Update 22
मैं -आह ...... नितिन ..... अब .... बस .... करो ..... आह .... ऑफ .... नहीं ....वहाँ .. पर मत चूमो ... ।
नितिन ने नीचे मेरे पैरों पर चूमते हुए मेरी साड़ी को ओर भी ऊपर उठाकर अपनी जेब से एक ओर लाल पट्टी निकाली मेरे पैरों को भी उस लाल मुलायम पट्टी से बांध दिया ।
मैं - ऑफ ... नितिन ... ये ... क्या कर रहे हो ... आह... मत करो .. ।
नितिन कब का मेरी बातों को सुन रहा था वो तो वासना के नशे मे डूबा हुआ था और अब वही नशा मुझ पर छाने लगा और मेरे सोचने समझने की शक्ति जाती रही , हवस की गर्मी ने मुझे अपना गुलाम बना लिया .. । वहाँ ऑफिस मे मेरा पति , मेरे लिए काम मे लगा है और यहाँ उसका बॉस मुझे अपने ही बिस्तर पर लूट रहा है , इस बात से ही मेरी कामअग्नि चरम पर पहुँच गई । नितिन अब और आगे बढ़ा और मेरी टांगों से हाथ ले जाते हुए मेरी पेन्टी तक ले गया और एकदम से उसे पकड़कर नीचे खिंच दिया ,
मैं उसे ऐसा करने से रोकना भी चाहती थी मगर मेरे हाथों को उसने पहले ही बांध दिया था , मैं कुछ भी ना कर सकी केवल उसकी मिन्नते करने से ..
मैं - नितिन मत निकलो इसे ... प्लीज जो करना है ऊपर-ऊपर से कर लो..... आह ... ।
मेरी पेन्टी गीली थी नितिन के हाथों मे आते ही नितिन जान गया कि वो क्यूँ गीली है , नितिन ने मेरी ओर देखकर कहा - " वाह पदमा ... तुम्हारे चुतरस की खुशबू तो इत्र को भी मात देती है , .. आज मे इसे फिर से पियूँगा । "
इतना कहकर नितिन ने मेरी पेन्टी को नीचे फेंक दिया, नितिन फिर से मेरे ऊपर आया , मेरी मोटी चुचियों को मसलते हुए मेरे ब्लाउज के हुक खोल दिए और उसके दोनों भागों को अलग कर दिया ।
ब्लाउज के खुलते ही मेरी लाल ब्रा मे कैद गद्देदार चुचियाँ बाहर आ गई जिन्हे चूमते हुए नितिन ने जबरदस्त तरीके से मसला और दबाया । मुझे तो ऐसा लगने लगा जैसे आज नितिन मेरे बूब्स से दूध निकाल कर ही मानेगा । मेरी चुचियों को ब्रा के ऊपर से ही चूमते हुए नितिन मेरे पेट और जहाँ तक उसका हाथ पहुँच सकता था वहाँ तक जाते हुए , मेरे पूरे बदन को अपने सख्त हाथों से मसला और दबाया ।
नितिन - कैसा लग रहा है पदमा , मजा आ रहा है ना ....
मैं -आह .... .. नितिन ... अगर अशोक ने मुझे ... ऐसे देख लिया तो तो वो तो हार्ट-अटैक से ही मर जाएगा .... ओह .. ।
नितिन - अशोक तो चूतिया है , उसे ये भी नहीं पता , तुम जैसे माल को कैसे चोदा जाता है ।
मैं - आह ... उन्हे गाली मत दो नितिन .... उफ्फ़ ... ।
नितिन ने फिर नीचे आकर मेरे पेट पर चूमा और इस बार भी उसने अपने हाथ की उँगलियाँ मेरे मुहँ मे फँसा दी , मैं भी जिस्मानी आग के दरिया मे गोते लगा रही थी , मैंने नितिन की दोनों उँगलियों को अपने मुहँ मे भरकर चूसना शुरू कर दिया ।
नितिन अब रूकने के मूड मे नहीं था और ना ही मैं , उसने नीचे हाथ लेजाकर मेरी साड़ी मे हाथ डाला और मेरी योनि को मसलते हुए मेरे पेटीकोट के नाड़े को पकड़कर खिंच दिया , पेन्टी तो वो पहले ही उतार चुका था , नाड़ा खुलते ही पेटीकोट अपने आप नीचे सरकने लगा और नितिन को मेरी चुत मसलने मे आसानी हो गई । आज कोई बोहोत टाइम के बाद मेरी योनि को मसल रहा था , जिस्मानी आग ने मुझे पागल कर दिया और मैं बिस्तर से उछल पड़ी ।
नितिन मेरे जिस्म की तपिश को समझ गया था और वो जान गया था की मैं अब आपने बदन की गर्मी की गुलाम बन गई हूँ , और उसने बाजी मार ली है । नितिन ने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर पलट दिया और अपनी पेन्ट मे कैद लम्बे लिंग से ही मेरे नितम्बों पर धक्के लगाने लगा ।
हालाँकि उसका लिंग अभी भी उसकी पेन्ट मे था लेकिन मेरी गाँड़ बिल्कुल नंगी थी , सिर्फ साड़ी थी जोकि कमर तक ऊपर उठी हुई थी , नितिन के लिंग का वार सीधे मेरे नंगे नितम्बों पर हो रहा था ।
मेरे नितम्बों पर पड़ने वाले ये धक्के मुझे अच्छे लग रहे थे , इसी बीच नितिन अचानक रुक गया , जिज्ञासावश मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वो अपने कपड़े निकाल रहा था , पल भर की भी देर ना हुई और नितिन ने अपने कपड़े निकाल-कर बिल्कुल नंगा हो गया ,,, मेरी आँखे अभी भी उसके गठीले बदन पर टिकी हुई थी जब मेरी नजरे उसके लिंग पर गई तो हैरत और रोमांचक डर से मेरा मुहँ खुला रह गया ।
नितिन का लण्ड बोहोत ही लंबा था ,
