Chapter 02
खैर अगले दिन सुबह मैंने अपना काम किया और सफाई वगैरा करने के बाद अपने कमरे की बालकनी में जा कर खड़ी हो गयी,
इतने में क्या देखती हूँ की एक गधा चला जा रहा है. और आगे एक गधी भी चली जा रही थी. गधे ने अपना लगभग अढाई फुट लम्बा और ५ इंच मोटा डंडे जैसा लौड़ा बाहर निकल लिया था.
मैं समझ गयी की गधा आज इस गधी का काम तमाम करने के मूड में है.
यह देख कर मुझे भी मजा आने लगा और मेरी चूत भी गीली होने लगी,
मैं समझ गयी की आज सुबह सुबह कुछ मजेदार देखने को मिलेगा.
अब मैं आप लोगों को अपने घर के बारे में बता देती हूँ. हमारा घर २ मंजिला है. ऊपर की मंजिल पर एक कमरा है जिस में पापा सुबह सुबह अपना योगा या कसरत करते हैं. और नीचे के कमरों में हम लोग रहते है. हमारे घर के साथ ही एक खली प्लाट है, जो काफी बड़ा है.
प्लाट के मालिक ने उस के चारों ओर चारदीवारी करवा रखी है और अंदर जाने के लिए एक गेट लगवा रखा है.
गेट तो काफी समय से खुला ही पड़ा है क्योंकि उस का ताला कभी का टूट चूका है, इसलिए अक्सर आवारा पशु आदि उस प्लाट में घुस जाते हैं. उस के चारों ओर की चारदीवारी काफी ऊँची है.
इस समय पापा ऊपर के कमरे में कसरत कर रहे थे. और मैं नीचे के कमरे के बाहर खड़ी गधे गदही का होने वाला सेक्स खेल देखना चाह रही थी,
इतने में गधी उस खली प्लाट में घुस गयी और उसके पीछे पीछे गधा भी आ गया.
मैं इस से बहुत खुश हुई क्योंकि अब बाहर से कोई इस गधे और गधी को देख नहीं सकता था. तो में यदि उनकी रासलीला ऊपर से देख भी लेती तो किसी को भी पता नहीं चल सकता था कि में गधे गधी को चुदाई करते हुए देख रही हूँ.
गधा गधी के पास गया और गधी की गांड को सूंघने लगा. गधी को भी शायद अच्छा लग रहा था. क्योंकि पहले तो वो गधे से बचने के लिए इधर उधर जा रही थी पर जैसे ही गधे ने उसकी चूत को सूंघा तो गधी अब आराम से एक हे जगह खड़ी रह गयी.
गधे ने गधी की चूत को चाटना शुरू कर दिया.
अब गधी को बहुत आनंद आ रहा था. वो एक हे जगह टिक कर खड़ी हो गयी और उसने अपनी टाँगे थोड़ा फैला दी ताकि गधा उसकी चूत को अच्छी तरह से सूंघ सके और चाट सके.
गधे का लण्ड तन कर खड़ा हो चूका था. और उसका लौड़ा बाहर आ गया था. अढ़ाई फुट लम्बा और पांच इन्च मोटा लौड़ा बहुत ही भयानक लग रहा था.
मैं सोच रही थी की क्या गधी इतना बड़ा लौड़ा अपने अंदर ले भी पाएगी या नहीं.
इतने में गधे ने अपनी ऊपर की टाँगे गधी के ऊपर उसके कमर के दोनों ओर रखीं और अपना लौड़ा एक ही झटके से गधी की चूत में घुसेड़ने की कोशिश की.
गधी को शायद दर्द हुआ और वो जोर से चिल्ला कर आगे की और खिसक गयी जिस से गधे का लौड़ा अंदर न जा पाया।
गधे ने फिर आगे बढ़ कर गधी की चूत को चाटना शुरू कर दिया. जिस से गढ़ी फिर आराम से खड़ी हो गयी और चूत चटवाने का आनंद लेने लगी.
