Update 18
मैंने खुश होकर हामी भर दी
और गुप्ता जी के साथ बस के पिछले भाग की ओर जाने लगी , मगर मैं नहीं जानती थी कि जिसे मैं गुप्ता जी की उदारता समझ रही हूँ वो दरसल उनकी एक योजना का हिस्सा है । बस मे पीछे की ओर जाते हुए भी हमे एक भीड़ के दायरे को पार करना था । इसके लिए गुप्ता जी ने मेरा हाथ जो अभी भी उन्हे खुरदुरे हाथ मे अटखेलियाँ कर रहा था को अपनी कमर पर लपेटा और खुद अपना एक हाथ धीरे से मेरी पतली कमर से गुजारते हुए उसे मजबूती से अपने शिकंजे मे ले लिया
और दूसरे हाथ को मेरी नंगी बैकलेस पीठ पर रखकर मुझे अपनी ओर ताकत से खींचा इससे मेरी जो चूचियाँ गुप्ता जी के सिने से अबतक रगड़ खा रही थी वो अब उनकी छाती से अब बिल्कुल दब गई और तो और इस झटके से मेरे और गुप्ता जी के होंठ भी एक दूसरे के बिल्कुल करीब आ गए और हमारे होंठों से निकलने वाली गरम साँसों ने एक दूसरे को काम-क्रिया को दी जाने वाली संजीवनी की तरह एक दूसरे को रोमांचित करना शुरू कर दिया ।
मेरे और गुप्ता जी के होंठों के मध्य अब बस नाम मात्र का फ़ासला था ऐसा लगता रहा था कि गुप्ता जी के काले खुरदुरे होंठ किसी भी पल मेरे रसीले शरबत से भरे होंठों पर टूट पड़ेंगे और इनका सारा रस-शरबत पी जाएंगे । इस प्रकार एक भीड़ भरी बस मे एक पराए मर्द के साथ चिपकने मे मुझे बोहोत शर्म आ रही थी
और ऊपर से गुप्ता जी थे भी तो उम्र मे मुझसे कही बड़े । मेरे मन मे ये चिंता भी थी कि कही कोई हमे इस तरह एक दूसरे का आलिंगन कीये हुए ना देख ले , मैंने अपने चारों ओर देखा तो पाया किसी का ध्यान हम पर नहीं था सब लोग भीड़ के कारण परेशान थे । मुझे अपने जिस्म से ऐसे ही चिपकाए गुप्ता जी उस भारी भीड़ मे आगे बढ़ने लगे और हर पल के साथ मेरे जिस्म पर अपने हाथों की पकड़ और भी मजबूत करते गए और अपने हाथ मेरी कमर और पीठ पर घुमा-कर उनपर अपनी ऊँगलियों की चाप छोड़ने लगे । बीच -2 मे गुप्ता जी के होंठों से निकलती भारी साँसों की गंध मेरे मुहँ और नाक के जरिए मेरे अन्दर जाने लगी और मेरी साँसों मे भी खलबली मचने लगी ।
एक तो पहले से ही गुप्ता जी के इतने करीब होने से मेरी साँसे शर्म के मारे बावली हो रही थी और दूसरे हमले के लिए गुप्ता जी के खुरदुरे हाथ जो पीछे से मेरे जिस्म का आनंद उठा रहे थे, मेरे अन्दर रोम-रोम को तना रहे थे । गुप्ता जी का वो हाथ जो अबतक मेरी कमर को अपनी पकड़ मे बाँधे हुए था अब धीरे-2 नीचे सरकते हुए मेरे नितम्बों पर आ टीका था और उनपर बड़े प्यार से सहला रहा था अन्दर ही अन्दर मैं गुप्ता जी को कोस रही थी "अगर वो वहाँ आकर उस टैक्सी ड्राइवर से झगड़ा ना करते तो मैं कैसे भी मैंनेज करके उसी टैक्सी मे चली जाती, मगर अब गुप्ता जी के साथ इस भीड़ भरी बस मे धक्के खाते हुए जाना पड़ रहा है वो भी खड़े-खड़े और ऊपर से गुप्ता जी की ये बेबाक हरकते मेरे जिस्म को मोमबत्ती की तरह पिघलने पर मजबूर कर रही है । " मैं अपने विचारों की दुविधा मे थी कि इसी दौरान भीड़ से निकलते हुए एकाक बस मे एक धक्का सा लगा गुप्ता जी अपने स्थान से विचलित होते हुए मेरे होंठों पर गिरने को हो गए, मैं और गुप्ता जी पहले ही बेहद करीब थे और इसपर गुप्ता जी का मेरी ओर झुकना इसका सीधा मतलब था गुप्ता जी का मेरे होंठों पर होने वाला हमला , पर मैंने समय रहते स्थिति को संभाल लिया और ऐन मौके पर अपने होंठों को गुप्ता जी के होंठों से दूर खींचते हुए अपना सर दूसरी ओर घुमा लिया लेकिन इतना करने पर मेरे होंठ तो गुप्ता जी के होंठों से बच गए पर मेरे गाल उनके होंठों के स्पर्श से नहीं बच पाए और गुप्ता जी ने मौका पाते ही , मेरे गाल के निचले हिस्से पर अपने होंठ रगड़ते हुए वहाँ पर मुझे चूम लिया ।
एकदम से हुए इस वाक्या से गुप्ता जी थोड़े सम्भलते हुए मेरी ओर देखकर बोले - "ओह ... माफ करना पदमा ,पीछे से एकदम से धक्का लग गया था । " अपने आप को संभालते हुए मैंने सबसे पहले ये देखा कि कही गुप्ता जी को ऐसा करते हुए किसी और ने बस मे देखा तो नहीं । जब मैंने सुनिश्चित कर लिया की सब अपने मे मस्त है किसी को हम पर नजर रखने की फुर्सत नहीं तो मैंने गुप्ता जी की बात का जवाब दिया -
मैं - कोई बात नहीं गुप्ता जी , मैं समझ सकती हूँ बस मे बोहोत भीड़ है ।
मेरी बात सुनकर गुप्ता जी थोड़े सीधे हुए और आगे बढ़ने लगे । मैं तो बस जल्द से जल्द गुप्ता जी के चंगुल से निकलना चाहती थी ,क्योंकि गुप्ता जी का जो हाथ मेरे गोल भारी मांसल नितम्बों को पहले केवल सहला रहा था अब धीरे धीरे उन्हे अपने हाथों मे भरने की कोशिशे करने लगा था । और एक बार तो गुप्ता जी ने भीड़ का फायदा उठाते हुए मेरे एक नितम्ब को अपने हाथ मे जितना हो सके उतना भरकर जोर से दबा दिया ।
