Update 19
गुप्ता जी - मैं तुम्हें बर्बाद ही तो करना चाहता हूँ पदमा........।
कहते हुए गुप्ता जी ने अपने एक हाथ को मेरे नितम्बों पर से हटाया और मेरी कमर पर एक जोर की चिकोटी काट दी ।
"आह .........गुप्ता ज ज ........। " मजे और उत्तेजना मे मेरी आँखे बंद हो गई और मेरे होंठों से ये शब्द निलक पड़े , मेरे होंठों के खुलते ही गुप्ता जी ने अपने मोटे काले प्यासे होंठ मेरे रसीले लबों मे घूसा दिए
और मेरी दुनिया अगली कुछ मिनटों के लिए एक दम से थम सी गई । गुप्ता जी ने मेरे होंठों को अपने होंठों मे भरकर उनकी वो चुसाई की कि उसका स्वाद आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है । गुप्ता जी के दौनों हाथ मेरी कमर पर थे और मेरी आँखे अभी-भी बंद थी पर मेरे होंठ गुप्ता जी के होंठों की हर क्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनके होंठों से साथ खुल और बन्द हो रहे थे ।
अगली कुछ मिनटों के लिए तो मुझे मेरी हालत और हालात किसी का भी कुछ ख्याल नहीं रह गया था बस ध्यान था तो इतना कि गुप्ता जी मेरे होंठों को चूसकर वो परम सुख दे रहे है जो उन्हे आज तक नहीं मिला शायद । गुप्ता जी ने मेरी जीभ को भी अपने होंठों मे भरकर कितनी ही देर उसका रस पिया
और अपना ढेर सारा थूक भी मेरे मुहँ के अन्दर भर दिया , मैं भी मस्ती मे चूर होकर उनका सारा थूक पी गई । उसके बाद गुप्ता जी मेरे होंठों के सारे रस को पीते गए और मैं उन्हे बेझिझक अपने लबों का सारा शरबत पिलाती गई । गुप्ता जी के लिए तो ये मानो स्वर्ग की घड़ी चल रही थी उन्होंने जी भरकर मेरे होंठो का मज़ा लिया और फिर जब उन्हे छोड़ा तो उनमे नाम-मात्र का रस बचा था बाकी सारा रस तो गुप्ता जी किसी प्यासे पथिक की तरह पी गए ।
जब गुप्ता जी ने मेरे लबों से अपने लब निकाले उस समय मेरी आँखे बिल्कुल लाल हो चुकी थी और मैं गुप्ता जी की बाहों मे सहमी सी खड़ी थी । मेरे अन्दर वासना की लहरे उफान खा रही थी और मेरी योनि से चुतरस निकलकर मेरी पेंटी को पूरा भीगाने लगा , मेरी चुचियाँ मेरी तेज साँसों के साथ लगातार ऊपर नीचे हो रही थी ।
गुप्ता जी ने मेरी आँखों मे देखा और मैंने शर्म से आँखे नीची कर ली, फिर गुप्ता जी ने मुझे फिर से पकड़कर चूमना शुरू कर दिया और अपने दोनों हाथों के मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे । उधर रोड पर बस चल रही थी और इधर मेरे बदन पर गुप्ता जी के हाथ ।
मेरा विरोध बिल्कुल समाप्त हो चुका था पर मेरे होंठों से धीरे - धीरे " ना ह ह ......नहीं ...... रुक जाइए ...... गुप्ता जी ...... । " जैसे शब्द निकल रहे थे जिनका वास्तव मे कोई मतलब नहीं था ये बात गुप्ता जी भी जान गए थे । मेरे ब्लाउज के हुक खोलने मे गुप्ता जी को कतई भी देर ना लगी वो इस काम मे पूरे माहिर थे । ब्लाउज के खुलते ही गुप्ता जी मेरी दूध से भरी चुचियों पर टूट पड़े और मेरी ब्रा को नीचे करके मेरी एक चुची को अपने मुहँ मे भरकर चूसने लगे ।
" आह ...... हाय मैं ...... मर गई ........ ओह ....... । " मैं धीमे स्वर मे आहें भरती हुई बड़बड़ाने लगी और साथ ही गुप्ता जी के सर को अपनी चुचियों पर जोर से दबाने लगी । उस समय तो मेरे पैर इतने भारी हो गए थे कि मन कर रहा था कि यही बस मे लेट जाऊँ मगर लेटना तो दूर मैं तो वहाँ जी भरकर आहें भी नहीं भर पाई , डर भी लग रहा था कि कही कोई पीछे ना देख ले । इसी डर और उत्तेजना ने मुझे और भी कामुक कर दिया ... गुप्ता जी मेरी चुचियों को चूसते हुए नीचे की ओर आने लगे और मेरे पेट और फिर नाभी के आस -पास चूमते हुए उन्होंने अपनी पेन्ट मे हाथ डालकर अपने शैतान जैसे लिंग को बाहर निकाल लिया ।
मेरा ध्यान गुप्ता जी के लिंग पर तब तक नहीं गया था मैं तो आँखे बन्द किये खड़े-खड़े गुप्ता जी की हरकतों का मज़ा उठा रही थी , मैं होश मे जब आई जब गुप्ता जी ने मुझे चूमना छोड़कर सीधे खड़े हुए । मैंने अपनी आँखे खोली और जैसे ही मेरी नजर नीचे गुप्ता जी के लिंग पर गई , मैं हक्की-बक्की रह गई । गुप्ता जी का लिंग पूरा तना हुआ था और बोहोत बड़ा आकार ले चुका था , इससे पहले इतना बड़ा खड़ा लिंग मैंने केवल एक बार वरुण का ही देखा था , वो भी बाथरूम के बाहर से । मगर गुप्ता जी का लिंग इतने पास से देखकर मेरी सिट्टी गुल हो गई । गुप्ता जी मेरी ओर ही देख रहे थे और मुझे इस तरह अपने लिंग पर घूरता पाकर गुप्ता जी बोले - " क्या हुआ पदमा ? तुम्हें कैसा लगा मेरा लण्ड ?"