इससे पहले मैंने उसे महसूस जरूर किया था लेकिन देखा आज पहली बार था .. नितिन का लिंग मेरी आँखों के सामने झूल रहा था और मेरी निगाहे उस पर ही टिकी हुई थी । नितिन मुझे उसके लिंग की ओर घूरता हुआ पाकर मुस्कुराते हुए बोला - " कैसा है मेरा लण्ड , पदमा । "
नितिन की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ और शर्मा-कर मैंने अपनी नजरे फेर ली । नितिन दोबारा से मेरे पास आया और उसका लोहे के सरिया के जैसा गरम लण्ड मेरे पेट से टकरा गया , मेरा दिल इतनी रफ्तार से धड़का जैसे मैं अभी बेहोश हो जाऊँगी ।
मौका देखकर नितिन ने मेरे हाथ और पैरों पर बंधी पट्टी खोल दी , जब वो समझ गया की अब मैं आपने जिस्म के हाथों मजबूर हो चुकी हूँ और अब कहीं नहीं जा सकती । नितिन ने मेरे ब्लाउज को पीछे से पकड़कर ऊपर की ओर उठा दिया और मस्ती मे चूर मेरे हाथ अपने आप ऊपर होते चले गए ,मैं नितिन के सामने सिर्फ ब्रा मे रह गई ।
मैंने शर्मा कर अपने बदन को अपने हाथों से ढक लिया तो नितिन ने अपने हाथ पीछे ले जाकर मेरी ब्रा भी खोल दी और मेरे कंधों पर चूमते हुए उसे भी निकाल दिया ।
मैं एक बार फिर नितिन के सामने नग्न हो गई और अपनी लुटती हुई इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों से आपनी चुचियाँ छिपा ली लेकिन ये भी नितिन को ना-ग्वार था उसने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर वापस बिस्तर पर लिटा दिया और खुद मेरे ऊपर आकर मेरे होंठों से अपने होंठ मिला दिए और उन्हे पीने लगा ,
उसने मेरे हाथ मेरे बूब्स से हटाकर बिस्तर के दोनों तरफ दबा दिए और मेरे होंठों को छोड़कर मेरी चुचियों का दूध निचोड़ने लगा , मेरे बड़े-बड़े बूब्स नितिन के मुहँ मे पूरे आ भी नहीं रहे थे फिर भी नितिन उन्हे जितना हो सके अपने मुहँ मे भरकर चूस रहा था , उसने ना सिर्फ मेरे चुचियों को चूसा बल्कि उनपर काटा भी और अपने प्यार की निशानी दी ।
मैं - आह.... आह.... उफ्फ़ ... नहीं .... मत .. काटो .. ओह ..।
नीचे नितिन के लण्ड ने मेरी योनि मे ऐसी आग लगा दी थी कि अपने आप ही उसमे से पानी की धारा निकलने लगी , मेरी योनि और नितिन ने लिंग मे बस मेरी साड़ी का एक महीन परदा था जो हमारे बीच फँसा हुआ था जिसका होना ना होने के बराबर ही था क्योंकि उसके रहते भी नितिन का लण्ड मेरी चुत पर बराबर चोट कर रहा था ।
अब नितिन का मन आगे बढ़ने का था उसने मेरे हाथों और चुचियों को छोड़ा , और मेरी कमर मे फँसी साड़ी को एक झटके मे पकड़कर निकाल दिया अब मेरे जिस्म पर नाम-मात्र भी कपड़े का नहीं था । मेरे जिस्म का एक एक अंग नितिन की आँखों के सामने था ,
पर नितिन की नजरें जहाँ उलझी हुई थी वो थी मेरी योनि और उससे टपकता मेरा चुतरस । नितिन ने एक बार अपनी जीब अपने होंठों पर फिराई तो मैं समझ गई कि नितिन क्या करने वाला है ? नितिन यहाँ इस कमरे मे मेरी चुत का रस पिएगा ये सोच-सोचकर ही मेरी साँसे बावली हो रही थी । पहले भी नितिन ने जब मॉर्निंग वॉक पर मेरी योनि को चाटा था तो मेरी हालत खराब हो गई थी ,आज फिर वही होने वाला था । आखिर नितिन ने मेरे दोनों पैरों को पकड़कर अलग किया और मेरी योनि को अपने हाथों से छूते हुए बोला - " आह .. क्या चीज हो तुम पदमा ..। तुम्हारी चुत को तो दिन रात चोदा जाना चाहिए । "
ऐसा बोलकर नितिन मेरी योनि पर झुक गया और उसके बेहद करीब जाकर उसे सूंघा । फिर मेरी ओर देखकर बोला - " इतनी सेक्सी चुत ... क्या बात है ? पदमा क्या मैं तुम्हारी चुत का ये रस पी लूँ ? "
मैंने शर्म से अपनी आँखे बन्द करली और कोई जवाब नहीं दिया इसके बाद नितिन ने मेरे जवाब का इंतज़ार भी नहीं किया और अपने होंठ खोलकर मेरी गुलाबी रसीली चुत पर लगाकर चूसने लगा ।
मैं - आह .. आह ... ऑफ ... नितिन .... करते हुए बिस्तर पर उछल पड़ी और मेरे हाथ खुद-ब-खुद नितिन के सर के बालों मे उलझ गए और मैंने उसके सर को अपनी योनि पर दबा दिया ।
नितिन की जीभ मेरी चुत की हर गहराई को नाप रही थी मेरा जिस्म बुरी तरह से मचलने लगा , मेरी योनि चुतरस के रूप मे अंगारे बरसाने लगी , जिन्हे नितिन मुहँ लगाए पीता चला गया । उसने अपना एक हाथ ऊपर करके मेरी चुची को पकड़ लिया और मेरी चुत को चाटते हुए मेरी चुची को दबाने लगा । मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं शब्दों मे बयां नहीं कर सकती । पूरे बदन मे अंगारों की झुरझुरी लगी हुई थी । इस तरह से तो मेरी चुत को कभी अशोक या गुप्ता जी ने भी नहीं चाटा था । मैं मस्ती के सागर मे झूमते हुए लगातार आहें भर रही थी ....