हड़बड़ाहट और रोमांच मे मेरे मुहँ से एक "आह......" फूट पड़ी ।
मेरी आह सुनते ही गुप्ता जी अपने होंठों पर एक कुटिल मुस्कान लिए मेरी आँखों मे देखते हुए बोले - "क्या हुआ पदमा । "
अपनी नज़रों को गुप्ता जी की सवालिया नज़रों से चुराते हुए और अपनी घबराहट छिपाते हुए मैं उनसे कहा - "कुछ नहीं गुप्ता जी , थोड़ा भीड़ की वजह से ......... "
मैंने अपनी बात को अधूरा छोड़ दिया जिसे गुप्ता जी ने पूरा किया ।
गुप्ता जी - ओह ..... बस थोड़ी देर और पदमा । "
फिर थोड़ी ओर जद्दो -जहद के बाद आखिर हम दोनों एक दूसरे को अपने जिस्म से सटाये बस के आखिर मे पहुँच गए जैसा गुप्ता जी ने कहा था बस मे पीछे की ओर वाकई मे काफी जगह थी यहाँ पर लोग बोहोत ही कम थे ,और जो थे वो हमसे आगे ही थे । यहाँ आकर हमे कुछ राहत मिली और एक सुकून की साँस हम दोनों ने ली । मगर यहाँ आकर भी गुप्ता जी ने मुझे अपनी बाहों की पकड़ से आजाद नहीं किया बल्कि उसी तरह अपने एक हाथ से मेरी पीठ को पकड़े और दूसरे हाथ से मेरे नितम्बों की गोलाइयों को थामे गुप्ता जी मुझे अपने जिस्म की ओर बाँधे खड़े रहे ।
मानों वो मुझसे दूर हटना भूल गए हों या शायद हटना ही ना चाहते हो । जब गुप्ता जी की ओर से कोई गतिविधि नहीं हुई तब मैंने ही उनकी ओर देखते हुए कहा -
मैं - गुप्ता जी.... ।
गुप्ता जी( वैसे ही ) - हम्म क्या हुआ पदमा ।
मैं - मुझे छोड़िए ना अब ।
मेरी बात सुनकर जैसे गुप्ता जी को ध्यान आया की मैं अभी भी उनकी बाहों की कैद मे हूँ और फिर " ओह हाँ पदमा ....... । " कहते हुए गुप्ता जी ने अपना एक हाथ मेरी पीठ से वापस खिंच किया और दूसरा हाथ भी मेरे नितम्बों पर से हटा लिया और मुझे अपनी पकड़ से आजाद करके शांति से वही खड़े हो गए । हम दोनों बस के बिल्कुल आखिर मे खड़े थे हमारे साथ बगल मे कोई ओर दूसरा आदमी नहीं था । बाकी के सभी लोग हमसे आगे ही खड़े थे, वो सब लोग सामने की ओर चेहरा करके खड़े थे और उन सबकी पीठ हमारी ओर ही थी । इतनी देर उस भीड़ मे गुप्ता जी के साथ चिपके रहने से मेरी साँसे बोहोत भारी हो गई थी और मेरी साँसे बोहोत तेज तेज चल रही थी जिसके कारण मेरी चूचियाँ भी तेजी के साथ ऊपर नीचे हो रही थी
और उनपर गुप्ता जी किसी गिद्ध की तरह नजर गड़ाए खड़े थे । जब मैंने ये बात नोटिस की तो अपने आप को नॉर्मल करते हुए , गुप्ता जी की ओर से घूमकर दूसरी तरफ मुहँ कर लिया और खड़ी हो गई ।
और फिर यहाँ से शुरू हुआ गुप्ता जी का वासना भरा मेरे जिस्म से खिलवाड़ करने का दूसरा प्रकरण , जिसके लिए गुप्ता जी मुझे पीछे लेकर आए थे ---
मैं और गुप्ता जी बस मे सबसे पीछे खड़े थे और कुछ इस तरह से खड़े थे कि गुप्ता जी मेरे पीछे थे और मे बस का सहारा लिए हुए उनके आगे खड़ी थी । गुप्ता जी के मन का चोर तो मैं जानती थी और मेरे दिल मे भी उनके आगे खड़े होने से बैंक के वही चल-चित्र घूम रहे थे जो उन्होंने मेरे साथ उस अंधेरी गैलरी मे कीये थे , मुझे से भी डर था कि कही गुप्ता जी यहाँ भी शुरू ना हो जाए और थोड़ी ही देर मैं मेरा डर सच साबित होने लगा ,,,
बस के आगे बढ़ने के साथ -साथ गुप्ता जी मुझसे पीछे से सटने लगे और बस के झटकों का बहाना बना कर बार बार मुझसे टकराने की कोशिश करने लगे
, गुप्ता जी का बार-बार का ऐसा करना मुझे भी असहज बनाने लगा थोड़ी ही देर मैं गुप्ता जी पीछे से मुझसे बिल्कुल मिल गए और मैं उनसे दूरी बनाने की कोशिश करती हुई थोड़ा आगे होने की कोशिश करने लगी , लेकिन इससे मेरी उलझने दूर नहीं हुई क्योंकि अगले ही पल गुप्ता जी फिर बस के धक्कों का बहाना बना पीछे से मुझसे आन मिले ,
अब तो मेरे पास आगे जाने की भी जगह बची थी मे बस और गुप्ता जी के बीच मे फँस कर रह गई । बस से तो कोई खतरा नहीं ना था मगर पीछे से गुप्ता जी का तनाव बना चुका लिंग मुझे मेरे नितम्बों पर चुभ रहा था और गुप्ता जी बस के धक्कों के बहाने से मेरे नितम्बों पर अपने कड़े लिंग से पेंट के अन्दर से ही वार कर रहे थे । मैं अपने हाथों से गुप्ता जी को पीछे धकलते हुए अपने और गुप्ता जी के बीच मे कुछ गैप बनाने की कोशिश कर रही थी