गुप्ता जी के मुहँ से ऐसी गंदी बात सुनकर शायद मुझे अच्छा ना लगता मगर उस समय मैं बोहोत गरम हो चुकी थी और उस वक्त मुझे उनकी हर बात और भी वासना से भर दे रही थी । मुझे कुछ ना बोलता देखकर गुप्ता जी फिर बोले - " बोलो ना पदमा कैसा है मेरा लण्ड ?"
मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था , सर्दी मे भी मे पसीने-पसीने हो रही थी , मैंने अपना थूक गले मे गटका और उत्तेजना मे बहकते हुए गुप्ता जी के सवाल का जवाब दे बैठी ।
मैं - बोहोत लंबा है ..... गुप्ता जी ...... ।
"ऑफ ..... ये मैंने क्या कह दिया ? गुप्ता जी क्या सोचेंगे मेरे बारे मे । "
गुप्ता जी ने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा और कहा - " पदमा !"
मैंने गुप्ता जी के उद्बोधन पर उनकी ओर देखा तो उन्होंने अपनी बात पूरी की -
गुप्ता जी - इससे खेलों ना पदमा ..... इसे अपने नाजुक हाथों का स्पर्श करा दो ताकि ये धन्य हो जाए ।
जब से मैंने गुप्ता जी के लिंग को देखा था तब से मेरे मन मे उसे छूने की लालसा जाग रही थी और अब गुप्ता जी ने मुझे खुद उसे अपने हाथ मे लेने का न्योता दे डाला , मगर मैं हिम्मत नहीं कर पा रही थी अपने हाथ को आगे बढ़ाकर उसे छूने की । बस टकटकी लगाए उसे देखे जा रही थी , गुप्ता जी का लिंग अभी भी उनकी पैंट के बाहर उसी तरह तनाव मे झटके खा रहा था । गुप्ता जी मेरी मनो-स्थिति समझ गए थे तो उन्होंने खुद अपने हाथ आगे बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने खड़े लिंग पर रखकर एक जोर की आह भरी ।
गुप्ता जी के लिंग पर हाथ पड़ते ही मेरे पूरे जिस्म मे एक करंट सा दौड़ गया और मैंने तेजी से अपने हाथ उनके लिंग से पीछे खेन्च लिए । मगर गुप्ता जी हार कहाँ मानने वाले थे उन्होंने फिर से मेरा हाथ पकड़कर अपने लिंग पर रख दिया और खुद अपने हाथों से मेरी चुचियाँ पकड़कर अपने होंठ मेरी चुचियों पर रखकर उन्हे अपने मुहँ मे भर-भरकर उनका दूध निचोड़ने लगे ।
इस बार मैंने भी अपना हाथ गुप्ता जी के लिंग से नहीं हटाया और उसे अच्छे से महसूस करने के लिए पकड़े हुए ही थोड़ा आगे पीछे करने लगी । गुप्ता जी का लिंग बोहोत काला था अब तक के जीतने मैंने देखे थे उनमे सबसे काला गुप्ता जी का ही था । गुप्ता जी मेरे लिंग के हिलाने के साथ-साथ बीच मे कराहने लगे और अपने दोनों हाथ मेरे पीछे लेजाकर मेरी साड़ी के ऊपर से ही मेरे बड़े-बड़े नितम्बों को मसलने लगे । ऐसा लग रहा था कि मानो गुप्ता जी के लिए तो वहाँ कोई कपड़ा ही नहीं है और वो ऐसे ही मेरे नितम्बों को मसल रहे थे जैसे मैं बिल्कुल नग्न उनकी बाहों मे खड़ी हूँ ।
मेरे नितम्बों को मसलते हुए गुप्ता जी बोले - " पदमा ...... इसे मुहँ मे लो ना ..... ।
"क्या ......???.. मुहँ मे ...... " - ये क्या बोल रहे है गुप्ता जी ... । जैसे ही मैंने ये सुना मेरे कान खड़े हो गए । मैंने तो आज तक अशोक का लिंग भी अपने मुहँ मे नहीं लिया और गुप्ता जी मुझे चलती हुई बस मे अपना लिंग मुहँ मे लेने को कह रहे है । नहीं नहीं ये नहीं तो सकता ।
मैंने अपने हाथ गुप्ता जी के लिंग से वापस खेन्चने चाहे मगर गुप्ता जी शायद जान गए थे कि मैं क्या करने वाली हूँ इसलिए उन्होंने अपने हाथ से मेरा हाथ अपने लिंग पर ही दबाए रखा और बोले - " क्या हुआ पदमा ? क्या तुम्हें मेरा लण्ड पसंद नहीं आया ? "
मैं - गुप्ता जी .......... ।
गुप्ता जी - जल्दी करो पदमा ...... हमारा स्टॉप आने वाला है , किसी ने पीछे मुड़ के देख लिया तो हम दोनों को समस्या हो जाएगी । इसे जल्दी से अपने मुहँ मे लेकर शांत कर दो ।
ये पहली बार था जब गुप्ता जी ने मुझे ये कहा था कि कोई पीछे मुड के ना देख ले और गुप्ता जी की बात सुनकर मुझे भी घबराहट हो गई कि कही कोई वाकई मे पीछे मुड़ के ना देख ले । मैं खुद भी बोहोत ज्यादा चुदासी हो चुकी थी और अगर ये बस ना होती तो शायद आज मे अब तक गुप्ता जी के हाथों पूरी तरह से लूट चुकी होती । मैंने गुप्ता जी की ओर देखा तो वो मेरी तरफ एक बड़ी ही आशा भरी नज़रों से देख रहे थे मानो उन्हे यकीन हो की मैं उनके लिंग को अपने मुहँ मे ले लूँगी , फिर मैंने गुप्ता जी के लिंग की ओर देखा जो मेरे हाथों मे आने के बाद से और भी ज्यादा फनफना रहा था , मैं गुप्ता जी के लिंग के प्रति पहले से ही आकर्षित थी मेरे होंठ मेरे दाँतों मे फँसे हुए थे । फिर आई वो घड़ी जिसका गुप्ता जी ना जाने कबसे इंतज़ार कर रहे थे , हवस मे मेरे कदम ऐसे बहक जाएंगे मैंने कभी सोचा भी नहीं था । मेरी सारी मर्यादाएं टूट गई और जो काम मैंने कभी अपने पति के साथ भी नहीं किया वो अपने से लगभग 22-23 साल बड़े एक मर्द के साथ करने का पाप कर दिया ... । और नीचे झुककर गुप्ता जी का वो काला मोटा लिंग अपने होंठों के बीच से ले जाते हुए अपने मुहँ मे ले लिया ।