" आह ... आह .. आह ..... ऑफ .... मम्म्म् ..... यस .... यस ... "
मेरी कामुक आहों को सुनकर नितिन ने अपना सर एक बार ऊपर उठाया ओर मैं बैचेन हो गई , मैं अब नहीं चाहती थी कि नितिन किसी भी हालत मे रुके , मैंने सवालिया नज़रों से नितिन की आँखों मे देखा , जैसे पूछ रही हूँ " क्योँ रुक गए ?"
नितिन के मेरी लाल आँखों मे देखते हुए पूछा - " कैसा लग रहा है पदमा ? " और अपनी एक उँगली मेरी योनि मे धीरे से घुसा दी ।
" आह ....... बोहोत अच्छा ..... करते रहो ..... । " - मैंने कराहते हुए जवाब दिया ।
नितिन यहाँ नहीं रुका बल्कि ओर जोर से मेरी चुत मे उँगली करते हुए बोला - " क्या अशोक भी ऐसे ही करता है तुम्हारे साथ .... "
" आह .... नितिन .... चुप ... हो जाओ ... उन्हे .. बीच मे मत लाओ .... आह .. ऑफ ...। "
नितिन ने फिर पूछा - " बोलो ना पदमा .. क्या वो भी तुम्हारी चुत चाटता है ?"
नितिन के सवाल मुश्किल होते जा रहे थे और साथ ही मेरी आँखे भी पथराने लगी थी , मैं चरम-सुख पर पहुँचने की कगार पर थी और मैंने नितिन के सवाल का जवाब दिया
मैं - नहीं ...... वो .. नहीं ..... करते ऐसा .... आह ... ।
नितिन ने जब ये सुना तो उसने मुस्कुराकर एक ओर उँगली मेरी चुत मे डाल दी ओर जोर-जोर से उसे अन्दर बाहर करने लगा
नितिन - ये क्या पदमा तुम तो खुद ही मजे ले रही हो , और मेरा क्या ?
मैं ( आहे भरती हुई )- आह ... बोलो क्या चाहिए .... तुम्हें नितिन ...ऑफ ?
नितिन - जैसे मैंने तुम्हारी चुत चुसी है , तुम मेरा लण्ड चूसो ।
जब नितिन ने ये बोला मेरे दिमाग मे वही छाया-चित्र बन गए जब मैंने बस मे गुप्ता जी का लिंग चूसा था , और यहाँ नितिन मुझे फिर से वही करने को बोल रहा था ।
मैं - नितिन ..... उफ़ ... आह ..
नितिन समझ गया था कि मेरा बदन अकड़ने लगा है और मैं किसी भी समय झड़ सकती हूँ और इस समय मेरी कामवासना पूरे चरम पर है , नितिन ये इस मौके का पूरा फायदा उठाया और तेज-तेज मेरी चुत मे अपनी उँगलियाँ अन्दर बाहर करते हुए बोला - " जल्दी बोलो पदमा .. लोगी ना मेरा लोड़ा अपने इस प्यारे नरम होंठों मे "
नितिन की उँगलियों के वार से मेरी चुत , भर-भर के पानी छोड़ने लगी और मेरा पूरा जिस्म ऐंठ गया .. मैंने अपने बदन की कमान नितिन के हाथों मे सोपते हुए कह ही दिया - " हाँ ... लूँगी ... डाल दो .. इसे मेरे नरम होंठों के बीच ... आह.... आह.. "
नितिन ने ये सुनने के बाद एक पल की भी देरी करनी गलत समझी और मेरी योनि से अपने हाथ की उँगलियाँ निकालकर , बेड पर खड़ा हो गया और मेरे सर बाल पकड़कर मुझे घुटनों के बल बैठा दिया .. मेरे सामने नितिन का मोटा काला लण्ड झूल रहा था ... और उस समय मुझे किसी चीज का ध्यान नहीं था सिवाय इसके कि मुझे ये मोटा लण्ड अपने मुहँ मे चाहिए । मैंने उसके लण्ड को अपने मुहँ मे लेने के लिए अपना मुहँ खोल दिया लेकिन नितिन ने मेरे बालों को पकड़कर मुझे लण्ड से दूर किया हुआ था , जब मैंने खुद ही उसके लण्ड को मुहँ मे लेना चाहा तो उसने उसे मेरे मुहँ से दूर कर दिया और मेरे मुहँ मे नहीं घुसने दिया,बल्कि उसका लण्ड मेरे गालों से जरूर छू गया ।
नितिन को मुझे तड़पाने मे बोहोत मजा आ रहा था वो मुझे ऐसे इस्तेमाल कर रहा था जैसे मैं उसकी कोई गुलाम हूँ लेकिन अब मैं भी रुकने वाली नहीं थी , मैंने एक बार फिर से कोशिश की और इस बार नितिन के लण्ड को लपक ले आपने होंठों के बीच अपने मुहँ मे ले लिया और तरीके से उसे चूसने लगी ।
लण्ड के मुहँ मे जाते ही , नितिन की भी आहें फूट गई और वो भी .. " आह ..पदमा ... मेरी ... रांड ... । " बड़बड़ाते हुए हुए अपना लण्ड मेरे मुहँ मे तेजी से अन्दर - बाहर करने लगा ।
गुप्ता जी का लण्ड चूसने के बाद मैंने सोचा था कि अब कभी किसी का नहीं चूसूँगी, लेकिन पता नहीं था मेरी ये खुद से किया वादा बस दो दिन मे टूट जाएगा । मुझे सच मे नितिन का लण्ड चूसने मे मजा आने लगा , और मैं उसे मजे से चूसने लगी जैसे कोई आइसक्रीम हो ....