क्योंकि गुप्ता जी का लिंग ना केवल मेरे नितम्बों बल्कि मेरे दिलों - दिमाग पर भी वार कर रहा था । जिस्म मे फिर से वही झुरझुराहट महसूस होने लगी थी एक तो गुप्ता जी के साथ बैंक मे बिताए वो पल और फिर बस के अन्दर गुप्ता जी के जिस्म से वो मजबूत आलिंगन ,, रह रहकर मेरा जिस्म मेरे दिमाग पर हावी होने लगा । गुप्ता जी मेरे इतने करीब आ चुके थे कि पीछे से उनके होंठों और नाक से निकलने वाली गरम साँसे अपनी दस्तक मेरे कानों और गर्दन पर दे रही थी ।
ना जाने मुझे फिर से क्या होने लगा था कि मैं चाहकर भी गुप्ता जी को रोक नहीं पा रही थी । मैंने धीरे से अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो जाना कि सब लोग आगे देखने मे व्यस्त है किसी का ध्यान पीछे नहीं है , मैंने चैन की साँस ली , मगर उधर गुप्ता जी ना तो खुद शांत हो रहे थे ना मुझे होने दे रहे थे । गुप्ता जी बस के हर एक झटके का पूरा फायदा उठाते हुए मुझे पीछे से दीवाना कर रहे थे । मैं उन्हे कुछ कह पाने की स्थिति मे भी नहीं थी । मगर मेरा बोलना अब अनिवार्य हो गया था , मैं नहीं चाहती थी कि गुप्ता जी की हिम्मत और बढ़े और वो कुछ और आगे ना करने लगे और दूसरी तरफ मेरा खुद पर से काबू भी छूटता जा रहा था और फिर अचानक गुप्ता जी ने मेरी साड़ी के ऊपर से मेरे नितम्बों पे हाथ रख दिए और वहाँ धीरे से सहलाने लगे , बैंक के अन्दर भी गुप्ता जी ने मुझे ऐसा तड़पाया की मेरी योनि से चुतरस बस निकलने ही वाला था और अब यहाँ पर गुप्ता जी के ये असहनीय कामुक वार मुझे फिर से बहकने पर मजबूर कर रहे थे
इसलिए मैंने गुप्ता जी के हाथ अपने नितम्बों से हठाते हुए उन्हे कहा -
मैं ( अपनी कामुकता छिपाते हुए ) -गुप्ता जी ....थोड़ा पीछे रहिए ना ......ऐसे कोई देखेगा तो क्या सोचेगा .......।
गुप्ता जी ( बेझिझक )- अरे ..मैं क्या बताऊ पदमा ... बोहोत ठंड लग रही है बस मे तो सोचा कि क्यों ना तुम्हारे पास ही खड़ा हो जाऊँ । वैसे तुम्हें भी तो ठंड लग रही होगी ना ..... तो क्यों ना हम थोड़ी देर ऐसे ही रहे ।
मैं - ......हह मगर गुप्ता जी लोग देख लेंगे तो ...... ।
गुप्ता जी - कोई नहीं देख सकता पदमा ..। सब हमसे आगे खड़े है और वो लोग सामने देख रहे है तुम फिक्र मत करो ।
मैं - लेकिन गुप्ता जी .... बस के धक्कों से जब आप मेरे ऊपर गिरते हो तो मैं पूरी हिल जाती हूँ ।
गुप्ता जी - ओह अच्छा ..... ये बात है तो इसका मैं एक इलाज जानता हूँ ।
मैं ( सोचते हुए ) - क्या उपाय है गुप्ता जी ।।?
गुप्ता जी - क्यों ना मैं तुम्हारी कमर को पीछे से पकड़ लूँ पदमा फिर तो कोई परेशानी नहीं होगी है ना .......।
गुप्ता जी की ये बात सुनकर तो मैं और भी परेशान हो गई , ये मेरे लिए और भी दुविधाजनक बात हो गई थी , मैंने गुप्ता जी को मना करते हुए कहा -
मैं - नहीं ... गुप्ता जी .... मुझे वहाँ ना छूइएगा ..... प्लीज ।
गुप्ता जी - मगर क्यों पदमा क्या हो जाएगा ?
मैं - नहीं.... गुप्ता जी..... समझने की कोशिश कीजिए ..... कुछ हो जाएगा ..... ।
गुप्ता जी - ये बात है तब तो मैं जरूर छूकर देखूँगा ।
और फिर मेरे बदन मे कंपकपी छूट गई जब गुप्ता जी ने धीरे से अपने हाथ मेरी कमर पर रख दिए और वहाँ पर अनजान बनते हुए सहलाने लगे ।
गुप्ता जी - लो देखो कुछ भी तो नहीं हुआ ।
मैं - आह ..... ... गुप्ता जी .... आप बड़े जिद्दी है ।
गुप्ता जी( पीछे से मुस्कुराते हुए ) - पदमा तुम्हें भी ठंड लग रही है , देखो ना तुम्हारा बदन कैसे भँवरे की तरह थरथरा रहा है ।
अब मैं गुप्ता जी को क्या बताऊँ कि मेरा बदन ठंड की वजह से नहीं बल्कि उनके कामुक कारनामों से होने वाली उत्तेजना के कारण कांप रहा है , अब तो उन्हे वैसे भी मेरे बदन से खेलने का बहाना मिल गया था और वो अपने सर को मेरे कंधे से लगभग बिल्कुल लगा के अपनी गरम साँसे मेरी गर्दन पर चुभाते हुए मेरी हवस की अग्नि को हवा दे रहे थे ,और नीचे उनके हाथ मेरी नाभी और पेट पर घूम रहे थे जिसकी वजह से मेरे पेट थर-थर काँप रहा था और साँसे तेजी से चल रही थी ।
इसी बीच गुप्ता जी के हाथ मेरी नाभी के नीचे लटके मेरे कमरबंध (waistband) पर जा फसे और उसे अपने हाथों मे लेते हुए गुप्ता जी मेरे कानों मे धीरे से बोले -
गुप्ता जी - हम्म ... अब मुझे पता चल गया पदमा ।
मैं - क्या पता चल गया गुप्ता जी ।
गुप्ता जी - यही की तुम्हें ठंड क्यों लग रही है ?और क्यों तुम्हारा बदन काँप रहा है ?
गुप्ता जी की बात सुनकर मैं थोड़ी हैरान रह गई और मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा पता नहीं गुप्ता जी अब अपने मुहँ से कौन सी बात निकलेंगे । मैं गुप्ता जी की ओर पीछे धीरे से सवालिया नज़रों से देखा तो गुप्ता जी बोले - "ये सब इसकी वजह से हो रहा है ना ?"