जैसे ही मेरी जीभ गुप्ता जी के लिंग के टोपे से टकराई , गुप्ता जी ने मेरे सर को अपने हाथों से पकड़ा और अपने लिंग पर दबाते हुए , धीमे-धीमे कराहने लगे । गुप्ता जी के लिंग का स्वाद कुछ अनोखा था , और मे इतनी गरम हो चुकी थी कि मुझे अपने परिवार और पति की इज्जत का कुछ भी ख्याल नहीं रहा । मेरे मुहँ मे आकर गुप्ता जी का लिंग जोरदार झटके लेने लगा और मेरा मुहँ गुप्ता जी के लिंग से भर गया ।
इतना बड़ा लिंग ,मैं सही से अपने मुहँ मे ले भी नहीं पा रही थी मगर फिर भी गुप्ता जी मेरे सर को अपने लिंग पर दबाते हुए मस्ती मे कुछ बड़बड़ाते जा रहे थे ।
गुप्ता जी - चूस ... चूस ...... पदमा ..... ..। ऐसे ही चूस ..... कबसे इंतज़ार था इस लम्हे का ..... चूस ...... मेरा लण्ड .... आह .. ।
मैं भी मस्ती मे गुप्ता जी के लिंग को चूसती रही और तभी बस का हॉर्न बजा ,, ये हमारे वाले स्टॉप का हॉर्न था , हॉर्न सुनते ही मैं एक दम से घबरा गई और गुप्ता जी के लिंग को अपने मुहँ से निकाल-कर , जल्दी से खड़ी होकर अपने कपड़े ठीक करते हुए उतरने की तैयारी करने लगी
गुप्ता जी ने भी मुझे अब नहीं टोका , घबराहट के मारे मेरी हवस अब काफूर हो गई । उधर गुप्ता जी ने भी अपने लिंग को अपने हाथ से पकड़कर 5-6 बार तेजी से हिलाया और एकदम से अपने दाँत भींचते हुए अपना कितना ही वीर्य वही बस मे गिरा दिया
और फिर जल्दी से अपना लिंग अपनी पेन्ट के अन्दर डाल लिया । मैं जब तक नॉर्मल हुई मेरा स्टॉप आ गया और बस के पिछले गेट खुल गए , मैंने बिना गुप्ता जी की ओर देखे आगे कदम बढ़ाए और बस से उतरते हुए तेजी से गली मे चलने लगी । मुझे इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने एक बार भी पलटकर गुप्ता जी की ओर नहीं देखा , जल्दी -2 मे मैं , गुप्ता जी से अपना कमरबन्द लेना भी भूल गई ।
" नहीं नहीं ये मुझसे क्या हो गया ....॥"
" ये मैंने क्या कर दिया ... हे भगवान ! "
" मैं कैसे अशोक का सामना करूँगी । "
"अपने कामुक बदन की आग मे अन्धी होकर मैं कितना बड़ा पाप कर बैठी..।"
अपने घर के अन्दर दरवाजे के पास खड़ी मैं अपनी की हुई करतूत पर अपने आप को धिक्कार रही थी ।
" ये मुझे क्या होता जा रहा है ....?"
" ये सब मर्द मुझे मेरी मर्यादा के मार्ग से भटकाने के लिए क्योँ मेरे पीछे पड़े है ....?"
" आज तो गुप्ता जी ने मुझे बस मे कह भी दिया था कि वो तो मुझे बर्बाद ही करना चाहते है ..., फिर भी , मैंने कैसे उनका वो .........।..।"
" नहीं ...... नहीं ....... ये काम तो मैंने कभी अशोक के साथ भी नहीं किया और गुप्ता जी तो फिर भी एक 50 वर्षीय बूढ़े मर्द है ...। "
" बूढ़े .......? ह् खाक बूढ़े है .... उनके लिंग का तवान और लम्बाई देखकर तो ऐसा लगता है जैसे किसी 25-26 साल के नौजवान का लिंग है । "
" नहीं नहीं ....... ये मैं भी क्या सोचने लगी ..... फिर से नहीं ...... । "
अभी भी मैं अपने मन को बोहोत डाँट रही थी लेकिन फिर भी रह रहकर गुप्ता जी के उस लंबे लिंग का ध्यान मेरे दिमाग से निकल नहीं रहा था । गुप्ता जी के लिंग की परछाई मे दिलों दिमाग पर ऐसी छाई थी कि मैं चाहकर भी उसे भूल नहीं पा रही थी ।
जब भी मैं उस लम्हे को याद करती जब मैंने खुद झुककर गुप्ता जी का वो लम्बा काला मोटा लिंग अपने नाजुक गुलाबी होंठों मे लिया था तो मेरा रोम रोम मे जिस्म से उखड़ जाता । अपने जिस्म मे दिन पर दिन आने वाले बदलाव से मैं खुद भी हैरान हो रही थी ...।
"ये सब कब रुकेगा ..? "
"अब तो मुझे अपने पर से भरोसा ही उठने लगा है , कही किसी दिन मैं अपने इस जिस्म की गर्मी की गुलाम होकर अपनी सारी हदे ही ना तोड़ दूँ ? अगर ऐसा हुआ ना तो मेरे पास डूबकर मरने के अलावा कोई चारा नहीं होगा । "