अचानक मेरी नजर सामने वाले मकान की खिड़की पर लगे शीशे पर गयी. (हमारे मकान से आगे वो खाली प्लाट था और उस के आगे फिर घर था. में इस घर की खिड़की पर लगे कांच की बात कर रही हूँ..)
उस शीशे में हमारे घर की परछाई दिख रही थी. मैंने शीशे में देखा की ऊपर मेरे पापा भी खड़े उन गधे गधी की चुदाई का सीन देख रहे थे.
पता नहीं पापा कितनी देर से खड़े थे या शायद गधी की उस चिल्लाहट को सुन कर आये थे.
मुझे यह देख कर अजीब लगा. अब हम दोनों बाप बेटी उस गधे और गधी को होने वाली संभावित चुदाई को देखने के लिए खड़े थे.
पापा को मालूम नहीं था कि मैंने उन्हें देख लिया है.
मैं पापा की हर हरकत को देख सकती थी।
पापा को पता नहीं था कि मैं भी इस चुदाई समारोह की एक और दर्शक हूँ.
मेरे शैतानी दिमाग में एक आईडिया आया और मैंने पापा को अपनी उपस्थिति का एहसास करवाने के लिए गधे की ओर मुंह किये हुए ही बोला.
"अबे जल्दी से ऊपर चढ़ जा और घुसेड़ दे अपन पूरा। "
पापा यह आवाज सुन कर मेरी तरफ देखे. वो हैरान रह गए कि उनकी प्यारी बेटी भी इस चुदाई को देखने को खड़ी है.
अब पापा की नजर मेरे ऊपर भी थी.
वो इत्मीनान से मुझे देख सकते थे क्योंकि वो ऊपर के कमरे में थे और में नीचे के. तो मेरे द्वारा उन्हें देख लिए जाने का कोई भी डर नहीं था.
पर उन्हें क्या मालुम था की सामने वाले मकान की खिड़की के कांच से में उन्हें देख सकती थी.
मुझे लगा की पापा को पटाने का यह एक और सुनहरी मौका है. तो मैंने अपनी सलवार में अपना हाथ घुसा लिया और अपनी चूत में अपनी उंगलिया घुसा कर अंदर बाहर करनी शुरू कर दी.
यह पापा को दुगना मजा आने वाला कारनामा था.
सामने अब गधा काफी देर से गधी की चूत सूंघ चूका था और अब वो असली काम यानि चुदाई के मूड में था.
गधा अपना लम्बा लंड निकाले गधी पे चढ़ रहा था.
जेसे ही लंड चूत को छूता गधी आगे हो जाती, शायद गधे के मोटे लौड़े से वो भी डर रही थी पर मजे के कारण वो चुदाई भी करवाना चाह रही थी,
एसा दो- तिन बार हुआ लेकिन गधे ने अचानक अपने मोटे से लौड़े का टोपा गधी की चूत के छेद पर सेट कर के एसा धक्का मारा कि आधा लंड गधी की चुतमें चला गया।
गधी हों-हों.ची..हों-हों..ची..करने लगी और आगे दोड़ने लगी.गधा भी अपना लंड घुसाए दो पेरों पे दोड़ने लगा. हों-हों.ची..हों-हों..ची..करने लगा.
मेरे चहेरे पे स्माइल आ गई. गधी को शायद इतने मोटे लौड़े से दर्द हो रहा था पर गधी के इधर उधर भागने के बावजूद भी उसने अपना लण्ड गधी की चूत से बाहर नहीं निकलने दिया.
आखिर गधी भी रुक गयी पता नहीं गधी का दर्द कम हो गया था, या उसे समज आ गया था की अब तो चुदाई हो कर ही रहेगी और गधा लण्ड बाहर निकालने से रहा. या यह भी हो सकता है की अब उसे भी मजा आने लगा हो,
खैर कुछ भी हो अब गधा आराम से गधी को पूरे लण्ड से चोद रहा था. और गधी चुप चाप खड़ी अपनी चुदाई करवा रही थी.
गधा पूरा लण्ड बाहर निकाल लेता और फिर एक ही झटके से उसे फिर से पूरा अंदर घुसेड़ देता.