गुप्ता जी का इशारा नीचे मेरी कमर पर बँधे कमरबन्द की ओर था, मैंने देखा गुप्ता जी उसमे उलझे उसे उससे खेलते हुए बोले - " मैं इसे उतार देता हूँ पदमा , ताकि तुम्हें ठंड ना लगे तुम बाद मे इसे जाते हुए ले लेना । "
ये कहकर गुप्ता जी ने मेरे जवाब का इंतज़ार कीये बिना अपनी ऊँगलियों को मेरे पेट पर घुमाते हुए मेरी कमर के कमरबंद को उतार दिया
और फिर से वहाँ पर अपने हाथ घुमाते हुए मेरे बदन से खेलने लगे मेरे बदन का रोम रोम गुप्ता जी के वार से जलने लगा गुप्ता जी धीरे धीरे मेरे इतने करीब आ गए की मेरे कंधों और कानों पे उन्हे गरम होंठों का स्पर्श मुझे होने लगा यहाँ तक की मेरी चूचियाँ भी बेधड़क होकर ऊपर नीचे होती हुई उत्तेजित अवस्था मे आने लगी । गुप्ता जी ने फिर से अपने अधूरे काम को पूरा करने की मंशा से एक बार फिर मेरे नितम्बों पर हाथ रखा और उन्हे मसलना शुरू किया और इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि उनके होंठ मेरे कंधों से दूर ना हो जाए क्योंकि वो जानते थे कि अगर मैं एक बार उनके हवस के फैलाए जाल से निकल गई तो फिर उन्हे सब कुछ दोबारा से शुरू करना होगा इसलिए गुप्ता जी ने अपने होंठो को मेरे कानों पर लगा कर वहाँ बार-बार चूमा ।
और अब गुप्ता जी ने अपने हाथों की सखताई मेरे गद्देदार नितम्बों पर और भी मजबूत कर दी और मेरी साड़ी को उठा-उठाकर मेरे नितम्बों को रगड़ने लगे अब मेरे हौसले भी जवाब देने लगे थे और गुप्ता जी ने मुझे हवस के गहरे कुएँ धकलने का पूरा इंतेजम कर लिया ।
गुप्ता जी एक दर्जी थे जो उनके हाथों के पकड़ने की कला से ही जाहिर हो जाता है , मेरे नितम्बों की गोलाइयों का बराबर माप लेते हुए वो उन्हे मसलने लगे और मेरे गालों पर चूमते हुए गुप्ता जी ने मेरे कान को एक बार अपने गरम होंठों मे भर लिया और उसे ना केवल जी भरकर चूसा बल्कि अंत मे अपने कठोर दाँतों से उस पर काट कर वहाँ अपने प्यार का प्रतीक बना दिया ।
" आह .........।..। गुप्ता जी ................... । " - मैंने अपने होंठों से हुँकार भरी । जिसे सुनकर गुप्ता जी पीछे से ही बोले - " मजा आ रहा है ना पदमा । "
मैं - ऑफफ ...... गुप्ता जी ये आप क्या कर रहे है ...... ।
गुप्ता जी - तुम बस मजा लो पदमा ......... । आज तुम्हें बोहोत मजा आने वाला है ।
मैं - म्मम्म् ..... नहीं गुप्ता जी .... मुझे छोड़िए कोई देख लेगा .... आह ..... ।
गुप्ता जी मेरी हर बात को नज़रअंदाज़ करते हुए बस आपनी वासना की आग मिटाने मे लगे थे और मुझे अब पीछे से अपनी बाहों मे भरकर अपनी पैंट मे कैद फनफनाते हुए लिंग से मेरे नितम्बों धीरे-धीरे पर धक्के लगाने लगे । मेरी दिल की धड़कनों का ऐसा हाल था की मेरी चूचियाँ मेरा ब्लाउज और ब्रा फाड़कर बाहर निकलने को बेताब हो रही थी और साँसे तो मैं क्या ही कहूँ ?
मुझे इतना अजीब जी उत्तेजना महसूस हो रही थी कि मैं बता नहीं सकती । बस के अन्दर एक अजीब ही माहोल बन गया था कितने ही लोग हमसे आगे खड़े सीधे देख रहे थे और इधर गुप्ता जी मुझे लूटने मे व्यस्त थे ।
गुप्ता जी - पदमा ..... तुम्हें अपना वादा याद है ना ।
मैं समझ रही थी कि गुप्ता जी क्या कहना चाह रहे है ......
मैं - शशशश......कौन स वादा गुप्ता जी ....... ?
गुप्ता जी - अभी बताता हूँ ..... ।
कहते हुए गुप्ता जी ने मेरे पीछे से अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर और अपनी बाहों को भी मेरे इर्द-गिर्द से हटा लिया अब गुप्ता जी के लिंग का वार मेरे नितम्बों पर नहीं हो रहा था और ना ही उनके वो चुंबन मे कानों और गले पर पड़ रहे थे । एक बार को तो मुझे थोड़ा आश्चर्य सा हुआ कि ये क्या हुआ गुप्ता जी को , क्योंकि मुझे भी इस खेल मैं अब मजा आ रहा था और मैं भी गुप्ता जी के जिस्म से मिलने वाले मजे का आनंद ले रही थी , और अगले ही पल गुप्ता जी ने मुझे मेरी कमर के दोनों भागों से पकड़कर अपनी ओर घूमा दिया
और बिना देरी कीये मेरी साड़ी का पल्लू सामने से हटाते हुए मेरे गले से लेकर ब्लाउज के क्लीवेज तक मुझे ज़ोरों से चूमने लगे । मेरे बदन की नस-नस मे गुप्ता जी ने अपनी हवस की बिजली भरनी शुरू करदी
मैं - आह ..... गुप्ता जी ..... अब बस कीजिए ...... नाह ....... ।
गुप्ता जी ने एक पल के लिए अपने होंठ मेरे जिस्म से हटाते हुए कहा - " पहले बताओ .... अपना वादा याद है ना ? " और इतना कहकर फिर से मुझे चूमने लगे और अपने हाथ मेरे पीछे साड़ी पर लेजाकर मेरे नितम्बों को जोर जोर से रगड़ने और मसलने लगे ।
मैं - हाँ .... गुप्ता जी ..... मुझे ...याद है ..... अपना वादा ..... ओह ..।
गुप्ता जी - तो वादा पूरा करो पदमा .... ।