कितनी ही देर तक तो मैं अपनी आज गुप्ता जी के साथ की हुई हरकतों पर पछताती रही
, लेकिन अब समय तेजी से बीत रहा था । रात होने को आई थी और अशोक के घर आने का समय हो चला था , मुझे रात के खाने की तैयारी भी करनी थी । इसलिए मैं अपने मन को शांत करते हुए पहले बाथरूम मे गई और सबसे पहले अपनी पेन्टी जो मेरे चुतरस से बिल्कुल भीग चुकी थी को निकाला और फिर दूसरी साफ पेन्टी पहन ली
उसके बाद मैंने अपने चेहरे को अच्छे से धोया और गुप्ता जी के लिंग का स्वाद अपने मुहँ से निकालने के लिए कई बार कुल्ला भी किया ।
पानी से अपनी सफाई करने से मैंने गुप्ता जी के लिंग का स्वाद तो अपने मुहँ से निकाल दिया लेकिन अपने दिमाग और मन से मैं आज की घटना को कैसे दूर करूंगी और अगर करना भी चाहूँ तो गुप्ता जी मुझे ऐसा करने नहीं देंगे , वो कभी इस बात को ना खुद भूलेंगे ना ही मझे भूलने देंगे ।
7 बजे मैं कीचेन मे खाना बना रही थी , मगर मेरा मन खुद से ही बात करने मे लगा था तभी दरवाजे की घण्टी बजी और मेरे कान खड़े हो गए और घबराहट के मारे दिल की धड़कने भी बढ़ गई । मैं जान गई थी के ये अशोक ही है ..... मगर दरवाजा खोलकर अशोक के सामने आने से मैं कतरा रही थी । मैंने कितनी ही देर कीचन मे लगा दी और तब तक डॉर बेल 2 बार बज चुकी थी फिर मैंने जल्दी से अपने कदम गेट की ओर बढ़ाए और खुद को नॉर्मल करते हुए दरवाजा खोला ...।
अशोक मुझे सामने देख मुस्कुराये और अन्दर आकर मुझे हग करते हुए बोले - " कैसी हो बीवी जी .... आज सुबह तो तुम्हारा मूड बोहोत ऑफ था बोलो ठीक हुआ या नहीं । "
मैं धीरे से अशोक से अलग हुई और उसे कहा - " मैं ठीक हूँ .... आप आइये ..... । "
फिर मैं और अशोक अन्दर हॉल मे आ गए । अशोक सोफ़े पर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारने लगे और मैं कीचेन मे जाकर उनके लिए पानी लेकर आई । अशोक ने पानी पिया और फिर मेरे चेहरे की ओर देखकर कहा - " क्या हुआ पदमा ? तुम कुछ परेशान सी लग रही हो ?"
अशोक ने मेरे चेहरे के हाव-भाव को पढ़ लिया था । अशोक को मुझ पर कुछ शक ना हो जाए इसलिए मैंने अपने चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट लाते हुए अशोक से कहा - " नहीं ... नहीं .... एसी कोई बात नहीं बस वो आज जरा बैंक गई थी ना तो वहाँ कुछ ज्यादा ही समय लग गया और थोड़ी थकान सी हो गई । "
अशोक - ओह अच्छा ..... मैं तो भूल ही गया था उस बारे मे वैसे क्या कहा है बैंक मैनेजर ने ?
मैं - कुछ नहीं बस कुछ डॉक्यूमेन्ट सबमिट करने थे अब बस कुछ दिनों बाद एक बार जाके रि-कनफ़र्म करना पड़ेगा की सब ठीक है क्या ।
अशोक - चलो तो अच्छा है ... बस तुम जल्दी से खाना बना लो फिर आराम कर लेना आज तुम बोहोत थक गई होगी ।
मैं - खाना तो तैयार है ... आप बस फ्रेश हो जाइए , मैं लगती हूँ ।
अशोक - ओके माइ डार्लिंग ।
ऐसा कहते हुए अशोक उठे और मेरे पास आकर अपने हाथों से मेरे चेहरे को पकड़कर पहले मेरे माथे पर अपने होंठों से चूमा और फिर गाल पर चूमा ।
और इसके बाद फ्रेश होने बाथरूम मे चले गए और मैं किचन मे ।
किचन मे खाना लगाते हुए मैं ये सोचने लगी कि "भला कितना प्यारा पति मिला है मुझे और मैंने आज उसे ही धोका दे दिया , वो भी एक 50 साल के आदमी के साथ । लेकिन मैं भी क्या करूँ मैं भी तो एक औरत हूँ आखिर मेरे भी तो कुछ अरमान है अगर वो अशोक पूरा नहीं कर पा रहा तो ये उसकी गलती है मेरी नहीं ,,,,,,
नहीं नहीं मैं ये सोच भी कैसे सकती हूँ अशोक ने तो मेरे लिए कितना कुछ किया , मुझे दूसरे मर्दों से उसकी तुलना नहीं करनी चाहिए , वो मेरे पति है और मेरे लिए सब कुछ है । "
थोड़ी ही देर मे अशोक फ्रेश होकर वापस हॉल मे आ गए , तब तक मैंने भी खाना लगा दिया था । उसके बाद मैंने और अशोक ने एक साथ मिलकर खाना खाया , अशोक बीच-बीच मे बात करते रहे लेकिन मेरा मन अब उनकी बातों मे नहीं था । जब हमारा खाना खत्म हो गया तो मैं डाइनिंग टेबल से बर्तन हटाने लगी और उन्हे कीचेन मे रख दिया इसी बीच अशोक ने मुझे पीछे से आवाज दी -
अशोक - पदमा !
मैं अशोक की आवाज सुनकर पीछे घूमी और पूछा - " कहिए ..... ?"
अशोक - तुम्हारा कमर-बन्द कहाँ है ?