नितिन मेरे सर को उसके लण्ड पर दबाए आहें भरने लगा - " आह पदमा ... तुम तो बड़ा अच्छा लण्ड चुसती हो कहाँ से सीखा ..?
अब मैं नितिन को क्या बताती कि मैंने उससे पहले अपने एक 50 साल के टेलर का भी चूसा हुआ है , लेकिन सच बताऊँ तो मुझे नितिन के लण्ड को चूसने मे ज्यादा मजा आ रहा था गुप्ता जी से भी ज्यादा । नितिन का लिंग मेरे मुहँ मे पूरा घुसने को तैयार था और जब नितिन ने उसे पूरा मेरे मुहँ मे घुसाया तो मेरा साँस लेना दुर्भर हो गया .. वो जड़ तक मेरे हलक मे उतर गया और मेरे गले की गहराई को मापने लगा मैंने नितिन से आँखों ही आँखों मे मदद की गुहार लगाई , तब जाकर नितिन ने उसे मेरे मुहँ मे से निकाला और मेरे जान मे जान आई , मैं जोर जोर से साँसे लेने लगी ..
नितिन ने मुझे फिर से खड़ा किया मेरी चुत मे अपनी ऊँगली डाल कर जोर-जोर से अन्दर बाहर करते हुए .. मुझे झड़ने पर मजबूर कर दिया मेरी चुत से पानी की बोछार होने लगी
.. मेरी आँखे पथरा गई और मेरा बदन काँपते हुए मैं जोर जोर से चीखने लगी ...
" आह ..... आह ..... आआआआआआ............. ह ,,,,,,,,"
मुझे निढाल होता देख नितिन ने मेरी आहों को शांत करने के लिए फिर से मुझे नीचे बीठा के मेरे मुहँ मे अपना लण्ड दे दिया और उसे तेजी से मेरे मुहँ मे आगे पीछे करने लगा .. मेरे मुहँ से " घू घू .. "की आवाज पूरे कमरे मे गूंज गई अगर कोई ओर वहाँ होता तो यही सोचता कोई रंडी अन्दर चुद रही है ।
मुझे भी इसमे मजा आ रहा था , नितिन का जिस्म भी अब अकड़ने लगा और तभी नितिन तड़पते हुए बोला - " जल्दी अपना मुहँ खोलो पदमा ... आह .. मेरा छूटने ... वाला है ... आह ... । "
मुझे कुछ नहीं सूझा , हड़बड़ाहट मे मैंने भी कामुकता वश अपना मुहँ नितिन के लण्ड के सामने खोल दिया और जबतक मैं कुछ समझ पाती नितिन ने अपने लण्ड के वीर्य से मेरा सारा मुहँ भर दिया और मेरे गालों पर भी उसे गिराते हुए उन्हे सना दिया ।
नितिन निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ा और मैं भी उसी तरह बेड पर लेट गई । वासना और हवस का दौर अब थम चुका था और अब सिवाय लज्जित होने के अपनी हालत पर रोने के मेरे पास कोई रास्ता नहीं था । मेरे लिए एक-एक सेकंड नितिन के कमरे मे रुकना नरक मे रुकने ने समान था, मैं जल्दी से भागकर बाथरूम मे गई और झटपट शावर खोलकर उसके नीचे खड़ी होकर अपनी हालत और कीये हुए कुकर्मों पर रोने लगी , रोते-रोते ही मैंने नितिन के वीर्य से सना हुआ अपना चेहरा साफ किया
और बाहर आकर जल्दी से अपने कपड़े पहनकर नितिन के कमरे से निकल गई , जाने से पहले मैंने एक बार पीछे मुड़कर नितिन को देखा तो वो आराम से अपने बेड पर सोया हुआ था जैसे उसका तो कुछ नहीं गया, और सच भी यही था कि उसका तो कुछ गया ही नहीं था ।
नितिन के कमरे से बाहर आकर मुझे एहसास हुआ कि मैंने हवस की एक ऐसी दुनिया मे कदम रख दिए है जिसका कोई अंत नहीं । मेरे कदम आगे ही नहीं बढ़ रहे थे , इस होटल मे मैंने आज अपना बोहोत कुछ गंवा दिया था , चलते चलते मैं उस होटल की एक-एक इमारत को देख रही थी ।
जब मैं होटल से बाहर आई तो देखा मेरे पास नितिन का दिया हुआ कमर-बंद था , जिसके बदले मैं नितिन को अपनी इज्जत दे आई थी ।
नितिन ने नीचे मेरे पैरों पर चूमते हुए मेरी साड़ी को ओर भी ऊपर उठाकर अपनी जेब से एक ओर लाल पट्टी निकाली मेरे पैरों को भी उस लाल मुलायम पट्टी से बांध दिया ।
मैं - ऑफ ... नितिन ... ये ... क्या कर रहे हो ... आह... मत करो .. ।
नितिन कब का मेरी बातों को सुन रहा था वो तो वासना के नशे मे डूबा हुआ था और अब वही नशा मुझ पर छाने लगा और मेरे सोचने समझने की शक्ति जाती रही , हवस की गर्मी ने मुझे अपना गुलाम बना लिया .. । वहाँ ऑफिस मे मेरा पति , मेरे लिए काम मे लगा है और यहाँ उसका बॉस मुझे अपने ही बिस्तर पर लूट रहा है , इस बात से ही मेरी कामअग्नि चरम पर पहुँच गई । नितिन अब और आगे बढ़ा और मेरी टांगों से हाथ ले जाते हुए मेरी पेन्टी तक ले गया और एकदम से उसे पकड़कर नीचे खिंच दिया ,
मैं उसे ऐसा करने से रोकना भी चाहती थी मगर मेरे हाथों को उसने पहले ही बांध दिया था , मैं कुछ भी ना कर सकी केवल उसकी मिन्नते करने से ..