मैं - ओह गुप्ता जी ..... यहाँ नहीं ...... प्लीज ...... ।
गुप्ता जी - नहीं पदमा ..... अब मैं और इंतज़ार नहीं कर सकता ..। मेरे होंठ बोहोत प्यासे हो चुके है अब इनकी प्यास तुम्हारे इन रसीले लबों के शरबत से ही बुझेगी ।
मैं - गुप्ता जी ...... प्लीज ..... नहीं ,,,,,,, कोई देख लेगा .... तो मैं बर्बाद हो जाऊँगी .... ।
और गुप्ता जी के साथ बस के पिछले भाग की ओर जाने लगी , मगर मैं नहीं जानती थी कि जिसे मैं गुप्ता जी की उदारता समझ रही हूँ वो दरसल उनकी एक योजना का हिस्सा है । बस मे पीछे की ओर जाते हुए भी हमे एक भीड़ के दायरे को पार करना था । इसके लिए गुप्ता जी ने मेरा हाथ जो अभी भी उन्हे खुरदुरे हाथ मे अटखेलियाँ कर रहा था को अपनी कमर पर लपेटा और खुद अपना एक हाथ धीरे से मेरी पतली कमर से गुजारते हुए उसे मजबूती से अपने शिकंजे मे ले लिया
और दूसरे हाथ को मेरी नंगी बैकलेस पीठ पर रखकर मुझे अपनी ओर ताकत से खींचा इससे मेरी जो चूचियाँ गुप्ता जी के सिने से अबतक रगड़ खा रही थी वो अब उनकी छाती से अब बिल्कुल दब गई और तो और इस झटके से मेरे और गुप्ता जी के होंठ भी एक दूसरे के बिल्कुल करीब आ गए और हमारे होंठों से निकलने वाली गरम साँसों ने एक दूसरे को काम-क्रिया को दी जाने वाली संजीवनी की तरह एक दूसरे को रोमांचित करना शुरू कर दिया ।
मेरे और गुप्ता जी के होंठों के मध्य अब बस नाम मात्र का फ़ासला था ऐसा लगता रहा था कि गुप्ता जी के काले खुरदुरे होंठ किसी भी पल मेरे रसीले शरबत से भरे होंठों पर टूट पड़ेंगे और इनका सारा रस-शरबत पी जाएंगे । इस प्रकार एक भीड़ भरी बस मे एक पराए मर्द के साथ चिपकने मे मुझे बोहोत शर्म आ रही थी
और ऊपर से गुप्ता जी थे भी तो उम्र मे मुझसे कही बड़े । मेरे मन मे ये चिंता भी थी कि कही कोई हमे इस तरह एक दूसरे का आलिंगन कीये हुए ना देख ले , मैंने अपने चारों ओर देखा तो पाया किसी का ध्यान हम पर नहीं था सब लोग भीड़ के कारण परेशान थे । मुझे अपने जिस्म से ऐसे ही चिपकाए गुप्ता जी उस भारी भीड़ मे आगे बढ़ने लगे और हर पल के साथ मेरे जिस्म पर अपने हाथों की पकड़ और भी मजबूत करते गए और अपने हाथ मेरी कमर और पीठ पर घुमा-कर उनपर अपनी ऊँगलियों की चाप छोड़ने लगे । बीच -2 मे गुप्ता जी के होंठों से निकलती भारी साँसों की गंध मेरे मुहँ और नाक के जरिए मेरे अन्दर जाने लगी और मेरी साँसों मे भी खलबली मचने लगी ।
एक तो पहले से ही गुप्ता जी के इतने करीब होने से मेरी साँसे शर्म के मारे बावली हो रही थी और दूसरे हमले के लिए गुप्ता जी के खुरदुरे हाथ जो पीछे से मेरे जिस्म का आनंद उठा रहे थे, मेरे अन्दर रोम-रोम को तना रहे थे । गुप्ता जी का वो हाथ जो अबतक मेरी कमर को अपनी पकड़ मे बाँधे हुए था अब धीरे-2 नीचे सरकते हुए मेरे नितम्बों पर आ टीका था और उनपर बड़े प्यार से सहला रहा था अन्दर ही अन्दर मैं गुप्ता जी को कोस रही थी "अगर वो वहाँ आकर उस टैक्सी ड्राइवर से झगड़ा ना करते तो मैं कैसे भी मैंनेज करके उसी टैक्सी मे चली जाती, मगर अब गुप्ता जी के साथ इस भीड़ भरी बस मे धक्के खाते हुए जाना पड़ रहा है वो भी खड़े-खड़े और ऊपर से गुप्ता जी की ये बेबाक हरकते मेरे जिस्म को मोमबत्ती की तरह पिघलने पर मजबूर कर रही है । " मैं अपने विचारों की दुविधा मे थी कि इसी दौरान भीड़ से निकलते हुए एकाक बस मे एक धक्का सा लगा गुप्ता जी अपने स्थान से विचलित होते हुए मेरे होंठों पर गिरने को हो गए, मैं और गुप्ता जी पहले ही बेहद करीब थे और इसपर गुप्ता जी का मेरी ओर झुकना इसका सीधा मतलब था गुप्ता जी का मेरे होंठों पर होने वाला हमला , पर मैंने समय रहते स्थिति को संभाल लिया और ऐन मौके पर अपने होंठों को गुप्ता जी के होंठों से दूर खींचते हुए अपना सर दूसरी ओर घुमा लिया लेकिन इतना करने पर मेरे होंठ तो गुप्ता जी के होंठों से बच गए पर मेरे गाल उनके होंठों के स्पर्श से नहीं बच पाए और गुप्ता जी ने मौका पाते ही , मेरे गाल के निचले हिस्से पर अपने होंठ रगड़ते हुए वहाँ पर मुझे चूम लिया ।
एकदम से हुए इस वाक्या से गुप्ता जी थोड़े सम्भलते हुए मेरी ओर देखकर बोले - "ओह ... माफ करना पदमा ,पीछे से एकदम से धक्का लग गया था । " अपने आप को संभालते हुए मैंने सबसे पहले ये देखा कि कही गुप्ता जी को ऐसा करते हुए किसी और ने बस मे देखा तो नहीं । जब मैंने सुनिश्चित कर लिया की सब अपने मे मस्त है किसी को हम पर नजर रखने की फुर्सत नहीं तो मैंने गुप्ता जी की बात का जवाब दिया -
मैं - कोई बात नहीं गुप्ता जी , मैं समझ सकती हूँ बस मे बोहोत भीड़ है ।