जोरदार चुदाई चल रही थी, दोनों गधे आपसमे गधा पचीसी खेल रहे थे।
मैंने पापा की परछाई की और देखा तो पाया की पापा बड़े ही इत्मीनान से सामने गधे और नीचे अपनी बेटी की चूत में उँगलियों से रगड़ाई देख रहे थे.
मैंने पाया की पापा का हाथ उनके ट्रेक सूट के पजामे के अंदर था और वो भी इतना गर्म हो गए थे कि अपने लण्ड को मसल रहे थे.
पापा को यकीन था की मैं उन्हें नहीं देख सकती तो वो आराम से अपना लण्ड सेहला रहे थे.
मैंने पापा को और मजा देने और पटाने के इरादे से सोचा और अपनी सलवार के नाड़े को खोल दिया और सलवार को अपने घुटनो तक नीचे कर दिया.
अब में कमर से नीचे नंगी थी, मेरी अपनी चूत में हुई हुई दो उंगलिया अब पापा को साफ़ दिखाई दे रही थी. पापा तो आज जन्नत का नजारा कर रहे थे.
सामने गधा गधी की चुदाई चल रही थी और नीचे उनकी बेटी नंगी बैठी हुई अपनी चूत में उँगलियाँ कर रही थी,
पापा इतना गर्म हो गए थे कि उन्होंने भी अपने पजामे को नीचे खिसका दिया और खुल कर मुठ मारना शुरू कर दिया.
पापा को यो यह था कि उनको मुठ मारते हुए कोई नहीं देख सकता तो वो आराम से अपने लण्ड को नंगा करके मुठ मार रहे थे.
मेरी भी जन्नत हो गयी थी, मैं पहले भी चाहे पापा को मुठ मारता देख चुकी थे पर आज तो वो मेरी नंगी चूत को देख कर मुठ मार रहे थे. इस से मेरा मजा हजारों गुणा बढ़ गया और अपने आप मेरी उँगलियों की स्पीड बढ़ गयी.
अब हम दोनों बाप बेटी सामने गधे गधी की चुदाई और हम बाप बेटी की मुठ मारने को देख कर आनंद ले रहे थे.
पापा का ध्यान सामने गधी पर कम और नीचे अपनी चूत की रगड़ाई कर रही बेटी पर ज्यादा था.
पापा को मेरी नंगी चूत साफ़ दिखाई दे रही थी। मैं भी जान भूझ कर इस पोज़ में लेट कर अपनी चूत में उंगलिया फेर रही थी जिस पोज़ में पापा को मेरी चूत बिलकुल ठीक से दिखाई दे. ताकि पापा को ज्यादा मजा आये.
पापा की मुठ मारने की स्पीड भी तेज हो गयी थी.
मुझे सामने मकान की खिड़की के कांच से पापा का लण्ड बिलकुल साफ़ दिखाई दे रहा था.
तभी मैंने सोचा की क्यों न पापा को पटाने के लिए उन्हें कुछ और ज्यादा मजा दिया जाये.
यह सोच कर मैंने अपनी चूत से अपनी उंगलिया बाहर निकली और सलवार को ऊपर कमर पर कर के खड़ी हो गयी. पापा को समझ नहीं आया की अचानक मेरा मुठ मारने का प्रोग्राम क्यों बदल गया. मैं उठ कर अंदर किचन में गयी और एक मोटा सा खीरा ले कर वापिस आ गयी।
पापा ने मेरे हाथ में खीरा देखा तो उन्हें थोड़ा थोड़ा समझ आया की आज उनकी प्यारी बेटी क्या करने जा रही है,
पापा को लगा की शायद मैं गधे गधी की चुदाई देख कर इतनी उत्तेजित हो गयी हूँ की अब उँगलियों से मेरा काम नहीं चलने वाला और मैं एक खीरे से मजा लेना चाहती हूँ.
मैंने खीरा भी जान भूझ कर काफी लम्बा और मोटा लिया था.