मैं - नितिन मत निकलो इसे ... प्लीज जो करना है ऊपर-ऊपर से कर लो..... आह ... ।
मेरी पेन्टी गीली थी नितिन के हाथों मे आते ही नितिन जान गया कि वो क्यूँ गीली है , नितिन ने मेरी ओर देखकर कहा - " वाह पदमा ... तुम्हारे चुतरस की खुशबू तो इत्र को भी मात देती है , .. आज मे इसे फिर से पियूँगा । "
इतना कहकर नितिन ने मेरी पेन्टी को नीचे फेंक दिया, नितिन फिर से मेरे ऊपर आया , मेरी मोटी चुचियों को मसलते हुए मेरे ब्लाउज के हुक खोल दिए और उसके दोनों भागों को अलग कर दिया ।
ब्लाउज के खुलते ही मेरी लाल ब्रा मे कैद गद्देदार चुचियाँ बाहर आ गई जिन्हे चूमते हुए नितिन ने जबरदस्त तरीके से मसला और दबाया । मुझे तो ऐसा लगने लगा जैसे आज नितिन मेरे बूब्स से दूध निकाल कर ही मानेगा । मेरी चुचियों को ब्रा के ऊपर से ही चूमते हुए नितिन मेरे पेट और जहाँ तक उसका हाथ पहुँच सकता था वहाँ तक जाते हुए , मेरे पूरे बदन को अपने सख्त हाथों से मसला और दबाया ।
नितिन - कैसा लग रहा है पदमा , मजा आ रहा है ना ....
मैं -आह .... .. नितिन ... अगर अशोक ने मुझे ... ऐसे देख लिया तो तो वो तो हार्ट-अटैक से ही मर जाएगा .... ओह .. ।
नितिन - अशोक तो चूतिया है , उसे ये भी नहीं पता , तुम जैसे माल को कैसे चोदा जाता है ।
मैं - आह ... उन्हे गाली मत दो नितिन .... उफ्फ़ ... ।
नितिन ने फिर नीचे आकर मेरे पेट पर चूमा और इस बार भी उसने अपने हाथ की उँगलियाँ मेरे मुहँ मे फँसा दी , मैं भी जिस्मानी आग के दरिया मे गोते लगा रही थी , मैंने नितिन की दोनों उँगलियों को अपने मुहँ मे भरकर चूसना शुरू कर दिया ।
नितिन अब रूकने के मूड मे नहीं था और ना ही मैं , उसने नीचे हाथ लेजाकर मेरी साड़ी मे हाथ डाला और मेरी योनि को मसलते हुए मेरे पेटीकोट के नाड़े को पकड़कर खिंच दिया , पेन्टी तो वो पहले ही उतार चुका था , नाड़ा खुलते ही पेटीकोट अपने आप नीचे सरकने लगा और नितिन को मेरी चुत मसलने मे आसानी हो गई । आज कोई बोहोत टाइम के बाद मेरी योनि को मसल रहा था , जिस्मानी आग ने मुझे पागल कर दिया और मैं बिस्तर से उछल पड़ी ।
नितिन मेरे जिस्म की तपिश को समझ गया था और वो जान गया था की मैं अब आपने बदन की गर्मी की गुलाम बन गई हूँ , और उसने बाजी मार ली है । नितिन ने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर पलट दिया और अपनी पेन्ट मे कैद लम्बे लिंग से ही मेरे नितम्बों पर धक्के लगाने लगा ।
हालाँकि उसका लिंग अभी भी उसकी पेन्ट मे था लेकिन मेरी गाँड़ बिल्कुल नंगी थी , सिर्फ साड़ी थी जोकि कमर तक ऊपर उठी हुई थी , नितिन के लिंग का वार सीधे मेरे नंगे नितम्बों पर हो रहा था ।
मेरे नितम्बों पर पड़ने वाले ये धक्के मुझे अच्छे लग रहे थे , इसी बीच नितिन अचानक रुक गया , जिज्ञासावश मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वो अपने कपड़े निकाल रहा था , पल भर की भी देर ना हुई और नितिन ने अपने कपड़े निकाल-कर बिल्कुल नंगा हो गया ,,, मेरी आँखे अभी भी उसके गठीले बदन पर टिकी हुई थी जब मेरी नजरे उसके लिंग पर गई तो हैरत और रोमांचक डर से मेरा मुहँ खुला रह गया ।
नितिन का लण्ड बोहोत ही लंबा था ,
इससे पहले मैंने उसे महसूस जरूर किया था लेकिन देखा आज पहली बार था .. नितिन का लिंग मेरी आँखों के सामने झूल रहा था और मेरी निगाहे उस पर ही टिकी हुई थी । नितिन मुझे उसके लिंग की ओर घूरता हुआ पाकर मुस्कुराते हुए बोला - " कैसा है मेरा लण्ड , पदमा । "
नितिन की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ और शर्मा-कर मैंने अपनी नजरे फेर ली । नितिन दोबारा से मेरे पास आया और उसका लोहे के सरिया के जैसा गरम लण्ड मेरे पेट से टकरा गया , मेरा दिल इतनी रफ्तार से धड़का जैसे मैं अभी बेहोश हो जाऊँगी ।