अशोक का सवाल सुनकर मेरे होश उड़ गए ,,गुप्ता जी ने बस मे मेरे जिस्म से खिलवाड़ करते हुए मेरा कमर-बन्द उतार लिया था और फिर जल्दी-जल्दी मे बस से उतरने के चक्कर मे, मैं उनसे वो लेना भी भूल गई , लेकिन अब अशोक का सवाल सुनकर मुझे अपने कमरबंद की याद आई । अशोक के सामने सामान्य रहने का ढोंग करते हुए मैंने कहा - " वो ... वो आज गलती से काम करते हुए निकल गया था और फिर उसे पहनने का वक्त ही नहीं लगा । "
अशोक - अच्छा ...., चलो तो मैं सोने जा रहा हूँ तुम भी अपना काम खत्म करके जल्दी आ जाना ।
मैं - जी ठीक है ।
कहते हुए गुप्ता जी ने अपने एक हाथ को मेरे नितम्बों पर से हटाया और मेरी कमर पर एक जोर की चिकोटी काट दी ।
"आह .........गुप्ता ज ज ........। " मजे और उत्तेजना मे मेरी आँखे बंद हो गई और मेरे होंठों से ये शब्द निलक पड़े , मेरे होंठों के खुलते ही गुप्ता जी ने अपने मोटे काले प्यासे होंठ मेरे रसीले लबों मे घूसा दिए
और मेरी दुनिया अगली कुछ मिनटों के लिए एक दम से थम सी गई । गुप्ता जी ने मेरे होंठों को अपने होंठों मे भरकर उनकी वो चुसाई की कि उसका स्वाद आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है । गुप्ता जी के दौनों हाथ मेरी कमर पर थे और मेरी आँखे अभी-भी बंद थी पर मेरे होंठ गुप्ता जी के होंठों की हर क्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनके होंठों से साथ खुल और बन्द हो रहे थे ।
अगली कुछ मिनटों के लिए तो मुझे मेरी हालत और हालात किसी का भी कुछ ख्याल नहीं रह गया था बस ध्यान था तो इतना कि गुप्ता जी मेरे होंठों को चूसकर वो परम सुख दे रहे है जो उन्हे आज तक नहीं मिला शायद । गुप्ता जी ने मेरी जीभ को भी अपने होंठों मे भरकर कितनी ही देर उसका रस पिया
और अपना ढेर सारा थूक भी मेरे मुहँ के अन्दर भर दिया , मैं भी मस्ती मे चूर होकर उनका सारा थूक पी गई । उसके बाद गुप्ता जी मेरे होंठों के सारे रस को पीते गए और मैं उन्हे बेझिझक अपने लबों का सारा शरबत पिलाती गई । गुप्ता जी के लिए तो ये मानो स्वर्ग की घड़ी चल रही थी उन्होंने जी भरकर मेरे होंठो का मज़ा लिया और फिर जब उन्हे छोड़ा तो उनमे नाम-मात्र का रस बचा था बाकी सारा रस तो गुप्ता जी किसी प्यासे पथिक की तरह पी गए ।
जब गुप्ता जी ने मेरे लबों से अपने लब निकाले उस समय मेरी आँखे बिल्कुल लाल हो चुकी थी और मैं गुप्ता जी की बाहों मे सहमी सी खड़ी थी । मेरे अन्दर वासना की लहरे उफान खा रही थी और मेरी योनि से चुतरस निकलकर मेरी पेंटी को पूरा भीगाने लगा , मेरी चुचियाँ मेरी तेज साँसों के साथ लगातार ऊपर नीचे हो रही थी ।
गुप्ता जी ने मेरी आँखों मे देखा और मैंने शर्म से आँखे नीची कर ली, फिर गुप्ता जी ने मुझे फिर से पकड़कर चूमना शुरू कर दिया और अपने दोनों हाथों के मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे । उधर रोड पर बस चल रही थी और इधर मेरे बदन पर गुप्ता जी के हाथ ।
मेरा विरोध बिल्कुल समाप्त हो चुका था पर मेरे होंठों से धीरे - धीरे " ना ह ह ......नहीं ...... रुक जाइए ...... गुप्ता जी ...... । " जैसे शब्द निकल रहे थे जिनका वास्तव मे कोई मतलब नहीं था ये बात गुप्ता जी भी जान गए थे । मेरे ब्लाउज के हुक खोलने मे गुप्ता जी को कतई भी देर ना लगी वो इस काम मे पूरे माहिर थे । ब्लाउज के खुलते ही गुप्ता जी मेरी दूध से भरी चुचियों पर टूट पड़े और मेरी ब्रा को नीचे करके मेरी एक चुची को अपने मुहँ मे भरकर चूसने लगे ।
" आह ...... हाय मैं ...... मर गई ........ ओह ....... । " मैं धीमे स्वर मे आहें भरती हुई बड़बड़ाने लगी और साथ ही गुप्ता जी के सर को अपनी चुचियों पर जोर से दबाने लगी । उस समय तो मेरे पैर इतने भारी हो गए थे कि मन कर रहा था कि यही बस मे लेट जाऊँ मगर लेटना तो दूर मैं तो वहाँ जी भरकर आहें भी नहीं भर पाई , डर भी लग रहा था कि कही कोई पीछे ना देख ले । इसी डर और उत्तेजना ने मुझे और भी कामुक कर दिया ... गुप्ता जी मेरी चुचियों को चूसते हुए नीचे की ओर आने लगे और मेरे पेट और फिर नाभी के आस -पास चूमते हुए उन्होंने अपनी पेन्ट मे हाथ डालकर अपने शैतान जैसे लिंग को बाहर निकाल लिया ।
मेरा ध्यान गुप्ता जी के लिंग पर तब तक नहीं गया था मैं तो आँखे बन्द किये खड़े-खड़े गुप्ता जी की हरकतों का मज़ा उठा रही थी , मैं होश मे जब आई जब गुप्ता जी ने मुझे चूमना छोड़कर सीधे खड़े हुए । मैंने अपनी आँखे खोली और जैसे ही मेरी नजर नीचे गुप्ता जी के लिंग पर गई , मैं हक्की-बक्की रह गई । गुप्ता जी का लिंग पूरा तना हुआ था और बोहोत बड़ा आकार ले चुका था , इससे पहले इतना बड़ा खड़ा लिंग मैंने केवल एक बार वरुण का ही देखा था , वो भी बाथरूम के बाहर से । मगर गुप्ता जी का लिंग इतने पास से देखकर मेरी सिट्टी गुल हो गई । गुप्ता जी मेरी ओर ही देख रहे थे और मुझे इस तरह अपने लिंग पर घूरता पाकर गुप्ता जी बोले - " क्या हुआ पदमा ? तुम्हें कैसा लगा मेरा लण्ड ?"