मेरी बात सुनकर गुप्ता जी थोड़े सीधे हुए और आगे बढ़ने लगे । मैं तो बस जल्द से जल्द गुप्ता जी के चंगुल से निकलना चाहती थी ,क्योंकि गुप्ता जी का जो हाथ मेरे गोल भारी मांसल नितम्बों को पहले केवल सहला रहा था अब धीरे धीरे उन्हे अपने हाथों मे भरने की कोशिशे करने लगा था । और एक बार तो गुप्ता जी ने भीड़ का फायदा उठाते हुए मेरे एक नितम्ब को अपने हाथ मे जितना हो सके उतना भरकर जोर से दबा दिया ।
हड़बड़ाहट और रोमांच मे मेरे मुहँ से एक "आह......" फूट पड़ी ।
मेरी आह सुनते ही गुप्ता जी अपने होंठों पर एक कुटिल मुस्कान लिए मेरी आँखों मे देखते हुए बोले - "क्या हुआ पदमा । "
अपनी नज़रों को गुप्ता जी की सवालिया नज़रों से चुराते हुए और अपनी घबराहट छिपाते हुए मैं उनसे कहा - "कुछ नहीं गुप्ता जी , थोड़ा भीड़ की वजह से ......... "
मैंने अपनी बात को अधूरा छोड़ दिया जिसे गुप्ता जी ने पूरा किया ।
गुप्ता जी - ओह ..... बस थोड़ी देर और पदमा । "
फिर थोड़ी ओर जद्दो -जहद के बाद आखिर हम दोनों एक दूसरे को अपने जिस्म से सटाये बस के आखिर मे पहुँच गए जैसा गुप्ता जी ने कहा था बस मे पीछे की ओर वाकई मे काफी जगह थी यहाँ पर लोग बोहोत ही कम थे ,और जो थे वो हमसे आगे ही थे । यहाँ आकर हमे कुछ राहत मिली और एक सुकून की साँस हम दोनों ने ली । मगर यहाँ आकर भी गुप्ता जी ने मुझे अपनी बाहों की पकड़ से आजाद नहीं किया बल्कि उसी तरह अपने एक हाथ से मेरी पीठ को पकड़े और दूसरे हाथ से मेरे नितम्बों की गोलाइयों को थामे गुप्ता जी मुझे अपने जिस्म की ओर बाँधे खड़े रहे ।
मानों वो मुझसे दूर हटना भूल गए हों या शायद हटना ही ना चाहते हो । जब गुप्ता जी की ओर से कोई गतिविधि नहीं हुई तब मैंने ही उनकी ओर देखते हुए कहा -
मैं - गुप्ता जी.... ।
गुप्ता जी( वैसे ही ) - हम्म क्या हुआ पदमा ।
मैं - मुझे छोड़िए ना अब ।
मेरी बात सुनकर जैसे गुप्ता जी को ध्यान आया की मैं अभी भी उनकी बाहों की कैद मे हूँ और फिर " ओह हाँ पदमा ....... । " कहते हुए गुप्ता जी ने अपना एक हाथ मेरी पीठ से वापस खिंच किया और दूसरा हाथ भी मेरे नितम्बों पर से हटा लिया और मुझे अपनी पकड़ से आजाद करके शांति से वही खड़े हो गए । हम दोनों बस के बिल्कुल आखिर मे खड़े थे हमारे साथ बगल मे कोई ओर दूसरा आदमी नहीं था । बाकी के सभी लोग हमसे आगे ही खड़े थे, वो सब लोग सामने की ओर चेहरा करके खड़े थे और उन सबकी पीठ हमारी ओर ही थी । इतनी देर उस भीड़ मे गुप्ता जी के साथ चिपके रहने से मेरी साँसे बोहोत भारी हो गई थी और मेरी साँसे बोहोत तेज तेज चल रही थी जिसके कारण मेरी चूचियाँ भी तेजी के साथ ऊपर नीचे हो रही थी
और उनपर गुप्ता जी किसी गिद्ध की तरह नजर गड़ाए खड़े थे । जब मैंने ये बात नोटिस की तो अपने आप को नॉर्मल करते हुए , गुप्ता जी की ओर से घूमकर दूसरी तरफ मुहँ कर लिया और खड़ी हो गई ।
और फिर यहाँ से शुरू हुआ गुप्ता जी का वासना भरा मेरे जिस्म से खिलवाड़ करने का दूसरा प्रकरण , जिसके लिए गुप्ता जी मुझे पीछे लेकर आए थे ---
मैं और गुप्ता जी बस मे सबसे पीछे खड़े थे और कुछ इस तरह से खड़े थे कि गुप्ता जी मेरे पीछे थे और मे बस का सहारा लिए हुए उनके आगे खड़ी थी । गुप्ता जी के मन का चोर तो मैं जानती थी और मेरे दिल मे भी उनके आगे खड़े होने से बैंक के वही चल-चित्र घूम रहे थे जो उन्होंने मेरे साथ उस अंधेरी गैलरी मे कीये थे , मुझे से भी डर था कि कही गुप्ता जी यहाँ भी शुरू ना हो जाए और थोड़ी ही देर मैं मेरा डर सच साबित होने लगा ,,,
बस के आगे बढ़ने के साथ -साथ गुप्ता जी मुझसे पीछे से सटने लगे और बस के झटकों का बहाना बना कर बार बार मुझसे टकराने की कोशिश करने लगे
, गुप्ता जी का बार-बार का ऐसा करना मुझे भी असहज बनाने लगा थोड़ी ही देर मैं गुप्ता जी पीछे से मुझसे बिल्कुल मिल गए और मैं उनसे दूरी बनाने की कोशिश करती हुई थोड़ा आगे होने की कोशिश करने लगी , लेकिन इससे मेरी उलझने दूर नहीं हुई क्योंकि अगले ही पल गुप्ता जी फिर बस के धक्कों का बहाना बना पीछे से मुझसे आन मिले ,
अब तो मेरे पास आगे जाने की भी जगह बची थी मे बस और गुप्ता जी के बीच मे फँस कर रह गई । बस से तो कोई खतरा नहीं ना था मगर पीछे से गुप्ता जी का तनाव बना चुका लिंग मुझे मेरे नितम्बों पर चुभ रहा था और गुप्ता जी बस के धक्कों के बहाने से मेरे नितम्बों पर अपने कड़े लिंग से पेंट के अन्दर से ही वार कर रहे थे । मैं अपने हाथों से गुप्ता जी को पीछे धकलते हुए अपने और गुप्ता जी के बीच मे कुछ गैप बनाने की कोशिश कर रही थी
