जाकर मुझे रात के लिए डिनर भी तैयार करना था इसलिए मैं जल्द से जल्द एक टैक्सी लेकर अपने घर जाना चाहती थी , इसलिए मैं तुरंत मैन रोड़ की साइड जाकर खड़ी हो गई और टैक्सी का इंतज़ार करने लगी ।

थोड़ी देर बाद एक टैक्सी आकर रुकी , और उसके अन्दर बैठे ड्राइवर ने मेरी ओर देखकर पहले तो वही काम किया जो बाकी के मर्द करते है , उसने मेरे स्तन और मेरी साड़ी मे से नुमाया होती हुई नाभी पर अपनी नज़रों की लहर दौड़ाई

और फिर अन्दर से ही मेरी ओर देखते हुए उस ड्राइवर ने पूछा "कहाँ जाना है मैडम ! " उसकी पहली हरकत देखकर मेरा मन तो नहीं हुआ कि मैं उसकी टैक्सी मे बैठू पर मुझे घर जाने मे देर हो रही थी ओर कोई ओर टैक्सी भी इस समय मिलनी मुश्किल थी इसलिए मैंने अपने मोहल्ले का नाम बताया तो उसने कहा "वो तो बोहोत दूर है , 200 रुपये लूँगा । "

मैं - क्या 200 रुपये ???? 50 रुपये तो मुझे वहाँ से यहाँ आने मे लगे है बस , और तुम्हें 200 रुपये चाहिए ।

ड्राइवर - हाँ तो मैडम इतनी देर मे आपको वहाँ तक लेकर जाऊँगा और फिर वहाँ कोई सवारी भी नहीं मिलेगी इतनी रात मे, तो मेरा तो नुकसान हो जाएगा ना ।

मैं - फिर भी 200 तो बोहोत ज्यादा है 100 रुपये दे सकती हूँ ।

ड्राइवर ( एक बार मुझे ऊपर से नीचे तक घूरके देखते हुए )- 150 रुपये बस । इससे कम नहीं हो सकता ।

मैं कुछ उलझन सी मे थी कि क्या कहूँ इतने मे ही , " नहीं चाहिए ..........। चल निकल ..........। " - किसी ने मेरे पीछे से जोर से कहा । मैंने हैरानी से तुरंत पीछे मुड़कर देखा

तो पाया कि वो गुप्ता जी थे , गुप्ता जी को यहाँ देखकर मुझे हैरानी और परेशानी दोनों हुई । गुप्ता जी की मेरे साथ बैंक के अन्दर की हुई हरकते अभी भी मेरे मन से निकली नहीं थी और ना ही मैं उनके वो शब्द भूली थी जो उन्होंने मुझे कहे थे कि " पदमा मुझे तुम्हारे होंठों का शरबत पीना है ।"

मुझे अपनी ओर घूमती देखकर , गुप्ता जी ने एक बार मेरी मुस्कुरा-कर देखा और फिर मेरी ओर आगे बढ़कर उस टैक्सी ड्राइवर से बात करने लगे ।

गुप्ता जी - क्यूँ बे ........ 150 रुपये चाहिए तुझे राज नगर तक के ????

ड्राइवर - अरे साहब ...... मैं तो ये बोल रहा था के बोहोत देर हो गई है तो इस टाइम कोई और सवारी भी नहीं मिलेगी ।

मैंने एक बात नोटिस की , जब मैं उस टैक्सी वाले से बात कर रही थी तो उसके बात का लहजा बड़ा ही असभ्य था मगर अब गुप्ता जी से बात करते हुए उसके तरीके मे एक अजीब सा बदलाव आ गया ।

गुप्ता जी - अबे तो क्या सारी सवारी की जिम्मेदारी हमारी है ?

गुप्ता जी तो उस ड्राइवर से ऊलझ ही गए थे मुझे लगा बात कही किसी ओर तरफ ना चली जाए इसलिए मैंने गुप्ता जी को बीच मे ही टोकते हुए कहा -

मैं - अरे गुप्ता जी आप परेशान ना हो , कोई बात नहीं ।

गुप्ता जी - अरे पदमा तुम नहीं जानती इन घटिया लोगों को मुझे अच्छी पता है ये मासूम औरतों को देखकर , उन्हे लूटने की फिराक मे रहते है ।

गुप्ता जी का "मासूम औरत और उन्हे लूटने" का सम्बोधन कुछ इस प्रकार का था कि मानों वो पैसे नहीं कुछ और ही लूटने की बात कर रहे थे । मैंने अपने मन मे सवालिया नज़रों से गुप्ता जी को देखते हुए कहा - " ये ही क्या गुप्ता जी , खुद आप भी तो मुझे लूटना ही चाहते है , इसीलिए तो इतनी हमदर्दी दिखा रहे है और आप जो लूटना चाहते है वो इन रुपयों से कहीं ज्यादा कीमती है । "

ड्राइवर - अरे साहब , अगर पैसों का इतना ही लालच है तो जाइए ना बस मे चले जाइए वहाँ किराया बोहोत सस्ता है । क्यूँ मेरी टैक्सी के पीछे लगे है ?