उसका आकार बिलकुल पापा के लौड़े के जैसा था. पापा शायद सोच रहे थे कि क्या मैं इतना मोटा खीरा ले भी पाऊँगी या नहीं. पर मैंने जान भूझ कर ऐसा खीरा चुना था।, ताकि पापा को इतना पता लग जाये की उनकी बेटी उनके लौड़े के आकार का खीरा ले सकती है तो समय आने पर उनके लण्ड को भी झेल लेगी.
मैंने ऐसा इसलिए सोचा था ताकि यदि जब भी कभी हम बाप बेटी को चुदाई का असली मौका आये तो पापा कहीं डर कर कि उनका लण्ड तो बहुत बड़ा है, मुझे चोदने से मना न कर दें.
मैं पापा को बता देना चाहती थी की उनकी बेटी जरूरत पड़ने पर उनका पूरा लौड़ा ले सकती है,
मैंने दुबारा से अपनी सलवार खोल कर पूरी ही टांगो से बाहर निकाल दी और अब पूरी तरह से नंगी हो कर जमीन पर लेट गयी.
मेरे लेट जाने से ऊपर के कमरे की छत पर खड़े पापा को मेरी नंगी चूत बिलकुल क्लियर दिखाई दे रही थी.
मेरी चूत पर थोड़े छोटे छोटे से बाल हैं, पर भगवन की दया से मैंने आज ही अपनी चूत की सफाई करी थी.
पापा मेरी नंगी चूत को देखते हुए अपनी मुठ मार रहे थे.
मैंने खीरे को अपने मुंह में ले कर चूसना शुरू कर दिया, असल में तो मैं खीरे को गीला कर रही थी पर मैं उसे गीला इस ढंग से कर रही थी कि जैसे मैं कोई लौड़ा चूस रही होऊं.
मैं खीरे को ४-५ इंच तक मुंह के अंदर ले लेती और उसे चूसते हुए बाहर निकालती, पापा शायद यही तसवुर कर रहे थे की काश मेरे मुंह में खीरा नहीं बल्कि उनका लौड़ा होता.
खैर मैंने खीरे को अच्छी तरह चूसने और गीला करने के बाद, उसकी नोक को अपनी चूत के मुंह पर रखा और एक झटके से लगभग आधा खीरा अंदर घुसेड़ लिया.
मुझे थोड़ा दर्द तो हुआ और मेरे मुंह से एक जोर की आह की आवाज निकल गयी.
फिर मैंने खीरे को धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर दिया. जैसे मैं खीरे से चुदवा रही होऊं.
धीरे धीरे मेरी हाथ की स्पीड बढ़ती गयी. अब मैं तेज तेज खीरा अंदर बाहर कर रही थी. मैंने जान भूझ कर अपनी आँखें बंद कर ली थी, ताकि पापा को लगे की मैं मजे के कारण आँखें बंद करे खीरे से चुदवा रही हूँ, पर असल में मैंने आँखें थोड़ी खुली रखी थी ताकि मैं सामने गधे को चुदाई करते और इधर अपने पापा को मुठ मारते आराम से देख सकूँ.
पापा भी यह समझते हुए की मेरी आँखें तो मजे की अधिकता के कारण बंद हैं, आराम से अब खुल कर मुझे खीरा लेते हुए देख रहे थे.
अब हम चारोँ यानि गधा, गधी, पापा और मैं सेक्स का आनंद ले रहे थे.
मैंने खीरे से तो न जाने कितनी बार मजा लिया था पर आज पापा के सामने खीरा लेते हुए इतना आनंद आ रहा था की बता नहीं सकती. शायद यह रिश्तों की दीवार को लांघते हुए मजा लेने के कारण था.
अब मेरा और उधर पापा का काम पूरा होने ही वाला था.
इधर गधे ने भी चुदाई की स्पीड बढ़ा दी थी. गधे ने अपनी आगे वाली दोनों टांगे जो उसने गधी की कमर के दोनों ओर रखी थी, से गधी को कस के पकड़ लिया और जोर जोर से अपना लौड़ा अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। गधि ने -- गधे का लम्बा लंड पूरा अपनी चूत में ले लिया था.गधा हांफ रहा था..