क्योंकि गुप्ता जी का लिंग ना केवल मेरे नितम्बों बल्कि मेरे दिलों - दिमाग पर भी वार कर रहा था । जिस्म मे फिर से वही झुरझुराहट महसूस होने लगी थी एक तो गुप्ता जी के साथ बैंक मे बिताए वो पल और फिर बस के अन्दर गुप्ता जी के जिस्म से वो मजबूत आलिंगन ,, रह रहकर मेरा जिस्म मेरे दिमाग पर हावी होने लगा । गुप्ता जी मेरे इतने करीब आ चुके थे कि पीछे से उनके होंठों और नाक से निकलने वाली गरम साँसे अपनी दस्तक मेरे कानों और गर्दन पर दे रही थी ।
ना जाने मुझे फिर से क्या होने लगा था कि मैं चाहकर भी गुप्ता जी को रोक नहीं पा रही थी । मैंने धीरे से अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो जाना कि सब लोग आगे देखने मे व्यस्त है किसी का ध्यान पीछे नहीं है , मैंने चैन की साँस ली , मगर उधर गुप्ता जी ना तो खुद शांत हो रहे थे ना मुझे होने दे रहे थे । गुप्ता जी बस के हर एक झटके का पूरा फायदा उठाते हुए मुझे पीछे से दीवाना कर रहे थे । मैं उन्हे कुछ कह पाने की स्थिति मे भी नहीं थी । मगर मेरा बोलना अब अनिवार्य हो गया था , मैं नहीं चाहती थी कि गुप्ता जी की हिम्मत और बढ़े और वो कुछ और आगे ना करने लगे और दूसरी तरफ मेरा खुद पर से काबू भी छूटता जा रहा था और फिर अचानक गुप्ता जी ने मेरी साड़ी के ऊपर से मेरे नितम्बों पे हाथ रख दिए और वहाँ धीरे से सहलाने लगे , बैंक के अन्दर भी गुप्ता जी ने मुझे ऐसा तड़पाया की मेरी योनि से चुतरस बस निकलने ही वाला था और अब यहाँ पर गुप्ता जी के ये असहनीय कामुक वार मुझे फिर से बहकने पर मजबूर कर रहे थे
इसलिए मैंने गुप्ता जी के हाथ अपने नितम्बों से हठाते हुए उन्हे कहा -
मैं ( अपनी कामुकता छिपाते हुए ) -गुप्ता जी ....थोड़ा पीछे रहिए ना ......ऐसे कोई देखेगा तो क्या सोचेगा .......।
गुप्ता जी ( बेझिझक )- अरे ..मैं क्या बताऊ पदमा ... बोहोत ठंड लग रही है बस मे तो सोचा कि क्यों ना तुम्हारे पास ही खड़ा हो जाऊँ । वैसे तुम्हें भी तो ठंड लग रही होगी ना ..... तो क्यों ना हम थोड़ी देर ऐसे ही रहे ।
मैं - ......हह मगर गुप्ता जी लोग देख लेंगे तो ...... ।
गुप्ता जी - कोई नहीं देख सकता पदमा ..। सब हमसे आगे खड़े है और वो लोग सामने देख रहे है तुम फिक्र मत करो ।
मैं - लेकिन गुप्ता जी .... बस के धक्कों से जब आप मेरे ऊपर गिरते हो तो मैं पूरी हिल जाती हूँ ।
गुप्ता जी - ओह अच्छा ..... ये बात है तो इसका मैं एक इलाज जानता हूँ ।
मैं ( सोचते हुए ) - क्या उपाय है गुप्ता जी ।।?
गुप्ता जी - क्यों ना मैं तुम्हारी कमर को पीछे से पकड़ लूँ पदमा फिर तो कोई परेशानी नहीं होगी है ना .......।
गुप्ता जी की ये बात सुनकर तो मैं और भी परेशान हो गई , ये मेरे लिए और भी दुविधाजनक बात हो गई थी , मैंने गुप्ता जी को मना करते हुए कहा -
मैं - नहीं ... गुप्ता जी .... मुझे वहाँ ना छूइएगा ..... प्लीज ।
गुप्ता जी - मगर क्यों पदमा क्या हो जाएगा ?
मैं - नहीं.... गुप्ता जी..... समझने की कोशिश कीजिए ..... कुछ हो जाएगा ..... ।
गुप्ता जी - ये बात है तब तो मैं जरूर छूकर देखूँगा ।
और फिर मेरे बदन मे कंपकपी छूट गई जब गुप्ता जी ने धीरे से अपने हाथ मेरी कमर पर रख दिए और वहाँ पर अनजान बनते हुए सहलाने लगे ।
गुप्ता जी - लो देखो कुछ भी तो नहीं हुआ ।
मैं - आह ..... ... गुप्ता जी .... आप बड़े जिद्दी है ।
गुप्ता जी( पीछे से मुस्कुराते हुए ) - पदमा तुम्हें भी ठंड लग रही है , देखो ना तुम्हारा बदन कैसे भँवरे की तरह थरथरा रहा है ।
अब मैं गुप्ता जी को क्या बताऊँ कि मेरा बदन ठंड की वजह से नहीं बल्कि उनके कामुक कारनामों से होने वाली उत्तेजना के कारण कांप रहा है , अब तो उन्हे वैसे भी मेरे बदन से खेलने का बहाना मिल गया था और वो अपने सर को मेरे कंधे से लगभग बिल्कुल लगा के अपनी गरम साँसे मेरी गर्दन पर चुभाते हुए मेरी हवस की अग्नि को हवा दे रहे थे ,और नीचे उनके हाथ मेरी नाभी और पेट पर घूम रहे थे जिसकी वजह से मेरे पेट थर-थर काँप रहा था और साँसे तेजी से चल रही थी ।
इसी बीच गुप्ता जी के हाथ मेरी नाभी के नीचे लटके मेरे कमरबंध (waistband) पर जा फसे और उसे अपने हाथों मे लेते हुए गुप्ता जी मेरे कानों मे धीरे से बोले -
गुप्ता जी - हम्म ... अब मुझे पता चल गया पदमा ।
मैं - क्या पता चल गया गुप्ता जी ।
गुप्ता जी - यही की तुम्हें ठंड क्यों लग रही है ?और क्यों तुम्हारा बदन काँप रहा है ?
गुप्ता जी की बात सुनकर मैं थोड़ी हैरान रह गई और मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा पता नहीं गुप्ता जी अब अपने मुहँ से कौन सी बात निकलेंगे । मैं गुप्ता जी की ओर पीछे धीरे से सवालिया नज़रों से देखा तो गुप्ता जी बोले - "ये सब इसकी वजह से हो रहा है ना ?"