गुप्ता जी के मुहँ से ऐसी गंदी बात सुनकर शायद मुझे अच्छा ना लगता मगर उस समय मैं बोहोत गरम हो चुकी थी और उस वक्त मुझे उनकी हर बात और भी वासना से भर दे रही थी । मुझे कुछ ना बोलता देखकर गुप्ता जी फिर बोले - " बोलो ना पदमा कैसा है मेरा लण्ड ?"
मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था , सर्दी मे भी मे पसीने-पसीने हो रही थी , मैंने अपना थूक गले मे गटका और उत्तेजना मे बहकते हुए गुप्ता जी के सवाल का जवाब दे बैठी ।
मैं - बोहोत लंबा है ..... गुप्ता जी ...... ।
"ऑफ ..... ये मैंने क्या कह दिया ? गुप्ता जी क्या सोचेंगे मेरे बारे मे । "
गुप्ता जी ने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा और कहा - " पदमा !"
मैंने गुप्ता जी के उद्बोधन पर उनकी ओर देखा तो उन्होंने अपनी बात पूरी की -
गुप्ता जी - इससे खेलों ना पदमा ..... इसे अपने नाजुक हाथों का स्पर्श करा दो ताकि ये धन्य हो जाए ।
जब से मैंने गुप्ता जी के लिंग को देखा था तब से मेरे मन मे उसे छूने की लालसा जाग रही थी और अब गुप्ता जी ने मुझे खुद उसे अपने हाथ मे लेने का न्योता दे डाला , मगर मैं हिम्मत नहीं कर पा रही थी अपने हाथ को आगे बढ़ाकर उसे छूने की । बस टकटकी लगाए उसे देखे जा रही थी , गुप्ता जी का लिंग अभी भी उनकी पैंट के बाहर उसी तरह तनाव मे झटके खा रहा था । गुप्ता जी मेरी मनो-स्थिति समझ गए थे तो उन्होंने खुद अपने हाथ आगे बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने खड़े लिंग पर रखकर एक जोर की आह भरी ।
गुप्ता जी के लिंग पर हाथ पड़ते ही मेरे पूरे जिस्म मे एक करंट सा दौड़ गया और मैंने तेजी से अपने हाथ उनके लिंग से पीछे खेन्च लिए । मगर गुप्ता जी हार कहाँ मानने वाले थे उन्होंने फिर से मेरा हाथ पकड़कर अपने लिंग पर रख दिया और खुद अपने हाथों से मेरी चुचियाँ पकड़कर अपने होंठ मेरी चुचियों पर रखकर उन्हे अपने मुहँ मे भर-भरकर उनका दूध निचोड़ने लगे ।
इस बार मैंने भी अपना हाथ गुप्ता जी के लिंग से नहीं हटाया और उसे अच्छे से महसूस करने के लिए पकड़े हुए ही थोड़ा आगे पीछे करने लगी । गुप्ता जी का लिंग बोहोत काला था अब तक के जीतने मैंने देखे थे उनमे सबसे काला गुप्ता जी का ही था । गुप्ता जी मेरे लिंग के हिलाने के साथ-साथ बीच मे कराहने लगे और अपने दोनों हाथ मेरे पीछे लेजाकर मेरी साड़ी के ऊपर से ही मेरे बड़े-बड़े नितम्बों को मसलने लगे । ऐसा लग रहा था कि मानो गुप्ता जी के लिए तो वहाँ कोई कपड़ा ही नहीं है और वो ऐसे ही मेरे नितम्बों को मसल रहे थे जैसे मैं बिल्कुल नग्न उनकी बाहों मे खड़ी हूँ ।
मेरे नितम्बों को मसलते हुए गुप्ता जी बोले - " पदमा ...... इसे मुहँ मे लो ना ..... ।
"क्या ......???.. मुहँ मे ...... " - ये क्या बोल रहे है गुप्ता जी ... । जैसे ही मैंने ये सुना मेरे कान खड़े हो गए । मैंने तो आज तक अशोक का लिंग भी अपने मुहँ मे नहीं लिया और गुप्ता जी मुझे चलती हुई बस मे अपना लिंग मुहँ मे लेने को कह रहे है । नहीं नहीं ये नहीं तो सकता ।
मैंने अपने हाथ गुप्ता जी के लिंग से वापस खेन्चने चाहे मगर गुप्ता जी शायद जान गए थे कि मैं क्या करने वाली हूँ इसलिए उन्होंने अपने हाथ से मेरा हाथ अपने लिंग पर ही दबाए रखा और बोले - " क्या हुआ पदमा ? क्या तुम्हें मेरा लण्ड पसंद नहीं आया ? "
मैं - गुप्ता जी .......... ।
गुप्ता जी - जल्दी करो पदमा ...... हमारा स्टॉप आने वाला है , किसी ने पीछे मुड़ के देख लिया तो हम दोनों को समस्या हो जाएगी । इसे जल्दी से अपने मुहँ मे लेकर शांत कर दो ।
ये पहली बार था जब गुप्ता जी ने मुझे ये कहा था कि कोई पीछे मुड के ना देख ले और गुप्ता जी की बात सुनकर मुझे भी घबराहट हो गई कि कही कोई वाकई मे पीछे मुड़ के ना देख ले । मैं खुद भी बोहोत ज्यादा चुदासी हो चुकी थी और अगर ये बस ना होती तो शायद आज मे अब तक गुप्ता जी के हाथों पूरी तरह से लूट चुकी होती । मैंने गुप्ता जी की ओर देखा तो वो मेरी तरफ एक बड़ी ही आशा भरी नज़रों से देख रहे थे मानो उन्हे यकीन हो की मैं उनके लिंग को अपने मुहँ मे ले लूँगी , फिर मैंने गुप्ता जी के लिंग की ओर देखा जो मेरे हाथों मे आने के बाद से और भी ज्यादा फनफना रहा था , मैं गुप्ता जी के लिंग के प्रति पहले से ही आकर्षित थी मेरे होंठ मेरे दाँतों मे फँसे हुए थे । फिर आई वो घड़ी जिसका गुप्ता जी ना जाने कबसे इंतज़ार कर रहे थे , हवस मे मेरे कदम ऐसे बहक जाएंगे मैंने कभी सोचा भी नहीं था । मेरी सारी मर्यादाएं टूट गई और जो काम मैंने कभी अपने पति के साथ भी नहीं किया वो अपने से लगभग 22-23 साल बड़े एक मर्द के साथ करने का पाप कर दिया ... । और नीचे झुककर गुप्ता जी का वो काला मोटा लिंग अपने होंठों के बीच से ले जाते हुए अपने मुहँ मे ले लिया ।