मौका देखकर नितिन ने मेरे हाथ और पैरों पर बंधी पट्टी खोल दी , जब वो समझ गया की अब मैं आपने जिस्म के हाथों मजबूर हो चुकी हूँ और अब कहीं नहीं जा सकती । नितिन ने मेरे ब्लाउज को पीछे से पकड़कर ऊपर की ओर उठा दिया और मस्ती मे चूर मेरे हाथ अपने आप ऊपर होते चले गए ,मैं नितिन के सामने सिर्फ ब्रा मे रह गई ।
मैंने शर्मा कर अपने बदन को अपने हाथों से ढक लिया तो नितिन ने अपने हाथ पीछे ले जाकर मेरी ब्रा भी खोल दी और मेरे कंधों पर चूमते हुए उसे भी निकाल दिया ।
मैं एक बार फिर नितिन के सामने नग्न हो गई और अपनी लुटती हुई इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों से आपनी चुचियाँ छिपा ली लेकिन ये भी नितिन को ना-ग्वार था उसने मुझे मेरे कंधों से पकड़कर वापस बिस्तर पर लिटा दिया और खुद मेरे ऊपर आकर मेरे होंठों से अपने होंठ मिला दिए और उन्हे पीने लगा ,
उसने मेरे हाथ मेरे बूब्स से हटाकर बिस्तर के दोनों तरफ दबा दिए और मेरे होंठों को छोड़कर मेरी चुचियों का दूध निचोड़ने लगा , मेरे बड़े-बड़े बूब्स नितिन के मुहँ मे पूरे आ भी नहीं रहे थे फिर भी नितिन उन्हे जितना हो सके अपने मुहँ मे भरकर चूस रहा था , उसने ना सिर्फ मेरे चुचियों को चूसा बल्कि उनपर काटा भी और अपने प्यार की निशानी दी ।
मैं - आह.... आह.... उफ्फ़ ... नहीं .... मत .. काटो .. ओह ..।
नीचे नितिन के लण्ड ने मेरी योनि मे ऐसी आग लगा दी थी कि अपने आप ही उसमे से पानी की धारा निकलने लगी , मेरी योनि और नितिन ने लिंग मे बस मेरी साड़ी का एक महीन परदा था जो हमारे बीच फँसा हुआ था जिसका होना ना होने के बराबर ही था क्योंकि उसके रहते भी नितिन का लण्ड मेरी चुत पर बराबर चोट कर रहा था ।
अब नितिन का मन आगे बढ़ने का था उसने मेरे हाथों और चुचियों को छोड़ा , और मेरी कमर मे फँसी साड़ी को एक झटके मे पकड़कर निकाल दिया अब मेरे जिस्म पर नाम-मात्र भी कपड़े का नहीं था । मेरे जिस्म का एक एक अंग नितिन की आँखों के सामने था ,
पर नितिन की नजरें जहाँ उलझी हुई थी वो थी मेरी योनि और उससे टपकता मेरा चुतरस । नितिन ने एक बार अपनी जीब अपने होंठों पर फिराई तो मैं समझ गई कि नितिन क्या करने वाला है ? नितिन यहाँ इस कमरे मे मेरी चुत का रस पिएगा ये सोच-सोचकर ही मेरी साँसे बावली हो रही थी । पहले भी नितिन ने जब मॉर्निंग वॉक पर मेरी योनि को चाटा था तो मेरी हालत खराब हो गई थी ,आज फिर वही होने वाला था । आखिर नितिन ने मेरे दोनों पैरों को पकड़कर अलग किया और मेरी योनि को अपने हाथों से छूते हुए बोला - " आह .. क्या चीज हो तुम पदमा ..। तुम्हारी चुत को तो दिन रात चोदा जाना चाहिए । "
ऐसा बोलकर नितिन मेरी योनि पर झुक गया और उसके बेहद करीब जाकर उसे सूंघा । फिर मेरी ओर देखकर बोला - " इतनी सेक्सी चुत ... क्या बात है ? पदमा क्या मैं तुम्हारी चुत का ये रस पी लूँ ? "
मैंने शर्म से अपनी आँखे बन्द करली और कोई जवाब नहीं दिया इसके बाद नितिन ने मेरे जवाब का इंतज़ार भी नहीं किया और अपने होंठ खोलकर मेरी गुलाबी रसीली चुत पर लगाकर चूसने लगा ।
मैं - आह .. आह ... ऑफ ... नितिन .... करते हुए बिस्तर पर उछल पड़ी और मेरे हाथ खुद-ब-खुद नितिन के सर के बालों मे उलझ गए और मैंने उसके सर को अपनी योनि पर दबा दिया ।
नितिन की जीभ मेरी चुत की हर गहराई को नाप रही थी मेरा जिस्म बुरी तरह से मचलने लगा , मेरी योनि चुतरस के रूप मे अंगारे बरसाने लगी , जिन्हे नितिन मुहँ लगाए पीता चला गया । उसने अपना एक हाथ ऊपर करके मेरी चुची को पकड़ लिया और मेरी चुत को चाटते हुए मेरी चुची को दबाने लगा । मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं शब्दों मे बयां नहीं कर सकती । पूरे बदन मे अंगारों की झुरझुरी लगी हुई थी । इस तरह से तो मेरी चुत को कभी अशोक या गुप्ता जी ने भी नहीं चाटा था । मैं मस्ती के सागर मे झूमते हुए लगातार आहें भर रही थी ....