गुप्ता जी का इशारा नीचे मेरी कमर पर बँधे कमरबन्द की ओर था, मैंने देखा गुप्ता जी उसमे उलझे उसे उससे खेलते हुए बोले - " मैं इसे उतार देता हूँ पदमा , ताकि तुम्हें ठंड ना लगे तुम बाद मे इसे जाते हुए ले लेना । "
ये कहकर गुप्ता जी ने मेरे जवाब का इंतज़ार कीये बिना अपनी ऊँगलियों को मेरे पेट पर घुमाते हुए मेरी कमर के कमरबंद को उतार दिया
और फिर से वहाँ पर अपने हाथ घुमाते हुए मेरे बदन से खेलने लगे मेरे बदन का रोम रोम गुप्ता जी के वार से जलने लगा गुप्ता जी धीरे धीरे मेरे इतने करीब आ गए की मेरे कंधों और कानों पे उन्हे गरम होंठों का स्पर्श मुझे होने लगा यहाँ तक की मेरी चूचियाँ भी बेधड़क होकर ऊपर नीचे होती हुई उत्तेजित अवस्था मे आने लगी । गुप्ता जी ने फिर से अपने अधूरे काम को पूरा करने की मंशा से एक बार फिर मेरे नितम्बों पर हाथ रखा और उन्हे मसलना शुरू किया और इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि उनके होंठ मेरे कंधों से दूर ना हो जाए क्योंकि वो जानते थे कि अगर मैं एक बार उनके हवस के फैलाए जाल से निकल गई तो फिर उन्हे सब कुछ दोबारा से शुरू करना होगा इसलिए गुप्ता जी ने अपने होंठो को मेरे कानों पर लगा कर वहाँ बार-बार चूमा ।
और अब गुप्ता जी ने अपने हाथों की सखताई मेरे गद्देदार नितम्बों पर और भी मजबूत कर दी और मेरी साड़ी को उठा-उठाकर मेरे नितम्बों को रगड़ने लगे अब मेरे हौसले भी जवाब देने लगे थे और गुप्ता जी ने मुझे हवस के गहरे कुएँ धकलने का पूरा इंतेजम कर लिया ।
गुप्ता जी एक दर्जी थे जो उनके हाथों के पकड़ने की कला से ही जाहिर हो जाता है , मेरे नितम्बों की गोलाइयों का बराबर माप लेते हुए वो उन्हे मसलने लगे और मेरे गालों पर चूमते हुए गुप्ता जी ने मेरे कान को एक बार अपने गरम होंठों मे भर लिया और उसे ना केवल जी भरकर चूसा बल्कि अंत मे अपने कठोर दाँतों से उस पर काट कर वहाँ अपने प्यार का प्रतीक बना दिया ।
" आह .........।..। गुप्ता जी ................... । " - मैंने अपने होंठों से हुँकार भरी । जिसे सुनकर गुप्ता जी पीछे से ही बोले - " मजा आ रहा है ना पदमा । "
मैं - ऑफफ ...... गुप्ता जी ये आप क्या कर रहे है ...... ।
गुप्ता जी - तुम बस मजा लो पदमा ......... । आज तुम्हें बोहोत मजा आने वाला है ।
मैं - म्मम्म् ..... नहीं गुप्ता जी .... मुझे छोड़िए कोई देख लेगा .... आह ..... ।
गुप्ता जी मेरी हर बात को नज़रअंदाज़ करते हुए बस आपनी वासना की आग मिटाने मे लगे थे और मुझे अब पीछे से अपनी बाहों मे भरकर अपनी पैंट मे कैद फनफनाते हुए लिंग से मेरे नितम्बों धीरे-धीरे पर धक्के लगाने लगे । मेरी दिल की धड़कनों का ऐसा हाल था की मेरी चूचियाँ मेरा ब्लाउज और ब्रा फाड़कर बाहर निकलने को बेताब हो रही थी और साँसे तो मैं क्या ही कहूँ ?
मुझे इतना अजीब जी उत्तेजना महसूस हो रही थी कि मैं बता नहीं सकती । बस के अन्दर एक अजीब ही माहोल बन गया था कितने ही लोग हमसे आगे खड़े सीधे देख रहे थे और इधर गुप्ता जी मुझे लूटने मे व्यस्त थे ।
गुप्ता जी - पदमा ..... तुम्हें अपना वादा याद है ना ।
मैं समझ रही थी कि गुप्ता जी क्या कहना चाह रहे है ......
मैं - शशशश......कौन स वादा गुप्ता जी ....... ?
गुप्ता जी - अभी बताता हूँ ..... ।
कहते हुए गुप्ता जी ने मेरे पीछे से अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर और अपनी बाहों को भी मेरे इर्द-गिर्द से हटा लिया अब गुप्ता जी के लिंग का वार मेरे नितम्बों पर नहीं हो रहा था और ना ही उनके वो चुंबन मे कानों और गले पर पड़ रहे थे । एक बार को तो मुझे थोड़ा आश्चर्य सा हुआ कि ये क्या हुआ गुप्ता जी को , क्योंकि मुझे भी इस खेल मैं अब मजा आ रहा था और मैं भी गुप्ता जी के जिस्म से मिलने वाले मजे का आनंद ले रही थी , और अगले ही पल गुप्ता जी ने मुझे मेरी कमर के दोनों भागों से पकड़कर अपनी ओर घूमा दिया
और बिना देरी कीये मेरी साड़ी का पल्लू सामने से हटाते हुए मेरे गले से लेकर ब्लाउज के क्लीवेज तक मुझे ज़ोरों से चूमने लगे । मेरे बदन की नस-नस मे गुप्ता जी ने अपनी हवस की बिजली भरनी शुरू करदी
मैं - आह ..... गुप्ता जी ..... अब बस कीजिए ...... नाह ....... ।
गुप्ता जी ने एक पल के लिए अपने होंठ मेरे जिस्म से हटाते हुए कहा - " पहले बताओ .... अपना वादा याद है ना ? " और इतना कहकर फिर से मुझे चूमने लगे और अपने हाथ मेरे पीछे साड़ी पर लेजाकर मेरे नितम्बों को जोर जोर से रगड़ने और मसलने लगे ।
मैं - हाँ .... गुप्ता जी ..... मुझे ...याद है ..... अपना वादा ..... ओह ..।
गुप्ता जी - तो वादा पूरा करो पदमा .... ।
मैं - ओह गुप्ता जी ..... यहाँ नहीं ...... प्लीज ...... ।
गुप्ता जी - नहीं पदमा ..... अब मैं और इंतज़ार नहीं कर सकता ..। मेरे होंठ बोहोत प्यासे हो चुके है अब इनकी प्यास तुम्हारे इन रसीले लबों के शरबत से ही बुझेगी ।
मैं - गुप्ता जी ...... प्लीज ..... नहीं ,,,,,,, कोई देख लेगा .... तो मैं बर्बाद हो जाऊँगी .... ।