शायद उसका माल निकलने वाला था.
फिर गधे ने अपना लण्ड जोर से एक झटके से गधी के अंदर जड़ तक घुसेड़ दिया और एक बार जोर से हुआँ हुआँ की आवाज़ निकली और वो जोर से उछला पूरा लंड घुसा दिया इसबार गधी ने कोई शोर नहीं किया शांति से खड़ी रही । गधा शांत हो गया और उसके लण्ड से उसका वीर्य गधी की चूत में निकलना शुरू हो गया.
गधे का काम होते ही वो अब बिलकुल शांत खड़ा था और गढ़ी के अंदर अपना माल छोड़ रहा था.
अब गधे ने अपना लंड बाहर निकल लिया.
अभी भी उसके लंड से माल टपक रहा था.
गधा पचीसी पूरी हो गई. गधा-गधी शांत हो गये
में और पापा सारा नजारा देख रहे थे.
गधे का माल चूत ते ही मैंने भी अपनी स्पीड एकदम तेज की और मेरे मुंह से भी एक जोर की आह की आवाज़ निकली और मेरी चूत ने भी ढेर सारा पानी छोड़ दिया.
आज पापा मेरे को खीरे से मजा लेते देख रहे थे तो शायद इसी लिए मेरा ओर्गास्म इतना जबरदस्त था की मेरे मुंह से जोर की ओह ओह और आह आह की अव्वाज़ निकली। मेरी चूत से बहुत पानी निकला जिस से मेरी झांगे और सारी चूत गीली हो गयी.
मैंने खीरा अपनी चूत से बाहर खींच लिया. खीरा मेरी चूत के पानी से चमक रहा था।
इधर पापा का भी काम होने ही वाला था. पर उधर गधे का वीर्यपात और इधर अपनी नंगी बेटी की चूतना देख कर पापा से भी अपना आप संभाला नहीं गया.
पापा ने २-३ बार जोर से अपने लौड़े को हिलाया और जोर से आह की.
उनके मुंह से आवाज़ निकलते ही मैं समझ गयी की पापा का काम तमाम हो रहा है. मैंने अपनी सेक्स के मजे से बंद आँखों को थोड़ा सा खोल कर देखा तो पापा के लौड़े से उनके वीर्य की एक तेज और बहुत बड़ी सी धार एक पिचकारी जैसे छूटी जैसे बन्दूक से गोली चूत ती है,
पापा की पहली पिचकारी इतनी मोती और तेज थी कि वो कमरे की रेलिंग को पार करके नीचे नंगी लेटी मेरे पेट पर गिरी.
पापा का वीर्य इतना गाढ़ा और गर्म था की मेरी तो मजे से आँखें ही बंद हो गयी।
पापा एक बार तो डर गए की उनका वीर्य मेरे पेट पर गिर गया है, पर मैं जान भूझ कर ऐसे लेटी रही की जैसे कुछ नहीं हुआ.
पापा भी थोड़ा मुत्मइन हो गए.
मैंने एक हरकत ऐसी की जिस से पापा के लौड़े से पिचकारियां फिर से निकल पड़ी.
मैंने अपनी चूत में ऊँगली डाल कर अपने पानी से गीली ऊँगली मुंह में डाल ली (ऐसा मैंने इसलिए किया की पापा को शक न हो ) और फिर अपनी ऊँगली से अपने पेट पर गिरा पापा का वीर्य उठा कर अपने मुंह में डाल लिया।
असल में मैं पापा के वीर्य का स्वाद चखना चाहती थी, और यह तो भगवन के द्वारा दिया हुआ सुनहरी मौका था. जो पापा का वीर्य अपने आप मेरे पेट पर गिर गया था.
पापा ने जब मुझे उनका वीर्य चाट ते देखा तो उनके लण्ड ने फिर से वीर्य छोड़ना शुरू कर दिया. पर अब उस में वो तेजी न थी कि वो मुझ तक आ पाता।
पापा का वीर्य बहुत ही स्वादिष्ट था. मुझे तो अमृत जैसा स्वाद आ गया.