गुप्ता जी ने पीछे मेरी ओर पलटकर एक बार देखा , मैं कुछ कह ना सकी और मुझे कुछ ना बोलता पाकर गुप्ता जी वापस टैक्सी ड्राइवर की ओर घूमकर बोले - "हाँ-हाँ ... चले जाएंगे ... तू अपना रास्ता नाप । "

इतना सुनते ही टैक्सी ड्राइवर ने अपनी टैक्सी स्टार्ट की और वहाँ से चला गया । गुप्ता जी थोड़े गुस्सेा होते हुए मेरी ओर पलटे और बोले - " कमीना कही का ........ । पैसों की लूट समझते है । तुम घबराओ मत पदमा , बस आती ही होगी । "

मैं - वो तो ठीक है गुप्ता जी , मगर आपको ऐसे उससे उलझने की जरूरत नहीं थी ।

गुप्ता जी - जरूरत थी पदमा ...। तुमसे कोई खराब तरीके से बात करे तो मुझे अच्छा नहीं लगता ।

मैंने बिना कुछ कहे गुप्ता जी की बात पर अपना सर हामी मे हिला दिया और वही खड़ी होकर अपने आप को कोसने लगी , " ये गुप्ता जी भी पता नहीं कहाँ से आ जाते है बार-बार मुझे परेशानी मे डाल देते है हर बार । मुझे भी क्या जरूरत थी इतना मोल करने की ,अच्छी भली जा रही थी अगर पहले ही सीधी चली जाती तो गुप्ता जी के साथ जाने से बच जाती , मगर अब पूरे रास्ते इनके साथ ही जाना पड़ेगा । पर वो भी तो पैसे कुछ ज्यादा ही मांग रहा था अच्छा किया जो गुप्ता जी ने उसे भगा दिया । " एक तरफ मैं गुप्ता जी के साथ जाने की बात सोचकर बैचेन थी दूसरी ओर गुप्ता जी के लिए मन मे एक स्नेह का भाव भी पनप गया क्योंकि आज उन्होंने मेरे लिए उस बदतमीज टैक्सी ड्राइवर से झगड़ा किया ।

थोड़ी ही देर मैं बस भी आ गई । मगर मैं अपने ही ख्यालों मे गुम थी , गुप्ता जी ने ही मुझे आवाज लगाकर मेरी विचारों की दुनिया को भंग किया ।

गुप्ता जी - पदमा पदमा ..... कहाँ खो गई .... चलो बस आ गई ।

मैं जैसे ही वास्तविकता से वाकिफ़ हुई तो देखा गुप्ता जी पहले से ही बस मे चढ़े हुए थे और मुझे देखते हुए बस के अन्दर आने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाए हुए थे , जिसका मतलब साफ था कि मैं उनका हाथ थामकर बस मे चढ़ जाऊ । गुप्ता जी जानते थे कि मैं स्वयं भी बस मे चढ़ सकती हूँ लेकिन उन्हे तो मेरे मखमली गोरे हाथ को अपने हाथ मे लेकर उसके स्पर्श का आनंद उठाना था । मैंने गुप्ता जी के हाथ का सहारा लेते हुए बस के अन्दर प्रवेश किया और ऊपर चढ़ गई । बस के अन्दर आते ही गुप्ता जी ने मुझे खुद से सटा लिया , परन्तु इसका कारण बस के अगले भाग मे मौजूद भीड़ थी ।

मेरा हाथ गुप्ता जी ने अभी भी नहीं छोड़ा था और वो उसे अपने हाथ मे लेकर ही उसकी कोमलता का पूरा जायजा ले रहे थे । उस भीड़ के माहोल ने हमे एक दूसरे के बोहोत ही करीब होने पर मजबूर कर दिया और मैं और गुप्ता जी बिल्कुल एक दूसरे से चिपक से गए , इतना कि मेरी भारी गद्देदार चूचियाँ गुप्ता जी की कठोर विशाल छाती से चिपक गई और वहाँ पर घर्षण होने लगा । इस रगड़ के कारण मेरी चूचियों मे अपने आप एक अजीब सा तनाव होने लगा था , और मुझे इससे थोड़ी असहजता भी हो रही थी । गुप्ता जी मेरी परेशानी से अच्छे से वाकिफ़ थे इसलिए उन्होंने मुझे कहा - " पदमा !"

मैं - हाँ गुप्ता जी ..... । कहिए क्या हुआ ?

गुप्ता जी - यहाँ पर काफी भीड़ है, इससे तुम्हें काफी परेशानी भी हो रही होगी , चलो पीछे की ओर चलते है वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं होगी ।

गुप्ता जी का सुझाव मुझे अच्छा लगा और साथ मे ये भी विचार आया कि गुप्ता जी को मेरी फिक्र है वरना वो अपने सिने को मेरी चूचियों से मिलने वाले मजे को यूँ ही नहीं जाने देते ।​
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