जैसे ही मेरी जीभ गुप्ता जी के लिंग के टोपे से टकराई , गुप्ता जी ने मेरे सर को अपने हाथों से पकड़ा और अपने लिंग पर दबाते हुए , धीमे-धीमे कराहने लगे । गुप्ता जी के लिंग का स्वाद कुछ अनोखा था , और मे इतनी गरम हो चुकी थी कि मुझे अपने परिवार और पति की इज्जत का कुछ भी ख्याल नहीं रहा । मेरे मुहँ मे आकर गुप्ता जी का लिंग जोरदार झटके लेने लगा और मेरा मुहँ गुप्ता जी के लिंग से भर गया ।
इतना बड़ा लिंग ,मैं सही से अपने मुहँ मे ले भी नहीं पा रही थी मगर फिर भी गुप्ता जी मेरे सर को अपने लिंग पर दबाते हुए मस्ती मे कुछ बड़बड़ाते जा रहे थे ।
गुप्ता जी - चूस ... चूस ...... पदमा ..... ..। ऐसे ही चूस ..... कबसे इंतज़ार था इस लम्हे का ..... चूस ...... मेरा लण्ड .... आह .. ।
मैं भी मस्ती मे गुप्ता जी के लिंग को चूसती रही और तभी बस का हॉर्न बजा ,, ये हमारे वाले स्टॉप का हॉर्न था , हॉर्न सुनते ही मैं एक दम से घबरा गई और गुप्ता जी के लिंग को अपने मुहँ से निकाल-कर , जल्दी से खड़ी होकर अपने कपड़े ठीक करते हुए उतरने की तैयारी करने लगी
गुप्ता जी ने भी मुझे अब नहीं टोका , घबराहट के मारे मेरी हवस अब काफूर हो गई । उधर गुप्ता जी ने भी अपने लिंग को अपने हाथ से पकड़कर 5-6 बार तेजी से हिलाया और एकदम से अपने दाँत भींचते हुए अपना कितना ही वीर्य वही बस मे गिरा दिया
और फिर जल्दी से अपना लिंग अपनी पेन्ट के अन्दर डाल लिया । मैं जब तक नॉर्मल हुई मेरा स्टॉप आ गया और बस के पिछले गेट खुल गए , मैंने बिना गुप्ता जी की ओर देखे आगे कदम बढ़ाए और बस से उतरते हुए तेजी से गली मे चलने लगी । मुझे इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने एक बार भी पलटकर गुप्ता जी की ओर नहीं देखा , जल्दी -2 मे मैं , गुप्ता जी से अपना कमरबन्द लेना भी भूल गई ।
" नहीं नहीं ये मुझसे क्या हो गया ....॥"
" ये मैंने क्या कर दिया ... हे भगवान ! "
" मैं कैसे अशोक का सामना करूँगी । "
"अपने कामुक बदन की आग मे अन्धी होकर मैं कितना बड़ा पाप कर बैठी..।"
अपने घर के अन्दर दरवाजे के पास खड़ी मैं अपनी की हुई करतूत पर अपने आप को धिक्कार रही थी ।
" ये मुझे क्या होता जा रहा है ....?"
" ये सब मर्द मुझे मेरी मर्यादा के मार्ग से भटकाने के लिए क्योँ मेरे पीछे पड़े है ....?"
" आज तो गुप्ता जी ने मुझे बस मे कह भी दिया था कि वो तो मुझे बर्बाद ही करना चाहते है ..., फिर भी , मैंने कैसे उनका वो .........।..।"
" नहीं ...... नहीं ....... ये काम तो मैंने कभी अशोक के साथ भी नहीं किया और गुप्ता जी तो फिर भी एक 50 वर्षीय बूढ़े मर्द है ...। "
" बूढ़े .......? ह् खाक बूढ़े है .... उनके लिंग का तवान और लम्बाई देखकर तो ऐसा लगता है जैसे किसी 25-26 साल के नौजवान का लिंग है । "
" नहीं नहीं ....... ये मैं भी क्या सोचने लगी ..... फिर से नहीं ...... । "
अभी भी मैं अपने मन को बोहोत डाँट रही थी लेकिन फिर भी रह रहकर गुप्ता जी के उस लंबे लिंग का ध्यान मेरे दिमाग से निकल नहीं रहा था । गुप्ता जी के लिंग की परछाई मे दिलों दिमाग पर ऐसी छाई थी कि मैं चाहकर भी उसे भूल नहीं पा रही थी ।
जब भी मैं उस लम्हे को याद करती जब मैंने खुद झुककर गुप्ता जी का वो लम्बा काला मोटा लिंग अपने नाजुक गुलाबी होंठों मे लिया था तो मेरा रोम रोम मे जिस्म से उखड़ जाता । अपने जिस्म मे दिन पर दिन आने वाले बदलाव से मैं खुद भी हैरान हो रही थी ...।
"ये सब कब रुकेगा ..? "
"अब तो मुझे अपने पर से भरोसा ही उठने लगा है , कही किसी दिन मैं अपने इस जिस्म की गर्मी की गुलाम होकर अपनी सारी हदे ही ना तोड़ दूँ ? अगर ऐसा हुआ ना तो मेरे पास डूबकर मरने के अलावा कोई चारा नहीं होगा । "
कितनी ही देर तक तो मैं अपनी आज गुप्ता जी के साथ की हुई हरकतों पर पछताती रही
, लेकिन अब समय तेजी से बीत रहा था । रात होने को आई थी और अशोक के घर आने का समय हो चला था , मुझे रात के खाने की तैयारी भी करनी थी । इसलिए मैं अपने मन को शांत करते हुए पहले बाथरूम मे गई और सबसे पहले अपनी पेन्टी जो मेरे चुतरस से बिल्कुल भीग चुकी थी को निकाला और फिर दूसरी साफ पेन्टी पहन ली