" आह ... आह .. आह ..... ऑफ .... मम्म्म् ..... यस .... यस ... "
मेरी कामुक आहों को सुनकर नितिन ने अपना सर एक बार ऊपर उठाया ओर मैं बैचेन हो गई , मैं अब नहीं चाहती थी कि नितिन किसी भी हालत मे रुके , मैंने सवालिया नज़रों से नितिन की आँखों मे देखा , जैसे पूछ रही हूँ " क्योँ रुक गए ?"
नितिन के मेरी लाल आँखों मे देखते हुए पूछा - " कैसा लग रहा है पदमा ? " और अपनी एक उँगली मेरी योनि मे धीरे से घुसा दी ।
" आह ....... बोहोत अच्छा ..... करते रहो ..... । " - मैंने कराहते हुए जवाब दिया ।
नितिन यहाँ नहीं रुका बल्कि ओर जोर से मेरी चुत मे उँगली करते हुए बोला - " क्या अशोक भी ऐसे ही करता है तुम्हारे साथ .... "
" आह .... नितिन .... चुप ... हो जाओ ... उन्हे .. बीच मे मत लाओ .... आह .. ऑफ ...। "
नितिन ने फिर पूछा - " बोलो ना पदमा .. क्या वो भी तुम्हारी चुत चाटता है ?"
नितिन के सवाल मुश्किल होते जा रहे थे और साथ ही मेरी आँखे भी पथराने लगी थी , मैं चरम-सुख पर पहुँचने की कगार पर थी और मैंने नितिन के सवाल का जवाब दिया
मैं - नहीं ...... वो .. नहीं ..... करते ऐसा .... आह ... ।
नितिन ने जब ये सुना तो उसने मुस्कुराकर एक ओर उँगली मेरी चुत मे डाल दी ओर जोर-जोर से उसे अन्दर बाहर करने लगा
नितिन - ये क्या पदमा तुम तो खुद ही मजे ले रही हो , और मेरा क्या ?
मैं ( आहे भरती हुई )- आह ... बोलो क्या चाहिए .... तुम्हें नितिन ...ऑफ ?
नितिन - जैसे मैंने तुम्हारी चुत चुसी है , तुम मेरा लण्ड चूसो ।
जब नितिन ने ये बोला मेरे दिमाग मे वही छाया-चित्र बन गए जब मैंने बस मे गुप्ता जी का लिंग चूसा था , और यहाँ नितिन मुझे फिर से वही करने को बोल रहा था ।
मैं - नितिन ..... उफ़ ... आह ..
नितिन समझ गया था कि मेरा बदन अकड़ने लगा है और मैं किसी भी समय झड़ सकती हूँ और इस समय मेरी कामवासना पूरे चरम पर है , नितिन ये इस मौके का पूरा फायदा उठाया और तेज-तेज मेरी चुत मे अपनी उँगलियाँ अन्दर बाहर करते हुए बोला - " जल्दी बोलो पदमा .. लोगी ना मेरा लोड़ा अपने इस प्यारे नरम होंठों मे "
नितिन की उँगलियों के वार से मेरी चुत , भर-भर के पानी छोड़ने लगी और मेरा पूरा जिस्म ऐंठ गया .. मैंने अपने बदन की कमान नितिन के हाथों मे सोपते हुए कह ही दिया - " हाँ ... लूँगी ... डाल दो .. इसे मेरे नरम होंठों के बीच ... आह.... आह.. "
नितिन ने ये सुनने के बाद एक पल की भी देरी करनी गलत समझी और मेरी योनि से अपने हाथ की उँगलियाँ निकालकर , बेड पर खड़ा हो गया और मेरे सर बाल पकड़कर मुझे घुटनों के बल बैठा दिया .. मेरे सामने नितिन का मोटा काला लण्ड झूल रहा था ... और उस समय मुझे किसी चीज का ध्यान नहीं था सिवाय इसके कि मुझे ये मोटा लण्ड अपने मुहँ मे चाहिए । मैंने उसके लण्ड को अपने मुहँ मे लेने के लिए अपना मुहँ खोल दिया लेकिन नितिन ने मेरे बालों को पकड़कर मुझे लण्ड से दूर किया हुआ था , जब मैंने खुद ही उसके लण्ड को मुहँ मे लेना चाहा तो उसने उसे मेरे मुहँ से दूर कर दिया और मेरे मुहँ मे नहीं घुसने दिया,बल्कि उसका लण्ड मेरे गालों से जरूर छू गया ।
नितिन को मुझे तड़पाने मे बोहोत मजा आ रहा था वो मुझे ऐसे इस्तेमाल कर रहा था जैसे मैं उसकी कोई गुलाम हूँ लेकिन अब मैं भी रुकने वाली नहीं थी , मैंने एक बार फिर से कोशिश की और इस बार नितिन के लण्ड को लपक ले आपने होंठों के बीच अपने मुहँ मे ले लिया और तरीके से उसे चूसने लगी ।
लण्ड के मुहँ मे जाते ही , नितिन की भी आहें फूट गई और वो भी .. " आह ..पदमा ... मेरी ... रांड ... । " बड़बड़ाते हुए हुए अपना लण्ड मेरे मुहँ मे तेजी से अन्दर - बाहर करने लगा ।
गुप्ता जी का लण्ड चूसने के बाद मैंने सोचा था कि अब कभी किसी का नहीं चूसूँगी, लेकिन पता नहीं था मेरी ये खुद से किया वादा बस दो दिन मे टूट जाएगा । मुझे सच मे नितिन का लण्ड चूसने मे मजा आने लगा , और मैं उसे मजे से चूसने लगी जैसे कोई आइसक्रीम हो ....