पापा मुझे अपना वीर्य चाटते देखते रहे. और अपना लण्ड धीरे धीरे सहलाते रहे.
उधर गधा गधी भी चले गए थे.
मैं भी कांपते और लड़खड़ाते हुए कदमो से उठी और अपने कमरे के अंदर चल दी.
मुझे आज बहुत ही आनंद आया था.
लग रहा था की मैं एक न एक दिन पापा से चुदवाने में सफल हो ही जाउंगी।
देखो भगवान् को क्या मंजूर था.
आज पापा को मुठ मारते देखते हुए अपनी चूत में ऊँगली और फिर खीरा घुसेड़ने से इतना मजा आया की मैं उसे बयान नहीं कर सकती.
अपनी गधा गधी वाली आज की पापा को पटाने की करवाई के बाद मैं कमरे में आ गयी. मैं सोच रही थी कि क्या मैं किसी दिन अपने पापा को पटाने में कामयाब हो भी जाउंगी या नहीं. क्योंकि हमारे भारतीय समाज में बाप बेटी का रिश्ता एक बहुत ही पवित्र रिश्ता होता है.
इस समाजिक रिश्ते की दिवार को तोड़ कर बाप बेटी में चुदाई का रिश्ता होना चाहे कहानियों में कितना ही लिखा जाये पर असल में काम ही होता है,
मैंने कमरे में आते ही कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। और फिर मैं मिरर के सामने खड़ी हो कर अपने बाल संवारने लगी।
मैं खुद को आईने में देख रही थी और मंद मंद मुस्कुरा रही थी. मेरे मन में अभी भी यही चल रहा था कि कैसे मेरे को नंगी को घूरे जा रहे थे वो अपनी पलकें भी नहीं झपकारहे थे।
क्या सच में मैं इतनी खुबसूरत लग रही हूं। फिर मैं धीरे से अपने कपडे निकाल देती हूँ.
अब मैं बिल्कुल नंगी थी मैंने अपनी चूत के बालों को साफ किया हुआ था। स्तन जो बड़े बड़े थे बिल्कुल सीधे तने हुए थे। हल्के भूरे रंग का घेरा था और उसके ऊपर छोटा सा निप्पल उनकी ख़ूबसूरती में चार चाँद लगा रहा था।
फिर मैंने पीछे से खुद को मिरर में अपनी उभरी हुई गांड देखि जो कि दूध सी सफेद थी, जिनको कोई एक बार देख ले पागल हो जाए।
बड़े-बड़े उबरे हुए नितमब जिनको न जाने कब मेरे पापा अपने हाथों से लूटते हैं।
अपने हुस्न को देख मैं मुस्कुराने लगती हूँ । मेर जिस्म अब इतना खिल गया था जिसे देख मैं खुद पर गर्व महसूस करती थी।
मैं खुद को आईने में देख सोचती हूँ कि मैं इतनी सुन्दर हूँ तो पापा भी अब मेरे को एक बार नंगी देख चुके हैं (पिछली बार तो उन्होंने मेरे को पैंटी में ही देखा था ).
पापा ने आज तो मेरे को नंगी अपनी चूत में ऊँगली करते देख कर मुठ भी मरी है तो मुझे आशा थी की यदि कभी पापा को अपनी बेटी को चोदने का मौका मिला तो वो उसे किसी भी हालत में छोड़ेंगे नहीं. बस मुझे दिक्कत थी तो इतनी ही थी, की अभी तो मेरी मम्मी गयी हुई है तो मैं कोशिश कर सकती हूँ पर जब मम्मी आ जाएगी तो मुश्किल होगा.
तो मैंने सोचा की आज पापा ने मुझे नंगी देख लिया है तो आज मुझे गर्म लोहे पर कुछ और चोट करने की कोशिश करनी चाहिए.
मैं सोच रही थी की आखिर पापा को अपनी चुदाई के लिए किस तरह पटाऊँ?