उसके बाद मैंने अपने चेहरे को अच्छे से धोया और गुप्ता जी के लिंग का स्वाद अपने मुहँ से निकालने के लिए कई बार कुल्ला भी किया ।
पानी से अपनी सफाई करने से मैंने गुप्ता जी के लिंग का स्वाद तो अपने मुहँ से निकाल दिया लेकिन अपने दिमाग और मन से मैं आज की घटना को कैसे दूर करूंगी और अगर करना भी चाहूँ तो गुप्ता जी मुझे ऐसा करने नहीं देंगे , वो कभी इस बात को ना खुद भूलेंगे ना ही मझे भूलने देंगे ।
7 बजे मैं कीचेन मे खाना बना रही थी , मगर मेरा मन खुद से ही बात करने मे लगा था तभी दरवाजे की घण्टी बजी और मेरे कान खड़े हो गए और घबराहट के मारे दिल की धड़कने भी बढ़ गई । मैं जान गई थी के ये अशोक ही है ..... मगर दरवाजा खोलकर अशोक के सामने आने से मैं कतरा रही थी । मैंने कितनी ही देर कीचन मे लगा दी और तब तक डॉर बेल 2 बार बज चुकी थी फिर मैंने जल्दी से अपने कदम गेट की ओर बढ़ाए और खुद को नॉर्मल करते हुए दरवाजा खोला ...।
अशोक मुझे सामने देख मुस्कुराये और अन्दर आकर मुझे हग करते हुए बोले - " कैसी हो बीवी जी .... आज सुबह तो तुम्हारा मूड बोहोत ऑफ था बोलो ठीक हुआ या नहीं । "
मैं धीरे से अशोक से अलग हुई और उसे कहा - " मैं ठीक हूँ .... आप आइये ..... । "
फिर मैं और अशोक अन्दर हॉल मे आ गए । अशोक सोफ़े पर बैठकर अपनी दिनभर की थकान उतारने लगे और मैं कीचेन मे जाकर उनके लिए पानी लेकर आई । अशोक ने पानी पिया और फिर मेरे चेहरे की ओर देखकर कहा - " क्या हुआ पदमा ? तुम कुछ परेशान सी लग रही हो ?"
अशोक ने मेरे चेहरे के हाव-भाव को पढ़ लिया था । अशोक को मुझ पर कुछ शक ना हो जाए इसलिए मैंने अपने चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट लाते हुए अशोक से कहा - " नहीं ... नहीं .... एसी कोई बात नहीं बस वो आज जरा बैंक गई थी ना तो वहाँ कुछ ज्यादा ही समय लग गया और थोड़ी थकान सी हो गई । "
अशोक - ओह अच्छा ..... मैं तो भूल ही गया था उस बारे मे वैसे क्या कहा है बैंक मैनेजर ने ?
मैं - कुछ नहीं बस कुछ डॉक्यूमेन्ट सबमिट करने थे अब बस कुछ दिनों बाद एक बार जाके रि-कनफ़र्म करना पड़ेगा की सब ठीक है क्या ।
अशोक - चलो तो अच्छा है ... बस तुम जल्दी से खाना बना लो फिर आराम कर लेना आज तुम बोहोत थक गई होगी ।
मैं - खाना तो तैयार है ... आप बस फ्रेश हो जाइए , मैं लगती हूँ ।
अशोक - ओके माइ डार्लिंग ।
ऐसा कहते हुए अशोक उठे और मेरे पास आकर अपने हाथों से मेरे चेहरे को पकड़कर पहले मेरे माथे पर अपने होंठों से चूमा और फिर गाल पर चूमा ।
और इसके बाद फ्रेश होने बाथरूम मे चले गए और मैं किचन मे ।
किचन मे खाना लगाते हुए मैं ये सोचने लगी कि "भला कितना प्यारा पति मिला है मुझे और मैंने आज उसे ही धोका दे दिया , वो भी एक 50 साल के आदमी के साथ । लेकिन मैं भी क्या करूँ मैं भी तो एक औरत हूँ आखिर मेरे भी तो कुछ अरमान है अगर वो अशोक पूरा नहीं कर पा रहा तो ये उसकी गलती है मेरी नहीं ,,,,,,
नहीं नहीं मैं ये सोच भी कैसे सकती हूँ अशोक ने तो मेरे लिए कितना कुछ किया , मुझे दूसरे मर्दों से उसकी तुलना नहीं करनी चाहिए , वो मेरे पति है और मेरे लिए सब कुछ है । "
थोड़ी ही देर मे अशोक फ्रेश होकर वापस हॉल मे आ गए , तब तक मैंने भी खाना लगा दिया था । उसके बाद मैंने और अशोक ने एक साथ मिलकर खाना खाया , अशोक बीच-बीच मे बात करते रहे लेकिन मेरा मन अब उनकी बातों मे नहीं था । जब हमारा खाना खत्म हो गया तो मैं डाइनिंग टेबल से बर्तन हटाने लगी और उन्हे कीचेन मे रख दिया इसी बीच अशोक ने मुझे पीछे से आवाज दी -
अशोक - पदमा !
मैं अशोक की आवाज सुनकर पीछे घूमी और पूछा - " कहिए ..... ?"
अशोक - तुम्हारा कमर-बन्द कहाँ है ?
अशोक का सवाल सुनकर मेरे होश उड़ गए ,,गुप्ता जी ने बस मे मेरे जिस्म से खिलवाड़ करते हुए मेरा कमर-बन्द उतार लिया था और फिर जल्दी-जल्दी मे बस से उतरने के चक्कर मे, मैं उनसे वो लेना भी भूल गई , लेकिन अब अशोक का सवाल सुनकर मुझे अपने कमरबंद की याद आई । अशोक के सामने सामान्य रहने का ढोंग करते हुए मैंने कहा - " वो ... वो आज गलती से काम करते हुए निकल गया था और फिर उसे पहनने का वक्त ही नहीं लगा । "
अशोक - अच्छा ...., चलो तो मैं सोने जा रहा हूँ तुम भी अपना काम खत्म करके जल्दी आ जाना ।
मैं - जी ठीक है ।