नितिन मेरे सर को उसके लण्ड पर दबाए आहें भरने लगा - " आह पदमा ... तुम तो बड़ा अच्छा लण्ड चुसती हो कहाँ से सीखा ..?
अब मैं नितिन को क्या बताती कि मैंने उससे पहले अपने एक 50 साल के टेलर का भी चूसा हुआ है , लेकिन सच बताऊँ तो मुझे नितिन के लण्ड को चूसने मे ज्यादा मजा आ रहा था गुप्ता जी से भी ज्यादा । नितिन का लिंग मेरे मुहँ मे पूरा घुसने को तैयार था और जब नितिन ने उसे पूरा मेरे मुहँ मे घुसाया तो मेरा साँस लेना दुर्भर हो गया .. वो जड़ तक मेरे हलक मे उतर गया और मेरे गले की गहराई को मापने लगा मैंने नितिन से आँखों ही आँखों मे मदद की गुहार लगाई , तब जाकर नितिन ने उसे मेरे मुहँ मे से निकाला और मेरे जान मे जान आई , मैं जोर जोर से साँसे लेने लगी ..
नितिन ने मुझे फिर से खड़ा किया मेरी चुत मे अपनी ऊँगली डाल कर जोर-जोर से अन्दर बाहर करते हुए .. मुझे झड़ने पर मजबूर कर दिया मेरी चुत से पानी की बोछार होने लगी
.. मेरी आँखे पथरा गई और मेरा बदन काँपते हुए मैं जोर जोर से चीखने लगी ...
" आह ..... आह ..... आआआआआआ............. ह ,,,,,,,,"
मुझे निढाल होता देख नितिन ने मेरी आहों को शांत करने के लिए फिर से मुझे नीचे बीठा के मेरे मुहँ मे अपना लण्ड दे दिया और उसे तेजी से मेरे मुहँ मे आगे पीछे करने लगा .. मेरे मुहँ से " घू घू .. "की आवाज पूरे कमरे मे गूंज गई अगर कोई ओर वहाँ होता तो यही सोचता कोई रंडी अन्दर चुद रही है ।
मुझे भी इसमे मजा आ रहा था , नितिन का जिस्म भी अब अकड़ने लगा और तभी नितिन तड़पते हुए बोला - " जल्दी अपना मुहँ खोलो पदमा ... आह .. मेरा छूटने ... वाला है ... आह ... । "
मुझे कुछ नहीं सूझा , हड़बड़ाहट मे मैंने भी कामुकता वश अपना मुहँ नितिन के लण्ड के सामने खोल दिया और जबतक मैं कुछ समझ पाती नितिन ने अपने लण्ड के वीर्य से मेरा सारा मुहँ भर दिया और मेरे गालों पर भी उसे गिराते हुए उन्हे सना दिया ।
नितिन निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ा और मैं भी उसी तरह बेड पर लेट गई । वासना और हवस का दौर अब थम चुका था और अब सिवाय लज्जित होने के अपनी हालत पर रोने के मेरे पास कोई रास्ता नहीं था । मेरे लिए एक-एक सेकंड नितिन के कमरे मे रुकना नरक मे रुकने ने समान था, मैं जल्दी से भागकर बाथरूम मे गई और झटपट शावर खोलकर उसके नीचे खड़ी होकर अपनी हालत और कीये हुए कुकर्मों पर रोने लगी , रोते-रोते ही मैंने नितिन के वीर्य से सना हुआ अपना चेहरा साफ किया
और बाहर आकर जल्दी से अपने कपड़े पहनकर नितिन के कमरे से निकल गई , जाने से पहले मैंने एक बार पीछे मुड़कर नितिन को देखा तो वो आराम से अपने बेड पर सोया हुआ था जैसे उसका तो कुछ नहीं गया, और सच भी यही था कि उसका तो कुछ गया ही नहीं था ।
नितिन के कमरे से बाहर आकर मुझे एहसास हुआ कि मैंने हवस की एक ऐसी दुनिया मे कदम रख दिए है जिसका कोई अंत नहीं । मेरे कदम आगे ही नहीं बढ़ रहे थे , इस होटल मे मैंने आज अपना बोहोत कुछ गंवा दिया था , चलते चलते मैं उस होटल की एक-एक इमारत को देख रही थी ।
जब मैं होटल से बाहर आई तो देखा मेरे पास नितिन का दिया हुआ कमर-बंद था , जिसके बदले मैं नितिन को अपनी इज्जत दे आई थी ।